Saturday, December 4, 2021

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मणिपुर: जहां साधारण दंड प्रावधान लागू नहीं हो सकता, वहां लगायी गयी रासुका

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क्या गोबर तथा गोमूत्र के इस्तेमाल से कोविड-19 का इलाज सम्भव है? इसका जवाब नहीं है लेकिन सत्ताधारी राजनीतिक दल के कई नेता मानते हैं कि गोबर तथा गोमूत्र के इस्तेमाल से कोविड-19 का इलाज किया जा सकता है। फेसबुक’ या सोशल मीडिया पर किसी जागरूक नागरिक ने एक पोस्ट डालकर कह दिया कि कोविड-19 का इलाज गोबर तथा गोमूत्र नहीं है और इसकी वकालत करने वाले भाजपा नेताओं की आलोचना कर दी तो राजसत्ता ने उसे रासुका में हिरासत में ले लेती है। इस तरह भाजपा की सरकारें रासुका और अन्य कानूनों का दुरूपयोग कर रही हैं यह मामला मणिपुर के राजनीतिक कार्यकर्ता लिचोमबाम इरेंद्रो की गिरफ़्तारी का है जिसे भाजपा नेताओं की आलोचना करने पर रासुका के तहत हिरासत में ले लिया गया और उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप पर सोमवार की शाम को रिहा किया गया। 

उच्चतम न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी की कि निवारक निरोध खंड का उपयोग ऐसे मामले में किया गया है, जहां साधारण दंड प्रावधानों की भी आवश्यकता नहीं है। इसी से समझ लें कि सत्य बोलने वालों और असहमति की आवाजों को भाजपा सरकारें कैसे दबा रही हैं।

कोविड-19 के उपचार के लिए गोबर और गोमूत्र के इस्तेमाल की वकालत करने वाले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं की आलोचना करने पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत में लिए गए मणिपुर के राजनीतिक कार्यकर्ता लिचोमबाम इरेंद्रो को उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद सोमवार शाम को रिहा कर दिया गया। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि उन्हें एक दिन भी जेल में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने दिन में कहा था कि उनको हिरासत में रखने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।

इरेंद्रो के पिता की ओर से जमानत याचिका दाखिल करने वाले वकील शादान फरासत ने बताया कि उच्चतम न्यायालय के आदेश का अनुपालन करते हुए उसे शाम चार बजकर 45 मिनट पर रिहा कर दिया गया। पीठ ने याचिकाकर्ता को रिहा करने के निर्देश दिए थे। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि मणिपुर सरकार को इस अदालत के आदेश का अनुपालन शाम पांच बजे तक या उससे पहले करना होगा।

पीठ ने निर्देश दिया था कि मणिपुर जेल अधिकारियों को इस आदेश के बारे में तुरंत सूचित किया जाए ताकि सोमवार शाम पांच बजे तक कार्यकर्ता को रिहा किया जा सके। सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि वह याचिका का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन जवाब दाखिल करेंगे। इसके बाद पीठ ने याचिका को मंगलवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

इससे पहले, राजनीतिक कार्यकर्ता के पिता एल रघुमणि सिंह की ओर से पेश अधिवक्ता फरासत ने कहा था कि निवारक निरोध खंड का उपयोग ऐसे मामले में किया गया है, जहां साधारण दंड प्रावधानों की भी आवश्यकता नहीं है।

याचिका में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत राजनीतिक कार्यकर्ता को हिरासत में रखने को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ऐसा केवल कोविड-19 के इलाज के रूप में गोबर तथा गोमूत्र के इस्तेमाल की वकालत करने वाले भाजपा नेताओं की आलोचना करने के कारण ‘‘उनको सजा देने के लिए’’ किया गया।

याचिका में दावा किया गया था कि इरेंद्रो ने 13 मई को ‘फेसबुक’ पर एक पोस्ट में कहा था कि कोविड-19 का इलाज गोबर तथा गोमूत्र नहीं है। याचिका में कहा गया है कि मणिपुर भाजपा के प्रमुख के निधन के बाद भाजपा नेताओं के कोविड-19 से निपटने के लिए गोबर तथा गोमूत्र के इस्तेमाल करने जैसे अवैज्ञानिक तथ्यों तथा उनके गलत जानकारियां फैलाने की आलोचना करने के संदर्भ में वह बयान दिया गया था।’याचिका में कहा गया कि 13 मई को ‘पोस्ट’ करने के बाद उसे हटा भी दिया गया था।याचिका में कहा गया है कि इरेंद्रो को जमानत दे दी गई थी, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट के रासुका के तहत उन्हें हिरासत में रखने का आदेश देने के कारण रिहा नहीं किया गया।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह याचिका का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन जवाब दाखिल करेंगे। इसके बाद पीठ ने याचिका को मंगलवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि मणिपुर जेल अधिकारियों को इस आदेश के बारे में तुरंत सूचित किया जाए ताकि सोमवार शाम पांच बजे तक कार्यकर्ता को रिहा किया जा सके।

पोस्टर लगाकर पीएम मोदी की आलोचना में एफआईआर

उच्चतम न्यायालय ने एक याचिकाकर्ता से कहा कि वह कोविड-19 रोधी टीकाकरण अभियान के सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कथित तौर पर निंदात्मक पोस्टर लगाने के कारण गिरफ्तार लोगों और ऐसे मामलों के बारे में शीर्ष न्यायालय को जानकारी दे। न्यायालय ने कहा कि वह पुलिस को केंद्र की टीकाकरण नीति की आलोचना करने वाले पोस्टर लगाने पर प्राथमिकी दर्ज नहीं करने के संबंध में व्यापक आदेश नहीं दे सकता है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने याचिकाकर्ता प्रदीप कुमार यादव को ऐसे मामलों की जानकारी जुटाने के लिए एक हफ्ते का वक्त दिया और कहा कि अखबारों की खबरों पर निर्भर रहने के बजाए उन्हें इस संबंध में जानकारी स्वयं एकत्रित करनी चाहिए थी।

 यादव ने कहा कि दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और लक्षद्वीप में ऐसे मामले दर्ज किए गए हैं और पुलिस को ऐसे मामलों में प्राथमिकी की प्रति याचिकाकर्ता को देने का निर्देश दिया जाए। इस पर पीठ ने कहा, ‘अखबार हम भी पढ़ते हैं। लक्षद्वीप का विवाद कुछ अलग था। उसमें महिला को केरल उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत दे दी है। इस मामले में उस विवाद को लाने की जरूरत नहीं है। दिल्ली और अन्य स्थानों पर कौन से मामले दर्ज हुए हैं, आप उनके बारे में बताएं।’

 पीठ ने पुलिस के लिए निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए कहा कि यह उन्हें नोटिस जारी करने के समान होगा। इसके साथ ही पीठ ने मामले को अगले हफ्ते सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि कोविड रोधी टीकाकरण के सिलसिले में कथित तौर पर मोदी की आलोचना करने वाले पोस्टर लगाने के कारण दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकियों को रद्द किया जाए। याचिका में कहा गया कि 19 वर्षीय युवक, 30 वर्षीय ई-रिक्शा चालक और 61 वर्षीय कारीगर समेत 25 लोगों को दिल्ली पुलिस ने टीकाकरण अभियान के सिलसिले में कथित तौर पर प्रधानमंत्री के निंदात्मक पोस्टर लगाने के लिए गिरफ्तार किया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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