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Categories: बीच बहस

हकीकत और फसाने के बीच ऑनलाइन की फसंत

इस लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई, ऑनलाइन काम, डिजिटल भुगतान, ट्विटर आंदोलन, वेबिनार जैसे शब्द तेजी से हमारी भाषा का हिस्सा हो गए। ट्रोल जैसे शब्द तो पहले से ही चल रहे हैं, लेकिन जब इन शब्दों का प्रयोग सरकार कर रही थी तब उसके अर्थ अलग किस्म के थे। जैसे ऑनलाइन काम। यह सिर्फ कर्मचारियों के आपसी संयोजन से ही काम निपटाना नहीं होता है। यह ग्राहकों तक पहुंचना भी होता है। हरेक काम का उपभोक्ता होता है। काम का उपभोक्ता नहीं है तो यह सिर्फ उस उत्पादक व्यवस्था को बनाए रखने की एक मशक्कत ही होती है।

इस व्यवस्था में ऑनलाइन पढ़ाई का मसला ज्यादा गंभीर है। यह उत्पादक और उपभोग की व्यवस्था नहीं होती। यह ज्ञान हासिल करने की एक जटिल प्रक्रिया होती है, जिसमें शिक्षक और छात्र के बीच मनोवैज्ञानिक संबंध एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही। इसमें ज्ञान की प्रिंट मैटीरियल के साथ देश, समाज की आर्थिक, सामाजिक

और सांस्कृतिक माहौल की भी गहरी भूमिका होती है। सरकार निश्चय ही अक्सर निर्णायक भूमिका में होती है। कई बार वह नीतियों, प्रिंट मैटेरियल, भवन से आगे बढ़कर शिक्षकों और छात्रों को शिक्षण संस्थान में चुनने की सीधी जिम्मेदारी में आ जाती है, जिसका सीधा असर सरकार के पूर्वाग्रहों के अनुरूप होता है।

लॉकडाउन के दौरान अपनाई गई ऑनलाइन शिक्षा नीति ऐसे ही पूर्वाग्रहों से संचालित हुई लगती है। इसे आपदा स्थिति में रखकर प्रयोग करने का मसला अधिक दिखता है। नेशनल सैंपल सर्वे की 2017-18 की 75वें राउंड की रिपोर्ट को यदि हम देखें, तब इस बात को और गहराई से समझ सकते हैं। भारत में 11 प्रतिशत परिवार के पास लैपटॉप, डेस्कटॉप या टैबलेट उपलब्ध है। कुल 24 प्रतिशत लोगों के पास इंटरनेट, जिसमें मोबाइल टॉवर, वाई-फाई से जुड़े फोन भी शामिल हैं, उपलब्ध हैं। इसमें भी कुल योग को यदि शहर और गांव में विभाजित करें तब ये सुविधा शहर में 42 प्रतिशत और गांव में महज 15 प्रतिशत ही उपलब्ध है।

यदि हम छात्रों की कुल संख्या के संदर्भ में देखें तो सिर्फ नौ प्रतिशत छात्र ही डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में नामांकन करा पाए हैं। इसमें भी कुल योग का 21 प्रतिशत शहर में और चार प्रतिशत गांव में हैं। इन नामांकित छात्रों में से भी केवल 25 प्रतिशत ही इंटरनेट से किसी भी माध्यम से जुड़ सके। इसमें शहर में 44 प्रतिशत और गांव में 17 फीसदी ही इस सुविधा का लाभ उठा पाए।

झारखंड, उड़ीसा, कर्नाटक, तेलगांना और त्रिपुरा में महज एक प्रतिशत लोग ही इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटर का प्रयोग कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश जिसे चंद्रबाबू नायडू ने देश का आधुनिकतम राज्य बना देने का वादा किया था, वहां भी बिहार और उड़ीसा जितना ही छात्रों का चार प्रतिशत हिस्सा ही इंटरनेट से जुड़ा है। सिक्किम- 75 प्रतिशत और गोवा 74 प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर हैं।

धनी वर्ग से आने वाले 10 प्रतिशत छात्रों में इंटरनेट का प्रयोग सबसे अधिक है। शहर में 66 प्रतिशत और गांव में 45 प्रतिशत इस सुविधा का प्रयोग करते हैं। गरीब समुदाय महज दो फीसदी इंटरनेट से जुड़े कम्प्यूटर का प्रयोग करते हैं। इसमें तीन प्रतिशत के पास अपने कम्प्यूटर हैं और 10 प्रतिशत अन्य डिजिटल साधनों का प्रयोग करते हैं।

इसे यदि जातीय और धर्म के आधार पर देखें, तो स्थिति की गंभीरता और भी बुरी दिखती है। अनुसूचित जाति के सिर्फ चार फीसद छात्रों के पास इंटरनेट से जुड़ा कम्प्यूटर है। 17 प्रतिशत इंटरनेट का प्रयोग कर रहा था जिसमें अन्य डिजिटल साधनों का प्रयोग भी शामिल है। ओबीसी हिस्से में यह क्रमशः सात और 23 प्रतिशत है। अनुसूचित जनजाति में चार

और 13 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति में उत्तर-पूर्व की जातियों को भी शामिल कर लिया जाता है। यदि हम झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को अलग से देखें तो स्थिति ज्यादा स्पष्ट होती। पूरे मुस्लिम समुदाय में यह आठ और 23 प्रतिशत है। यहां भी मुस्लिम समुदाय को एक समान समुदाय के रूप में पेश किया गया है, जबकि यहां जातिगत और क्षेत्रीय स्तर पर विभाजन उतना ही गहरा है जितना ‘हिंदू’ श्रेणी में है। अन्य प्रवर्ग में यह 21 प्रतिशत और 45 प्रतिशत है।

कुल छात्रों का 25 प्रतिशत हिस्सा इंटरनेट से जुड़े ऑनलाइन शिक्षा में पंजीकृत हुआ है। इसमें से भी 90 प्रतिशत के पास उपयुक्त साधन नहीं हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति का महज चार प्रतिशत हिस्सा ही ऑनलाइन शिक्षा को हासिल कर पाने की स्थिति में है, जबकि गरीब आय से आने वाले छात्रों में 98 प्रतिशत हिस्सा इस सुविधा से महरूम हैं।

ऐसे में, हमें एक और शब्द अपने शब्दकोष में शामिल कर लेना चाहिए, डिजिटल डिवाइड। यह विभेदीकरण सिर्फ लॉकडाउन तक सीमित है, ऐसा नहीं है। मोदी ने जब कर और वित्त व्यवस्था को डिजिटल करने का निर्णय लिया था और नोटबंदी और जीएसटी के साथ साथ खातों को भी डिजिटल बना देने का निर्णय लिया था, तब उसका आर्थिक, सामाजिक असर वर्ग, जाति, धर्म, क्षेत्र आदि के विभाजनों की चलनी से छनते हुए नीचे गया।

मोदी ने दावा किया कि अमीर और गरीब दोनों ही लाइनों में लग गए, कर देय एकदम खुले तरीके से होने लगा है, …लेकिन सच्चाई क्या है? अमीरों की दौलत में कितनी कमी आई? उसी समय में पैसे की लूट हुई। अरबपतियों की संख्या में इजाफा हुआ। आज जब मोदी छह लाख गांवों को इंटरनेट से जोड़ देने का दावा कर रहे हैं और शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र को इंटरनेट के माध्यम से काम करने का रास्ता बना रहे हैं, तब हमें यह ध्यान में रखना होगा कि इस प्रक्रिया में एक बहुत बड़े समूह को बाहर, हाशिये पर भेजा जा रहा है।

चंद दिनों पहले, मोदी ने एक पत्रिका के समारोह में कहा कि ज्ञान हासिल करने की प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है। यह बात हाल ही में आई नई शिक्षा नीति के मूल मर्म को ही पेश करता है, जिसमें शिक्षक की भूमिका शिक्षा के महज साधन से अधिक नहीं है। लॉकडाउन में ऑनलाइन शिक्षा को जमीन पर ला देने का यह प्रयास आंकड़ों के नजरिये से बहुसंख्यक छात्रों को शिक्षा से वंचित कर देने की भावी योजना जैसी दिखती है। खासकर, तब और भी जब साक्षरता को ही शिक्षा का पर्याय बना दिया गया।

(अंजनी कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

This post was last modified on September 10, 2020 1:50 pm

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