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नयी शिक्षा नीतिः पिछड़े चिंतन के नेता कैसे तैयार करेंगे नई सोच के नौजवान!

शिक्षा एक धारदार चाक़ू की तरह है। अगर आपको सही शिक्षक जीवन में सही समय पर मिल जाए तो जीवन काफ़ी आसान हो जाता है, लेकिन अगर ग़लत जानकारी देने वाला शिक्षक आपको मिल जाए तो आपका बना बनाया जीवन भी बर्बादी की कगार पर आ जाता है। आज हम उन लोगों की बात करेंगे, जिनके हवाले हमने अपनी अगली पीढ़ी की शिक्षा का भविष्य कर दिया है।

हमारे देश में नेता बनने के लिए किसी नीति का जानकार या विशेषज्ञ होना ज़रूरी नहीं होता, कोई परीक्षा पास नहीं करनी होती, कोई भी व्यक्ति मात्र लोकप्रियता और बाहुबल के आधार पर नेता बन सकता है, लेकिन कौन सी नीति असल लोकहित के लिए बेहतर है, किस नीति के दूरगामी परिणाम बेहतर होंगे, ये चुनने के लिए विभिन्न विषयों का जानकार होना बेहद बेहद ज़रूरी है। अब नीति जिन्होंने बनाई है या होगी वे तो बेहद पढ़े-लिखे इंसान होंगे, लेकिन उस नीति को लागू करवाने वाले लगभग अनपढ़ होंगे तो आप कैसे ये मान कर चलते हैं कि शिक्षा नीति उचित ढंग से लागू होगी। इतना तो आप समझते ही हैं कि पार्टी कोई भी जीते, लोगों का अशिक्षित रहना, जानकारी से वंचित रहना हमेशा पार्टीयों के पक्ष में ही होगा।

आइए आज नयी कही जाने वाली शिक्षा नीति लागू करवाने वालों के विचारों से उनका इरादा जानते हैं। सबसे पहले नरेंद्र मोदी। उनके सार्वजनिक बयानों से आइए उनके शिक्षा के प्रति रवैये को समझते हैं।

1. मोदी खुले मंच पर अपनी शिक्षा के बारे में अलग-अलग बयान दे चुके हैं। वे ऐसे विषय में ख़ुद को एमए बताते हैं जो आज तक विश्व की किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाया ही नहीं गया। न आज तक उनका कोई बैचमेट मिल पाया है और न ही कोई शिक्षक। इमरजेंसी के वर्ष में रविवार के दिन उनकी डिग्री प्रिंट हुई है। डिग्री में कम्यूटर फांट हैं जब कंप्यूटर आया ही नहीं था, जबकि एक दूसरे इंटरव्यू में वे बताते हैं कि उन्होंने स्कूली शिक्षा के बाद कोई पढ़ाई ही नहीं की। तो अब आप सोचिए, जिसकी स्वयं की शिक्षा के बारे में इतने झोल हैं क्या वह शिक्षा नीति को सही ढंग से लागू होने देगा?

2. डिसलेक्सिया जैसी गंभीर बीमारी पर हो रही चर्चा का इस्तेमाल वे विपक्ष के नेता का मज़ाक उड़ाने के लिए करते हैं, इससे पता चलता है कि वे मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कितने सीरियस हैं।
3. गणित की जानकारी उनकी ऐसी है कि कभी वो 600 करोड़ भारतीय बोल देते हैं।
4. मेडिकल साइंस की उनकी जानकारी ऐसी है कि वैदिक काल में प्लास्टिक सर्जरी की बात करते हैं। उनको हेड ट्रांसप्लांट और प्लास्टिक सर्जरी की कितनी समझ है मुझे नहीं पता।
5. पर्यावरण विज्ञान की उनकी जानकारी ऐसी है कि उन्होंने क्लाइमेट चेंज को नकार दिया था।
6. सेक्स-जेंडर के बारे में उनके समर्थकों की समझ ऐसी है कि वे एलजीबीटी कम्युनिटी को बीमारी के तौर पर देखते हैं, लेकिन वह कभी भी खुले आम उनका विरोध नहीं करते हैं।
7. एतिहासिक धरोहरों की उनकी जानकारी ऐसी है कि बैंगलोर में भाषण देते वक़्त ‘लाल किला’ और ‘लाल दरवाज़ा’ में कंफ्यूज्ड हो गए थे।

8. उनके हिसाब से महाभारत के समय जेनेटिक साइंस था।
9. इतिहास की बात करें तो उन्हें ये नहीं पता चंद्रगुप्त गुप्त वंश के नहीं मौर्य वंश के थे। (चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश के थे लेकिन मोदी उनका ज़िक्र नहीं कर रहे थे)। एक बार तो हद ही हो गई, मोदी ने एलेक्जेंडर को बिहारियों के हाथों हरवा दिया था, जबकि अलेक्जेंडर तो कभी गंगा पार भी नहीं पहुंचा। अमेरिका में वो कह आए थे कि कोणार्क मंदिर 2000 साल पहले बना था अब किसी सरकारी अधिकारी में तो इतनी हिम्मत है नहीं कि उन्हें बताए कि कोणार्क 13वीं सदी में बना था। मोदी ने एक बार तीन अलग–अलग सदी में पैदा हुए संतों की मुलाक़ात करा दी थी। संत कबीर, गुरुनानक और गोरखनाथ। बाबा गोरखनाथ 11वीं शताब्दी के हैं, कबीर 15वीं शताब्दी के हैं, गुरुनानक 16वीं शताब्दी के हैं।

10. भूगोल की समझ भी इतनी गज़ब है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय को मोदी ने बिहार पहुंचा दिया था, हालांकि तक्षशिला आज के पाकिस्तान में है।
11. महिला आरक्षण के बारे में उन्हें ये नहीं पता कि सरदार पटेल ने यह बात 1919 में नहीं, 1926 में की थी।
12. राज्यों के बारे में उन्हें ये भी नहीं पता था कि महाराष्ट्र के अब तक 17 मुख्यमंत्री हुए हैं उन्हें ये आंकड़ा 26 लगता है तो कोई क्या करे।
13. रुपये के बारे में उन्हें यह भी नहीं पता कि 1947 में एक डॉलर तीन रुपये 30 पैसे के बराबर था, वे सबको एक रुपये के बराबर बताते फिरते हैं।
14. वह नामों को लेकर भी कंफ्यूज्ड हो जाते हैं। श्यामजी कृष्णजी वर्मा को श्यामा प्रसाद मुखर्जी समझ लेते हैं। कभी मोहनदास को मोहनलाल गांधी कह बैठते हैं। एक बार नेहरु को मुखर्जी की मौत का ज़िम्मेदार भी बता दिया था।
15. उन्होंने आरबीआई के गवर्नर का पद इतिहास के विशेषज्ञ को दिला दिया।

इसके अलावा भी बहुत बतोलेबाज़ी आपको याद होगी। जैसे बादल राडार सिद्धांत, नाली गैस टी सिद्धांत, पकोड़ा रोज़गार सिद्धांत।

अब हम बात करते हैं हमारे गृह मंत्री की। वे तो अभी-अभी खुले मंच पर स्वीकार चुके हैं कि नागरिकता, लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, संघवाद वाले चैप्टर तो उन्होंने स्कूल में स्किप कर दिए थे। उन्हें इस बात का कोई गम भी नहीं है। जनसंख्या अनुपात के बारे में भाजपा के मंत्री साक्षी महाराज के बेहतरीन ख्यालात हैं। हर हिंदू परिवार को 3-4 बच्चे पैदा करने चाहिए।

मानव संसाधन मंत्री सत्यपाल सिंह डार्विन थियोरी को नकारते हैं और मनुस्मृति थियोरी का खुलेआम प्रचार करते हैं। महानुभाव ने ख़ुद को वैज्ञानिक ही घोषित करते हुए यह कहा। यही सत्यपाल सिंह थे, जिन्होंने घोषणा की थी कि हवाई जहाज राईट ब्रदर्स से बहुत पहले एक हिंदू ने बनाया था। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव हमेशा सत्यपाल जी की वैज्ञानिक समझ का साथ देते आए हैं।

इसी कड़ी में अगला नाम हैं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का। उनके हिसाब से ज्योतिष के सामने  विज्ञान बौना है। ऋषियों ने परमाणु परीक्षण किया था। नासा ने चुपके से निशंक को ये कन्फर्म किया था कि भविष्य में बोलने वाले कंप्यूटरों की नींव संस्कृत से रखी जाएगी। उनके हिसाब से संस्कृत ही दुनिया की इकलौती वैज्ञानिक भाषा है। रामसेतु इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन मॉडल है। हिंदी-इंग्लिश दोनों भारत की आफ़ीशिअल भाषाएं हैं, लेकिन निशंक साहब ने संविधान में पढ़ लिया कि हिंदी राष्ट्रीय भाषा है। भारत के छात्र आज भी वह पन्ना खोज रहे हैं, जिसमें कहीं ऐसा लिखा हो।

वर्तमान सरकार से प्रभावित हो कर हाई कोर्ट के जज भी यही मानते हैं कि मोर ब्रह्मचारी होता है और बिना सेक्स किए आंसुओं से गर्भधारण करता है।

राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी के हिसाब से गाय इकलौती ऐसी जानवर है जो ऑक्सीजन लेती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है। पता नहीं ये गाय फिर ऑक्सीजन लेती ही क्यों है?

राजनाथ सिंह के मुताबिक़ आपको ग्रहणों के बारे में बेहतर जानकारी बगल वाले पंडित के पंचांग से मिल सकती है, इसके लिए आपको एस्ट्रोनॉमरस की सुनने की कोई ज़रूरत नहीं। मैंने बगल वाले पंडित से पूछा था कि शनि ग्रह के उपग्रह की झीलें किस द्रव्य से बनी हैं, उसने कोई जवाब ही नहीं दिया।

मोदी सरकार के इस समय के सबसे पढ़े लिखे माने जाने वाले मंत्री पियूष गोयल को ये तक नहीं पता कि ग्रेविटी की खोज आइंस्टीन ने की थी या न्यूटन ने। प्रकाश जावड़ेकर और पियूष गोयल के हिसाब से भारत में जो व्यक्ति जानबूझकर न कमाता हो उसे बेरोज़गार नहीं कहना चाहिए। अब मैं आज भी उन सरकारी आंकड़ों का इंतज़ार कर रहा हूं जिनमें बाई च्वायस बेरोजगारों की असल संख्या पता चले।

ट्विटर पर इस बेबाक ख़याली के कारण ही ट्रेंड हुआ था कि वर्तमान सरकार को ये नवरत्न कहां से हासिल हुए हैं। यूनियन मिनिस्टर प्रकाश जावडेकर ने कहा था कि उनके पास सुबूत हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री आतंकवादी हैं, लेकिन उन्होंने कभी सुबूत सीबीआई के सामने क्यों नहीं रखे? प्रकाश जावड़ेकर के मुताबिक़ वायु प्रदूषण से लोगों की जीवन आयु कम होने का कोई संबंध ही नहीं है।

महिला बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी एक चुनाव में ख़ुद को बीए बताती हैं तो दूसरे चुनाव में मात्र 12वीं पास। निर्मला ताई ने तो संसद में प्याज-लहसुन की बढ़ती कीमतों पर दो टूक कह दिया था कि वे तो प्याज-लहसुन खाने वाले परिवार से हैं नहीं, इसलिए वह इन चीज़ों को लेकर ज़्यादा फ़िक्र नहीं करती। अब उन्होंने कोरोना को ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ बता दिया है। वहीं रविशंकर प्रसाद अर्थव्यवस्था का हाल फिल्मों की टिकट बिक्री से पता कर लेते हैं।

कोरोना वायरस से पीड़ित व्यक्ति को भाभीजी पापड़ से ठीक करवाने वाले केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल तो आपको याद ही होंगे। योगी आदित्यनाथ तो कह ही चुके हैं कि हिन्दू–मुस्लिम इतनी अलग-अलग संस्कृति हैं कि वे साथ रह ही नहीं सकते तो अब उनकी नज़र से देखा जाए तो दोनों के साथ पढ़ने की तो बात ही संभव नहीं।

भाजपा के मंत्री सुनील भरला ने वायु प्रदूषण से बचाव के लिए हवन-यज्ञ करने का उपाय सुझाया था। पवित्र लकड़ी जलाई जाए और इंद्र को प्रसन्न करा कर वर्षा कराई जाए। वहीं डॉक्टर हर्षवर्धन ने वायु प्रदूषण के सवाल पर गाजर खाने की सलाह दे डाली। डॉक्टर हर्षवर्धन के मुताबिक वेदों में सापेक्षता का सिद्धांत अल्बर्ट आइंस्टाइन के सिद्ध करने से पहले ही दिया हुआ है। हर्षवर्धन ने ये तक कह दिया था कि दिल्ली में वायु प्रदूषण से 12 लाख मौतों की ख़बर सिर्फ़ लोगों में डर फ़ैलाने के लिए चलाई जा रही है।

इन सभी में इतिहास, भूगोल, विज्ञान की समझ कितनी है, बताने की जरूरत नहीं बचती। ये सभी भगत सिंह के नास्तिक होने की बात छुपाते हैं। जब ये कम्युनिज्म, कम्युनिस्टों या लेफ़्ट को सिरे से नकार देते हैं तो ये बात क्यों छुपाते हैं कि सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह लेफ्टिस्ट थे।

अब एक सवाल जो इस वर्तमान सरकार से होना चाहिए कि आपके स्वयं का एक ‘शिक्षा संस्थान’ है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जिसकी कई शाखाएं हैं। उसी शाखाओं से आप के ज़्यादातर मंत्रीगण निकले हुए हैं। यह संघ दुनिया में सबसे बड़ा शिक्षा संस्थान है तो इसमें से निकले कितने लोग विश्व की या भारत की टॉप यूनिवर्सिटीज़ में जा कर पढ़ाते हैं या वे विज्ञान, साहित्य या कला के क्षेत्र में जाते हैं या सेना में भर्ती होते हैं। इस संस्थान में जाति-धर्म के हिसाब से विद्यार्थियों का क्या अनुपात है? ये एक प्राइवेट संस्था थी तो है जो भी ये वर्तमान सरकार बदलाव लाना चाहती थी इसमें से ज़्यादातर बदलावों का प्रयोग तो वह अपने इस संस्थान में कर ही सकती थी तो फिर क्यों नहीं किया?

दरअसल 2014 में ही आरएसएस ने भारतीय शिक्षा नीति आयोग बना लिया था और इसके अध्यक्ष थे दीनानाथ बत्रा, जिन्हें महारथ हासिल है हिन्दू राष्ट्रवाद के मुताबिक़ इतिहास को देखने और दिखाने की। एनसीआरटी की किताबों में पहले से ही जाने कितने बदलाव ये लोग कर चुके हैं और न जाने कितने करने वाले हैं। कृश्न चन्दर का एक साधारण सा व्यंग्य ‘जामुन का पेड़’ तो इनसे सहन हुआ नहीं। अब भी आपको ज़रा सा यकीन है कि ये लोग आपके बच्चों में वैज्ञानिक विचारधारा पनपने देंगे?

(आदित्य अग्निहोत्री फिल्ममेकर और पटकथा लेखक हैं। आजकल मुंबई में रहते हैं।)

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This post was last modified on September 2, 2020 1:45 am

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