Sunday, October 17, 2021

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ऑन स्पॉट फ़ैसला: घोर ‘अंधकार युग’ का अवशेष

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ठीक दो साल पहले, 2017 के अक्तूबर का दूसरा सप्ताह। हरियाणा के यमुनानगर की एक आम सी महिला, गीता चौधरी मीडिया के सामने कुछ कहने के लिए आयीं। उन्हें यह भी नहीं मालूम था कि वह व्यक्तिगत तौर पर न वामपंथी, न दक्षिणपंथी, बल्कि मनुष्यपंथी हैं। उनकी बेचैनी उस फ़र्ज़ी सच को सरेआम कर देने भर की थी, जिसे वह रिश्ते के फ़र्ज़ के नाम पर लगभग पिछले 20 सालों से अपने दिल-ओ-दिमाग़ में दबाये हुए थीं। इन बीस सालों में गीता चौधरी भी युवा बेटी की मां हो गयी थीं।

उन्हें भी एक आम आदमी की तरह अपनी युवा बेटी की सुरक्षा की चिंता दिन-रात सताती थी और यही अहसास उसे वह हिम्मत दे गया था, जिसकी ताक़त के बूते वह मीडिया के सामने एक दिन अचानक खड़ी हो गयीं। वह उस वीभत्स कांड पर सालों की चुप्पी से पैदा हुई अपनी ही आत्मग्लानि से मुक्त होना चाहती थीं। उन्होंने उस दिन ख़ुलासा किया था कि उनके पास कुछ ऐसे सबूत हैं, जिनसे यह साबित होता है कि सीबीआई और आरोपियों के बीच रुपयों का लेन-देन हुआ था और पंजाब तथा हरियाणा हाई कोर्ट में सीबीआई ने ग़लत रिपोर्ट पेश कर दी थी।

उन्होंने कहा था कि इस कांड को दबाने के लिए प्रशासनिक तथा न्यायिक व्यवस्था में करोड़ों के लेन-देन हुए थे, उन्होंने उसी प्रेस वार्ता में यह भी कहा था कि पिता के कहने पर उन्होंने स्वयं अपने हाथों से एक अधिकारी को लाखों रुपये दिये थे। उस कांड को लेकर जिस समय गीता चौधरी मीडिया के सामने यह ख़ुलासा कर रही थीं, उसी समय, मौक़े पर रेणुका शर्मा के पीड़ित, पिता सुभाष शर्मा भी मौजूद थे। दरअसल सुभाष शर्मा को गीता चौधरी ख़ुद वहां लेकर आयी थीं।

गीता चौधरी ने कहा था कि उसने सीबीआई को भी एक पत्र लिखा है और बहुत जल्द वह सारे सुबूत सीबीआई को सौंप देंगी। ऐसा वह पहले नहीं कर पायीं, इसके लिए रेणुका के पिता से भी उन्होंने माफ़ी मांगी। गीता चौधरी ने क्षमायाचना करते हुए सुभाष शर्मा से कहा था, ‘मुझे और मेरे स्वर्गीय पिता को माफ़ कर दीजिए’। इसके बाद रेणुका के पिता सुभाष शर्मा भी मीडिया के सामने अपनी पीड़ा रखते हुए कहा था, “पिछले दो दशकों से इंसाफ़ की उम्मीद में भटक रहा हूं। न्याय की गुहार लगाते लगाते मेरी पत्नी चल बसीं और परिवार उजड़ गया”।

उल्लेखनीय है कि गीता शर्मा, भजनलाल सरकार में मंत्री रहे स्वर्गीय शेर सिंह की बेटी हैं। साल 1998 में हरियाणा के यमुनानगर में सामूहिक बलात्कार के बाद नाबालिग़, रेणुका शर्मा की हत्या कर दी गयी थी और उस बच्ची की लाश किसी नाले के किनारे बोरी में ठूंसी हुई मिली थी। इस वारदात के पीछे जिस रवि का हाथ बताया गया था, वह और कोई नहीं, बल्कि गीता चौधरी का भाई और तत्कालीन हरियाणा सरकार में मंत्री रहे शेर सिंह का बेटा था। आरोप लगाया गया कि उसने अपने दोस्तों के साथ इस वारदात को अंजाम दिया था। केस उस सीबीआई को सौंपा गया, जिसके बारे में लोगों के बीच यक़ीन का माहौल रहा है कि वह ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर देती है। उसकी यह साख उन दिनों ज़बरदस्त तो थी ही, पब्लिक परसेप्शन में साल-दर-साल-लगातार छीजते जाने के बावजूद, इस मायने में यह साख आज भी किसी भी एजेंसी से कहीं ज़्यादा है। सीबीआई ने केस की जांच की और फिर तमाम आरोपियों को क्लीन चिट दे दी।

रेणुका शर्मा बलात्कार तथा हत्याकांड, रसूखदार आरोपी, सीबीआई द्वारा जांच तथा क्लीनचिट, आत्मा की आवाज़ पर अपने ही भाई के ख़िलाफ़ सुबूतों के दावे के साथ मीडिया के सामने हाज़िर होती गीता चौधरी और अपनी बहन, गीता चौधरी पर संपत्ति विवाद को लेकर फ़ंसाये जाने के आरोप के साथ रवि चौधरी का पलटवार। मगर, इस कहानी में जो सबसे बड़ा विलेन नज़र आया है,वह है-साखदार रही सीबीआई। ऐसा लगता है कि अपराध और उसकी जांच की आंच की धौंकनी सत्ता और उसके नेतृत्व की उंगुली में फ़ंसी हो। कितनी आग देनी है, कितनी धधक पैदा करनी है, कब तक और किस रंग-ढंग में हनक को क़ायम रखना है, सब कुछ सत्ता की उंगुलीबाज़ व्यवस्था तय करती है। मगर उस उंगलीबाज़ व्यवस्था की अपनी एक सीमा है,जब यह सीमा ख़त्म हो जाती है,तब कहीं से जनता के बीच एक आवाज़ आती है-‘यह सीबीआई तो सरकारी तोता है’।

फिर, हैदराबाद की पुलिस की क्या बिसात ! पुलिस का चरित्र अब भी वही अंग्रेज़ी काल की सत्ता चौखट की रक्षक वाली है। सत्ता की रक्षा के लिए उसे उसके भक्षण से भी गुरेज नहीं है, जिसकी वास्तविक रक्षा का जिम्मा सौंपा गया है। पुलिस की छवि आज भी अपराधियों को डराने वाली नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच ऐंठने, रौब गांठने, डराने-हड़काने वाली है। यही अहसास हैदराबाद की पीड़िता के पिता को भी उस समय हुआ होगा, जब पुलिस के पास जाने पर उन्हें जवाब मिला होगा, ‘तुम्हारी बेटी किसी के साथ भाग गयी होगी, तीन चार घंटे में लौट आयेगी’।

पुलिस का यह बयान किसी सड़क छाप-ग़ुंडे-मवाली की उस ज़बान की तरह लगती है, जो किसी भी सभ्य नागरिक को तोड़कर रख देने के लिए काफ़ी है। असल में हैदराबाद की दिशा की बर्बर मौत की दशा पुलिस के इसी बयान ने तय कर दी थी, क्योंकि इस बयान के पीछे का मनोविज्ञान ही वह सबसे बड़ा कारण था, जिससे दिशा की हत्या को अंजाम मिलने में सहायक बना। इसके लिए महज तीन पुलिसकर्मी को मुअत्तल कर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि पूरे पुलिस विभाग पर हत्या का केस बनना चाहिए था। ठीक वैसे ही, जैसे किसी सवारी ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की स्थिति में रेल मंत्रालय के शीर्ष पर बैठे मंत्री पर इस्तीफ़े का दबाव बनता है।

आश्चर्य है, जो पुलिस एक सप्ताह तक अपने ऊपर उल्लिखित बयान से विलेन बनी रही, वही पुलिस न्याय-व्यवस्था को धता बताते हुए ऑन स्पॉट बिना दोषी सिद्ध हुए चार लोगों को मौत के घाट उतार देती है और ‘विलेन पुलिस’, रात के अंधेरे के छंटते ही ‘हीरो पुलिस’ में तब्दील हो जाती है। जो लोग मारे गये हैं,वे लोग कौन थे, यह ठीक से आम लोगों को मालूम भी नहीं है। ये क्या वही लोग हैं, जिन्होंने दिशा के साथ बर्बरता दिखायी थी, या फिर इन चारों की क़ीमत पर बर्बर रसूखदार कोई और है, जो न्याय व्यवस्था के इस छद्म पर अपने अंत:पुर में मुस्कुरा रहा है कि हां, उसे बलि चढ़ाने का यह परंपरागत हुनर मालूम है और हर बार वह ऐसे हुनर दिखाकर अब भी बच निकल सकता है।

हैदराबाद पुलिस ने तात्कालिक भावनाओं के ज्वार में दीर्घकालिक न्याय व्यवस्था का गला घोंट दिया है और इसका शिकार एक बार फिर कोई और नहीं, बल्कि हम-आप-तमाम मासूम नागरिक हुए हैं। जिन चारों के एनकाउंटर से पुलिस ने पब्लिक के रिपब्लिक को एक झटके में मध्यकालीन कुलीनों के राजसिंहान वाले ‘ऑन स्पॉट फ़ैसले’ में बदल दिया है, उनकी जांच-पड़ताल होना अभी बाक़ी थी। मगर ऑन स्पॉट फ़ैसला हुआ, और हम ‘सुल्तानी व्यवस्था’ के हामी होकर अपने ही विरुद्ध निहाल हो गये।

सुल्तानी व्यवस्था! इसे महसूस करने के लिए, उन बलात्कारों या हत्याकांडों के आरोपों की सूची पर एक नज़र डालिये, जहां कोई मंत्री रहा, चिन्मयानंद अस्पताल में है और आरोप लगाने वाली पीड़िता जेल में है, कहते हैं कि पीड़िता के पास सुबूत है, मगर वह हूक रही है; उस कुलदीप सिंह सेंगर को याद कीजिए, जिस पर आरोप लगाने वाली पीड़िता ने अपने परिवार के बड़े हिस्से को खो दिया है, लेकिन कुलदीप सिंह सेंगर के ख़िलाफ़ ‘ऑन स्पॉट फ़ैसला’ तो क्या एफ़आईआर तक दर्ज होने में हीले हवाली होती है ; नब्बे के दशक के पिछड़ों के मसीहा,लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में सियासी रसूख़ बघारते और लालू की जीवनी लिखने वाले मृत्युंजय यादव को याद कीजिए, जिस पर बलात्कार के आरोप लगाने के कारण आईएएस बीके विश्वास की पत्नी चंपा विश्वास को सालों बिहार के बाहर दिल्ली में शरण लेनी पड़ी थी; 

सत्ता के सुरूर का पर्यायवाची बन चुके तेजस्वी यादव के मामा, साधु यादव को याद कीजिए, जिसके गैरेज से शिल्पी गौतम की लाश मिली थी, शिल्पी के शरीर से लिथल एल्युमिनियम प्वॉयज़न और एक से अधिक लोगों के वीर्य के सैंपल भी मिले थे, जिसका जवाब, उसी सत्ता के बोझ को संभालने-थामने वाली पुलिस कभी नहीं दे पायी थी; हाल ही में हुई मुज़फ़्फ़रपुर के बच्चियों के साथ रिमांड होम कांड का आरोपी, ब्रजेश ठाकुर अपनी मुस्कुराहट से सत्ता को भी अपने रसूख की आहट जता जाता है, कई बच्चियां अपनी तड़पा देने वाली कहानियां सुनाती हैं, मगर ठाकुर अपने ठोकर से सुशासन में घबराहट पैदा कर देता है; उस नवरूणा हत्याकांड को याद कीजिए, जिसके बारे में सामान्य पब्लिक परसेप्शन है कि इस कांड में पुलिस, राजनीति-भू-माफ़िया सबके सब मुलव्विस हैं, मगर ऑन स्पॉट फ़ैसले’ का क्या ? हैदारबाद पुलिस के ऑन स्पॉट फ़ैसले को अगर आप ‘बेंचमार्क’ मानते हैं, तो क्या इन तमाम मामलों में ‘ऑन स्पॉट फ़ैसले नहीं हो जाने चाहिए थे, मगर ऐसा नहीं हो पाया।

ऊपर गिनाये गये चंद कांड एक प्रकार के हैं। इसकी एक दूसरी प्रकृति भी है और इसकी सूची भी छोटी नहीं है, जिसमें कोई अशोक कुमार,रयान इंटरनेशनल स्कूल में हुए प्रद्युम्न हत्याकांड में पकड़ लिया जाता है, उसकी बर्बर पिटाई होती है, पिटाई में उसकी हड्डी पसली टूट जाती है, नैरेटिव गढ़ा जाता है कि वह अपनी पत्नी के साथ सेक्सुअल रिलेशन से संतुष्ट नहीं था, इसलिए उसने एक मासूम के साथ दरिंदगी कर दी। कई सप्ताह तक वह पब्लिक परसेप्शन में घृणास्पद और हत्यारा बना रहता है, पब्लिक का भावनात्मक उफ़ान जब थम जाता है, यानी पुलिस अपनी पहली बाधा जब पार कर लेती है, तो अचानक पुलिस की वह थियोरी एक दिन भड़भड़ाकर गिर जाती है और प्रद्युम्न हत्याकांड का वह भी एक ऐसा मासूम शिकार बनकर रह जाता है, जिसका उपयोग पुलिस, पब्लिक भावनाओं के थामने के लिए करती है।

अशोक टूटा-फूटा,बेकार पड़ा अपने परिवार पर बोझ बना जी रहा है। यह भी पुलिसिया ‘पार्शियली ऑन स्पॉट फ़ैसले’ का परिणाम ही था। ऐसे ही ‘पार्शियली ऑन स्पॉट फ़ैसले’ के नतीजे के तौर पर कई लोगों की ज़िंदगी जेल में बीत जाती है और बाद में निर्दोष साबित हो जाने के बाद भी वह ज़िंदगी को फिर से पटरी पर नहीं ला पाने के लिए अभिशप्त हो जाता है। सवाल है कि ऐसे ‘ऑन स्पॉट फ़ैसले’ उस पुलिस वाले के लिए क्यों नहीं हो पाया था, जब उसने दिशा के पिता से कहा था-‘तुम्हारी बेटी किसी के साथ भाग गयी है, तीन-चार घंटे में लौट आयेगी’।

शायद इसलिए नहीं कि पुलिस उसी ऊंगलीबाज़ व्यवस्था की ऊंगली में फंसी एक मज़बूत डोर है,जिसे जनता को कठपुतली बनाकर उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करने का हुनर आता है। ‘पुलिस का ऑन द स्पॉट फ़ैसला’ अभी हमें-आपको भले ही नहीं डरा रहा हो, न्याय-व्यवस्था की नाकामी से इस फ़ैसले की शैली भले ही हमें लुभा रही हो, आनंदित कर रही हो, मगर इसके शिकार अंतत: हम नागरिक समाज को होना है, क्योंकि पुलिस व्यवस्था, कोई संपूर्ण न्याय व्यवस्था नहीं, बल्कि उसकी एक कड़ी मात्र है। मध्यकाल, जिसे कमोवेश दुनिया भर में ‘अंधकार युग’ का ख़िताब मिला हुआ है, वहां भी सिपहिया न्याय व्यवस्था नहीं, बल्कि दरबार में सिमटी, अविकसित न्याय-व्यवस्था ही थी।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)        

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