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अब तो 11 साल पहले शांति भूषण का दिया बंद लिफाफा खोलेगा सुप्रीम कोर्ट!

कहते हैं कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी लेकिन 21वीं सदी में भी कुछ बहुत ज्ञानी लोग कालिदास की तरह जिस डाल पर बैठे रहते हैं उसे ही काटने का प्रयास करते हैं। कुछ ऐसा ही मामला उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के विरुद्ध अवमानना की कार्रवाई का है। जब से नई अवमानना की कार्रवाई शुरू की गयी है और वर्ष 2009 की अवमानना की कार्रवाई झाड़ पोंछ कर बाहर निकाली गयी है तब से उच्चतम न्यायालय की छीछालेदर हो रही है और अनजाने में ही उच्चतम न्यायालय ने अपनी आलोचना का द्वार स्वत: ही खोल दिया है।

पुराने मामले में प्रशांत भूषण के पिता पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने जो मुहरबंद लिफाफा उच्चतम न्यायालय को सौंपा था उसे भी अब उच्चतम न्यायालय को खोलना पड़ेगा जो पूर्व चीफ जस्टिसों के लिए अनुकूल नहीं होगा क्योंकि गड़े मुर्दे बाहर आयेंगे और सार्वजनिक छीछालेदर होगी।

अब माननीयों को कौन समझाये कि यदि नई अवमानना पर सुनवाई की हठ पर माननीय अड़े रहे तो तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस खेहर के कार्यकाल में कलिखोपुल की चिट्ठी में लगाये गये आरोपों का मामला, जस्टिस दीपक मिश्रा के कार्यकाल में मेडिकल प्रवेश घोटाले का मामला, जस्टिस रंजन गोगोई के कार्यकाल में राफेल से लेकर अयोध्या विवाद और यौन शोषण तक का मामला और वर्तमान चीफ जस्टिस एस ए बोबडे के कार्यकाल में न्यायिक निष्क्रियता और संविधान से इतर राष्ट्रवादी मोड़ में लिए जा रहे फैसलों का मामला खुली अदालत में उठेगा जिससे पहले से ही गिरी विश्वसनीयता का संकट और अधिक गहराएगा।

पुराने जजों के भ्रष्टाचार की, उसके बारे में शांति भूषण द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर लम्बे चौड़े हलफनामे और उसके साथ मुहरबंद लिफाफा जिसमें एक-एक जज का नाम लेकर उनके भ्रष्टाचार के दस्तावेजी सबूत पेश किए गए हैं। अब उच्चतम न्यायालय को उन सबूतों की जांच और उन पर खुली चर्चा के लिए तैयार होना पड़ेगा।अब माननीयों की हड़काइयां-पड़काइयां से वरिष्ठ अधिवक्ता नहीं डरे तो क्या स्थिति होगी इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। क्योंकि इस मामले में पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने उच्चतम न्यायालय में स्पष्ट घोषणा किया था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए माफी मांगने के बजाय वे जेल जाना पसंद करेंगे।

आपराधिक अवमानना के नये मामले की  कार्यवाही भूषण के 27 जून के ट्वीट को लेकर शुरू की गई है। जिसमें कहा गया था कि जब भविष्य में इतिहासकार पिछले 6 वर्षों में वापस मुड़ कर देखेंगे तो पाएंगे कि कैसे औपचारिक आपातकाल के बिना भी भारत में लोकतंत्र नष्ट हो गया है। उस समय वे विशेष रूप से इस विनाश में उच्चतम न्यायालय की भूमिका को चिह्नित करेंगे और विशेष रूप से अंतिम 4 सीजेआई की भूमिका को। उच्चतम न्यायालय  का कहना है कि उनको एक वकील से शिकायत मिली है, जो भूषण द्वारा 29 जून को किए गए ट्वीट के संबंध में है। इस ट्वीट में भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे द्वारा हार्ले डेविडसन मोटर बाइक की सवारी करने पर टिप्पणी की गई थी।

उच्चतम न्यायालय  के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पिछले तीस साल से लड़ रहे हैं। यह कुछ हद तक उनके इस निरंतर संघर्ष का ही परिणाम था कि सितम्बर 2009 में न्यायाधीश अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा देने के लिए तैयार हो गये, लेकिन इसके बाद भी बहुत कुछ किया जाना बाकी था। वर्ष 2009 में तहलका के साथ एक बातचीत में भूषण ने उन बाकी उपायों पर चर्चा की जिनसे जज और भी जवाबदेह बनें। उन्होंने न्यायिक भ्रष्टाचार के कई स्वरूपों पर भी चर्चा की। दूसरी कई बातों के अलावा उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में से आधे भ्रष्ट रहे हैं।

इस साक्षात्कार के आधार पर अधिवक्ता हरीश साल्वे ने भूषण और तहलका के सम्पादक तरुण तेजपाल के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला दाखिल कर दिया, पहले पहल प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि भारत का नागरिक होने के नाते उन्हें अपनी सोच सामने रखने का अधिकार है। मगर उच्चतम न्यायालय की साख का हवाला देते हुए अदालत मामले को जारी रखने पर अड़ी रही। प्रशांत भूषण पर यह साबित करने के लिए जोर डाला गया कि वे अपनी बात की गंभीरता साबित करें।

ऐसे में अब उन्होंने उन सबूतों के साथ एक पूरक हलफनामा दायर किया है जो भ्रष्ट जजों के बारे में उनके कथन को वजन देते हैं। हलफनामे में प्रशांत भूषण ने एक बार फिर दोहराया कि न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार के दस्तावेजी सबूत जुटाना कितना मुश्किल है क्योंकि एक तो जजों के खिलाफ किसी कार्रवाई की इजाजत नहीं है, दूसरे, ऐसी कोई अनुशासनात्मक संस्था नहीं है जिसकी तरफ देखा जा सके और उनके खिलाफ एफआईआर लिखवाने तक के लिए भी पहले चीफ जस्टिस की इजाजत लेनी पड़ती है।  लेकिन यह हलफनामा कई जजों के आचरण पर गंभीर सवाल खड़े करता था ।

इसके बाद एक ऐतिहासिक कदम के तहत संविधान विशेषज्ञ और पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने भी एक हलफनामा दायर किया और मांग की कि इस मामले में उन पर भी मुकदमा चलाया जाये। अपने बेटे की तरह उन्होंने भी कहा कि पिछले 16 चीफ जस्टिसों में से 8 भ्रष्ट रहे हैं। शांति भूषण ने एक मुहरबंद लिफाफा में इन जजों के नाम अदालत को सौंपे। उन्होंने कहा कि मैं इसे महान सम्मान समझूंगा अगर भारत के लोगों के लिए एक ईमानदार और पारदर्शी न्यायपालिका बनाने की कोशिश में मुझे जेल जाना पड़े।

शांति भूषण ने अपने हलफनामे में जिन 16 मुख्य न्यायाधीशों का जिक्र किया है, उनमें जस्टिस रंगनाथ मिश्र, जस्टिस केएन सिंह, जस्टिस एमएच केनिया, न्यायाधीश एलएम शर्मा, जस्टिस एमएन वैंकटचल्लैया, जस्टिस एएम अहमदी, जस्टिस जेएस वर्मा, जस्टिस एमएम पंछी, जस्टिस एएस आनंद, जस्टिस एसपी बरूचा, जस्टिस बीएन कृपाल, जस्टिस जीबी पाठक, जस्टिस राजेन्द्र बाबू, जस्टिस आरसी लाहोटी, जस्टिस वीएन खरे और जस्टिस वाईके सभरवाल शामिल हैं।

शांतिभूषण ने तब कहा था कि न्यायाधीशों का भ्रष्टाचार सीआरपीसी के तहत संज्ञेय अपराध है। सीआरपीसी में प्रावधान है कि एक बार एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस विवेचना करेगी और साक्ष्य एकत्र करेगी तथा कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करेगी। फिर उसके विरुद्घ मुकदमा चलेगा और दोषी पाये जाने पर जेल की सजा काटनी पड़ेगी मगर उच्चतम न्यायालय ने सीआरपीसी के इन प्रावधानों की वीरास्वामी मामले में 1997 में हवा निकाल दी और व्यवस्था दी कि भारत में मुख्य न्यायाधीश की अनुमति के बिना किसी भी न्यायाधीश के विरुद्ध एफआईआर दर्ज नहीं की जायेगी। वीरास्वामी फैसले के बाद आज तक किसी भी न्यायाधीश केविरुद्ध न तो प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति दी गयी है, न ही प्राथमिकी दर्ज हुई है। नतीजतन भ्रष्ट न्यायाधीशों को अभियोजन में पूरी तरह अभयदान मिल गया है।

इस प्रकरण की पोषणीयता पर सुप्रीम कोर्ट में 10 नवम्बर 09 को सुनवायी के दौरान जब खंडपीठ द्वारा इस मामले में माफी मांगने का बार-बार प्रस्ताव दिया तो पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने उच्चतम न्यायालय से स्पष्ट कहा कि यह उनका दृढ़ विश्वास है कि न्यायपालिका में बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार है। मैं वही बात कह रहा हूँ जो प्रशांत भूषण ने कहा है। माफी मांगने का कोई प्रश्न नहीं उठता। मैं जेल जाना ज्यादा पसंद करूंगा। न्यायपालिका को तब तक साफ सुथरा नहीं बनाया जा सकता जब तक न्यायपालिका में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार को आम जनता के बीच उजागर नहीं किया जाता।

दरअसल, यह सारा प्रकरण न्यायिक जवाबदेही आंदोलन के प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण के तहलका में प्रकाशित एक साक्षात्कार में यह कहने पर उत्पन्न हुआ था कि देश के पिछले सोलह न्यायाधीशों में आधे भ्रष्ट थे। उस समय तक न्यायमूर्ति एच.एस. कपाडिय़ा मुख्य न्यायाधीश नहीं बने थे, उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन के साथ एक पीठ में वेदांता स्टरलाइट ग्रुप से जुड़े एक मामले की सुनवाई की थी इसी साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा था कि न्यायमूर्ति कपाड़िय़ा को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह कंपनी के शेयर धारक हैं।

आपातकाल के पहले का एक वाकया आप भी सुन लें। उन दिनों समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडिस ‘प्रतिपक्ष’ साप्ताहिक निकालते थे जिसमें एक कवर स्टोरी संसद भ्रष्टाचार की गंगोत्री है प्रकाशित हुई। कांग्रेस ने इसका संज्ञान नहीं लिया तो स्वतंत्र पार्टी के सांसद पीलू मोदी से विपक्ष ने प्रतिपक्ष और जार्ज फर्नांडिस के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की नोटिस लोकसभा में दिलवा दिया। इस पर कांग्रेसी सांसद उत्साहित होकर उछलने लगे कि अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे। मामला स्पीकर के विचाराधीन था। लोकसभा में तैनात रिंद नौकरशाहों ने तुरंत स्थिति की गम्भीरता से प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी को अवगत कराया और विशेषाधिकार हनन की नोटिस नामंजूर कर दी गयी। यदि मंजूर होती तो लोकसभा में पता नहीं कौन-कौन से घोटाले और कदाचार उघाड़े जाते जिससे सरकार को ही कटघरे में खड़ा होना पड़ता।

अपना अपमान कराकर किसी को अपमानित करना कालिदास की परम्परा में आता है योर आनर!

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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