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राजनीति की विरासती पीढ़ी को संघर्ष नहीं सत्ता की मलाई है प्यारी

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट की बगावत के बाद कांग्रेस में जलजला आ गया है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की लापरवाही से ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत नहीं संभली और तीन चुनावों के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मिली सत्ता हाथों से खिसक गयी। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की चौकसी से फ़िलहाल अंक गणित कांग्रेस के पक्ष में है पर राहुल के चहेते सचिन पायलट लगातार कांग्रेस की शर्म का सबब बने हुए हैं। इन दोनों घटनाओं ने कांग्रेस के खानदानी क्षत्रपों पर भरोसे करके पार्टी चलाने और जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को नेपथ्य में धकेले रहने की नीति को उघाड़ कर रख दिया है। ये खानदानी क्षत्रप एसी कमरों में बैठ कर राजनीति करते रहे हैं और ज़मीनी संघर्ष से इनका कोई लेना-देना नहीं है।

इन खानदानी क्षत्रपों को विरासत में सब कुछ मिला है, इसमें इनका कोई व्यक्तिगत योगदान नहीं है। यही नहीं पार्टी हाई कमान के निर्देश के बिना किसी राज्य किसी जिले में तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार पार्टी आन्दोलन नहीं चला सकती इसका दीर्घकालिक नुकसान पार्टी को हो चुका है, हो रहा है।

दरअसल इसकी शुरुआत कांग्रेस में सिंडिकेट और इंडिकेट के संघर्ष से हुआ जब प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी ने राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के ही प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ बगावत कर दिया और निर्दलीय प्रत्याशी वीवी गिरी का समर्थन कर दिया । वीवी गिरी चुनाव जीत गये और कांग्रेस संगठन कांग्रेस और इंदिरा कांग्रेस में विभाजित हो गयी। एक झटके में कांग्रेस के पुराने खुर्राट नेता सत्ता से और पार्टी से बाहर चले गये। इसके बाद चुनावों में इंदिरा कांग्रेस ही असली कांग्रेस बन गयी और संगठन कांग्रेस को जनता ने ठुकरा दिया। उस समय जो नेता कांग्रेस में आये उनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी या तो कांग्रेस में या भाजपा में राजनीतिक रूप से सक्रिय है।

उत्तर प्रदेश को ही लें तो लाल बहादुर शास्त्री, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, डॉ. राजेंद्र कुमारी वाजपेयी, जितेन्द्र प्रसाद, सीपीएन सिंह, राजा दिनेश सिंह, अदि अदि की दूसरी और तीसरी पीढ़ी या तो कांग्रेस में है या लगातार चुनाव हारने के बाद भाजपा में शामिल हो गयी है। पूर्व प्रधानमन्त्री वीपी सिंह ने बगावत करके जनता दल की सरकार बनायी थी और मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर दी। उसके बाद पिछड़ों के राजनीतिक उभार से उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस के हाथ से सत्ता फिसल गयी। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों के उभार से कांग्रेस लगातार पिछड़ती चली गयी क्योंकि पार्टी की कमान कांग्रेसी क्षत्रपों के हाथ में है, ज़मीनी संघर्ष के नेता ही या तो नहीं हैं या हाशिये पर पड़े हैं।

सिंधिया और पायलट की बगावत के बाद कांग्रेस में आशंकाओं का दौर जारी है। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की नजरें उस यूथ ब्रिगेड पर हैं, जिन्हें राहुल गांधी ने अध्यक्ष रहते हुए अहम जिम्मेदारियां दी थीं। दरअसल बहुत कम समय में विरासत से आये कुछ क्षत्रपों को बहुत सारी जिम्मेदारियां दे दी गईं। पार्टी ने ऐसा यह सोचकर किया कि इनकी क्षमताओं का इस्तेमाल आगे बढ़ने में किया जाएगा, लेकिन ये क्षत्रप  संतुष्ट नहीं हैं। सिंधिया-पायलट के अलावा पार्टी में हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर, मध्य प्रदेश के पूर्व पार्टी अध्यक्ष अरुण यादव, मुंबई के पूर्व पार्टी चीफ मिलिंद देवड़ा, संजय निरूपम, पंजाब के पूर्व पार्टी प्रेसिडेंट प्रताप सिंह बाजवा, झारखंड यूनिट प्रेसिडेंट अजय कुमार, पूर्व कर्नाटक पार्टी चीफ दिनेश गुंडु राव भी राहुल की यूथ ब्रिगेड का हिस्सा रहे हैं।

यूथ ब्रिगेड के अलावा यूपी के पूर्व पार्टी अध्यक्ष राज बब्बर, मौजूदा इंचार्ज मधुसूदन मिस्त्री, राजस्थान के इंचार्ज अविनाश पांडेय, दीपक बावरिया भी उस ग्रुप का हिस्सा रहे हैं, जिन्हें राहुल की बैकिंग मिलती रही है। राहुल ब्रिगेड को लेकर पार्टी में नाराज़गी का स्तर अब बढ़ता जा रहा है, जिन्हें ज्यादा तरजीह दी जा रही है। पार्टी में इस बात को लेकर गुस्सा है कि इन नेताओं में से ज्यादातर ने बगावती तेवर दिखाए और जो भी जिम्मेदारियां उन्हें दी गईं, उन्हें ढंग से निभाया ही नहीं। इसके अलावा पार्टी में गुटबाजी को भी बढ़ावा दिया।

राजस्थान में हुई सियासी उठापटक की कोशिश के बाद सचिन पायलट के खिलाफ कांग्रेस ने कार्रवाई की। इस कार्रवाई से यह संदेश दिया गया है कि गलती के लिए अब कांग्रेस में माफी नहीं मिलेगी। धीरे-धीरे ये संदेश कांग्रेस के दूसरे राज्यों के उन नेताओं के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई करके देने जा रही है जो कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली और कार्यक्षमता पर सवाल उठाते हैं। महाराष्ट्र में भी कुछ ऐसे कांग्रेस नेता हैं जो लगातार राज्य की गठबंधन सरकार और राज्य से लेकर केंद्र तक के नेतृत्व पर सवाल खड़े करते आ रहे हैं। अब महाराष्ट्र में ऐसे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

महाराष्ट्र में कुछ नेताओं ने कांग्रेस द्वारा सचिन पायलट के खिलाफ की गई कार्रवाई के बाद कांग्रेस आलाकमान पर ही सवाल खड़े कर दिए थे। वहीं सचिन पायलट की तरफ़दारी करना कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय झा को महंगा पड़ा, कांग्रेस ने उन्हें भी तुरंत पद से हटा दिया। कुछ इसी तरह के तेवर कांग्रेस पार्टी के पूर्व सांसद और मुंबई प्रदेश अध्यक्ष संजय निरुपम लगातार दिखाते आ रहे हैं। पिछले साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान भी निरुपम ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस में दो ग्रुप हैं, जिनमें से एक सोनिया गांधी तो वहीं दूसरा राहुल गांधी की अगुआई वाला है। उन्होंने सोनिया के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल पर भी निशाना साधा था।

राज्य की अपनी पार्टी की महाअघाड़ी गठबंधन की सरकार की आलोचना करनी हो या पार्टी के आंतरिक मामलों को सबके सामने लाकर पार्टी की किरकिरी करनी हो, संजय निरुपम लगातार ये काम करते आ रहे हैं। इसीलिए अब संजय झा के बाद कांग्रेस के संजय निरुपम पर भी कार्रवाई की गाज गिरना तय बताया जा रहा है।शिवसेना और एनसीपी के नेता पहले ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से संजय निरुपम को लेकर अपनी नाराज़गी व्यक्त कर चुके हैं।

संजय निरुपम के खिलाफ कार्रवाई के लिए मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष एकनाथ गायकवाड़ ने पार्टी हाईकमान को एक रिपोर्ट भेजी है। महाअघाड़ी गठबंधन में कुछ कांग्रेसी नेता मतभेद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग इस रिपोर्ट में की गई है। राज्य के कांग्रेस नेताओं की तरफ से मांग की गई है कि तीन अलग-अलग वैचारिक दलों के एक साथ आकर सरकार चलाना चुनौती भरा काम होता है। ऐसे में कांग्रेसी नेताओं के बेतुके बयानों का सीधा असर सरकार पर होता है लिहाज़ा अनुशासनहीनता करने वाले नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो। संजय निरुपम की ही तरह मुंबई प्रदेश कांग्रेस के कुछ और बड़े नेता भी हैं जिनके बयान पार्टी को अक्सर मुश्किल में ला खड़े करते हैं। इनमें मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त के नाम भी शामिल हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

This post was last modified on July 27, 2020 9:54 am

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