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Categories: बीच बहस

अर्थव्यवस्था के संकट के केंद्र में हैं मोदी

रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के उस भाषण की अभी काफी चर्चा है जिसमें उन्होंने अर्थ-व्यवस्था की बीमारी के मूल में मोदी सरकार की फिजूलखर्चियों की बातें कही थीं। वे अपने भाषण में तथ्य देकर बताते हैं कि जीडीपी का सात प्रतिशत से अधिक तो सरकार खुद पर ख़र्च कर लेती है। इसकी वजह से सबसे अधिक व्याहत हुए हैं निजी क्षेत्र में मध्यम और लघु क्षेत्र के उद्योग।

सरकार के पास इनमें निवेश के लिये रुपया ही नहीं बचता है। इन्हें बाजार से काफी ऊंची ब्याज की दरों पर बाजार से क़र्ज़ उठाना पड़ता है, जिसके बोझ को उठाने में अक्षम होने के कारण इनकी कमर टूटती जा रही है । यही बेरोज़गारी में बेतहाशा वृद्धि के मूल में है । रिजर्वबैंक के वेबसाइट पर विरल आचार्य का यह भाषण लगा हुआ है । ध्यान दें कि विरल आचार्य ने मोदी सरकार से ख़फ़ा होकर अपने कार्यकाल से छ: महीना पहले ही अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और अध्यापन का काम अपना कर विदेश चले गये हैं। सचमुच, यही आज का सबसे बड़ा संकट है ।

कहना न होगा, मोदी खुद इस पूरी समस्या के केंद्र में हैं । नोटबंदी से लेकर जीएसटी पर अनाप-शनाप ख़र्च और घाटा, बड़े-बड़े प्रचार आयोजन, ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं, पटेल की मूर्ति पर ढ़ाई हज़ार करोड़ का ख़र्च, यात्राओं पर दो हज़ार करोड़ का ख़र्च, मोदी के रख-रखाव पर निजी तौर पर हज़ारों करोड़ का ख़र्च, फिर चुनाव के ठीक पहले हज़ारों करोड़ सम्मान राशि के रूप में किसानों में, लाखों करोड़ बैंकों को एनपीए का घाटा पूरा करने में, लाखों करोड़ मुद्रा योजना के ज़रिये अपने कार्यकर्ताओं के बीच बंटवाने आदि में ख़र्च करने के कारण जीडीपी का अधिक से अधिक रुपया तो खुद मोदी स्वेच्छाचारी तरह से लुटाते रहे हैं ।

इसके बाद निजी या सरकारी क्षेत्र में निवेश के लिये रुपया कहां से आयेगा? अब आगे ये विदेश से सेवानिवृत्ति बांड के ज़रिये क़र्ज़ लेकर लुटाने की योजना बना रहे हैं । अर्थात् मोदी जाने के पहले भारत की सार्वभौमिकता को बेच कर जायेंगे । इस प्रकार मोदी व्यक्तिगत रूप से अब भारत की अर्थ-व्यवस्था का संकट बन चुके हैं।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक, मार्क्सवादी चिंतक और स्तंभकार हैं। आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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