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Categories: बीच बहस

अर्णब मामले में फैसला सुरक्षित: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है या दुरूपयोग

उच्चतम न्यायालय ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी को किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से प्राप्त संरक्षण की अवधि सोमवार को बढ़ा दी। न्यायालय ने इसके साथ ही अर्णब के समाचार कार्यक्रम के दौरान कुछ टिप्पणियों की वजह से एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में मुंबई पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी रद्द करने के लिये उनकी याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली और आदेश सुरक्षित रख लिया। खास बात यह रही कि एक ओर जहां अर्णब की ओर से कहा गया की यह कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है वहीं महाराष्ट्र सरकार की और से कहा गया की अर्णब का कार्यक्रम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुच्छेद 19 (1) (क) का दुरूपयोग है।

जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड और जस्टिस एम आर शाह की पीठ ने अर्णब गोस्वामी की याचिका पर वीडियो कांफ्रेन्सिंग के माध्यम से सुनवाई की। सुनवाई के दौरान, पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि याचिकाकर्ता के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में उचित उपाय उपलब्ध हैं, चाहे वह अग्रिम जमानत के रूप में हो या एफआईआर को रद्द करने के लिए। न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने कहा कि यदि आप इस प्राथमिकी को रद्द करना चाहते हैं, तो बॉम्बे हाईकोर्ट जा सकते हैं। हमने पहले कार्रवाई के एक ही कारण से उत्पन्न एफआईआर की बहुलता के कारण हस्तक्षेप किया था। पीठ ने यह भी कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत सामान्य प्रक्रिया से एक विशेष छूट इस मामले के लिए नहीं बनाई जा सकती है। पीठ ने कहा कि हमें ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहिए जहां किसी को विशेष रूप से कार्यवाही के सामान्य पाठ्यक्रम से छूट दी गई हो।

रिपब्लिक टीवी चीफ के लिए पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि आपराधिक जांच का मकसद पत्रकारिता के लिए उनके मुवक्किल को परेशान करना है। उन्होंने कहा कि 25 अप्रैल को पुलिस द्वारा गोस्वामी से 12 घंटे लंबी पूछताछ की गई थी। साल्वे ने कहा कि पुलिस अर्णब से 12 घंटे तक पूछताछ कर चुकी है। क्या इस एफआईआर के लिए 12 घंटे की पूछताछ की जरूरत है? मुझे नहीं लगता। उन्होंने यह भी बताया कि गोस्वामी से पूछताछ करने वाले अधिकारियों में से एक का कोविड-19 टेस्ट पॉजिटिव आया है। महामारी के बीच पुलिस ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गोस्वामी से पूछताछ के लिए अनुरोध नहीं किया।

मुंबई पुलिस की निष्पक्षता पर संदेह व्यक्त करते हुए साल्वे ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को हस्तांतरित करने की मांग की। उन्होंने जोर देकर कहा कि जांच उचित तरीके से नहीं चल रही है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 19 (1) (ए) और आपराधिक जांच की पवित्रता के बीच एक संतुलन होना चाहिए। या तो मेरिट पर हमारी बात सुनें या मामले को सीबीआई को हस्तांतरित करें। प्रेस की स्वतंत्रता पर एक बड़ा प्रभाव हो सकता है।

सिब्बल ने अर्णब गोस्वामी द्वारा अपने कार्यक्रमों में दिए गए बयानों की प्रकृति पर प्रकाश डाला, जिसमें अर्णब ने संकेत दिया है कि सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने में कांग्रेस पार्टी की भूमिका है। सिब्बल ने तर्क दिया कि यह अनुच्छेद 19 (1) (क) का स्पष्ट उल्लंघन है। अपने कार्यक्रम में अर्णब गोस्वामी सनसनीखेज ढंग से लोगों को कलंकित कर रहे थे।

महाराष्ट्र राज्य के लिए पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इसका विरोध किया और कहा कि मामले को सीबीआई को हस्तांतरित करने का मतलब होगा कि जांच आपके हाथ में जाएगी। सिब्बल के इस बयान पर भारत के सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कड़ी आपत्ति जताई। इस संदर्भ में साल्वे ने कहा कि सिब्बल का बयान इस मामले को सीबीआई को स्थानांतरित करने की आवश्यकता को दर्शाता है। यह राज्य और केंद्र के बीच एक राजनीतिक समस्या है और मैं उनकी क्रॉस फायरिंग में फंस गया हूं।

सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि “यह एक अजीब मामला है क्योंकि यह मामला एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि समाज के खिलाफ है। मामला यह है कि आरोपी को पुलिस पर कोई विश्वास नहीं है और पुलिस भी इसकी जांच को बचाने के लिए अदालत में आई है। उच्चतम न्यायालय में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा दायर आवेदन में आरोप लगाया गया है कि गोस्वामी अदालत द्वारा उन्हें दी गई अंतरिम सुरक्षा का दुरुपयोग कर रहे हैं।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि गोस्वामी शुद्ध रूप से सांप्रदायिक हिंसा में लिप्त हैं। उन्होंने कहा कि इस सांप्रदायिक हिंसा को रोकें। शालीनता और नैतिकता का आपको पालन करने की आवश्यकता है। आप सनसनीखेज चीजों के माध्यम से लोगों को कलंकित कर रहे हैं। जवाब में, साल्वे ने कहा  कि तब्लीगी जमात के मरकज़ की बैठक के मुद्दे पर आलोचनात्मक टिप्पणी करना सांप्रदायिक सद्भाव के विघटन के रूप में नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मरकज़ के मुद्दे पर बहुत से लोगों ने आलोचना की है। अगर कुछ निकाय एक धार्मिक समूह के नेतृत्व की आलोचना करते हैं तो वह 295 (IPC की धारा 295) नहीं है। यदि ऐसा है, तो अनुच्छेद 19 को खत्म किया जाना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और केवी विश्वनाथन ने भी अपनी दलीलें  दीं।


अर्णब के खिलाफ पालघर मामले के बाद 2 मई को रजा एजुकेशन वेलफेयर सोसायटी के सचिव इरफान अबूबकर शेख ने दक्षिण मुंबई के पायधोनी थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। यह प्राथमिकी 14 अप्रैल को बांद्रा में एक मस्जिद के निकट प्रवासी कामगारों के एकत्र होने की घटना को लेकर की गई टिप्पणियों के संबंध में थी। प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि इन टिप्पणियों से एक समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।इस एफआईआर को गोस्वामी द्वारा रद्द करने की मांग की गई, जिसमें आरोप लगाया गया है कि उनके चैनल ने बांद्रा में प्रवासियों के बड़े जमावड़े की घटना को सांप्रदायिक रूप दिया।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होेने के साथ क़ानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

This post was last modified on May 12, 2020 9:07 am

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