Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

वाराणसी: नेपाली नागरिक का पहले मुंडन फिर जय श्रीराम लिखकर कट्टरपंथियों ने रची धर्मांधता की नई परिभाषा

धर्मांधता या धार्मिक कट्टरता, एक निरपेक्ष ज़हर की तरह होती है। वह भले ही अपने विपरीत धर्म के विरुद्ध जन्म ले पर अंत मे वह अपनी संस्कृति, धर्म और सभ्यता का ही नुकसान करती है। यह आप इतिहास के अध्ययन से सीख सकते हैं। बनारस में एक बेहद निंदनीय और शर्मनाक घटना हुई है जो इस ज़हर के विस्तार का प्रमाण देती है। घटना इस प्रकार है।

बनारस में रहने वाले एक नेपाली नागरिक का बुधवार को वहां विश्व हिंदू सेना नामक एक संगठन ने जबरन मुंडन कर दिया और उस नेपाली नागरिक के सिर पर जय श्रीराम का नारा लिख दिया। इतना ही नही उस नागरिक से नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली मुर्दाबाद का नारा भी लगवाया गया। विश्व हिंदू सेना ने अपने इस ‘महान’ कृत्य का वीडियो भी सोशल मीडिया पर जारी किया है और नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली को चेतावनी दी है। यदि नेपाल के पीएम लगातार ऐसे बयान देंगे तो इसका परिणाम उन्हें भुगतना होगा।

सोशल मीडिया के इस युग में बनारस के राजेन्द्र प्रसाद घाट पर घटी मुंडन और नेपाली प्रधानमंत्री के मुर्दाबाद की घटना की खबर नेपाल के अखबार कांतिपुर टाइम्स में भी छपी है। कांतिपुर टाइम्स के अनुसार,

‘स्तब्ध कर देने वाली यह घटना, बृहस्पतिवार को राजेन्द प्रसाद घाट पर, भारतीय प्रधानमंत्री के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में घटी। विश्व हिंदू सेना नामक एक संगठन के नेतृत्व में कुछ युवक, कुछ नेपाली नागरिकों को लेकर, वहां इकट्ठा हुए और उनसे नेपाली प्रधानमंत्री के मुर्दाबाद के नारे लगवाए और उनके मुंडन कर दिए गए। ‘

हालांकि अखबार ने यह भी छापा है कि, वाराणसी पुलिस ने विश्व हिंदू सेना के नेता अरुण पाठक के खिलाफ एक मुकदमा भी दर्ज कर लिया गया है। अरुण पाठक ने यह भी कहा है कि जब तक केपी शर्मा ओली अपने बयान के लिये माफी नहीं मांग लेते, तब तक यह क्रम चलता रहेगा।

नेपाल के साथ हमारे सम्बंध भले ही सदियों पुराने और रोटी बेटी के हों, पर पिछले 6 साल से भारत नेपाल के आपसी सम्बन्धों में काफी खटास आयी है। इस खटास को दूर करने के लिये निश्चय ही दोनों देश कूटनीतिक चैनल से कुछ न कुछ प्रयास कर रहे होंगे, पर अभी यह स्थिति सुधरी हो, ऐसा नहीं लगता है। भारत और नेपाल के बीच मुक्त आवागमन है और बहुत से भारतीय और नेपाली एक दूसरे देशों में अपने अपने देश की तरह ही रहते हैं। 2014 में जब काठमांडू में भूकंप आया था तो, भारत सरकार ने खुलकर आर्थिक मदद की थी। लेकिन भारतीय मीडिया के गैर जिम्मेदाराना रवैये से नेपाली जनता के आत्मसम्मान को ठेस लगी तो भारतीय मीडिया मुर्दाबाद के नारे भी लगे।

नेपाल में सरकार बदली और वहां कम्युनिस्ट पार्टी सरकार में आयी। केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री हुए। नेपाल वैचारिक रूप से चीन के नज़दीक हुआ और हालिया भारत चीन सीमा विवाद के समय नेपाल खुल कर चीन के पक्ष में खड़ा दिख रहा है। इसी बीच, पिछली कुछ संधियों को दरकिनार करके नेपाल ने लिपुलेख नामक स्थान जो नेपाल की पश्चिमी और भारत की पूर्वी सीमा पर है, के भारतीय क्षेत्र को अपने नक्शे में शामिल करते हुए एक नया नक्शा जारी कर दिया और इसे नेपाल की संसद ने स्वीकार भी कर लिया है।

लिपुलेख का इलाका भारत से मानसरोवर तीर्थ जाने वाले मार्ग पर स्थित है और यहां भारत नेपाल तथा चीन तीनों देशों की सीमाएं मिलती हैं। भारत, मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिये एक सुगम सड़क मार्ग का निर्माण कर रहा है, जिस पर चीन को तो आपत्ति है ही अब चीन के दबाव में नेपाल को भी इस पर आपत्ति हो गयी है। हालांकि केपी शर्मा ओली के इस दृष्टिकोण की नेपाल में भी आलोचना हो रही है।

नक्शे और लिपुलेख विवाद के बाद ही बिहार में भारत नेपाल सीमा पर, नेपाली सशस्त्र बल द्वारा दो भारतीय नागरिकों की हत्या कर दी गई और लखीमपुर खीरी के पास नो मेन्स लैंड के कुछ सीमा दिग्दर्शक खम्भे भी तोड़ दिये गए। भारत नेपाल सम्बन्धों में शत्रु भाव का अभाव है इसलिए इन सब घटनाओं की कोई व्यापक प्रतिक्रिया नहीं हुई और यह मामला प्रत्यक्ष रूप से ठंडा पड़ गया। लेकिन इससे नेपाल में भारत विरोधी और भारत में नेपाल विरोधी मानसिकता के जो भी अल्प लोग हैं उन्हें ज़रूर पोषण मिला।

इसी बीच, केपी शर्मा ओली ने भगवान राम के संबंध में एक विवादास्पद से भी अधिक हास्यास्पद बयान दे दिया कि, राम नेपाल के हैं और उनका जन्म नेपाल के एक गांव में हुआ था। राम के जन्मस्थान वाली अयोध्या, वर्तमान उत्तर प्रदेश की अयोध्या नहीं बल्कि नेपाल का एक गांव अयोध्या है। इस बयान का खूब मज़ाक़ उड़ा। राम की अयोध्या के बारे में उत्तर प्रदेश की अयोध्या के अतिरिक्त, अन्यत्र एक और अयोध्या का दावा पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान में भी किया जाता है।

इसी प्रकार लंका, लवकुश आश्रम आदि के बारे में अलग-अलग जगहों पर होने के दावे किए जाते हैं और इन सबको लेकर, इतिहास और पुरातत्वविदों में अक्सर अकादमिक बहस चलती रहती है और आगे भी यह चलती रहेगी। ऐसा ही एक दावा वाल्मीकि आश्रम का भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आश्रम वर्तमान बिठूर जो कानपुर के पास है, वहां है, तो यह भी कहा जाता है कि वह वाल्मीकि आश्रम, उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल की सीमा पर वाल्मीकि आश्रम नाम से स्थित एक जगह पर है जो नारायणी नदी के किनारे है। दोनों के ही अपने-अपने दावे हैं। सच झूठ पर अब भी बहस जारी है।

विश्व हिंदू सेना का अरुण पाठक।

बनारस की यह शर्मनाक घटना, भारतीय जन मानस की आम प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि यह कुछ धर्मांध कट्टरपंथी लफंगों द्वारा किया गया एक कृत्य है। बनारस, नेपाल के लिये भी उतना ही महत्वपूर्ण और पवित्र है जितना कि भारत के लिये। यह सभ्यता संस्कृति और धर्म का शीर्ष केंद्र है। नेपाल का शायद ही कोई राजनीतिक घराना ऐसा हो जिसके सदस्य बनारस में पढ़े न हों और जिनके संपर्क और घर बनारस में न हों। लेकिन ऐसी घटना घट कैसे गई इसके पीछे हमें कट्टरपंथी मानसिकता का इतिहास समझना होगा।

अगर केपी शर्मा ओली भारत आते और उनके विरोध में काले झंडे दिखाए जाते या नेपाल के दूतावास पर प्रदर्शन होता तो यह कोई आपत्तिजनक कृत्य नहीं होता, बल्कि यह किसी के भी विरोध करने का एक लोकतांत्रिक अधिकार है। पर एक सामान्य नेपाली नागरिक, जो अपने जीवन यापन के लिये बनारस में आया है उसे इस प्रकार अपमानित करना न केवल निन्दनीय और शर्मनाक है बल्कि एक प्रकार का ओछापन भी है।

क्या आप ने सोचा था यह ज़हर बस अखलाक तक ही सीमित रहेगा? अखलाक वह पहली सार्वजनिक घटना थी जिसे हिंदुत्व ब्रिगेड ने एक पुनीत कर्तव्य समझ कर अंजाम दिया था। अखलाक के घर गोमांस पाए जाने के अफवाह से उत्तेजित भीड़ ने उसकी हत्या कर दी थी। तब इसे धर्म और आस्था पर चोट की बात कही गयी थी। अधर्म और धर्म की सीमा वहीं मिट जाती है जहां धर्मांधता आ जाती है। अखलाक के बाद शम्भू रैगर, सहित, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, झारखंड आदि अनेक राज्यों में, कई घटनाएं हुई जो हिंदू मुस्लिम मतभेद को बढ़ाने के लिये और हिंदुत्व धार्मिक कट्टरपंथी मानसिकता को तुष्ट करने के लिये की गयी।

लेकिन यह अलग बात है कि भारतीय जन मानस इन कथित धर्मरक्षकों जो वास्तव में धर्मद्रोहियों का एक गिरोह है के, मायाजाल में नहीं फंसा। पिछले कुछ सालों से कभी गौरक्षा के नाम पर तो कभी बीफ के नाम पर तो कभी राजनीतिक कारणों से तो कभी सामाजिक गैर बराबरी तो कभी जातिगत द्वेष के कारण भीड़ हिंसा की सैकड़ों घटनाएं हुईं जिससे एक वर्ग का मन इतना बढ़ गया कि वह इस जघन्य अपराध को भी औचित्यपूर्ण ठहराने लगा। सरकार ने कहीं कार्यवाही की तो कहीं राजनैतिक कारणों से उसे नज़रअंदाज़ भी किया। हैरानी की बात यह भी हुई कि, एक पढ़े लिखे केंद्रीय मंत्री ने जेल से जमानत पर छूटे कुछ भीड़ हिंसा के अपराधियों को, झारखंड में, सार्वजनिक रूप से माला पहना कर उनका अभिनंदन भी किया। यह बात अलग है कि उस मंत्री ने बाद में अपने इस कृत्य के लिये अफसोस भी ज़ाहिर किया।

धर्मान्धता व्यक्ति के मस्तिष्क के तर्क और विवेक जाग्रत करने वाले तंत्र को सबसे पहले प्रभावित करती है। धार्मिक कट्टरता के आवेश और आवेग में उन्मादित व्यक्ति यह सोच ही नहीं पाता है कि वह कह क्या रहा है और कर क्या रहा है। बड़े साम्प्रदायिक दंगों में यह बात आप अक्सर ढूंढ सकते हैं। पढ़े लिखे और प्रबुद्ध समझे जाने वाले व्यक्ति भी कट्टरपंथी मानसिकता के उन्माद में हिंसक हो जाते हैं। राजनीतिक दल अपने अपने पोलिटिकल एजेंडे के अनुसार, ऐसे उन्मादित समूहों का राजनीतिक लाभ तो उठा लेते हैं पर समाज को आने वाले समय मे जो नुकसान उठाना पड़ता है वह सारे सामाजिक ताने बाने को मसका कर रख देता है। भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सदियों से चले आ रहे बहुलतावादी संस्कृति और समाज के कारण, इन सब कट्टरपंथी सोच को लंबे समय तक भारत बर्दाश्त नहीं कर पाता है और इस सर्प को झटक कर दूर फेंक देता है। भारतीय जनमानस उसे जल्दी ही खारिज़ भी कर देता है।

इस तालिबानी कृत्य की क्या प्रतिक्रिया नेपाल में होगी इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। नेपाल में भी भारत विरोधी गतिविधियों का समूह है, जो भारत से ऐसी ही खबरों की तलाश में रहता है। अगर वहां भी इस पागलपन के खिलाफ ऐसी ही कोई पागलपन भरी प्रतिक्रिया हुयी तो इससे न केवल भारत नेपाल के कूटनीतिक सम्बन्धों पर जो इस समय बिगड़े हुए हैं, और असर पड़ेगा बल्कि यह हमारी विदेश नीति के खोखले पन को ही उजागर करेगा कि आखिर किसी भी पड़ोसी देश से हमारा सम्बंध सामान्य क्यों नहीं है।

चीन तो यह चाह ही रहा है कि हम दक्षिण एशिया में अलग-थलग पड़ जाएं और उसकी यही योजना भी है। इसी योजना के अंतर्गत वह नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अब तो चाबहार समझौते के बाद ईरान तक को हमसे अलग करने के लिये तत्पर हो गया है। पर सवाल है कि उसके इन सब चालों का जवाब देने के लिये हम कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं।

वाराणसी पुलिस ने इस शर्मनाक कृत्य पर मुंडन करने वाले लोगों के विरुद्ध अभियोग भी दर्ज कर लिया है। इस घटना पर कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए। कड़ी कार्यवाही होगी भी। बनारस ही नहीं अधिकतर लोगों ने इस घटना की निंदा की है। पर यह घटनाएं जिस मानसिकता से उपजती हैं, उसका समाधान सबसे पहले करना होगा। हम सब धार्मिक और साम्प्रदायिक कट्टरता के विरोध में खड़े हों, और इस शूल की जड़ में ही मट्ठा डाल दें, ताकि हम निष्कंटक रूप से प्रगति पथ पर बढ़ते रहें। धर्म और राजनीति के घातक और स्वार्थ पूर्ण घालमेल ने धर्म का जो स्वरूप बना दिया है वह धर्म है ही नहीं वह अधर्म है।

सरकार को हर ऐसे कृत्य का जो धार्मिक उन्माद फैलाते हों, धर्म के आधार पर भेदभाव करते हों या हिंसा की आग लगाते हों वे चाहे कोई भी हों, किसी भी धर्म के हों या कितने भी महत्वपूर्ण हों उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। लेकिन इसके लिये सरकार को अपने चुनावी और पोलिटिकल एजेंडे से दूर जाना होगा। क्या ऐसा संभव है ?

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on July 17, 2020 6:39 pm

Share