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Categories: बीच बहस

सरकार, अब आप का इकबाल बुलंद नहीं रहा !

उत्तर प्रदेश के कानपुर के गांव बिकरू में, एक अभियुक्त विकास दुबे को पकड़ने गयी पुलिस पार्टी और बदमाशों के बीच हुई मुठभेड़ में, एक डीएसपी सहित कुल आठ पुलिसजन मारे गए। इस घटना पर पुलिस अफसरों और अन्य लोगों की तरह तरह प्रतिक्रियायें आ रही हैं। पुलिस की तैयारी और इस ऑपरेशन पर भी सवाल उठ रहे हैं और राजनीति के अपराधीकरण के साथ-साथ पुलिस में आपसी विश्वासघात यानी पुलिस अपराधी सम्बन्धों पर भी अंगुलियां उठ रही हैं। इस जघन्य हत्या की निंदा और विकास दुबे की गिरफ्तारी की कोशिशें भी चल रही हैं। पुलिस व्यवस्था के संदर्भ में, अगस्त बॉलमेर जो कैलिफोर्निया के बर्कले शहर के पहले पुलिस प्रमुख और आधुनिक पुलिस व्यवस्था के जन्मदाताओं में से एक माने जाते हैं का यह कथन उल्लेखनीय है,

” एक पुलिसकर्मी, जनता द्वारा उपेक्षित, उपदेश देने वालों द्वारा आलोचित, फिल्मों द्वारा हंसी मज़ाक़ का पात्र, अखबारों द्वारा निंदित, जज और अभियोजन अधिकारियों द्वारा असमर्थित होता है। वह सम्मानित समाज द्वारा त्याग दिया गया, अपने कैरियर में असंख्य बार खतरों और लोभ से घिरे रहते हुए भी, जब वह कानून को लागू करता है तो उसकी भर्त्सना भी की जाती है और कानून लागू नहीं करने पर, नौकरी से वह बर्खास्त भी हो जाता है।”

मैं इसे जिगर मुरादाबादी के ही शब्दों में कहूँ तो, यह आग का दरिया है और डूब कर जाना है !

कर्तव्य पालन में हुई यह बेहद दुःखद घटना, उत्तर प्रदेश के हाल के अपराध के इतिहास की एक बड़ी घटना है। डीएसपी देवेंद्र मिश्र, संभवतः मथुरा के जवाहर बाग कांड में शहीद होने वाले एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी के बाद ऐसी घटनाओं में शहीद होने वाले, दूसरे राजपत्रित अधिकारी हैं। कानपुर का बिकरु गांव, न तो बीहड़ का कोई गांव है और न ही विकास दुबे किसी संगठित दस्यु गिरोह का सरगना ही है। यह गांव, शहर से बहुत दूर भी नहीं है। विकास दुबे, एक आपराधिक चरित्र का व्यक्ति है और किसी समय बसपा का एक छोटा मोटा नेता भी था। लेकिन ज़रूरत पड़ने पर सफेदपोश बदमाश जैसे सभी राजनीतिक दलों में ठीहा खोज लेते हैं, वैसे यह भी ठीहा खोज लेता है। यह एक अजीब विडंबना भी है ऐसे छवि के दुष्टों और अपराधी नेताओं में जनता एक अजब तरह का नायकत्व भी ढूंढ लेती है।

यह नायकत्व का नतीजा है या हमारी राजनीति और चुनाव व्यवस्था की गम्भीर त्रुटि कि, पंद्रह वर्ष से या तो विकास दुबे स्वयं या तो उसकी पत्नी या उसका भाई,  ज़िला पंचायत का सदस्य होता रहा है। अपने गांव का वह निर्विरोध प्रधान भी एक समय रहा है। छोटे स्तर पर ही राजनीतिक गतिविधियों के कारण विधायक या संसद के चुनाव में वह किसी न किसी के साथ जुड़ा ही रहता है। 2001 में, इसने, कानपुर देहात के शिवली थाने में ही भाजपा के एक नेता संतोष शुक्ल जो तब दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री भी थे, की हत्या कर दी थी।

यह हत्या थाने के अंदर थाना कार्यालय में ही हुयी थी। आप यह जान कर हैरान रह जाएंगे कि दिन दहाड़े थाना ऑफिस में हुयी हत्या की उस घटना में विकास दुबे अदालत से बरी हो गया था। उस समय वह उसी क्षेत्र के एक वरिष्ठ बसपा नेता के काफी करीब था। 2017 में एसटीएफ़ द्वारा भी गिरफ्तार किया गया था, पर उसमें भी वह फिलहाल जमानत पर है। इसके अतिरिक्त अन्य मुकदमों में भी यह  मुल्जिम है। साथ ही वह एक रजिस्टर्ड हिस्ट्रीशीटर भी है।

पुलिस की इस ऑपरेशन में क्या कमियां रही हैं इस पर जांच भी हो रही होगी, लेकिन एक बात तो तय है कि इस दबिश या रेड की भनक विकास दुबे को ज़रूर रही होगी। अब जो खबरें आ रही हैं उसके अनुसार, थाने से ही इस दबिश की गोपनीयता भंग हुयी है। ऐसे ऑपरेशन के समय पुलिस पार्टी द्वारा मुल्जिम की शक्ति, उसके छिपने के ठिकानों और फ़ायर पावर का अंदाज़ा लगाने मे कहीं न कहीं चूक ज़रूर हो गयी है। बदलते परिवेश के अनुसार पुलिसिंग के ढर्रे भी बदलने होंगे और दबिश तथा इसी प्रकार के अन्य ऑपरेशन के समय एक प्रोफ़ेशनल परिपक्वता बनाये रखनी पड़ेगी।

घटना के एक दिन बाद पुलिस ने बिकरू गांव में विकास दुबे के मकान को ध्वस्त कर दिया। यही नहीं, घर के बाहर खड़ी उसकी कई गाड़ियों को भी नष्ट कर दिया गया। इस ध्वस्तीकरण के कानूनी प्राविधानों पर भी चर्चा चल रही है। क़ानूनी जानकारों की मानें तो क़ानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसमें किसी अभियुक्त या दोषी साबित किए गए अपराधी का घर, ध्वस्त किया जाए। कानून में कुर्की का प्रावधान है, पर उसका वारंट एक निर्धारित प्रक्रिया द्वारा अदालत से मिलता है न कि, किसी की मनमर्जी से। कुर्की में चल संपत्तियां ज़ब्त कर ली जाती हैं।

उस स्थिति में कई बार घर की खिड़कियां और दरवाज़े तोड़ दिए जाते हैं क्योंकि अदालत में उन्हें चल संपत्ति दिखा दिया जाता है। उन्हीं की आड़ में कई बार दीवार भी गिरा दी जाती है लेकिन पूरा घर ज़मींदोज़ कर दिया जाए, ऐसी कार्रवाई नहीं की जाती है। कुर्की में अचल संपत्ति को भी कुर्क करने का एक प्रावधान है जिसमें थोड़ा समय लगता है पर वह बहुत ही प्रभावी प्रावधान है। कानूनी प्रक्रिया यह है कि, मुल्जिम को गिरफ़्तार किया जाए,  अगर मुल्जिम ने संपत्ति का नुक़सान किया है तो उसकी वसूली हो, लेकिन संपत्ति को नष्ट करने का अधिकार क़ानून नहीं देता है।

पुलिस का मुख्य काम अपराधों की रोकथाम, अन्वेषण और क़ानून व्यवस्था बनाए रखना है। क़ानून का पालन हो यह उसकी सबसे पहली प्राथमिकता है। क़ानून कैसे लागू किया जाएगा, उसे लागू करने के लिए कौन कौन अधिकृत है और कब लागू किया जाएगा यह सब क़ानून की किताबों में स्पष्ट रूप से लिखा है। लेकिन जब इन कानूनों के बावजूद भी समाज और जनता को अपेक्षित लाभ नहीं पहुँच पाता है तो, जो कुंठा समाज और सरकार तक पहुँचती है तो, निशाने पर फिर, पुलिस ही आती है। तभी यह मानसिकता भी जन्म लेती है कि अब कानूनन कुछ नहीं हो पायेगा तो, कुछ न कुछ क़ानून से हट कर कदम उठाने पड़ेंगे।

जनता जो अक्सर पुलिस पर कानूनन काम न करने का आक्षेप लगाती रहती है, खुलेआम क़ानून के उल्लंघन पर पुलिस को हाथों हाथ ले लेती है। कुछ मित्र इसे असामान्य परिस्थितियों में, उठाया गया असामान्य कदम, कह कर इसका बचाव करेंगे, लेकिन डीके बसु कोड और अदालतें इसे विधि विरुद्ध और पुलिस अराजकता और न जाने क्या-क्या कहती हुयी पुलिस को ही कठघरे में खड़े कर देंगी। तब यही असामान्य कदम जो असामान्य परिस्थितियों के लिए एक औषधि के रूप में सुझाया गया था, अचानक पुलिस के लिए हलाहल बन जाता है।

अक्सर लोग कहते हैं कि, जब तक सख्ती नहीं होगी, अपराध नहीं रुकेंगे। सख्ती का आशय पुलिस के मसल पावर की सख्ती नहीं बल्कि सख्ती से क़ानून को लागू करना है। मैं इस तर्क से सहमत हूँ कि क़ानून कभी कभी अपनी धार खो बैठता है। लेकिन जो पुलिस जन समाज के हित में क़ानून विरोधी तरीके से व्यवस्था बनाने और अपराध रोकने का काम करते हैं क्या उनके हित और हक में समाज और लोग भी, लम्बे समय तक, जब वे कानूनी मुसीबत में रहते हैं, तो कभी खड़े नज़र आते हैं ? तात्कालिक समर्थन की बात मैं नहीं कह रहा हूँ। तत्काल तो लोग सुपर कॉप घोषित कर ही देते हैं। मेरा अनुभव है, जी नहीं । और फिर वही शास्त्र वचन सामने आता है, हे मनुष्य, अपने कर्मों का फल तो तुम्हें ही भोगना है।

पंजाब में जब केपीएस गिल डीजीपी थे तो पंजाब आतंकवाद के बेहद बुरे दौर से गुज़र रहा था। क़ानून व्यवस्था का यह हाल था कि कोई क़ानून रह ही नहीं गया था। असामान्य, परिस्थितियों में असामान्य कदम उठाये गए। स्थिति सुधरी और पंजाब में अमन चैन वापस आया। गिल साहब बेहद सराहे गए। लेकिन बाद में, उन्हीं असामान्य कदमों पर सवाल भी उठने लगे। कुछ मानवाधिकार संगठन जो आतंकी दिनों में, बिल में घुस गए थे, निकल कर बाहर आये और इतनी याचिकायें अदालतों में दायर हुईं कि, कल के नायक और त्राता, रातों रात हत्यारे, भ्रष्ट , सुपारी पर हत्या कराने वाले खलनायक हो गए। हद तब हो गयी जब इन्हीं याचिकाओं से पीड़ित अमृतसर के एक पूर्व एसएसपी ने रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या कर ली। आखिर किस ने झेला यह सब ?

ऐसे क़ानून के उल्लंघन को आप राज्य के पक्ष में कह कर उचित ठहरा सकते हैं । पर राज्य हित, किसी का निजी हित न बने, क्या ऐसा होने से रोका जा सकता है ? अपने साथियों से यही कहना चाहूंगा कि, हम सब को क़ानून लागू करने की ट्रेनिंग दी गयी है, न कि दुरुपयोग करने की। देश में आपराधिक न्याय प्रशासन के और भी अंग हैं। न्याय पालिका है, अभियोजन है, कारागार है। कभी किसी न्यायालय ने यह जानते हुए भी कि अभियुक्त ने सच में अपराध किया है पर साक्ष्य नहीं है, और तब भी दण्डित करने का एडवेंचर किया है ? शायद नहीं। जज चाहते हुए भी नहीं करते। लेकिन पुलिस, सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में हैं और खुद को कानून से इम्यून समझते हुए,  अक्सर ऐसे रास्ते एडवेंचर के रूप में अपना लेती है।

न्यायालय की अपनी मज़बूरियाँ और कमियाँ होंगी, पर उसके लिए केवल पुलिस ही क़ानून तोड़ें, और फिर कोई ऊंच नीच हो जाए तो अकेले भुगतें यह बिल्कुल उचित नहीं है। विवेचना में मेहनत करना, सुबूत जुटाना और उसे साबित करना कठिन काम है। लेकिन यह तो पुलिस का दायित्व और कर्तव्य है। सारी ट्रेनिंग ही इसी लिए दी जाती है। सिंघम और दबंग वास्तविक पुलिसिंग नहीं है। यह एडवेंचर है। तीन घंटे का मन बहलाव है। इस प्रवृत्ति से लोगों को तात्कालिक लाभ भले मिल जाए, पर पुलिस के लिए इसके दूरगामी परिणाम बहुधा सुखद नहीं होते हैं, और यह उचित भी नहीं है। क़ानून का राज क़ानून के प्रावधानों से ही लागू किया जाना चाहिए, गैर कानूनी तरीके से नहीं।

विकास दुबे के सभी मोबाइल फोन की, पिछले छः महीने की कॉल डिटेल अगर निकाली जाए तो राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण का एक बेहद भयानक चेहरा सामने आएगा। उतर प्रदेश हो या बिहार या कोई अन्य प्रदेश, अक्सर ऐसे गुंडे और अपराधी न केवल राजनीति में अपना असर रखते हैं, बल्कि वे अपनी अपनी बिरादरी के नायक के रूप में भी मूर्धाभिषिक्त हो जाते हैं। चाहे वह गोरखपुर के हरिशंकर तिवारी हों या वीरेंद्र शाही, या मऊ के मुख्तार अंसारी, या मुरादाबाद के डीपी यादव, प्रयागराज ( इलाहाबाद ) के अतीक अहमद, ग़ाज़ियाबाद के मदन भैया, आजमगढ़ के रमाकांत यादव, सीवान, बिहार का शहाबुद्दीन, आदि आदि न केवल अपने अपराध कर्मों से राजनीतिक गलियारों में सम्मान पाते हैं बल्कि वे अपनी अपनी बिरादरी के हीरो के रूप में भी देखे जाते हैं।  जीवन भर जनता के दुःख दर्द में खड़े रहने वाले पढ़े लिखे नेता जहां चुनाव हार जाते हैं वहीं यह तबका चुनाव दर चुनाव जीतता चला जाता है। जनता इनके पीछे दीवानों सी चिपकती है और मजे की बात जनता इनके इतिहास और आपराधिक बैक ग्राउंड को अच्छी तरह से जानती भी है।

चुनाव सुधार या अपराधी तत्वों को चुनाव में खड़े होने से रोकने की बाते हों, तो, परस्पर घनघोर विरोधी दल भी दो बिन्दुओं पर पूर्णतः सहमत नज़र जाते हैं कि, अपराधियों के चुनाव में भाग न लेने और पार्टी फंड को मिले दान की सार्वजनिक घोषणा पर कोई प्रभावी कानून न बने। राजनीति में यही दो मुख्य बिंदु हैं, जहां से राजनीति का प्रदूषण शुरू होता है और हम आप सब इन्हीं अपराधियों के मुखारविंद से झरते हुए सुभाषित सुनते हैं और उन्हें भारी बहुमत से वोट देकर विजयी बनाते हैं।

फिर इस बहस में उलझ जाते हैं कि राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है या अपराध का राजनीतिकरण। राजनीति में अपराधीकरण को तो, पुलिस नहीं ठीक कर सकती है, क्योंकि यह उसके बस में नहीं है, लेकिन पुलिस में अपराधी तत्वों की घुसपैठ न हो, यह तो पुलिस को ही सुनिश्चित करना पड़ेगा। पहले भी पुलिस विभाग में अपराधी तत्वों की पहचान कर के कार्यवाहियां की हैं, अब भी इसे नियमित आधार पर एक अराजनीतिक दृष्टिकोण से करते रहना होगा।

पुलिस सरकार के बजट में, नॉन प्लान एक्सपेंडीचर की श्रेणी में आती है। इसलिए इसके लिये धन की कमी सदैव बनी रहती है। ”  सरकार का सबसे महत्वपूर्ण, मीडिया का पसंदीदा सॉफ्ट टार्गेट, आम जनता से ईश्वरीय अपेक्षा लिए हुए यह विभाग सरकार, सत्ता और अधिकार का प्रतीक है । फिल्मों में कभी पांडु हवलदार, तो कभी सुपरमैन तो, कभी एंग्री यंग मैन के रूप में यह विभाग चित्रित होता रहता है । पुलिस एक बिरादरी है। पुलिस एक मानसिकता भी है और पुलिस को समाज में, एक दुर्गुण के रूप में भी अक्सर लिया जाता है। कुल मिला जुला कर यह सरकार का अकेला विभाग है जो, जब सारी मशीनरी थम जाती है तो, और भी गतिशील हो जाता है। यह नीलकंठ की तरह विष पायी है ।

सिंघम और दबंग फिल्मों में पुलिस जैसी दिखाई गई है वह छवि, जनता को बहुत मोहित करती है। इन फिल्मों की कथावस्तु, थीम, लगभग एक जैसा ही सन्देश देती है, कि ‘पुलिस अपने विधि विधान से अगर कार्य करेगी तो न तो समाज का भला होगा और न ही जनता का और क़ानून किसी भी प्रकार की बुराई के लिए अप्रासंगिक हो चुका है। पुलिस को क़ानून का राज कायम करने के लिए क़ानून की अवहेलना करनी चाहिए।’ अक्सर जनता के लोग अपराधियों को सार्वजनिक रूप से पीटते हुए, गधे पर बैठा कर जुलूस निकालते हुए देख कर प्रसन्न होते हैं और ऐसे दरोगा की जम कर तारीफ़ और वाह वाही करते हैं। लेकिन जब यही खबर कहीं छप जाती है और इसके वीडियो वायरल हो जाते हैं तो दरोगा जी, कागजों का पुलिंदा लिए अपनी शिकायतों के खिलाफ की जा रही जांचों में बयान देते हुए, अकेले ही नज़र आते हैं। नायक से खलनायक के बीच की जो सीमा रेखा है, वह कब समाप्त हो जाती है पता भी नहीं चलता है।

सरकार का इक़बाल बुलंद है ! यह संवाद आज से पचास साल पहले जब कप्तान साहब बहादुर अपने थानेदार साहब बहादुर से यह पूछते थे कि , कैसे मिजाज़ हैं और इलाके का क्या हाल है तो, लंबे तगड़े और रोबीले चेहरे की रोबदार आवाज़ से यही वाक्य निकलता था। इक़बाल का शाब्दिक अर्थ होता है प्रभाव, असर, रुतबा। बुलंद का अर्थ होता है ऊंचा। पर अब सरकार का इक़बाल बुलंद नहीं रहा ! क्यों ? यह न सिर्फ हुजूर सरकार अफसरों के लिए सोचने की बात है बल्कि उन सब के लिए जो एक ही यूनिफार्म में एक ही परेड ग्राउंड पर एक ही वर्ड ऑफ कमांड पर कदम ताल करते हैं ।

इक़बाल की बुलंदी की क्या बात की जाए, वह तो तनुज्जली की ओर जा रहा है और जो कुछ विभाग में हो रहा है उसे तो हम सब देख ही रहे हैं । 2015 से 2019 तक के सालों में 1100 बार पुलिस मजाहमत या पुलिस के काम में दखलंदाज़ी की छोटी बड़ी घटनाएं, पूरे देश मे हो चुकी हैं । रोज़ ही अखबारों में कहीं पुलिस से वकील मुल्ज़िम छुड़ा ले रहे हैं तो कहीं दबिश यानी रेड , करने गयी पुलिस पर हमला हो गया है या यातायात नियंत्रण के समय किसी रसूखदार पार्टी के झंडेधारी गाड़ी वाले ने यातायात सिपाही के गिरेबान पर हाथ रख दिया, जैसी ख़बरें छपती रहती हैं । पुलिस का मनोबल गिरा हुआ है या नहीं यह तो अलग बात है पर असामाजिक तत्वों का मनोबल ज़रूर बहुत बढ़ा हुआ है । यह मन बढ़ई अब इतनी आम हो गयी है कि पुलिस भी इसकी आदी होती जा रही है ।

अगर कानूनी अधिकारों की बात की जाए तो पुलिस को जो अधिकार 1861 के पुलिस अधिनियम और तब के ही संहिताबद्ध आईपीसी, सीआरपीसी और लॉ ऑफ़ एविडेंस में प्रदत्त हैं उसमें कोई कमी नहीं हुयी है बल्कि उसके बाद बहुत से ऐसे क़ानून पास हुए हैं जिसमें पुलिस को और अधिक अधिकार मिले हैं। पुलिस बल की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन आबादी के अनुपात में अब भी कम है। गतिशीलता के साथ साथ संचार के साधन भी बढ़े हैं पर इन सब के बावज़ूद भी पुलिस का रुतबा या सम्मान घटा ही है । ऐसा क्यों है ? यह सवाल अक्सर मेरे और मेरे सहकर्मी मित्र जो पुलिस और प्रशासनिक सेवा में हैं या रह चुके हैं के मन में खदबदाता रहता है ।

अपराध न हो सके इसका जिम्मा तो कोई नहीं ले सकता है लेकिन अपराध होने पर उसका खुलासा हो और दोषी पकड़े जाएं यह पुलिस का दायित्व और कर्तव्य दोनों है। पर उसे न्यायालय से सजा हो जाय यह जिम्मेदारी अभियोजन की भी है। हमारा कानून न्यायशास्त्र के जिस दर्शन पर टिका है उसमें सुबूतों का पुख्तापन इतना हो कि, अदालत संतुष्ट हो जाए और मुक़दमे में सज़ा हो जाए। लेकिन यह काम एडवेंचर से नहीं सम्भव है। यह काम सम्भव है तफ्तीश की बारीकी भरी समझ, मनोयोग से की जाने वाली पैरवी और अभियोजन से बेहतर तालमेल से।

क्या वर्तमान कानून-व्यवस्था की विविधता को देखते हुए किसी भी मुक़दमे की विवेचना करने वाले एसआई या इंस्पेक्टर को जो थाने की ड्यूटी में भी है इतना समय और धैर्य है ? जिला पुलिस में तो नहीं ही है। सीआईडी और क्राइम ब्रांच की बात और है। सरकार के पास लंबे समय से पुलिस सुधार की संस्तुतियां लंबित हैं पर आज तक उन पर कोई निर्णय नहीं हुआ। न तो एसओ से लेकर डीजीपी के तयशुदा कार्यकाल पर कोई फैसला हुआ न तो पुलिस की रिक्तियों की नियमित भर्ती पर, न शहरों में कमिश्नर सिस्टम लागू करने पर, न तो विवेचना को कानून व्यवस्था से अलग करने पर और न ही पुलिस की अन्य लॉजिस्टिक समस्याओं पर। क्योंकि यह सरकार की प्राथमिकता में है ही नहीं और हमारा ख्वाब भयमुक्त समाज का है !

पुलिस को कानून को कानूनी तरह से लागू करने पर अड़ा रहना चाहिए और कोई भी ऐसा निर्णय जो विधितन्त्र और विधिनुकूल न हो उसे सरकार को विनम्रता से अवगत करा भी देना चाहिए। सरकार को अपनी प्रशासनिक भूमिका में काम करते समय, राजनैतिक प्रतिबद्धता से मुक्त रहने की आदत डालनी पड़ेगी। अपराध नियंत्रण के अनेक पुराने कानूनी उपाय जो उस्ताद बता गए हैं वे अब अपनाए नहीं जाते है क्योंकि वे समय लेते हैं। इंस्टेंट सफलता के इस युग में जिस सिस्टमैटिक पुलिसिंग की ज़रूरत है वह अब धीरे धीरे भुला दी जा रही है और दबंग और सिंघम मॉडल पुलिसिंग उसकी जगह ले रही है। आज पुलिस का इकबाल खत्म हो रहा है और हम मिथ्या भौकाल के युग मे पहुंच गए हैं। लेकिन एक तल्ख हक़ीक़त यह है कि समाज, सड़क, संसद और संस्थाओं में आपराधिक मानसिकता का जो वायरस संक्रमित हो गया है उसका इलाज कोई नहीं करना चाहता है। जो कुछ भी इलाज के रूप में आप देख रहे हैं वह महज कॉस्मेटिक है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on July 7, 2020 9:00 am

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