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Categories: बीच बहस

टोना-टोटका और अंधविश्वास नहीं वैज्ञानिक प्रामाणिकता है बीमारियों के इलाज का पैमाना

1991 के बसंत में कनाडा की मैकमास्टर युनिवर्सिटी के डाक्टर जार्डन गुयात ने ‘साक्ष्य आधारित चिकित्सा’ (एविडेंस बेस्ड मेडिसिन) पारिभाषिक पद गढ़ा था। सरल शब्दों में इसका अर्थ होता है- मरीजों के इलाज के बारे में उस समय तक उपलब्ध श्रेष्ठतम साक्ष्य के आधार पर ईमानदार और विवेक सम्मत निर्णय करना। पिछले 30 सालों में, दुनिया भर में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले तमाम शोध ‘साक्ष्य आधारित चिकित्सा’ पर आधारित रहे हैं- किसी भी नई दवा, प्रत्यारोपण या तकनीक को व्यवहार में आने के पहले जांच-पड़ताल, मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन की एक मानक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इस तरह ‘साक्ष्य आधारित चिकित्सा’ ने यह सुनिश्चित किया है कि बीमार का इलाज करते समय जादू-टोना और झूठे दावे करने वाले ठगों से बचा जा सके।

दुर्भाग्यवश, कोविड-19 महामारी के इस दौर में हम दुनिया भर में सिलसिलेवार ‘साक्ष्य आधारित चिकित्सा’ की धज्जियां उड़ते देख रहे हैं। कोविड-19 का भय और उससे पैदा हुई अफरा-तफरी हमें अज्ञान के एक ऐसे अंधेरे गर्त में धकेल रही है, जहां यह मान लिया गया है कि कोविड-19 की दवा, टीका या इलाज पर शोध करना न सिर्फ आसान है बल्कि उसे प्रकाशित भी आसानी से करवाया जा सकता है। यहां तक कि ‘लेंसेट’ जैसे सर्वोच्च प्रतिष्ठा वाले मेडिकल जर्नल भी ऐसे शोधों को छापने में पीछे नहीं रहे जो साक्ष्य आधारित चिकित्सा के मानकों पर हुई परख के सामने ठहर नहीं सके। ‘रिट्रेक्शन वाच’ नाम की वेबसाइट के मुताबिक इस साल जनवरी से अप्रैल के बीच दुनिया भर में अलग-अलग जर्नलों से कोविड-19 से जुड़े कुल 22 पेपर हटाने पड़े।

डर, चिंता और बेचैनी के इस माहौल में पतंजलि समूह ने दो आयुर्वेदिक दवाएं भारतीय बाजार में उतारीं- कोरोनिल और स्वशिर वटी। यह दावा भी किया जा रहा है कि ये दोनों दवाएं कोरोना के शत-प्रतिशत मरीजों को ठीक कर सकती हैं। हालांकि केंद्रीय आयुष मंत्रालय, जिसके अधीन आयुर्वेदिक, यूनानी, सिद्ध और होम्योपेथिक चिकित्सा आते हैं, ने इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर रोक लगा दी थी, तथापि हरिद्वार में एक प्रेस कांफ्रेंस करके पतंजलि समूह के मालिक रामदेव ने दावा किया कि परीक्षण के दौरान इन दवाओं ने 3 दिन में 69 प्रतिशत और 7 दिन में 100 प्रतिशत कोविड मरीजों को ठीक कर दिया।

रोचक बात यह है कि पूरी प्रेस-कांफ्रेंस के दौरान रामदेव ने जो शब्दावली प्रयोग की उसमें साक्ष्य आधारित चिकित्सा से जुड़े जार्गन (पारिभाषिक शब्द) भरे पड़े थे। पूरी प्रेस-कांफ्रेंस के दौरान वह ‘क्लीनिकल केस स्टडी’ और ‘क्लीनिकल ट्रायल’ जैसे शब्दाडंबर का प्रयोग करते रहे जबकि यथार्थ में उनका कोई मतलब नहीं निकल रहा था।

एक वैज्ञानिक और एक एलोपैथी डॉक्टर की हैसियत से मुझे आयुर्वेद, होम्योपैथी या अन्य वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों से कोई समस्या नहीं है। समस्या है- अचूक उपचार के रामदेव सरीखे दावों से जिनका कहना है कि कोविड-19 की उनकी तथाकथित दवाएं शत-प्रतिशत रोगियों को ठीक करने में सक्षम हैं। यही वह मुख्य दोष है जिसके बारे में हमें सतर्क रहने की जरूरत है। इन वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में, जिनमें से एक को रामदेव ने अपना धंधा बनाया हुआ है, सबसे ज्यादा समस्या मूलक बात है- अपने खुद के दावों पर सवाल उठाने में उनकी असमर्थता। इसके बरक्स, विज्ञान की खूबी यह है कि वह अपनी खुद की मान्यताओं को चुनौती देता है और उन पर खुद ही सवाल खड़े करता है। विज्ञान में कुछ भी पूर्ण सत्य नहीं है। कोई भी एलोपैथिक दवा राम बाण होने या 100 प्रतिशत रोगियों को ठीक करने का दावा नहीं करती। कोई भी चिकित्सकीय हस्तक्षेप दुष्प्रभावों से 100 प्रतिशत मुक्त नहीं होता।

इस भूमिका से स्पष्ट है कि रामदेव समूह द्वारा जारी कोविड-19 की दवाएं वर्तमान महामारी के संदर्भ में साफ तौर पर एक बहुत महत्वपूर्ण बात की ओर इशारा कर रही हैं। पतंजलि समूह जैसी बड़ी कंपनियां उस बाजार को भुनाने के लिए बेचैन हैं जो कोविड-19 की दवा या टीके का बहुत बेसब्री से इंतजार कर रहा है। दुनिया को जल्द से जल्द इस भय से निकलना चाहिए। दुनिया के दूसरे मुल्कों में भी इतने ही जोर-शोर से कोरोना के इलाज पर काम चल रहा है। आस्ट्रियाई इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ टेक्नोलॉजी एसेसमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में कोविड-19 की कुल 155 दवाओं और 79 टीकों पर काम चल रहा है।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि इस खूंखार वायरस की दवा और टीका विकसित करने की मानवता की जरूरत तो है ही, बहुत से लोग उपचार के इन उपकरणों के जरिये मुनाफा बटोरने के लिए भी घात लगाये बैठे हैं। एक शताब्दी पहले मार्क्स ने पूंजीवाद के जिस संकट की बात की थी, वर्तमान महामारी ने उसे सबके सामने एकदम नंगा कर दिया है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि बाजार की शक्तियां इस संकट से लड़ने और पार पाने के लिए अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ कदम उठा रही हैं, तथापि यह जांच का विषय है कि नार्वे, जापान, जर्मनी और इजराइल जैसे देशों, जिनमें इलाज की व्यवस्था समाजीकृत है (समाजवादी नहीं), ने मौजूदा महामारी से निपटने के मामले में खास तौर पर इतना अच्छा काम कैसे किया?

भारत का मामला एकदम अलग है। साक्षरता के अभाव और जनमानस में गहरी पैठी हुई परंपराओं और धर्मों की मौजूदगी में, जनता का बड़ा हिस्सा आसानी से जादू-टोने और नौटंकियों के चक्कर में फंस जाता है। हड्डी के कैंसर का विशेषज्ञ होने के नाते मैं ऐसे बहुत से मरीजों को जानता हूं जो कैंसर के ‘रामबाण इलाज’ के नाम पर वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के चक्कर में फंसा लिये गये। अंततः इनमें से अधिकांश को बढ़ी हुई बीमारी और भयावह जटिलताओं के साथ एलोपैथी की शरण में वापस लौटना पड़ा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव और गहराई तक पैठी धर्मांधता ने जादू-टोने और दिखावे बाजी को आकर्षक बनाया है। यही वह तंग गलियारा है जिसमें रामदेव जैसे लोग अपना मायाजाल फैलाते हैं। लेकिन भारत में विज्ञान का विनाश करने की कोशिश करने वाले इन लोगों से ज्यादा कष्टकर बात है- इन अवैज्ञानिक डींगों पर वैज्ञानिक समुदाय की चुप्पी।

पिछले कुछ बरसों में विज्ञान के छीजने की दर में तेजी आई है। यह दुर्भाग्य की बात है कि इसका इशारा हमें वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व के अवैज्ञानिक और अप्रमाणिक शब्दाडंबर से मिल रहा है। प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, पीठासीन न्यायाधीश और यहां तक कि डाक्टरों द्वारा भी स्थापित वैज्ञानिक तथ्यों के बरक्स धार्मिक और पारम्परिक शब्दावली को अधिकृत तौर पर उद्धृत किया गया है। रोचक बात है कि चीन, कोरिया और जापान जैसे देशों में मान्यता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले नेता अपनी परंपराओं से भी गहरे जुड़े हों। यह हमें उनसे सीखना चाहिए कि वे विज्ञान को अपनी परंपराओं से कैसे अलग रख पाते हैं। चीन के वुहान में जन्म लेने के बावजूद मौजूदा महामारी की किसी दवा के बारे में चीन ने अभी तक कोई दावा नहीं किया है। महामारी को लेकर चीन का रवैया पूरी तरह से वैज्ञानिक और महामारी विज्ञान के स्थापित मानकों के अनुरुप है।

यद्यपि कोविड-19 का हमारे दैनिक जीवन पर शिकंजा और हमारे सुकून की बरबादी अभी भी जारी है, फिर भी इससे देश के किसी भी नेक बंदे को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह ऐसी दवाओं, उपचारों और रोकथाम के उपायों को प्रोत्साहित करे जो उसकी समझ और कार्रवाई के दायरे में नहीं आते। आज विवेकशीलता बेहद जरूरी है और विवेक बुद्धिमत्ता से आता है। हमें अपनी स्वास्थ्य-व्यवस्था को मजबूत बनाना होगा जिसके रिसते जख्मों को महामारी ने सबके सामने खोलकर रख दिया है।

मौजूदा महामारी ने हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जिस अराजकता और जटिलताओं का उद्घाटन किया है, उनका समाधान जादू-टोने या परंपरागत तरीकों से संभव नहीं है। इस वायरस को हम विज्ञान की ठोस जमीन पर शिकस्त दे सकते हैं। हमें अपने वर्तमान को सशक्त बनाना है, अतीत का गौरवगान करने से कुछ नहीं होगा। अपनी पुस्तक ‘इन लाइट ऑफ इंडिया’ में नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक ओक्टोवियो पाज कहते हैं- अतीत की आलोचना से ही आधुनिकीकरण की शुरुआत हो सकती है।

इस महामारी ने हमें आधुनिकीकरण को चुनने का सुनहरा मौका दिया है।

(27 जून, 2020 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एम्स, नई दिल्ली के प्रो. शाह आलम खान के इस लेख का हिंदी अनुवाद ज्ञानेंद्र सिंह ने किया है।)

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This post was last modified on July 15, 2020 1:49 pm

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