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लखनऊ का जनांदोलन और इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश

देश के अन्य शहरों की तरह नए नागरिकता कानून औऱ एनसीआर के विरोध में महिलाओं का एक आंदोलन लखनऊ शहर में, घन्टाघर पर चल रहा है। यह आंदोलन भी दिल्ली के शाहीनबाग आंदोलन की तर्ज पर है जो किसी एक राजनीतिक दल के आह्वान पर नहीं बल्कि स्वयंस्फूर्त रूप से चल रहा है। इसकी कमान भी मुख्यतः महिलाओं के ही हाथों में हैं। वे महिलाएं भी अधिकतर गृहिणियां ही हैं। इसी आंदोलन के दौरान 19 दिसंबर को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के समय लखनऊ में हिंसा भड़क उठी थी और पुलिस के बल प्रयोग के साथ साथ सार्वजनिक संपत्ति का भी नुकसान हुआ।

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू होने के बाद हुए लखनऊ के प्रदर्शन में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले 57 लोगों की तस्वीरें, उनके नाम-पते के साथ प्रशासन ने मुख्य चौराहों पर पोस्टर के रूप मे लगा दी हैं। यह होर्डिंग उन इलाकों में लगवायी गयी, जहां आंदोलनकारियों द्वारा तोड़फोड़ करने का आरोप है। इन 57 लोगों से 88,62,537 रुपए की वसूली करने की बात कही जा रही है।19 दिसंबर को लखनऊ के चार थाना क्षेत्रों में अचानक हिंसा फैल गई थी।

इन क्षेत्रों में ठाकुरगंज, हजरतगंज, केसरबाग और हसनगंज का नाम शामिल है। तब राज्य सरकार ने नुकसान की भरपाई उपद्रवियों से करवाए जाने की बात कही थी। इसके बाद पुलिस ने घटनास्थल के फोटोग्राफ और विभिन्न वीडियो क्लिप्स के आधार पर 150 से अधिक लोगों को नुकसान की भरपाई के लिये नोटिस भेजे थे। इनमें जांच के बाद मिले सबूतों के आधार पर प्रशासन ने 57 लोगों को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का दोषी पाया था।

जब इन लोगों, जिनसे धन वसूली की बात की जा रही है, की फ़ोटो सार्वजनिक रूप से चौराहे पर लगायी गयीं तो इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसका स्वतः संज्ञान लिया और सरकार को नोटिस जारी कर के पूछा कि, ये फोटो किस कानून के अंतर्गत लगाए गए हैं। इलाहबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान तोड़फ़ोड़ के आरोप में लोगों के फ़ोटो चौराहों पर लगा कर बदनाम करना, एक ग़ैर क़ानूनी कदम है। अदालत ने कहा है कि यूपी पुलिस द्वारा सीएए विरोधी आंदोलन में शामिल लोगों के फ़ोटो होर्डिंग्स पर लगाने का फ़ैसला नागरिकों की निजता, सम्मान और उनकी स्वतंत्रता के हनन का मामला है। लखनऊ प्रशासन ने सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हिंसा के अभियुक्तों के फ़ोटो वाली इन होर्डिंग्स पर इन लोगों के नाम और पते लिखे गये हैं।

अदालत ने 8 मार्च सुनवाई के दौरान सरकार को कड़ी फ़टकार भी लगाई और कहा कि ” बेहतर होगा कि आप ग़लती सुधार ले।” 9 मार्च को इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने, लखनऊ के डीएम और पुलिस कमिश्नर को अविलंब सभी पोस्टर, बैनर और फोटो आदि हटाने के आदेश दिेए हैं। अदालत ने 16 मार्च तक का समय देते हुए हाईकोर्ट के महानिबंधक के समक्ष सभी पोस्टर हटाए जाने संबंधी कार्रवाई की रिपोर्ट जमा करने को भी कहा है।

इलाहबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में बेहद गंभीर रूख अपनाते हुए रविवार यानि छुट्टी के दिन ही इसकी सुनवाई रखी थी। 8 मार्च को 3 बजे शुरू हुई सुनवाई क़रीब एक घंटे से ज़्यादा समय तक चली। इस सुनवाई में इलाहबाद हाइकोर्ट ने सरकार से कई सवाल पूछे थे। जिनके नाम और तस्वीरें होर्डिंग्स पर लगाई गई हैं उन्हें सीएए प्रोटेस्ट के दौरान राज्य की संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई के लिए कहा गया है। होर्डिंग्स पर लिखा गया है कि अगर यह नुकसान की भरपाई नहीं करते हैं तो इनकी संपत्ति नीलाम कर दी जाएंगी।

पोस्टर लगाए जाने के विवादित मामले में यूपी सरकार अदालत में हुई सुनवाई के दौरान अपने स्टैंड पर पूरी तरह कायम रही और एडवोकेट जनरल तथा एडिशनल एडवोकेट जनरल द्वारा सरकार की तरफ से कहा गया कि इस मामले में नियमों का पूरी तरह पालन किया गया है। जिन आरोपियों की तस्वीरें लगाई गईं, उनमें से एक एक के बारे में पुख्ता सबूत जुटाए गए हैं। वीडियो फुटेज व तस्वीरों से मिलान कर आरोपियों की पहचान की गई। उसके बाद ही पोस्टर व तस्वीरें लगाई गई हैं। सरकार की तरफ से इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का हवाला भी दिया गया। सरकारी वकीलों ने इस मामले को पीआईएल यानी याचिका के रूप में तब्दील किये जाने के हाईकोर्ट के फैसले पर भी एतराज जताया और कहा कि अगर ऐसे मामलों में किसी को आपत्ति हो सकती है तो वह सिर्फ उन आरोपियों को ही, जिनकी तस्वीरें पोस्टरों में लगाई गई हैं।

सरकार की तरफ से अदालत में कहा गया कि इलाहबाद हाईकोर्ट को इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेने का कोई अधिकार नहीं है। जबकि यह होर्डिंग इलाहबाद हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आने वाली उत्तर-प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लगायी गयी हैं। इलाहबाद हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोविंद माथुर ने जवाब देते हुए कहा कि पूरे उत्तर-प्रदेश के मामले, इलाहबाद हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।इलाहबाद हाईकोर्ट की वेबसाइट पर बताया गया था कि ‘कोर्ट ने खुद ही इस केस को अपने हाथ में लिया है। लखनऊ को चौराहों पर लगी ये होर्डिंग्स बाक़ायदा मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के आदेश पर लगाई गई हैं।’

सीएए का सड़क पर उतर कर विरोध करने वालों में एक वरिष्ठ आईपीएस अफसर, एसआर दारापुरी का भी नाम है। दारापुरी ने इस अदालती हस्तक्षेप पर कहा है कि “शहर में होर्डिंग लगाया जाना हमारी निजता, सम्मान और नागरिकों की आजादी के अधिकार का हनन है। जिस तरह का व्यवहार राज्य सरकार कर रही है और हमारे होर्डिंग लगा रही है, न्यायपालिका द्वारा इसका संज्ञान लिया जाना एक स्वागत योग्य कदम है। हमारे मुक़दमे में हमारी फोटोग्राफ ली गई है। मुझे नहीं पता यह तस्वीरें कहां से ली गई हैं। यह गैरकानूनी है और सरकार ने इसे होर्डिंग्स पर लगा दिया। यह हमारी निजता का उल्लंघन है और इससे हमारी जिंदगी और हमारी स्वतंत्रता को खतरा है। मैं इसके लिए राज्य को जिम्मेदार मानता हूं। “

सार्वजनिक संपत्ति के विनाश के खिलाफ कानून के बावजूद देश भर में विरोध प्रदर्शनों के दौरान दंगा, बर्बरता और आगज़नी की घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। चाहे राजस्थान में गुर्जरों द्वारा किया गया आरक्षण के संदर्भ में होने वाला आंदोलन हो या हरियाणा में जाटों का आंदोलन या रामरहीम की सज़ायाबी पर होने वाला हिंसक आंदोलन हो, या अभी हाल ही में हुए जामिया, जेएनयू से जुड़े आंदोलन, इन सब आंदोलनों में सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ है और आगे भी ऐसे आंदोलन होंगे ही।

यह कल्पना करना मुश्किल है कि आगे होने वाले आंदोलन हिंसक नहीं होंगे। बल्कि इससे पहले हुए आरक्षण समर्थक और विरोधी आंदोलनों में तो व्यापक रूप से हिंसा हुयी है। पर कभी भी किसी सरकार ने सरकारी संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिये ऐसे कदम नहीं उठाए हैं। जैसा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस समय उठाया है। लेकिन यह तर्क कि पहले जब कार्यवाही नहीं हुयी तो अब भी नहीं हो सकती है न्याय के लिये निर्बल और बेमतलब का तर्क है।

संसद ने सार्वजनिक संपत्तियों के सरक्षण के लिये एक कानून, लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984 पारित किया है जिसमें ऐसे लोगों को दंडित करने का प्राविधान है। इस अधिनियम के अनुसार, “अगर कोई व्यक्ति किसी भी सार्वजनिक संपत्ति को दुर्भावनापूर्ण कृत्य द्वारा नुकसान पहुँचाता है तो उसे पाँच साल तक की जेल अथवा जुर्माना या दोनों सज़ा से दंडित किया जा सकता है।”

इस अधिनियम के अनुसार लोक संपत्तियों में निम्नलिखित को शामिल किया गया है-

● कोई ऐसा भवन या संपत्ति जिसका प्रयोग जल, प्रकाश, शक्ति या उर्जा के उत्पादन और वितरण किया जाता है।

● तेल संबंधी प्रतिष्ठान

● खान या कारखाना

● सीवेज संबंधी कार्यस्थल

● लोक परिवहन या दूर-संचार का कोई साधन या इस संबंध में उपयोग किया जाने वाला कोई भवन, प्रतिष्ठान और संपत्ति।

व्यवहारिक रूप से इस कानून का उपयोग कम ही किया गया है। क्योंकि सबसे बड़ी समस्या इस कानून के अनुसार उस व्यक्ति की पहचान कर उसे दोषी सिद्ध करने की है जिसने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने कई मुकदमों की सुनवाई करते हुए अनेक अवसरों पर इस कानून को दंड देने के लिये अपर्याप्त बताया है और कई दिशा-निर्देशों को जारी कर के इस कानून के कई छिद्रों को बंद करने का भी प्रयास किया है। वर्ष 2007 में सार्वजनिक और निजी संपत्तियों के बढ़े पैमाने पर हुए नुकसान के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पूर्व न्यायाधीश केटी थॉमस और वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन की अध्यक्षता में दो समितियों का गठन किया और उनसे सुझाव आमंत्रित किये जिससे, इस कानून में बदलाव के लिये स्पष्ट दिशा निर्देश दिए जा सकें।

वर्ष 2009 में ‘डिस्ट्रक्शन ऑफ पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टीज़ एक्ट के अंतर्गत, स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश और अन्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त समितियों की सिफारिशों के आधार पर कुछ दिशा-निर्देश जारी किये, जो आप नीचे पढ़ सकते हैं। केटी थॉमस समिति ने सार्वजनिक संपत्ति के विनाश से जुड़े मामलों में आरोप सिद्ध करने की ज़िम्मेदारी की वर्तमान स्थिति को भी बदलने की सिफारिश की।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशा निर्देशों के अनुसार,

● सामान्यतः अभियोजन को यह साबित करना होता है कि किसी संगठन द्वारा की गई प्रत्यक्ष कार्रवाई में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा है और आरोपी ने भी ऐसी प्रत्यक्ष कार्रवाई में भाग लिया।

● परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक संपत्ति से जुड़े मामलों में कहा कि ,आरोपी को ही स्वंय को बेगुनाह साबित करने की ज़िम्मेदारी दी जा सकती है।

● न्यायालय को यह अनुमान लगाने का अधिकार देने के लिये कानून में संशोधन किया जाना चाहिये कि अभियुक्त सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने का दोषी है।

● सामान्यतः कानून यह मानता है कि अभियुक्त तब तक निर्दोष है जब तक कि अभियोजन पक्ष इसे साबित नहीं कर पाता।

● नरीमन समिति की सिफारशें सार्वजनिक संपत्ति के विनाश की क्षतिपूर्ति से भी संबंधित थीं।

● क्षतिपूर्ति सम्बंधित सिफारिशों को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि प्रदर्शनकारियों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का आरोप तय करते हुए, संपत्ति में हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति करने के लिये क्षतिपूर्ति शुल्क भी लिया जाएगा।

● सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को भी ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के दिशा-निर्देश जारी किये तथा सार्वजनिक संपत्ति के विनाश के कारणों को जानने तथा क्षतिपूर्ति की जाँच के लिये एक तंत्र की स्थापना करने के लिये कहा।

सार्वजनिक संपत्ति के विनाश से जुड़े कानून की तरह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी किये गए इन दिशा-निर्देशों का भी कोई बहुत प्रभाव नहीं पड़ा है क्योंकि ऐसे मामलों में प्रदर्शनकारियों की पहचान करना अभी भी मुश्किल है, विशेषतः उन मामलों में जब किसी नेता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से विरोध-प्रदर्शन का आह्वान नहीं किया जाता है। वर्ष 2015 में पाटीदार आंदोलन के बाद हार्दिक पटेल पर हिंसा भड़काने के लिये यही कानून लगा था पर अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर सका कि सरकारी संपत्ति के नुकसान में उनकी क्या भूमिका थी। सर्वोच्च न्यायालय में यह तर्क दिया गया कि चूँकि न्यायालय के पास हिंसा भड़काने से संबंधित कोई सबूत नहीं है इसलिये उसे संपत्ति के नुकसान के लिये उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने यह तर्क मान लिया।

वर्ष 2017 में एक दिलचस्प याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी। एक व्यक्ति को सड़क जाम कर रहे एक आंदोलन के कारण 12 घन्टे तक सड़क पर ही रुकना पड़ गया। उक्त याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसे लगातार चल रहे एक आंदोलन के कारण सड़क पर 12 घंटे से अधिक समय बिताने के लिये मजबूर किया गया था। कोशी जैकब बनाम भारत संघ नामक इस मामले के फैसले में न्यायालय ने पुनः कहा कि इस कानून को समय और परिस्थितियों के अनुसार अद्यतन करने की आवश्यकता है। इस मामले में याचिकाकर्ता को कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया और उसकी हर्जाने की मांग खारिज कर दी क्योंकि विरोध-प्रदर्शन करने वाले न्यायालय के सामने उपस्थित नहीं थे और यह साबित भी करता मुश्किल था, कि विरोध में किसकी कितनी भूमिका थी।

एक कटु सत्य यह है कि शांतिपूर्ण आंदोलन एक भ्रम है। यह मैं व्यवहारिक अनुभव और इतिहास में हुए अनेक बड़े छोटे आंदोलनों के अध्ययन के आधार पर कह रहा हूं। अमूमन कोई भी आंदोलन शांतिपूर्ण रहता नहीं है। उसकी शुरुआत ज़रूर शांतिपूर्ण उद्देश्य और तऱीके से हो फिर भी उसके अशान्तिपूर्ण हो जाने की संभावना बनी ही रहती है। उसमें हिंसा हो ही जाती है। जब महात्मा गांधी द्वारा संचालित जन आंदोलन अहिंसक नहीं रह पाए तो शेष आंदोलन कैसे अहिंसक रह पाएंगे, यह ध्यान देने की बात है।

गांधी विश्व भर में अहिंसात्मक सत्याग्रह और आंदोलनों के जन्मदाता के रूप में जाने जाते हैं। दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ उनका सत्याग्रह ज़रूर अहिंसक रहा, पर 1921 का असहयोग आंदोलन चौरीचौरा कांड के बाद हिंसक हो गया। गांधी ने यह कहते हुए आंदोलन वापस ले लिया कि जनता में अभी इतना नैतिक बल नहीं है कि वह अहिंसक रूप से खड़ी हो सके। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में तो जमकर हिंसा हुयी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि वह आंदोलन एक स्तर पर आकर नेतृत्वविहीन और स्वयंस्फूर्त हो गया था। लेकिन कुछ अपवाद भी है।

दो साल पहले किसानों का मुंबई लांग मार्च जो वामपंथी दलों द्वारा संचालित था वह पूरी तरह से अहिंसक रहा और उसकीं प्रशंसा भी हुयी। शांतिपूर्ण आंदोलनों के हिंसक होने के कई कारणों में दो प्रमुख हैं आंदोलनकारी उत्तेजित होकर खुद ही हिंसक हो जाय या कोई बाहरी असामाजिक तत्व उसमें घुस कर हिंसा फैला दें। लेकिन यह आंदोलन के नेतृत्व करने वालों की जिम्मेदारी है कि वे आंदोलन को न तो हिंसक होने और न अपने लक्ष्य से भटकने दें।

हिंसक आंदोलन अक्सर विफल होकर टूट जाते हैं और अपने लक्ष्य से भटक भी जाते हैं। हिंसा, उन्मादावस्था का परिणाम होती है और उन्माद एक अस्थायी तथा तात्कालिक मनोभाव है। कोई भी व्यक्ति हरदम, क्रोध, घृणा, प्रतिशोध, और हिंसा के भाव मे नहीं रह सकता है। विज्ञान का यह सिद्धांत कि हर चीज़ अपनी सामान्य दाब और तापक्रम पर आकर स्थिर हो जाती है, मनोभावों के लिये भी लागू होता है। पुलिस सबसे अधिक असहज होती है अहिंसक धरने और प्रदर्शन से।

अगर शांतिपूर्ण धरना चल रहा है और आंदोलनकारी व्यवस्थित तरह से उसे लगातार चला रहे हैं, केवल भाषण और नारेबाजी हो रही है, लोग शांतिपूर्ण तरह से बैठे हैं और कोई हिंसा नहीं हो रही है तो अक्सर ऐसे आंदोलन के समय पुलिस केवल एक घेरा बनाकर बैठ जाती है। धरने के जवाब में चुपचाप बैठे रहना भी खलने लगता है। लगता है, आंदोलनकारी और पुलिस, दोनों ही एक दूसरे को थका देना चाहते है। तब पुलिस और प्रशासन न तो बल प्रयोग कर पाता है और न ही आंदोलनकारियों को दौड़ा ही पाता है।

ऐसी स्थिति में, तब आंदोलन को खत्म करने के लिये आंदोलनकारी नेताओं और प्रशासन की तरफ से आपसी बातचीत भी होती रहती है और समस्या के समाधान तक पहुंचने की कोशिश होती है। अक्सर बातचीत सफल भी हो जाती है लेकिन यह आपसी बातचीत करने वालों के स्वभाव और कौशल पर भी निर्भर करता है।

लेकिन हिंसा के बाद अगर सार्वजनिक संपत्ति जैसे बस, रेल, डाकखाने या सरकारी इमारतें आदि में आगजनी और तोड़फोड़ होती है तो उसमें मुक़दमे कायम होते हैं और फिर कानूनी कार्यवाही होती है। हिंसा होते ही पुलिस को आंदोलनकारियों को भगाने और गिरफ्तार करने का अवसर मिल जाता है। अब चूंकि सीसीटीवी कैमरे आदि लगभग सभी महत्वपूर्ण जगहों पर लग गए हैं तो, ऐसी हालत में उपद्रव करने वालों की पहचान आसानी से हो भी जाती है।

जन आंदोलनों में व्यापक हिंसा इधर एक आदत सी बन गयी है। राजस्थान में होने वाला गुर्जर आरक्षण आंदोलन, हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन, आदि हाल में हुए व्यापक हिंसक आंदोलन रहे हैं। इनमें मुक़दमे भी कायम हुये हैं और जांच कमीशन भी बैठे हैं। पर न तो मुकदमों में कुछ उल्लेखनीय प्रगति हुयी और न ही जांच कमीशन के रिपोर्ट की सिफारिश मानी गयी। शांति हुयी सब भूल गए। इससे आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ता है।

हरियाणा में जब जाट आरक्षण के समय हिंसक आंदोलन और व्यापक तोड़फोड़ हुयी तो उसकी जांच के लिये पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी गठित हुयी थी। उन्होंने जांच की और अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, पर जब उन्होंने हिंसक गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिये अपनी सिफारिशों की अंतिम रिपोर्ट तैयार की तो सरकार ने उन्हे वहीं रोक दिया। प्रकाश सिंह ऐसे पुलिस अफसर नहीं हैं कि वे डिक्टेटेड लाइन पर अपनी जांच रिपोर्ट सौंपे।

उनकी रिपोर्ट से हरियाणा के असरदार जाट नेता और अफसर जब घिरने लगे तो उनक़ी रिपोर्ट पर सरकार खामोश हो गयी और इस प्रकार उसने,खुद को असहज होने से बचाया। पश्चिम बंगाल में ऐसे हिंसक आंदोलनों के उल्लेख से इतिहास भरा पड़ा है। यही स्थिति असम और नॉर्थ ईस्ट की भी है। छोटे-छोटे जनजाति कबीलों में बंटा नॉर्थ ईस्ट अक्सर मिथ्या अस्मिता के सवाल पर एक दूसरे से उलझता रहता है। यह कबीलाई संस्कृति लोगों को एकजुट तो किये रहती है पर कबीलाई अहंकार उन्हें हिंसक भी बना देता है।

लोकतंत्र में चाहे सरकार कितनी भी काबिल हो जनता अपनी बात कहने के लिये आंदोलन का रास्ता अपनाएगी ही। आंदोलन करने का अधिकार हमारा संविधान भी देता है। शाहीनबाग सत्याग्रह के सम्बंध में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन और आंदोलन जनता का मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा भेजे गए वार्ताकार सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट, संजय हेगड़े और गीता रामचंद्रन ने भी उनके आंदोलन को सही ठहराया और सड़क जाम के आरोप के मामले में यह भी पाया कि सड़कों पर कुछ अनावश्यक अवरोध पुलिस ने ही लगाए हैं। लेकिन आन्दोलनों में हिंसा न हो यह भी उतना ही आवश्यक है जितना की विरोध।

ऐसा नही है कि आंदोलनों या दंगों में होने वाली हिंसा केवल आंदोलनकारियों द्वारा की जाती है। बल्कि पुलिस भी जब बलप्रयोग करती है तो ऐसे नुकसान उससे भी हो जाते हैं। क्या कोई कानून ऐसा है जो सुरक्षा बलों द्वारा किये गये ऐसे नुकसान की भरपाई करे? शायद नहीं। हरियाणा में हुए जाट आंदोलन और रामरहीम के चेलों द्वारा की गयी हिंसा में जो व्यापक नुकसान हुआ है उस पर कोई भी नुकसान वसूली की कार्यवाही वहां की सरकार ने नहीं की।

ऐसा ही राजस्थान के गूजरों और गुजरात के पाटीदार आंदोलन के समय भी हुआ। कानून को जब सरकार अपनी सुविधा, मनमर्जी और राजनीतिक एजेंडे से लागू करती है तो सवाल खड़े ही होंगे। जैसा कि लखनऊ के पोस्टर कांड में हुआ है। मुख्यमंत्री का यह बयान कि सरकार बदला लेगी यह बताने के लिये पर्याप्त है कि सरकार बदले की कार्यवाही से इस सीएए विरोधी आंदोलन को कुचलने में लगी है। तभी इलाहाबाद हाईकोर्ट को लखनऊ पोस्टर मामले में स्वतः संज्ञान लेना पड़ा।

सीएए विरोधी आंदोलनों के कारण दिल्ली में व्यापक हिसक घटनाएं हुयीं। 50 से अधिक लोग मारे गए और 200 से अधिक लोग घायल हैं। सरकार और पुलिस की भूमिका को लेकर दुनियाभर मे सवाल उठ रहे हैं और इससे प्रधानमंत्री की वैश्विक छवि पर भी असर पड़ रहा है। सीएए विरोधी आंदोलनों में सरकार ने एक बार भी आंदोलनकारियों से बात कर के समझाने और मामला हल करने की कोशिश नहीं की। बल्कि अनावश्यक बल प्रयोग करके स्थिति और बिगड़ने दिया।

यहां तक की सीएए से सबसे अधिक प्रभावित असम और नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में भी सरकार ने बातचीत का रास्ता नहीं अपनाया। वह इस सिद्धांत पर अमल कर रही है कि एक न एक दिन चीजें अपने आप ही ठीक होने लगती हैं ! लेकिन जब किसी आंदोलन के साथ सरकार की बातचीत नहीं होती है तो आंदोलन के हिंसक होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। लोकशाही में सरकार का संवेदनशील होना बहुत ज़रुरी है अन्यथा एक ठस, संवेदनहीन और अहंकारी सरकार न केवल खुद विफल हो जाती है बल्कि देश को भी अराजकता में ठेल देती है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 10, 2020 9:15 am

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