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मोदी-विज्ञानः अज्ञान या फरेब?

आक्सीजन, पानी और एनर्जी देने वाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काल्पनिक टरबाइन सोशल मीडिया पर कई दिनों तक छाया रहा। देश और दुनिया में लोगोें को यह मजाक काफी पसंद आया। मोदी जी भी इस पर बात करते वक्त काफी खुश लग रहे थे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ज़रूर तकलीफ हुई कि प्रधानमंत्री के अज्ञान के बारे में बताने की हिम्मत उनके आस-पास के लोगोें में नहीं है।

मोदी विज्ञान की अपनी जानकारी का परिचय कई बार और भी दे चुके हैं। नाले के गैस को ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर चुके हैं और उस पर चाय बना चुके हैं। वह गणेश जी के हाथी के मस्तक को प्लास्टिक सर्जरी और महाभारत के योद्धा कर्ण का माता के गर्भ से जन्म नहीं लेने को टेस्ट ट्यूब विज्ञान बता चुके हैं। ऐसे ही विज्ञान का दर्शन मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक भी कराते रहे हैं।

क्या यह अज्ञान का मामला है? क्या उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पांचवीं कक्षा में पढ़ाए जाने वाले इस ज्ञान से नावाकिफ हैं कि कोई भी जानवर आक्सीजन लेकर कार्बन डाइआक्साइड छोड़ता है? उन्हें गाय आक्सीजन छोड़ती नजर आती है। क्या प्राचीन भारत में पुष्पक विमान के उड़ने से लेकर मिसाइल चलाने की क्षमता होने की कल्पना अज्ञान की उपज है? सच्चाई यह है कि ये कथाएं पहले से चलती रही हैं और हिंदुत्व की इतिहास-दृष्टि का हिस्सा हैं। इन सारी कथाओं का उद्देश्य प्राचीन भारत यानि हिंदू भारत की श्रेष्ठता दर्शाना है। लेकिन क्या बात श्रेष्ठता तक ही सीमित है?

ये कहानियां हिंदुत्व की राजनीति को सिर्फ सांप्रदायिकता का आधार ही नहीं देती हैं, बल्कि इसके आर्थिक एजेंडे को पूरा करने में मदद करती हैं। अंग्रेजों के समय में आरएसएस-हिंदू महासभा तथा मुस्लिम लीग जैसे संगठन धार्मिक श्रेष्ठता की बात कर समाज को बांटते थे। इससे आगे बढ़ कर आज़ादी के आंदोलन की पूरी विचारधारा और संघर्ष को नकारते थे। भारत के इतिहास को हिंदू युग, मुस्लिम युग और आधुनिक युग में बांटने का काम ब्रिटिश इतिहासकारों ने किया। उन्होंने ही हिंदू युग को श्रेष्ठ और मुसलमानों को हमलावर तथा भारत को पतन की ओर ले जाना वाला बताया।

तथ्य यह है कि मध्य युग में भी कई हिंदू राज्य थे और शासन करने के तरीके में हिंदू तथा मुस्लिम राजाओं में कोई फर्क नहीं था। उत्पादन की दृष्टि से भारत कभी पहले तो दूसरे नंबर पर होता था और एक निर्यात करने वाला देश था। साहित्य तथा संस्कृति के लिहाज से भी यह बड़ी ऊंचाई पर था। मध्ययुग में धार्मिक सुधार के क्रांतिकारी कार्य हुए तथा लोकभाषा में संतों तथा सूफियों ने कालजयी रचनाएं कीं। लेकिन देश की इन उपलब्धियों के बदले हिंदुत्व वादी प्राचीन भारत की उन उपलब्धियों के बारे में चर्चा करते रहे हैं जो काल्पनिक हैं।

वैदिक विज्ञान के बहाने उन्हें मध्य युग ही नहीं बल्कि प्राचीन भारत में बौद्ध दर्शन के प्रभाव में चिकित्सा तथा विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में हुई तरक्की को नकारने का मौका मिल जाता है। हिंदुत्व की लड़ाई सिर्फ मुसलमानों से नहीं है। यह बौद्ध तथा लोकायत चिंतन के भी खिलाफ है क्योंकि ये दर्शन बराबरी तथा विभिन्नता के पक्षधर रहे हैं।

आज़ादी के आंदोलन के इतिहास को गौर से देखने पर पता चलता है कि उपनिवेशवादी शोषण के लिए हो रहे विज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी के इस्तेमाल के खिलाफ कांग्रेस के नेताओं और देशभक्त बुद्धिजीवियों ने अपनी पूरी ताकत लगाई थी। उन्होंने देश के परंपरागत ज्ञान-विज्ञान तथा टेक्नालाॅजी को पुनर्जीवित करने की कोशिश करने के साथ आधुनिेक विज्ञान को हासिल करने का भी काम किया।

आधुनिक विज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी को अंग्रेजी सरकार के कब्जे से मुक्त करने के इस अभियान में बाल गंगाधर तिलक समेत कांग्रेस के तमाम नेता शामिल थे। तिलक ने स्वदेशी के तहत देशी उद्योग को आगे बढ़ाने और स्वदेशी कारखाने लगवाए तथा कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सहकारी स्टोर खुलवाए। महात्मा गांधी ने तो स्वदेशी को स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख कार्यक्रम ही बना दिया था। परंपरागत कारीगरी तथा आयुर्वेद, यूनानी जैसी चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देना स्वदेशी अभियान का हिस्सा था।

देश के राष्ट्रवादी वैज्ञानिक परंपरागत ज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी पर शोध के साथ-साथ इसे औद्योगिक विस्तार देने के काम में लगे थे। प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रफुल्ल चंद्र राय ने बंगाल केमिकल्स की स्थापना की थी जिसमें आयुर्वेदिक दवाओं के आधुनिक तरीके से उत्पादन होता था।

लेकिन गांधी जी आयुर्वेद तथा यूनानी जैसी पद्धतियों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचे बगैर अपनाने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने 1921 में दिल्ली के तिब्बिया कालेज की स्थापना के समारोह में वैद्यों तथा हकीमों को आधुनिक शोध का सहारा लेने की सलाह दी थी। एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की अच्छी बातों को अपनाने तथा देशी चिकित्सा पद्धतियों को जड़ता से मुक्त कराने की सलाह वह हरदम देते रहते थे।

विज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी के लिए ब्रिटेन पर निर्भरता खत्म करने के इस अभियान में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. मेघनाद साहा ने तो तीस के दशक में अभियान ही छेड़ रखा था। इस अभियान को जवाहरलाल नेहरू का समर्थन हासिल था। डॉ. साहा की पहल के कारण 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस  ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में राष्ट्रीय योजना समिति बनाई थी जिसने देश में वैज्ञानिक विकास की रूपरेखा तैयार की थी।

परंपरागत हुनर को जीवित रखने तथा देश को आत्मनिर्भर बनाने में इसकी अहम भूमिका सुनिश्चित करने के लिए गांधी जी ने 1934 में आल इंडिया विलेज इंडस्ट्रीज एसोसिएशन की स्थापना की थी। इसके सलाहकार मंडल में जगदीशचंद्र बोस तथा सीवी रमन जैसे उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे।

नई तालीम के लिए वर्धा में आयोजित कांफ्रेंस ने डॉ. जाकिर हुसैन कमेटी बनाई थी। कमेटी ने 1938 में जारी अपनी रिपोर्ट में देशी कारीगरी के साथ आधुनिक विज्ञान की पढ़ाई की सिफारिश की थी।

अंग्रेजों के आने से पहले के भारतीय दर्शन तथा विज्ञान की स्थिति को लेकर भी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान के लिए काफी शोध हुए और गणित, खगोलशास्त्र, ज्यामिति और बीजगणित के उत्कृष्ट ग्रंथों को खोज निकाला गया। भारत में विज्ञान के इतिहास पर गौर करने पर पता चलता है कि गणित, बीजगणित तथा खगोल शास्त्र में भारतीयों की दिलचस्पी वेद के समय से बनी थी और यह मध्ययुग तक बनी रही। अंग्रेजों के आने के बाद भारत की कारीगरी तथा परंपरागत ज्ञान की प्रणाली खत्म सी हो गई।  नई शिक्षा पद्धति भी पश्चिमी ज्ञान के विस्तार के बदले सीमित शिक्षा और अंग्रेजी शासन के लिए क्लर्क पैदा करने की प्रणाली बन गई।

महात्मा गांधी से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर तक परंपरागत ज्ञान के संरक्षण तथा विकास में लगे थे। साथ ही, वे आधुनिक विज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी के मामले में अंग्रेजों पर अपनी निर्भरता खत्म करने का काम कर रहे थे।

लेकिन हिंदुत्ववादी इस काम में मदद देने के बदले उस विज्ञान को प्रचारित करने में लगे थे जो काल्पनिक था। उन्हें उस कारीगरी तथा ज्ञान से कुछ लेना-देना नहीं था जिनके खत्म होने से जनता बेरोजगार हुई थी। उन्हें बंगाल के बुनकरों और बिहार में लोहा बनाने वाले उन कारीगरोें से कोई लेना-देना नहीं था जिसे अंग्रेजों ने रातोंरात भिखारी बना दिया। ऐसे अनेक उद्योग नष्ट हो गए।  गांधी जी खादी तथा स्वदेशी के जरिए अंग्रेजों की नीति से उजड़ गए लोगों की मुक्ति की कोशिश कर रहे थे।

लेकिन उपनिवेशवाद से सीधे संघर्ष में योगदान करने के बदले हिंदुत्ववादी विमान से लेकर प्लास्टिक सर्जरी की क्षमता का काल्पनिक दावा कर रहे थे। इस काम में सबसे आगे आर्य समाज था जो वेदों में सारा ज्ञान होने का दावा करता था। यह एक स्तर पर सांप्रदायिकता फैला रहा था और दूसरे स्तर पर अंग्रेजोें के खिलाफ आर्थिक लड़ाई को कमजोर कर रहा था। वेदों में विमान के ज्ञान के प्रचार से अंग्रेजों का क्या बिगड़ने वाला था? जब देश स्वदेशी और विदेशी वस्तुओं के बायकाॅट की ओर बढ़ रहा था, हिंदू महासभा नेता महामना मदन मोहन मालवीय अंग्रेजी सरकार की ओर से बनाए गए इंडस्ट्रियल कमीशन के सदस्य थे और उनके फायदे वाली नीतियों के लिए काम कर रहे थे। तीस के दशक में जब स्वदेशी आंदोलन अपनी जड़ें गहरी कर रहा था तो हिंदू महासभा सैनिक शिक्षा का प्रचार कर सरकार को सहयोग कर रहे थे और हिंदुओं को काल्पनिक विज्ञान पढ़ा रहे थे। सैकड़ों साल की उस भारतीय कारीगरी से उनका कोई लेना-देना नहीं था जिसने एक समय दुनिया में अपना सिक्का जमा रखा था।

प्रधानमंत्री मोदी का काल्पनिक वैदिक विज्ञान पर जोर देना या टरबाइन से आक्सीजन, पानी तथा बिजली बनाने की बात करना ऊपरी तौर पर अज्ञान का मामला दिखता है, लेकिन ऐसा नहीं है। यह हिंदुत्व की उसी विचारधारा का अगला भाग है जो आजादी के पहले अंग्रेजोें का हित साधती था और आज विदेशी तथा विदेशी पूंजीपतियों की मदद करती है।

मोदी के शासनकाल में देश की उन तमाम शोध संस्थाओं की आर्थिक सहायता कम कर दी गई है जो विश्व-स्तर का शोध कार्य कर रही थीं। यही नहीं रेलवे, रक्षा, टेलीफोन समेत अनेक उद्योगों में चल रहे शोध लगभग ठप कर दिए गए हैं ताकि विदेशी तकनीक लाई जा सके। देशी पूंजीपतियों को शोध करने में कोई रुचि नहीं है। वह विदेशी तकनीक के सरल मार्ग पर चल कर अपनी कमाई में लगा है। कोरोना काल में यह ज्यादा साफ तौर पर दिखाई  दे रहा है। कोविड की दवाई तथा इसका वैक्सीन बनाने की कोई सरकारी पहल करने के बजाय मोदी ने थाली बजाने और दीया जलाने का कार्यक्रम किया और हिंदुत्व के प्रचार-तंत्र ने इसे वैज्ञानिक सिद्ध किया। देश की जान-माल से खिलवाड़ के उदाहरण कम ही मिलते हैं।

विज्ञान तथा तकनीक की जनविरोधी नीतियों को ढंकने का इससे अच्छा उपाय क्या हो सकता है कि लोगों को काल्पनिक तथा हंसी पैदा करने वाले विज्ञान में उलझाए रखा जाए? मोदी और भाजपा का विज्ञान अज्ञान नहीं, फरेब है।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on October 13, 2020 5:35 pm

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