बीच बहस

चुनाव के लिए मंत्रिमंडल

भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के पिछले सत्तर सालों में यह पहला मौका है जब मंत्रिमंडल का गठन किसी चुनाव के लिए किया गया हो। भारतीय राजनीति और उसके शासन तंत्र का यह सबसे पतनशील दौर है। इस बात में कोई शक नहीं है कि हटाए गए मंत्री पूरी तरह से नाकाम रहे हैं। और उनकी नाकामी के पीछे उनसे ज्यादा पीएम मोदी जिम्मेदार रहे हैं। जिन्होंने कामकाज के लिहाज से किसी मंत्री या फिर उसके मंत्रालय के पास कुछ छोड़ा ही नहीं था। न तो उन्हें निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी और न ही वे कोई नई पहल कर सकते थे। मंत्रिमंडल में उनकी भूमिका काठ के उल्लू से ज्यादा नहीं थी। इसलिए अगर नाकामी भी है तो वह किसी मंत्री से ज्यादा और उससे पहले पीएमओ की है। ऐसे में सजा के लिहाज से बात की जाए तो वह सबसे पहले पीएमओ और फिर उसके आला अगुआ के तौर पर मोदी की जिम्मेदारी बनती है। अगर लोग हटाए गए मंत्रियों को रेल का डिब्बा करार दे रहे हैं और इंजन को बदलने की मांग कर रहे हैं तो वो कोई गलत बात नहीं कर रहे हैं।

जहां तक रही हटाए गए मंत्रियों के पीछे कारणों की बात तो उसका आधार कामकाज नहीं बल्कि मंत्रिमंडल में नए चेहरों की जरूरत और उसकी नये तरीके से पेशगी थी। मंत्रिमंडल में इन वरिष्ठों के रहते लाख चेहरे बदलने के बाद भी वह असर नहीं पड़ता जिसकी इस समय बीजेपी को दरकार है। प्रकाश जावड़ेकर, हर्षवर्धन, रमेश पोखरियाल निशंक और रविशंकर प्रसाद ऐसे चेहरे हैं जिनके सामने आने पर शामिल किए गए नये चेहरे गायब हा जाते। लिहाजा उन्हें उभारने और फिर चुनाव के लिहाज से पेश करने की यह आवश्यक शर्त बन गयी थी। वरना कामकाज के लिहाज से अगर 40 मंत्रियों को हटाना पड़ रहा है तो समझा जा सकता है कि पूरा मंत्रिमंडल ही फेल हो गया है। और इस नाकामी के लिए किसी और से ज्यादा उसका केंद्रक जिम्मेदार है। उसमें भी सबसे खास मंत्रालयों की नाकामी बताती है कि मंत्रिमंडल जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।

एक ऐसे समय में जबकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में और ज्यादा सक्षम और तेज तर्रार शख्स की जरूरत थी। इस बात में कोई शक नहीं कि डॉक्टर होते हुए भी हर्षवर्धन इस काम को नहीं कर सके। अब ये बात अलग है कि उन्हें कितना मौका दिया गया। बावजूद इसके अगर उनको हटाकर कोई नया शख्स ले आया गया तो वह उनसे भी ज्यादा काबिल, सक्षम और समझदार होना चाहिए था। लेकिन कल से जो सोशल मीडिया पर कहानी चल रही है उसमें नये मंत्री मनसुख मनडविया एमए पास होने के बावजूद अंग्रेजी की बुनियादी समझ भी नहीं रखते। यहां यह बात बिल्कुल साफ कर देना जरूरी है कि अंग्रेजी किसी की योग्यता के मांपने का पैमाना नहीं हो सकती है। लेकिन यह मंत्रालय ऐसा है जिसमें बगैर उसको जाने और समझे दो कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। इसमें दवाइयों से लेकर डब्ल्यूएचओ तक में इसकी जरूरत पड़ेगी। इसलिए कदम-कदम पर नौकरशाह या फिर अपने पीए पर निर्भर रहना किसी भी रूप में एक कैबिनेट मंत्री को शोभा नहीं देगा।

एक ऐसे समय में जबकि कोरोना का कहर अभी गया नहीं है। और पुरानी नाकामियों को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र को और ज्यादा स्ट्रीम लाइन करने की जरूरत थी तब मोदी ने यह नया प्रयोग किया है। इससे पता चलता है कि सरकार लोगों के जीवन को लेकर कितनी गंभीर है। और वह पुरानी नाकामियों से सबक लेकर गलतियों को सुधारने की जगह उससे बड़ी गलती करने पर आमादा है। ऐसा नहीं है कि दूसरे लोग उनके पास नहीं हैं। आप अनुप्रिया पटेल को बना देते वह शायद किसी और से ज्यादा सक्षम होतीं। लेकिन वह आपके राजनीतिक समीकरण में फिट नहीं बैठती हैं। लिहाजा उनके बारे में आप नहीं सोचेंगे।

बहरहाल किसी भी मंत्रालय में किसी भी मंत्री को बैठा दिया जाए उससे ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है। क्योंकि फैसले तो सारे पीएमओ से ही होने हैं। बाकी चूंकि इस देश में अभी संसदीय प्रणाली कायम है और उसमें मंत्रियों का बनाना मजबूरी है लिहाजा इन औपचारिकताओं से सरकार बच नहीं सकती थी। हां इनका इस्तेमाल अगर किसी नई राजनीतिक जरूरत के हिसाब से मैसेज देने में हो जाए तो भला इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। उसमें एक दो नहीं 100 लोगों की भी बलि भी कम होगी।

दरअसल मैंने बार-बार यह बात कही है और एक बार फिर उसे दोहराना चाहूंगा कि संघ और बीजेपी का लक्ष्य इस देश से लोकतंत्र को खत्म करना है। और वह उसे धीरे-धीरे मार रहे हैं। उस कड़ी में सभी संस्थाओं को अप्रासंगिक बना देना उसकी पहली शर्त है। और मोदी सरकार उसी रणनीति पर काम कर रही है। उसे केवल संसद के लिए नई बिल्डिंग ही नहीं चाहिए। उसे संविधान भी बदलने की जरूरत है। लेकिन उससे पहले उसके लिए देश में माहौल बनना बहुत जरूरी है। और किसी शख्स को इस बात को जरूर समझना चाहिए कि अगर देश में सामाजिक न्याय को पूरा करता हुआ कोई कथित मंत्रिमंडल तैयार कर लिया जाए और फिर उसके हाथों से संविधान का खून हो तो क्या संघ का रास्ता आसान नहीं हो जाएगा?

दलित और पिछड़े ही अगर बाबा साहेब के संविधान को बदलने की कवायद शुरू कर दें तो दलितों के बड़े विरोध और उनके भीतर पैदा होने वाले रोष से बचने में क्या सरकार को मदद नहीं मिलेगी? लिहाजा कुल्हाड़ी की इस मंत्रिमंडलीय बेंत से अपने ही संविधान के पेड़ को काटने की तैयारी की जा रही है। संघ ने इस तरह के प्रयोग बहुत किये हैं। दंगों में मुसलमानों से जमीन पर लड़ने के लिए दलितों को वह फूट सोर्लर के तौर पर स्तेमाल करता रहा है। अनायास नहीं शहरों में रहने वाला वाल्मीकि समुदाय उसका सबसे पुख्ता आधार बना हुआ है। गुजरात के दंगों में अहमदाबाद से लेकर वड़ोदरा तक दलितों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया था। यह ब्राह्णवादी वर्चस्व के पैरोकारी संघ की सवर्णों को सुरक्षित रखने की रणनीति का हिस्सा था।

अब जब उसे संसद से लेकर संविधान तक और संवैधानिक संस्थाओं से लेकर न्यायपालिका तक को नेस्तनाबूद करना है तब उसे इसी तरह की अंधी फौज की जरूरत थी। इस बात में कोई शक नहीं कि सवर्णों का एक बड़ा हिस्सा संघ और बीजेपी के कोर का काम कर रहा है। लेकिन देश और समाज में अपने वर्चस्व को बनाए रखने और अपने मनमुताबिक चीजों को संचालित करने के लिए समाज के दूसरे हिस्सों को भी साथ लाना उसकी जरूरत बन गयी है। यह सारी कास्मेटिक सर्जरी उसी का हिस्सा है। और एकबारगी जब पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी तो फिर सनातनी संस्कृति और उसकी वर्ण व्यवस्था के हिसाब से समाज के संचालन का रास्ता साफ हो जाएगा। संघ और बीजेपी उसको हासिल करने के लिए दिन-रात प्रयास कर रहे हैं। मोदी का यह मंत्रिमंडलीय फेर-बदल भी उसी का हिस्सा है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

This post was last modified on July 9, 2021 10:57 am

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