Saturday, January 22, 2022

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नए संसद भवन का भूमि पूजन : लोकतांत्रिक विमर्श में धर्म की एंट्री

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अंततः नए भारत के नए संसद भवन का भूमि पूजन शुभ मुहूर्त में वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य संपन्न हुआ। एक बार फिर लोकतंत्र को बहुत चतुराई से धर्म के विमर्श के साथ जोड़ने का सरकार का कौशल देखने को मिला। यह वही धार्मिक मूल्य मीमांसा है जिसे संविधान निर्माता बाबा साहब आंबेडकर शोषण को चिरस्थायी बनाने का माध्यम मानते रहे। आंबेडकर के लिए संविधान संचालित लोकतंत्र धर्म एवं जाति आधारित शोषण तंत्र के खात्मे की  आखिरी उम्मीद की भाँति था। प्रधानमंत्री जी ने अपने उद्बोधन में अनेक बार आंबेडकर, संविधान की महत्ता और संसद भवन के सेंट्रल हॉल में हुई संविधान सभा की बैठकों का जिक्र किया। 

प्रसंगवश यह बताना आवश्यक लगता है कि वर्तमान सत्ताधारी दल विनायक दामोदर सावरकर एवं गोलवलकर जैसे जिन विचारकों को अपना आदर्श मानता है वे मुखर होकर संविधान का विरोध करते रहे। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान को अंगीकार किया गया। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से असहमति रखने वाली और उससे दूरी बना लेने वाली आरएसएस ने संविधान का विरोध इसके तत्काल बाद ही प्रारंभ कर दिया था। 30 नवंबर, 1949 के ऑर्गनाइजर के संपादकीय में लिखा गया-  किन्तु हमारे संविधान में प्राचीन भारत में हुए अनूठे संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु द्वारा विरचित नियमों का रचनाकाल स्पार्टा और पर्शिया में रचे गए संविधानों से कहीं पहले का है। आज भी मनुस्मृति में प्रतिपादित उसके नियम पूरे विश्व में प्रशंसा पा रहे हैं और इनका सहज अनुपालन किया जा रहा है। किंतु हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए यह सब अर्थहीन है।

ऑर्गनाइजर जब मनुस्मृति की विश्व व्यापी ख्याति की चर्चा करता है तब हमारे लिए यह जानना आवश्यक हो जाता है कि उसका संकेत किस ओर है। आम्बेडकर ने यह उल्लेख किया है कि मनुस्मृति से जर्मन दार्शनिक नीत्शे प्रेरित हुए थे और नीत्शे से प्रेरणा लेने वालों में हिटलर भी था। हिटलर और मुसोलिनी संकीर्ण हिंदुत्व की अवधारणा के प्रतिपादकों के भी आदर्श रहे हैं।

विनायक दामोदर सावरकर भी भारतीय संविधान के कटु आलोचक रहे। उन्होंने लिखा- भारत के नए संविधान के बारे में सबसे ज्यादा बुरी बात यह है कि इसमें कुछ भी भारतीय नहीं है। मनुस्मृति एक ऐसा ग्रंथ है जो वेदों के बाद हमारे हिन्दू राष्ट्र के लिए सर्वाधिक पूजनीय है। यह ग्रंथ प्राचीन काल से हमारी संस्कृति और परंपरा तथा आचार विचार का आधार रहा है। आज भी करोड़ों हिंदुओं द्वारा अपने जीवन और व्यवहार में जिन नियमों का पालन किया जाता है वे मनुस्मृति पर ही आधारित हैं। आज मनुस्मृति हिन्दू विधि है।( सावरकर समग्र,खंड 4, प्रभात, दिल्ली, पृष्ठ 416)

गोलवलकर ने बारंबार संविधान से अपनी गहरी असहमति की निस्संकोच अभिव्यक्ति की। उन्होंने लिखा- हमारा संविधान पूरे विश्व के विभिन्न संविधानों के विभिन्न आर्टिकल्स की एक बोझिल और बेमेल जमावट है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे अपना कहा जा सके। क्या इसके मार्गदर्शक सिद्धांतों में इस बात का कहीं भी उल्लेख है कि हमारा राष्ट्रीय मिशन क्या है और हमारे जीवन का मूल राग क्या है?(बंच ऑफ थॉट्स, साहित्य सिंधु बेंगलुरु,1996, पृष्ठ 238)

 मनुस्मृति के प्रति संकीर्ण हिंदुत्व की विचारधारा के शिखर पुरुषों का यह आकर्षण बार बार महिला और दलित विरोध का रूप लेने की प्रवृत्ति दर्शाता रहा है। जब आंबेडकर ने हिन्दू पर्सनल लॉ में सुधार हेतु हिन्दू कोड बिल का ड्राफ्ट तैयार किया जिससे महिलाओं को विरासत आदि से संबंधित उनके अधिकार मिल सकें तब आरएसएस ने इसका जमकर विरोध किया। गोलवलकर ने कहा कि महिलाओं को इस प्रकार से अधिकार देना पुरुषों में गहरी मनोवैज्ञानिक उथल पुथल को जन्म देगा और मानसिक रोगों तथा अशांति का कारण बनेगा। (पाओला बच्चेट्टा, जेंडर इन द हिन्दू नेशन: आरएसएस वीमेन एज आइडिओलॉग्स, पृष्ठ 124)। एम जी वैद्य ने अगस्त 2015 में रायपुर में कहा कि जाति आधारित आरक्षण को खत्म कर देना चाहिए क्योंकि जाति अब अपना महत्व खोकर अप्रासंगिक हो गई है। जनवरी 2016 में वरिष्ठ भाजपा नेत्री सुमित्रा महाजन ने कहा कि आम्बेडकर जाति आधारित आरक्षण पर पुनर्विचार के पक्षधर थे किंतु हमने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री गिरिराज सिंह ने रणवीर सेना प्रमुख को बिहार के गांधी की संज्ञा दी थी।

 प्रधानमंत्री जी ने वर्तमान संसद भवन की आयु और उसकी जीर्णता को नए संसद भवन के निर्माण की आवश्यकता हेतु उत्तरदायी बताया। यद्यपि विश्व के अनेक प्रमुख लोकतांत्रिक देशों के संसद भवनों की तुलना में यह भवन कम आयु का ही है। नए संसद भवन के भूमिपूजन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा कि पुराने संसद भवन को पुरातात्विक संपत्ति के तौर पर संरक्षित किया जाएगा। भय होता है कि अब पुराने संसद भवन में कहीं हमारे संवैधानिक मूल्यों को भी इतिहास की विषय वस्तु न बना दिया जाए। इस स्मारक में संविधान की आत्मा कहीं बंधक न बना ली जाए। वर्तमान सरकार का भव्य स्मारकों के निर्माण पर बड़ा विश्वास है। प्रधानमंत्री आंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक के निर्माण का श्रेय लेते रहे हैं।

महान विभूतियों और उनके क्रांतिकारी विचारों को आम जनों तक पहुंचने से रोकने के लिए भव्य स्मारकों को कारागार की भाँति उपयोग में लाया जा रहा है। कट्टर हिंदुत्व के उपासकों द्वारा आंबेडकर के नाम से जिसे पूजा जा रहा है उसका वाह्य स्वरूप आंबेडकर जैसा अवश्य है किंतु उसके विचार आंबेडकर से ठीक विपरीत हैं। नए भारत का जो नया इतिहास व्हाट्सएप विश्वविद्यालय में गढ़ा जा रहा है उसमें आंबेडकर एक रूठे, भटके हुए विद्रोही हिन्दू के रूप में चित्रित किए जा रहे हैं जिनके हिन्दू धर्म से प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उन्होंने जब धर्म परिवर्तन किया तो इस्लाम का चयन न करके बौद्ध धर्म का चयन किया जिसे कट्टर हिंदुत्व के समर्थक हिन्दू धर्म का अंग मानते रहे हैं। आंबेडकर के साथ इससे बड़ा भद्दा और भौंड़ा मजाक नहीं हो सकता। 

प्रधानमंत्री जी ने इस अवसर पर एक भाषण भी दिया। निश्चित ही वे एक अत्यंत कुशल वक्ता हैं। उन्होंने लोकतांत्रिक परंपराओं में विश्वास रखने वाले एक उदार प्रधानमंत्री का भ्रम अवश्य बनाए रखा लेकिन वे अपनी मूल विचारधारा से किंचित भी नहीं भटके। यदि इस भाषण को सावधानी से डिकोड किया जाए तो उनकी प्रतिबद्धताओं को आसानी से समझा जा सकता है। वे इन वर्षों में जरा भी नहीं बदले, वे बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे हमेशा थे- कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा के प्रबल समर्थक, हर कीमत पर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध। 

प्रधानमंत्री ने भारत को लोकतंत्र का उद्गम स्थल बताया और संकल्प व्यक्त किया कि हम दुनिया को यह कहने पर विवश कर देंगे कि इंडिया इज द मदर ऑफ डेमोक्रेसी। आरएसएस  आंबेडकर और दूसरे संविधान निर्माताओं पर संविधान को पाश्चात्य अवधारणाओं के आधार पर गढ़ने का आक्षेप मढ़ता रहा है। आंबेडकर ने पूरे विश्व में असमानता और अन्याय के विरुद्ध चले संघर्षों और उनके बाद आए सकारात्मक परिवर्तनों का गहन अध्ययन कर अनेक प्रगतिशील विचारों का समावेश संविधान में किया था। वे देश के संचालन में धर्म के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष हस्तक्षेप को किसी भी प्रकार से रोकना चाहते थे। यही कारण था कि उन्होंने राष्ट्र संचालन में धर्म के विमर्श को बिल्कुल स्थान नहीं दिया।

प्रधानमंत्री ने भारत में लोकतंत्र के जिस इतिहास की चर्चा की वह वेद, पुराण और विभिन्न धर्मों की गलियों से होकर गुजरता है। प्रधानमंत्री जी ने 12वीं शताब्दी के समाज सुधारक बसावन्ना और उनकी अनुभव मंटप की संकल्पना का उल्लेख किया। यह उल्लेख अनायास ही नहीं था। बसावन्ना और उनकी वैचारिक परंपरा के साथ आरएसएस वही करने की कोशिश कर रहा है जो आंबेडकर के साथ किया जा रहा है- हिंदूकरण। बसावन्ना या बसवेश्वर या बासव(1106-1167/68)दक्षिण भारत के एक क्रांतिकारी विचारक एवं सुधारक थे।

वे जन्मना ब्राह्मण थे किंतु उन्होंने जाति प्रथा, लैंगिक असमानता, बहुदेववाद तथा वैदिक धर्म के कर्मकांडों को पूर्ण रूप से नकार दिया और उदार धार्मिक सिद्धांतों(वचनों) का लोक भाषा कन्नड़ में प्रतिपादन किया। उनका अनुभव मंटप लोकतंत्र को संस्थागत स्वरूप प्रदान करने वाला एक मंच था। यहाँ मानवीय मूल्यों तथा धार्मिक और नैतिक प्रश्नों पर हर वर्ग, लिंग और जाति के लोग बेरोकटोक खुली चर्चा कर सकते थे। किंतु इसका स्वरूप धर्म संसद की भांति ही था अंतर केवल इतना था कि इसमें धर्म गुरुओं के अतिरिक्त आम जन भी निर्बाध भागीदारी कर सकते थे। 

जाति के नाश में अंतरजातीय विवाह की भूमिका पर आंबेडकर बारंबार बल देते रहे । गांधी भी अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में जाति के उन्मूलन में अंतरजातीय विवाह के महत्व को स्वीकारने लगे थे। 12वीं शताब्दी के बसावन्ना अंतरजातीय विवाह की महत्ता को बहुत पहले से समझ चुके थे। ऐसे ही एक अंतरजातीय विवाह में सहयोग कर उन्होंने कल्याण के राजा को कुपित कर दिया जिसने वर-वधू के पिताओं को मृत्युदंड दे दिया। बसावन्ना के अनुयायियों ने प्रतिशोध लिया और राजा मारा गया। रामानुजन और कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार बसावन्ना ने इस हिंसा से दुःखी होकर कल्याण छोड़ दिया जबकि एचएस शिव प्रकाश आदि  के अनुसार उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया गया। धीरे धीरे उनके अनुयायी भी कल्याण छोड़कर चले गए। वे दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में बिखर गए। 

आधुनिक लिंगायत विद्वानों का कहना है कि बहुत बाद में जब यह अनुयायी प्रौढ़ देवराय के काल में 15 वीं शताब्दी फिर संगठित हुए तो इनमें बसावन्ना के युग के क्रांतिकारी तेवर गायब थे। आराध्य ब्राह्मणों का प्रवेश इस आंदोलन में हो गया था और उन्होंने वैदिक धर्म परंपरा को फिर से स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया। इन लिंगायत विद्वानों के अनुसार वीरशैव संबोधन  की उत्पत्ति भी 15वीं सदी में ही उच्च कुलीन लिंगायत धर्मावलंबियों द्वारा हुई। अब यह धर्म संस्थागत स्वरूप ले चुका था। ढेरों मठ बनने लगे। इन मठों में बैठने वाले धर्म गुरु सामाजिक, आर्थिक एवं कानूनी मामलों और विवादों का निपटारा करने लगे। विरक्त मठ लिंगायत समुदाय के उन अनुयायियों के थे जो प्रायः निचली जाति के थे और बसावन्ना के मूल विचारों का कड़ाई से पालन करते थे जबकि पांच गुरु पीठों की संकल्पना और गुरु मठ वीरशैव उपसंप्रदाय के ऊंची जाति के अनुयायियों से संबंध रखते थे। कन्नड़ भाषा में लिखे गए वचन-कवित्तों को लिंगायत अपना आधार मानते हैं और वीरशैवों के संस्कृत ग्रन्थ सिद्धांत शिखामणि को खारिज करते हैं। 

हो सकता है कि लिंगायतों को हिन्दू धर्म उत्तराधिकार में मिला हो किंतु बसावन्ना और उनके अनुयायियों ने बहुत जल्दी ही इससे दूरी बना ली। जब बसावन्ना का मूल्यांकन किया जाता है तो उन पर बौद्ध धर्म के प्रभाव को नकार दिया जाता है। उन्हें तमिलों की शैव न्यानमार परंपरा से संयुक्त किया जाता है। प्रगतिशील शक्तियां भी उन्हें रामानुज के साथ भक्ति आंदोलन से जोड़ने लगती हैं और उन्हें ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बनाए रखने वाले धर्म सुधारक का दर्जा दिया जाता है। यही व्याख्या कट्टरपंथियों को भी मुनासिब लगती है क्योंकि इस तरह वे बासव और उनके लिंगायत धर्म को हिन्दू धर्म की एक धारा के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। रामानुजन जैसे आधुनिक विद्वान यह मानते हैं कि लिंगायत हिन्दू धर्म के लिए वैसा ही है जैसा ईसाई धर्म के लिए प्रोटेस्टैंट मत है। 

आज लिंगायत खुद को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं। आरएसएस ऐसी किसी भी मांग के विरोध में खड़ा है। वह इन्हें हिन्दू धर्म का अविभाज्य अंग मानता है। मार्च 2018 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग का समर्थन करने वाले राजनीतिज्ञों की आलोचना करते हुए कहा कि एक ही धर्म का पालन करने वाले हम लोगों को आसुरी प्रवृत्ति के लोगों द्वारा सम्प्रदाय में बांटा जा रहा है। 

कुल मिलाकर यह कहानी एक प्रगतिशील लगने वाले सामाजिक आंदोलन के बिखरने और उस पर ब्राह्मणवादी शक्तियों की पुनः वर्चस्व स्थापना की है। बसावन्ना और आंबेडकर के विचारों में बहुत कुछ ऐसा है जो न केवल लोकतंत्र को मजबूती देने में मददगार है बल्कि लोकतंत्र का लोकतंत्रात्मक स्वरूप बनाए रखने में सहायक भी है। यही कारण है कि कट्टरपंथी ताकतें इन्हें हिन्दू धर्म की रूठी, नाराज, विद्रोही संतानों के रूप वर्गीकृत करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं ताकि इनके विचार लोकतंत्र के हिंदूकरण के मार्ग में बाधा न बनें। बसावन्ना ने धर्म के विमर्श को खारिज नहीं किया बल्कि उसके भीतर ही जाति भेद और असमानता के अंत के प्रयास किए। धर्म का विमर्श कट्टरपंथियों को बहुत रास आता है। यही कारण है कि कट्टरपंथी शक्तियां उन्हें बार बार अपने खेमे में लाने की कोशिश करती हैं।

प्रधानमंत्री जी ने अपने उद्बोधन में लिच्छवी और मल्ल जैसे बौद्ध परंपरा से संबंधित प्राचीन गणराज्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र सीखने के लिए हमें पश्चिम का मुंह ताकने की जरूरत नहीं है। बल्कि भारत के लिए लोकतंत्र जीवन मूल्य है, जीवन पद्धति है, राष्ट्र जीवन की आत्मा है। भारत का लोकतंत्र, सदियों के अनुभव से विकसित हुई व्यवस्था है। 

इन गणराज्यों के लोकतंत्रात्मक स्वरूप का विवेचन करने से पूर्व हमें लोकतंत्र के अर्थ पर विचार करना होगा। अपने संकीर्ण अर्थ में लोकतंत्र राजनीतिक दलों को  चुनाव लड़ने की स्वतंत्रता और सभी वयस्कों को नस्ल, जाति, रंग, धर्म, सम्प्रदाय, लिंग, आय आदि के भेद भाव के बिना मताधिकार द्वारा परिभाषित होता है। जबकि अपने व्यापक अर्थ में लोकतंत्र चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहता है बल्कि चुनावों के मध्य के राजनीतिक व्यवहार को भी स्वयं में समाहित करता है। यहाँ हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म पालन की स्वतंत्रता और संघ निर्माण की आजादी को लोकतांत्रिक व्यवहार का आधार बनाते हैं। 

मोदी जी द्वारा उल्लिखित सभी गणराज्यों में एक संथागार होता था जहां जनजातियों के प्रतिनिधि और परिवारों के प्रमुख एकत्रित होकर विभिन्न महत्वपूर्ण मसलों पर चर्चा एवं निर्णय करते थे। यह निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते थे। इन बैठकों की अध्यक्षता राजा अथवा सेनापति करता था। किंतु इन्हें गणतंत्र नहीं कहा जा सकता। यह दरअसल कुलीन तंत्र या ओलिगार्की द्वारा संचालित राज्य थे। इनकी सभाओं में गैर क्षत्रियों, गुलामों और मजदूरों को स्थान नहीं दिया जाता था। उदाहरणार्थ लिच्छवियों की सभा में 7707 राजा भागीदारी करते थे। यह सभी क्षत्रिय होते थे। इनके राज्यों का प्रमुख सेनापति हुआ करता था।

कुलीन तंत्र द्वारा संचालित इन राज्यों में सरकारी फरमानों और कानूनों के माध्यम से प्रजा पर कठोर नियंत्रण रखा जाता था। प्रोफेसर डीएन झा ने अपने आलेख रिपब्लिक्स फ़ॉर क्षत्रीज में इस विषय में अनेक उदाहरण दिए हैं। उन्होंने  बताया है कि किस प्रकार मल्ल महाजनपद में बुद्ध के आगमन के अवसर पर यह आदेश पारित किया गया था कि सभी नागरिक उनका स्वागत करेंगे और ऐसा न करने वाले पर भारी अर्थदंड लगाया जाएगा। इसी प्रकार एक बौद्ध जातक कथा के अनुसार अपने से निचले स्तर के राजा के साथ भी बेटी ब्याही नहीं जा सकती थी। वैशाली में नगर के विभिन्न वार्ड में रहने वाली लड़कियों के विवाह को नियंत्रित करने वाले नियम बनाए गए थे। अलग अलग वर्णों में जन्म लेने वाले लोगों के एक साथ बैठकर भोजन करने पर प्रतिबंध था। कुल मिलाकर यह सभी रिपब्लिक राज तंत्र से अधिक समानता दर्शाते हैं।

प्रधानमंत्री जी ने पुनः राष्ट्र प्रथम का संकल्प दुहराया। राष्ट्र प्रथम का विचार बहुत आकर्षक लगता है किंतु समस्या यह है कि प्रधानमंत्री जी जिस वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं उसकी राष्ट्र की संकल्पना गाँधी-नेहरू-आंबेडकर की राष्ट्र की अवधारणा से एकदम अलग है। सावरकर के अनुसार केवल हिंदू भारतीय राष्ट्र का अंग थे और हिंदू वो थे – जो सिंधु से सागर तक फैली हुई इस भूमि को अपनी पितृभूमि मानते हैं, जो रक्त संबंध की दृष्टि से उसी महान नस्ल के वंशज हैं, जिसका प्रथम उद्भव वैदिक सप्त सिंधुओं में हुआ था, जो उत्तराधिकार की दृष्टि से अपने आपको उसी नस्ल को स्वीकार करते हैं और इस नस्ल को उस संस्कृति के रूप में मान्यता देते हैं जो संस्कृत भाषा में संचित है।

राष्ट्र की इस परिभाषा के चलते सावरकर का निष्कर्ष था कि ‘ईसाई और मुसलमान समुदाय, जो ज़्यादा संख्या में अभी हाल तक हिंदू थे और जो अभी अपनी पहली ही पीढ़ी में नए धर्म के अनुयायी बने हैं, भले ही हमसे साझा पितृभूमि का दावा करें और लगभग शुद्ध हिंदू खून और मूल का दावा करें, लेकिन उन्हें हिंदू के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि नया पंथ अपना कर उन्होंने कुल मिलाकर हिंदू संस्कृति का होने का दावा खो दिया है।‘ सावरकर के अनुसार-“ हिन्दू भारत में-हिंदुस्थान में- एक राष्ट्र हैं जबकि मुस्लिम अल्पसंख्यक एक समुदाय मात्र।“ 

देश की स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 1947 को प्रकाशित ऑर्गेनाइजर का संपादकीय कहता है-  हम स्वयं को राष्ट्रवाद की मिथ्या धारणा से प्रभावित न होने दें। यदि हम इस सरल सत्य को स्वीकार कर लें कि हिंदुस्थान में केवल हिन्दू ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं और राष्ट्र की संरचना  इसी सुरक्षित और मजबूत आधार पर होनी चाहिए एवं राष्ट्र  हिंदुओं द्वारा हिन्दू परंपरा, संस्कृति, विचारों और अपेक्षाओं के अनुसार ही निर्मित होना चाहिए तब  हम स्वयं को बहुत सारे मानसिक विभ्रमों से बचा सकेंगे और वर्तमान तथा भविष्य की समस्याओं से छुटकारा भी पा सकेंगे। 

जबकि गांधी जी के अनुसार- “हिंदुस्तान में चाहे जिस मजहब के मानने वाले रहें उससे अपनी एकजुटता मिटने वाली नहीं। नए आदमियों का आगमन  किसी राष्ट्र का राष्ट्रपन नष्ट नहीं कर सकता। यह उसी में घुलमिल जाते हैं। ऐसा हो तभी कोई देश एक राष्ट्र माना जाता है। उस देश में नए आदमियों को पचा लेने की शक्ति होनी चाहिए। हिंदुस्तान में यह शक्ति सदा रही है और आज भी है। यूं तो सच पूछिए तो दुनिया में जितने आदमी हैं उतने ही धर्म मान लिए जा सकते हैं। पर एक राष्ट्र बनाकर रहने वाले लोग एक दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते। करें तो समझ लीजिए वे एक राष्ट्र होने के काबिल ही नहीं हैं।

हिंदू अगर यह सोच लें कि सारा हिंदुस्तान हिंदुओं से ही भरा हो तो यह उनका स्वप्न मात्र है। मुसलमान यह मानें कि केवल मुसलमान इस देश में बसें तो इसे भी दिन का सपना ही समझना होगा। हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो कोई भी इस देश को अपना देश मानकर यहां बस गए हैं वह सब एक देशी, एक मुल्की हैं, देश के नाते भाई भाई हैं और अपने स्वार्थ, अपने हित की खातिर भी उन्हें एक होकर रहना ही होगा। दुनिया में कहीं भी एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं माना गया, हिंदुस्तान में भी कभी नहीं रहा।( (हिन्द स्वराज, अध्याय-10, हिंदुस्तान की हालत- 3)।

नए संसद भवन के भूमि पूजन समारोह का स्वरूप  हिन्दू धर्म के किसी धार्मिक कार्यक्रम की भांति था। सर्व धर्म प्रार्थना सभा अवश्य हुई किंतु वह भी तो अंततः धर्म के विमर्श को परिपुष्ट करती थी। प्रधानमंत्री जी का उद्बोधन रह रह कर हमें हमारी धर्म परंपरा की ओर खींचता रहा। यह चिंताजनक संकेत है। धर्म और लोकतंत्र की युति लोकतंत्र के लिए विनाशक सिद्ध हो सकती है। प्रधानमंत्री जी के उद्बोधन में राष्ट्र प्रथम का विचार केन्द्रीयता लिए हुए था। किंतु प्रधानमंत्री जी को यह स्पष्ट करना था कि वे गांधी के राष्ट्र की चर्चा कर रहे हैं या सावरकर और गोलवलकर का राष्ट्र उनके जेहन में है। सावरकर और गोलवलकर के राष्ट्र में लोकतंत्र बहुसंख्यक तंत्र में बदल जाएगा। प्रधानमंत्री बारंबार संसद भवन को लोकतंत्र के मंदिर की संज्ञा देते रहे हैं। किंतु मंदिर की भूमिका धर्म के विमर्श तक ही सीमित रहनी चाहिए। नए संसद भवन को तो स्वतंत्रता, समानता, न्याय और तर्क के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।

(डॉ. राजू पाण्डेय लेखक और चिंतक हैं आप आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)

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