Sunday, June 26, 2022

कुपोषण को कृत्रिम नहीं, प्राकृतिक तरीकों से ही किया जा सकता है दूर: फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट

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भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के क़ानूनी नियमों और भारत सरकार के दिशा-निर्देशों का सरकार खुद ही उल्लंघन कर रही है। भारत सरकार के दिशा-निर्देश में फोर्टीफाईड चावल के बोरों या पैकेटों में लेबल लगाना क़ानूनी बाध्यता है। थैलीसीमिया से पीड़ित लोग और सिकल सेल एनीमिया वाले व्यक्तियों को चेतावनी देते हुए आयरन फोर्टीफाईड भोजन के प्रत्येक पैकेज पर विवरण देना अनिवार्य है। लेकिन कुछ बोरों में चेतावनी अंग्रेजी में प्रिंटेड होता है तो कुछ हिंदी में। लेकिन इस सम्बन्ध में डीलरों को कोई जानकारी नहीं दी गई है और कुछ बोरों में तो चेतावनी प्रिंटेड ही नहीं होते हैं।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों, महिला एवं बाल विकास के अधिकारियों तथा स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अधिकारियों को इस नए किस्म के खाद्यान्न के सम्बन्ध में बिल्कुल अंधेरे में रखा गया है। यदि स्कूल के मध्याह्न भोजन और आंगनबाड़ी के बच्चों को फोर्टीफाईड चावल के खाने से स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं हो जाती हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेवार होगा? जाहिर सी बात है कोई अधिकारी इसकी जवाबदेही नहीं लेना चाहेगा, जो राज्य में आमतौर पर देखा जाता रहा है।

रांची के रिम्स के चिकित्सकों ने बताया है कि राज्य में 60 से 70 हजार ऐसे पंजीकृत मामले हैं जो थैलीसिमिया व सिकलसेल एनीमिया से पीड़ित हैं। स्कूल आधारित स्क्रीनिंग से 10-20% स्क्रीनिंग के परिणाम पॉजिटिव हो रहे हैं। यह स्थिति तब है जब राज्य में जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ऐसी गंभीर बीमारियों की जांच की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है। इतनी बड़ी आबादी को सरकारें फोर्टीफाईड चावल खिलाकर उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रही हैं।

ये तमाम बातें एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में उभरकर सामने आई हैं।

फैक्ट फाइंडिंग टीम ने झारखंड के जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में पूर्वी सिंहभूम के चाकुलिया के बोडामचट्टी गांव के क्रमश: 12  और 7 साल के दो भाइयों से मुलाकात की थी। उन दोनों नौनिहालों को रक्त विकार संबंधी आनुवंशिक बीमारी है, जिन्हें एक नियत अन्तराल में खून चढ़ाया जाता रहा है। उनके माता-पिता ने बताया कि हाल के दिनों में बच्चों को साप्ताहिक रक्त चढ़ाना पड़ रहा है। जबकि यह अन्तराल पहले लगभग एक माह हुआ करता था। परिवार इतना गरीब है कि उनके समक्ष पीडीएस चावल के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

बता दें कि उक्त मामला बोडामचट्टी गांव के विश्वनाथ सोरेन, पत्नी मैनो सोरेन और बेटी मधु सोरेन की है। पहले इन दोनों बच्चों को 1 महीने के अन्तराल में खून चढ़ाना पड़ता था। लेकिन फोर्टीफाईड चावल जो जनवरी 2022 से पीडीएस डीलर के माध्यम से दिया जा रहा है। उसके लगातार सेवन से अब दोनों बच्चों को साप्ताहिक खून चढ़ाना पड़ रहा है। दोनों को क्रमश: 3 और 2 यूनिट खून चढ़ाना पड़ता है। 1 यूनिट खून की कीमत 450 रुपये है। रक्त चढ़ाने का काम सिर्फ जमशेदपुर में होता है जो बोडामचट्टी से काफी दूर है और बहुत खर्चीला है।

भोजन का अधिकार अभियान और झारखण्ड सीएसओ फोरम द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त के पूर्व राज्य सलाहकार सदस्य बलराम ने बताया कि झारखण्ड में खाद्य सुरक्षा योजनाओं में फोर्टिफिकेशन चावल का अलोकतांत्रिक तरीके से वितरण मानव स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से गंभीर चिंता का विषय है। सरकारें पूंजीपतियों के दबाव में आकर पूरे झारखण्ड की पीडीएस दुकानों, मध्याह्न भोजन एवं आंगनबाड़ी में फोर्टिफिकेशन चावल वितरण कर लोगों की खाद्य विविधता में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही है।

प्रतिभागी गणों के बीच विगत 8 से 11 मई तक झारखण्ड में फोर्टीफाईड चावल से लाभुकों की प्रतिक्रिया एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता पर किये गए फैक्ट फाइंडिंग प्रतिवेदन का राज्य स्तर पर साझाकरण किया गया। जिसमें पाया गया कि गांव में इस चावल को लोग प्लास्टिक चावल के तौर पर चर्चा करने लगे हैं। लोगों को ऐसे चावल के बारे कोई पूर्व जानकारी नहीं दी गई और उनके खाने की थाली तक गुपचुप तरीके से पहुंचाई जा रही है। जिन परिवारों ने भी पीडीएस चावल का अनजाने में सेवन किया, उनको स्वास्थ्य सम्बन्धी दिक्कतें यथा उबकाई आना, अपच होना, पेट में जलन, पतली दस्त जैसी बीमारियां उभरकर सामने आ रही हैं।

कार्यशाला में प्रतिभागियों ने एक स्वर में मांग रखी कि सरकार हर हाल में अनैतिक तौर पर वितरण किये जा रहे फोर्टिफाईड चावल को बंद करे। खाद्य सुरक्षा कानून में वर्णित मोटे अनाजों के साथ ही खाद्य तेल और दाल शामिल किये जाएं। मध्याह्न भोजन एवं आंगनबाड़ी में साप्ताहिक 6 दिन अंडे दिए जाएं। कार्यशाला में कहा गया कि कुपोषण को प्राकृतिक तरीकों से ही दूर किया जा सकता है कृत्रिम तरीके से नहीं।

कार्यशाला में खूंटी, लोहरदगा, लातेहार, पश्चिम सिंहभूम, रांची से विजय एक्का, रानी हस्सा, शानियारो देवी, सगीर अहमद, नीतू देवी, देवंती देवी, दिलीप रजक, मनोज भुइयाँ, जेम्स हेरेंज सहित कई लोगों ने शिरकत की। कार्यक्रम का संचालन भोजन का अधिकार अभियान के राज्य संयोजक अशर्फीनन्द प्रसाद ने किया।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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