Monday, April 15, 2024

कोरोना वायरस मामले की स्वतंत्र जाँच के लिए वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की मंजूरी

नई दिल्ली। सौ से ज्यादा देशों की मांग पर कोरोना वायरस की जाँच के प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई है। वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की जेनेवा में चल रही बैठक में इसका प्रस्ताव रखा गया था। सौ से ज्यादा देशों ने इसका समर्थन करते हुए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव में ये लिखा गया है कि कोरोना वायरस के मानव शरीर में फैलने की विस्तृत जाँच होगी। साथ ही इस महामारी में विश्व स्वास्थ्य संगठन के कामकाज की निष्पक्ष और चरणबद्ध समीक्षा भी की जाएगी।

वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की वार्षिक बैठक में डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्य देशों में से किसी ने भी, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, यूरोपीय संघ द्वारा लाये गए प्रस्ताव पर आपत्ति नहीं जताई। बहामा के राजदूत और वर्ल्ड हेल्थ असेंबली के अध्यक्ष केवा बैन ने कहा, “किसी ने भी इस जाँच के प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज नहीं कराई है, इसलिए मैं इस प्रस्ताव पर सदन की सहमति व्यक्त करता हूँ।”

जाँच के संकेत एक दिन पहले हीं मिल गए थे जब डब्ल्यूएचओ के प्रमुख और चीन के कट्टर समर्थक ट्रेडरोस ऐडहेनाँम ग्रेब्रीयेसोस ने एक स्वत्रंत मूल्यांकन की बात पर कहा था कि “अगर स्वत्रंत मूल्यांकन के जरिए कुछ महत्वपूर्ण सबक सीखे जा सकेंगे और हमें कुछ अच्छे सुझाव मिलेंगे, तो जितना जल्दी हो सकेगा हम उन पर काम करेंगे।”

गौरतलब है कि अमेरिका शुरू से ही कोरोना संक्रमण के फैलने और उस पर जानकारी को छुपाने का आरोप चीन पर मढ़ता रहा है। अमेरिका और यूरोपीय देशों का कहना है कि अगर समय पर चीन और डब्ल्यूएचओ इस संक्रमण की जानकारी सभी देशों से शेयर करते तो बहुत हद तक इस पर काबू पाया जा सकता था। डब्लूएचओ अपनी भूमिका निभाने में पूरी तरह नाकाम रहा है और उसके अध्यक्ष चीन के एजेंट के रूप में काम कर रहें हैं। ये शक तब और गहरा गया जब डब्ल्यूएचओ ने चीन की शह पर ताइवान को वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की बैठक में बुलाने से इंकार कर दिया।

आज जब संपूर्ण विश्व कोविड-19 की विभीषिका को झेल रहा है तब ताइवान ने अपने प्रयासों से अपने 2.3 करोड़ लोगों को कोरोना वायरस संक्रमण के खतरे से बचा लिया है। सीमित संसाधन के बावजूद उसकी ये पहल अनुकरणीय है। ताइवान चाहता है कि वे अनुभवों को वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में साझा करें, मगर चीन के विरोध के बाद डब्ल्यूएचओ ने ताइवान को बुलाने से मना कर दिया है।

ताइवान के उप-राष्ट्रपति चेन चिएन जेन के हवाले से खबरों में कहा गया है कि “आपदा के समय आप किसी को अनाथ कर रहे हैं। यह साफ करता है कि डब्ल्यूएचओ अपनी तटस्थ जिम्मेदारियों से ज्यादा राजनीति में लिप्त है।” अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो अनेकों बार कहा है कि डब्ल्यूएचओ चीन के इशारे पर चल रहा है जबकि अमेरिका सबसे अधिक फंडिंग करता है। ट्रंप ने स्पष्ट कह दिया है कि अगर निष्पक्ष समीक्षा और जाँच नहीं हुई तो अमेरिका इस संगठन की सदस्यता छोड़ देगा। अमेरिका के हटने का मतलब उसके साथ तकरीबन सौ देश भी उसका अनुसरण करेंगे। सभी जानते हैं कि अमेरिका तथा उसके मित्र देशों के हटने के बाद ये संगठन दंतविहीन हो जाएगा और चीन चाह कर भी इतनी फंडिंग नहीं कर पाएगा।

चीन के राष्ट्रपति ने जाँच के निर्णय पर कहा है कि वे जाँच के लिए तैयार हैं मगर ये जाँच कोरोना वायरस संक्रमण के समाप्त होने के बाद होगी। उनकी बात से जाहिर है कि वे जाँच को टालना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि अभी जाँच के लिए सही समय नहीं है, वर्तमान में जाँच होने पर उनकी पोल खुल सकती है।

ट्रंप प्रशासन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर ये आरोप लगाया है कि डब्ल्यूएचओ लोक स्वास्थ्य की जगह सियासत में ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है। ताइवान को चीन के दबाव में संगठन से बाहर किए जाने के फैसले ने साफ तौर पर जाहिर कर दिया है कि डब्ल्यूएचओ पर चीन का प्रभाव तो है।

गौरतलब है कि डब्ल्यूएचओ को 31 दिसंबर,2019 को इस घटना की जानकारी पहली बार मिली। 04 जनवरी को सोशल मीडिया पर इसकी खूब चर्चा हुई और विश्व के सभी देशों को पता चल गया कि चीन में एक वायरस ने अटैक किया है।05 जनवरी को सभी देशों के बड़े अखबारों ने इस वायरस के बारे में विस्तृत लेख छापा। उस समय ये पता नहीं था कि ये वायरस इंसान से इंसान में फैलता है। 10 जनवरी को बहुत से देशों ने यात्रा पर एडवाइजरी जारी की तब तक डब्ल्यूएचओ की तरफ से कुछ नहीं बोला गया था।

20-21 जनवरी को डब्ल्यूएचओ की क्षेत्रीय विशेषज्ञों ने बुहान का दौरा किया, तब तक ये महामारी वैश्विक हो गई थी। 22 जनवरी को डब्ल्यूएचओ ने फील्ड विजिट के बाद ये घोषणा की कि ये संक्रमण मानव से मानव में फैलता है, तब तक स्वतः संज्ञान लेते हुए सभी देशों ने सुरक्षा के उपाय कर लिये थे। डब्ल्यूएचओ ने 24 जनवरी को दूसरी ट्रेवल एडवाइजरी जारी किया और 27 जनवरी को तीसरी। 28 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन के वरिष्ठ अधिकारियों ने बीजिंग में चीन के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की और 30 जनवरी को डब्ल्यूएचओ ने सार्वजनिक आपातकाल की घोषणा की जब सब कुछ लूट चुका था।

(अजय श्रीवास्तव की फ़ेसबुक वॉल से लिया गया है।)

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