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Monday, September 27, 2021

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पाटलिपुत्र की जंग: पहले राउंड में ही मात खाता दिख रहा है ओवैसी का ‘मिशन बिहार’

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बिहार विधानसभा का चुनाव महासंग्राम में बदलता जा रहा है। यह अभी जितना सामान्य लग रहा है, उतना है नहीं। पिछली बार की तरह इस बार भी यह चुनाव विशुद्ध जातिगत और मजहबी समीकरणों पर ही लड़ा जाएगा। राजनीतिक दल इस स्थिति को बदलना नहीं चाहते। मुस्लिम मतदाता भी इससे अछूते नहीं हैं और जब इस चुनावी खेल में सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल हों तो यह राजनीतिक दांव बहुत बड़ा साबित होने जा रहा है। ओवैसी ने आज (बुधवार) दो ट्वीट किए हैं जो उनकी चिन्ता को बता रहा है। बिहार के लोगों की जो धारणा बन जाती है, वो बन जाती है। चुनाव के पहले राउंड में ही ओवैसी को बिहार के मुसलमानों ने वोट कटवा नेता घोषित कर दिया है और यह संदेश शहरों से लेकर गांवों तक जा पहुंचा है। 

ओवैसी ने अपने ट्वीट में उसी पर सफाई पेश की है। ओवैसी ने लिखा है- वोट कटवा कौन है? वही जिसने आपका वोट लिया जरूर था लेकिन मरहूम मौलाना कासमी को ट्रिपल तलाक बिल पर बोलने की इजाजत नहीं दी। वही जिसने वोट कटवों के डर से नीतीश को जितवा दिया और नीतीश जाकर मोदी की गोद में बैठ गया। इसके बाद ओवैसी लिखते हैं- अगर आप भी कांग्रेस और राजद की गुलामी से तंग हैं तो हमारा साथ दीजिये। अपना वोट ज़ाया जाने न दें। मजलिस आपके मुद्दों को पूरी बेबाकी और ईमानदारी से उठाएगी। हम कभी जालिम से समझौता नहीं करेंगे। मजलिस में बुज़दिली की कोई जगह नहीं है।

ओवैसी के बयान से साफ है कि मुस्लिम वोटों पर बड़ा दांव लग चुका है। सारी लड़ाई बिहार के 18 फीसदी मुस्लिम वोट को हथियाने के लिए शुरू हो गई है। बिहार में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सिर्फ मुस्लिम-यादव फार्मुले के आधार पर 15 साल राज किया है। ये हालात 1989 से बदले जब भागलपुर में दंगे हुए और मुसलमान कांग्रेस से अलग हो गए। उसी समय से मुसलमानों ने दूसरे राजनीतिक दलों की तरफ देखना शुरू किया।

उसी दौर में लालू बिहार में जनता दल को खड़ा कर रहे थे। मुसलमान लालू के साथ खड़े हो गए और वहीं से एमवाई (माई) फार्मुला की धूम मच गई। बिहार में 16 फीसदी यादव ओबीसी हैं और ये पूरी तरह से आज भी लालू की पार्टी आरजेडी के साथ हैं। लेकिन बिहार में करीब 15 फीसदी उच्च जाति यानी ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ मतदाता भी हैं। ये अब परंपरागत रूप से भाजपा का वोट बैंक हैं। हालांकि इनमें से ब्राह्मण बहुत लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहे लेकिन 1984 के बाद हालात तेज़ी से बदलते गए और ये लोग भाजपा के साथ आ गए।

जातियों के समीकरण में बिहार में अगर कोई भारी पड़ता है तो वो 40 फीसदी गैर यादव ओबीसी वाले मतदाता हैं। इनका वोट शेयर बंटा हुआ है। इनमें से कुछ जेडीयू, कुछ जीतन राम मांझी की पार्टी, कुछ कुशवाहा और साहनी की पार्टी के साथ हैं। यहां तक कि राम विलास पासवान की पार्टी भी 5 फीसदी दुसाध मतदाताओं के अपने साथ मानकर चलती है।

ओवैसी जब हैदराबाद से मिशन बिहार के लिए निकले थे तो उस समय तक विपक्षी महागठबंधन से मांझी की हम पार्टी, मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी और उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा अलग नहीं हुए थे। लेकिन अब ओवैसी की आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन (एआईएमआईएम) के साथ कुशवाहा की पार्टी, बीएसपी और देवेंद्र यादव की पार्टी समाजवादी जनता दल (डेमोक्रेटिक) ने अपना गठबंधन बनाया है। जाहिर है कि ये गठबंधन पहली बार बना है और ओवैसी पूरी ताकत से बिहार चुनाव को मुस्लिम मतदाताओं के दम पर राजनीति की प्रयोगशाला बनाना चाहते हैं। किशनगंज उपचुनाव में उनके प्रत्याशी की जीत के बाद से उनके हौसले बुलंद हैं।

इसलिए वोट काटने वाले नेता के रूप में उनका प्रचार होने और मतदाताओं में इस तरह की धारणा बन जाने से वह परेशान ज़रूर हैं। जब उनका कुशवाहा से गठबंधन नहीं हुआ था तो उससे पहले ओवैसी ने बिहार में 32 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही थी लेकिन अब गठबंधन के बाद बदले हालात में उन्हें कितनी सीटें मिलती हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। बिहार में करीब 40 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जिनमें मुस्लिम मतदाता 12 से 42 फीसदी हैं। सिर्फ किशनगंज ऐसी सीट है जहां मुस्लिम मतदाता 68 फीसदी हैं। 

यानी इन आंकड़ों के मद्देनजर अगर देखें तो ओवैसी की रणनीति पहले से ही तय है। किशनगंज उपचुनाव में पार्टी जीत का स्वाद भी चख चुकी है और जब ओवैसी अपना प्रचार अभियान सिर्फ इन्हीं 40 सीटों या 32 सीटों पर चलायेंगे तो मुस्लिम वोट उनके खाते में ज़रूर आयेंगे…लेकिन सवाल वही है कि अगर बिहार के जागरुक मतदाताओं ने ओवैसी को वोट कटवा मान लिया तो उनके पार्टी के प्रत्याशियों की जमानत जब्त करवाकर भेज देंगे। लेकिन इस बार बिहार चुनाव में दांव बड़ा है। पर्दे के पीछे भी बहुत कुछ हो रहा है, जो सामने नहीं आ रहा है।

भाजपा और जेडीयू का गठबंधन हो चुका है और सीटों पर सहमति बन चुकी है। नीतीश कुमार भाजपा के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव भी प्रकट कर चुके हैं लेकिन वो मामूली रिंग लीडर नहीं हैं। उनकी नजर कुशवाहा के गठबंधन पर लगी हुई है। संकेत मिल रहे हैं कि अगर कुशवाहा का गठबंधन मजबूती से लड़ गया तो भाजपा और जेडीयू इसे अपने पक्ष में मान रहे हैं, बशर्ते कि इस गठबंधन में ओवैसी की पार्टी मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में लाने में सफल हो जाए। फिर कांग्रेस और राजद गठबंधन कुछ खास कर नहीं पायेगा। पर, बड़ा सवाल वही है कि क्या मुस्लिम मतदाता राजद और कांग्रेस को छोड़कर किसी पार्टी की तरफ नहीं देखेंगे?

यह बहुत साफ है कि पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू को लेकर बिहार के मुस्लिम मतदाताओं की जो सोच थी वो अब नहीं है। मुस्लिम मतदाताओं ने खुलकर जेडीयू प्रत्याशियों को वोट किया और 17 में से 16 लोकसभा सीटें जेडीयू ले गई। मुस्लिम मतदाताओं ने इस पर भी गौर नहीं किया कि जेडीयू ने मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट नहीं दिए हैं। लेकिन एनडीए की दूसरी बार सरकार बनने के बाद जेडीयू और नीतीश कुमार की गतिविधियों और बयानों से बिहार का मुसलमान नाराज है।

ओवैसी ने आज यह तो याद किया कि कांग्रेस ने पूर्व सांसद मौलाना असरारूल हक कासमी को तीन तलाक पर लोकसभा में नहीं बोलने दिया था लेकिन ओवैसी ने आज यह याद नहीं किया कि किस तरह नीतीश कुमार ने मीडिया में तो तीन तलाक और धारा 370 का विरोध किया लेकिन जब सदन में इस पर मत विभाजन हुआ तो जेडीयू के सांसद वॉकआउट कर गए। इसका फायदा भाजपा को मिला, जिसने दोनों बिल सदन में पास करा लिये। इसी तरह नीतीश ने सीएए-एनआरसी पर अपना स्टैंड बार-बार बदला और उनकी पार्टी के सांसदों ने सीएए बिल पास होने के समय निर्लज्जता से मोदी सरकार का समर्थन किया। ये घटनाक्रम बिहार के मुस्लिम मतदाता भूले नहीं हैं और वे बातचीत में इस पर खुलकर बोलते हैं।

बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी वाकई बहुत काबिल शख्सियत के मालिक हैं। मुस्लिम हितों को लेकर सार्वजनिक रूप से आवाज उठाने वाले एकमात्र नेता हैं। लेकिन मुस्लिम वोट काटने वाले नेता की छवि बनने से बड़े चुनावों में उन्हें कोई फायदा नहीं मिलता। महाराष्ट्र में उनकी दो-चार सीटें आ जाती हैं लेकिन इससे उनकी बात नहीं बन रही है। असम में इसी तरह बदरुद्दीन अजमल भी अपनी पार्टी के साथ राजनीति करने उतरे थे लेकिन वक्त के साथ वो भी विलुप्त हो गए। ओवैसी का ऊंट बिहार में किस करवट बैठता है, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर बनी हुई है।

(यूसुफ किरमानी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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