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Monday, September 20, 2021

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एनजीओ का धंधा, कभी न मंदा

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अभी तो मंजिल दूर है, दूर है तेरा गांव।

तंबू में तू बैठ कर, ले ले थोड़ी छांव।।

मगर उम्मीदों के तंबू भी ग़ायब हैं। नजर डालते हैं तंबुओं की व्यवस्था पर;

लोकतांत्रिक देशों में सरकारी या सामाजिक सिस्टम की पहुंच से कोई तबका वंचित रह जाता है तो उसके कल्याण के लिए गैरसरकारी संगठनों की अवधारणा दुनिया के सामने आई और शीत युद्ध के बाद दुनिया भर में गैर-सरकारी संगठनों के उभार में तेजी आई। भारत में भी 1980 के बाद तेजी देखी गई।

विश्व बैंक के हिसाब से “ऐसे निजी संगठन जो कुछ इस तरीके की गतिविधियों से जुड़े होते हैं जिनसे किसी की परेशानी दूर होती हो, गरीबों के हित को बढ़ावा मिलता हो, पर्यावरण को सुरक्षित रखा जाता हो, मूलभूत सामाजिक सेवाएं मुहैया कराई जाती हों या सामुदायिक विकास का जिम्मा उठाया जाता हो उन्हें एनजीओ के तौर पर परिभाषित किया जाता है”।

फरवरी 2014 में अन्ना हजारे के संगठन “हिन्द स्वराज को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने तमाम एनजीओ के बारे में ब्यौरा मांगा था जिसके जवाब में कई राज्यों ने डेटा उपलब्ध नहीं करवाया मगर जिन राज्यों ने उपलब्ध करवाया उसके हिसाब से पूरे देश में 20 लाख एनजीओ अर्थात गैर-सरकारी संगठनों के होने का अनुमान लगाया गया। जिस देश मे 943 लोगों पर एक पुलिस कर्मी है उस देश में 600 लोगों पर एक एनजीओ है। एक बार फिर से ऊपर एनजीओ की परिभाषा पढ़िए, एनजीओ की संख्या देखिये फिर दिमाग में घूम रहे मजदूरों की बदहाली के दृश्यों को लाइये।

हर साल एनजीओज को तकरीबन 10 हजार करोड़ रुपये विदेशी फण्ड मिलता है और टॉप 5 विदेशी दान दाताओं में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और नीदरलैंड हैं। मतलब अरब देशों से गजवा-ए-हिन्द के तहत देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए फंडिंग का आरोप भी निराधार नज़र आता है।

सर्दी हो बरसात हो, या गर्मी की धूप ।

टेंट यहाँ मौजूद है, मौसम के अनुरूप ।।

भारत में खुशहाली के दौर में या पाखंड-अंधविश्वास फैलाने के सीजन में जगह-जगह एनजीओ के तंबू नजर आते रहे हैं, मगर संकट के दौर में ज्यादातर एनजीओ के दरवाजे धर्मस्थलों की तरह बंद हो जाते हैं। आज कोरोना के संकट में पुलिसकर्मी आप को हर मोड़ पर खड़े मिलते हैं, मगर एनजीओ गायब हैं।

भारत मे एनजीओ/चैरिटेबल ट्रस्ट/फाउंडेशन आदि का विश्लेषण करें तो बड़े एनजीओ बड़े उद्योगपतियों से जुड़े हुए हैं। भारत के उद्योगपति कितने दानवीर हैं वो आपने इस संकट में भली भांति देख लिया है। टैक्स में छूट व अवैध कमाई को वैध घोषित करने के आरोपों से जूझ रहे इन एनजीओ के ऊपर पिछली यूपीए सरकार ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी नाम से मुनाफे का 2% समाज कल्याण के कार्यों में खर्च करने का नियम बनाया था। यह फण्ड भी उद्योगपतियों ने अपने ही एनजीओ में डाल लिया जो पहले से सवालों के घेरे में थे।

भारत में एनजीओ के गठन को लेकर भी एक वर्गीय फैलाव नजर आता है।ज्यादातर एनजीओ उच्च कही जाने वाली जातियों से जुड़े लोगों द्वारा बनाये गए हैं। कुछ लोग दर्जनों एनजीओ के फाउंडर, सदस्य आदि हैं। इसी वर्ग विशेष के उद्योगपति, राजनेता, मीडिया घरानों से जुड़े लोग, वकील, सरकारी अधिकारी, जज आदि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इन एनजीओ से जुड़े हुए हैं व ज्यादातर की घरेलू कामकाज देख रही पत्नियां एनजीओ की मालिक, सदस्य हैं।

यही कारण है कि जिन एनजीओ का गठन उन वंचित लोगों तक पहुंचने का होता है जिन तक सरकारें नहीं पहुंच पाती हैं, वो एनजीओ सिर्फ सरकारी अनुदान, चंदा एकत्रित करने तक सीमित हैं और बीच-बीच में अपने वर्ग से जुड़े लोगों की सहायता करते हुए की फोटो/खबरें छपवा कर, उसकी कतरन लेकर अगली अनुदान की किश्त लेने सरकारी दफ्तरों व व्यापारियों के पास घूमने लग जाते हैं।एनजीओ के टेंट बड़े लचीले व परिवर्तनशील होते है। हालातों के हिसाब से खुद को ढालने में कभी देरी नहीं करते।

किसानों, कमेरों, ओबीसी, एससी, एसटी व माइनॉरिटी से जुड़े लोगों द्वारा बनाये एनजीओ संसाधनों के अभाव से जूझते नजर आते हैं। इन कौमों से जुड़े लोगों द्वारा किये जा रहे समाज कल्याण के कार्यों को जातिवादी परसेप्शन से भी देखा जाता है।

दरअसल भारत में गरीबी व संसाधनों का अभाव जातीय व्यवस्था के पिरामिड के हिसाब से है। जो जाति जितनी उच्च समझी जाती है उसमें गरीबी न्यून व जो जाति जितनी निम्न समझी जाती है उसमें गरीबी अधिकतम होती है। भारत में निम्न समझी जाने वाली बहुसंख्यक आबादी संसाधनों के अभाव से जूझ रही है और उनके कल्याण के लिए अल्प उच्च समझी जाने वाली जातियों के लोग एनजीओ के टेंट लगा कर कार्यरत हैं।

भारत में सामाजिक आंदोलनों का इतिहास देखा जाए तो हर बार संसाधनों के अभाव में दम तोड़ते रहे हैं।संघर्ष लंबा खिंचता है तो आंदोलनकर्ताओं के खाने तक का इंतजाम नहीं हो पाता है। आंदोलनों को कुचलने के लिए सरकारें सिविल सोसाइटी के लोगों के ऊपर मुकदमे करती हैं, गिरफ्तार करती हैं, मगर खुद के एनजीओ वकील तक नहीं कर पाते है और उच्च वर्गीय एनजीओ सरकारों के साथ सामंजस्य बैठा कर क्रांति करता है। इसलिए अनुदान की किश्तों तक ही ध्यान केंद्रित होता है। मतलब ध्यान टेंट गड़े रहने तक ही सीमित होता है।

मजदूरों को लेकर जाने वाली ट्रेनें लंबी हैं व भौतिक स्वरूप है इसलिए भटकती हुई सबको नज़र आ गईं, मगर सदियों से उच्चता की मानसिकता में लिपटे लोगों ने एनजीओ को शुरुआत में ही भटका दिया था क्योंकि जनकल्याण से भटकी हुई सरकारों को सब कुछ भटका हुआ ही भाता है। 

ज्ञात रहे 600 लोगों पर एक एनजीओ है और एक तिहाई अर्थात 200 लोगों को मदद की दरकार है। मतलब साफ है 200 लोगों को एक एनजीओ खाना पानी उपलब्ध नहीं करवा पा रहा है, इनको अपने गांवों तक नहीं पहुंचा पा रहा है!

नभ में जब तक सूर्य है, गंगा में जलधार।

निश दिन ही फले फूले, टेंट का कारोबार ।।

(मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।) 

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