विभाजन विभीषिका स्मृति के बहाने हॉरर के रौरव की तैयारी

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जो आपदा में कमाई और लूट के अवसर ढूंढ सकते हैं, अकाल मौतों को छुपाने में राहत महसूस कर सकते हैं, बर्बादी और विनाश में आह्लाद देख सकते हैं वे भला उत्सव और समारोहों के मौकों को भी त्रासद और विभाजन का जरिया बनाने से क्यों बाज आने लगे !! ठीक यही काम अपने नाम,  डिवाइडर इन चीफ,  को सार्थक करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। भारत की आजादी के 75वें महोत्सव के ठीक पहले शनिवार को ट्वीट कर उन्होंने कहा कि “देश के बंटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता। नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों एवं भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी। उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के तौर पर याद किए जाने का निर्णय लिया गया है।”  जो दिन स्वतन्त्रता संग्राम में कई पीढ़ियों के असाधारण संघर्षों के गौरव को याद करने का होना चाहिए था-  खुद देश का प्रधानमंत्री उसे  हॉरर – विभीषिका – के दिन के रूप में याद करने का आह्वान करके आने वाले दिनों को रौरव के दिनों में बदलने की पृष्ठभूमि बना रहा था। 

निस्संदेह भारत विभाजन की त्रासदी मानव समाज की बड़ी और टाली जा सकने योग्य त्रासदियों में से एक है।  डेढ़ से दो करोड़ नागरिकों का, उनकी मर्जी के विरुद्ध – सहमति के बिना, अपनी जन्मभूमि और अपने बसे बसाये घरों से बेदखल होकर शरणार्थी बन जाना।  अनचाहे ही एकदम अनजानी जगह पर पहुँचना और उजड़ी हुयी जिंदगी को शून्य से दोबारा शुरू करने के लिए विवश हो जाना। एक विराट त्रासदी है।  जघन्य भी है क्योंकि इस बंटवारे के दौरान बिना किसी कारण के उन्मादियों द्वारा भड़काई गयी हिंसा में 10 लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे- इनमें भी सबसे ज्यादा यातना महिलाओं और बच्चों को भुगतनी पड़ी थी।  दोनों देशों, जो बाद में बांग्लादेश बनने के बाद तीन हो गये, का साहित्य विभाजन की इन त्रासद घटनाओं का दस्तावेजीकरण भी करता है, सबक भी देता है।  मंटो से लेकर भीष्म साहनी तक सबका सबक एक है कि ऐसे लम्हे कभी न आएं जिनकी खताओं की सजा सदियों को भुगतना पड़े।  

शातिरपन की इंतहा यह है कि विभाजन के हॉरर के पुनर्स्मरण की बात वे कर रहे हैं जो इस विभाजन के असली सूत्रधार, शिल्पकार हैं।   इन त्रासदियों के सबसे बड़े गुनहगार हैं।   

इतिहास में दर्ज है कि जब पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में एकजुट कतारबद्ध था तब कौन था जो भारत विभाजन की भूमिका और पटकथा लिख रहा था ?  ये आरएसएस और उनके आराध्य तथा कुलगुरु सावरकर थे जो कोई पांच हजार साल पुरानी अनगिनत विविधताओं के समावेश वाली सभ्यता के इतिहास में पहली बार धर्म के आधार पर राष्ट्र का विभाजन करके उसके पुनर्गठन का आह्वान कर रहे थे।  हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में  1938 और 1939 में दिए अपने भाषणों में उन्होंने वह कुख्यात द्विराष्ट्र सिद्धांत दिया था जिसका मतलब हिन्दू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग राष्ट्र बनाना था।  भारत को हिन्दुत्व पर आधारित हिन्दू राष्ट्र बनाना था। वही हिंदुत्व जिसे परिभाषित करते हुए स्वयं को नास्तिक बताने वाले सावरकर ने साफ़ किया था कि इसका हिन्दू धर्म के साथ कोई संबंध नहीं है, कि यह एक विशेष तरह की शासन प्रणाली है।  विभाजन के इस सावरकरी आह्वान के दो साल बाद जाकर मुस्लिम लीग के मंच से मोहम्मद अली जिन्ना ने अलग राष्ट्र की इस मांग का प्रतिध्वनित किया था।  वही जिन्ना जिनकी मजार पर जाकर 2005 में डिवाइडर इन चीफ के पूर्ववर्ती अवतार लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें एक ऐसा विरला व्यक्तित्व  बताया था जिसने इतिहास पर छाप नहीं छोड़ी, इतिहास का निर्माण किया।   अंग्रेज सावरकरी पटकथा के संवाद लिखकर विभीषिकाओं की सीरीज का निर्देशन कर रहे थे।  वही अंग्रेज जिनकी स्तुति में माफीनामे लिख लिखकर सावरकर अपना हस्तलेख सुधारते  थे और आरएसएस  स्वतन्त्रता आंदोलन से दूर रहकर रानी के राज की मदद करने के “अच्छे आचरण” के प्रमाणपत्र हासिल करता  था।  

ध्यान रहे यह वह समय था जब कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से मौलाना हसरत मोहानी और स्वामी कुमारानन्द पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव रख रहे थे और लाखों भारतीय – हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई और बौद्ध – लाठी-गोली-जेल की यातनाएं भुगतते हुए अंग्रेजों को भगाने के लिए हांका लगाए हुए थे।  आजादी के दिन की 75 वीं सालगिरह भारतीय अवाम के इन बेहतरीन योद्धाओं द्वारा कुर्बानी में बहाये गए लहू की यादों से कौमी एकता को गाढ़ा करने का अवसर है – मगर डिवाइडर इन चीफ उसे भारतीय समाज में विभाजन की खाईयों को चौड़ा करने के फावड़े में बदलने पर आमादा है। 

अब करोगे याद तो हर बात याद आएगी।  फिर यह भी याद किया जाएगा कि जिस विभाजन की विभीषिका की स्मृति की बात की जा रही है उसके असली अपराधी कौन थे।  कौन हैं वे जिन्होंने विभाजन से पहले, विस्थापन के दौरान और उसके बाद लगातार उन्माद और हिंसा भड़काई।  कहने की जरूरत नहीं कि इधर आरएसएस इसमें जुटा था उधर  मुस्लिम लीग और जमात-ए-इस्लामी यही सब कर रही थी।  यह सिर्फ आरोप भर नहीं है।  आजादी के बाद हुए लगभग सभी दंगों की जांच रिपोर्ट्स ने संघ को दोषी ठहराया है।  यहां तक कि संघ जिन्हें अपना पूज्य मानता है उन सरदार पटेल ने भी  गांधी हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाते वक़्त उसकी जहरीली और नफरती उन्माद भड़काने की प्रवृत्ति को असली कारण बताया था।  विडम्बना की विद्रूपता यह है कि विभाजन के बाद भी अपनी उन्मादी और विभाजनकारी हरकतें जारी रखने  वालों के सर्वेसर्वा ही उस विभीषिका की स्मृति ताजी करने का आह्वान कर रहे हैं । 

हादसे सबक लेने के लिए होते हैं । सबक लेकर ही हादसों के दोहराव को,  पुनरावृत्ति को टाला जा सकता है।  सभ्यता को आगे बढ़ाया जा सकता है। मगर जिनका उद्देश्य ही समाज को मनु के मध्ययुग में धकेल देना हो, जिनका अस्तित्व  ही असत्यों और अर्धसत्यों के ताने बाने की झीनी बुनावट से बना हो, जिनकी राजनीति लाशों के ढेर को सत्ता तक पहुँचने वाली सीढ़ियां मानती हो,  ऐसी खाईयां चौड़ी करने के उस्ताद एक नया पैंतरा लेकर लाये हैं। हिंदी भाषा में 75वीं वर्षगांठ को अमृत महोत्सव कहा जाता है।  आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में स्वयंसेवक प्रधानमंत्री के इस नए विषाक्त आह्वान का असली मकसद उस दौर की घटनाओं के एकपक्षीय अधूरे सच को भी तोड़मरोड़ कर साम्प्रदायिक उन्माद की नयी लहर का ज्वार पैदा करने के लिए इस्तेमाल करना है।  हालांकि इसके पीछे अब तक के पैतरों की विफलता स्वीकारना, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड सहित कुछ महीनों वाले विधानसभा चुनावों के लिए आख्यान – नैरेटिव – बनाना और विनाशकारी नीतियों से उपजे आक्रोश से ध्यान बँटाना भी है।  कुल मिलाकर यह कि इतिहास बदलने के लिए नए झूठ गढ़ने की हवस में आरएसएस – सत्ता में पहुँचने के बाद जिनमें वह खुद लिप्त रहा उन विभीषिकाओं को आगामी समय में एक नई विभीषिका छेड़ने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।  इस लिहाज से यह आह्वान शर्मनाक और निंदनीय के साथ साथ अत्यंत खतरनाक भी है।    

इसके खिलाफ इतिहास के सच का झंडा उठाकर प्रतिआख्यान – काउंटर नैरेटिव – तैयार करना जरूरी है।  यह काम सिर्फ विमर्श के मोर्चे पर करना काफी नहीं है, उसे संघर्षों के मोर्चों के साथ नत्थी करना होगा।  ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने इसे समझा है और “भाई भाई नू लड़न न देना/ सन सैंतालीस बनन न देना” का नारा बुलंद किया है।  

(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं। और आजकल भोपाल में रहते हैं।)

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