महामारी, भय और भयभीत राज्य-समाज

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पिछले तीन महीने से पूरा विश्व कोरोना वायरस से उत्पन्न महामारी से जूझ रहा है। भारत में कोविद-19 महामारी के विकराल स्वरूप को क़रीब एक महीने पहले स्वीकार किया गया। जहाँ इस महामारी ने स्वास्थ्य संबंधी चिंता, और आर्थिक विपन्नता के प्रति लोगों को सशंकित किया है वहीं इसने एक भयनुमा माहौल को सर्वव्यापी बना दिया है। प्रतिबंध और आपात स्थिति के इस दौर में राज्य और समाज भयभीत है। यह भय कई बार बीमारी एवं उसके कारण हुई मृत्यु से भी ज़्यादा भयानक होता है।

पिछले एक महीने का घटनाक्रम हमें बताता है कि किस तरह, भय, शंका, चिंता और दुराव से लोगों की ज़िंदगी प्रभावित हुई है, सरकार और नागरिक के संबंध पर असर हुआ है। हर तरफ़, राज्य, समाज, समुदाय और परिवार भय से आक्रांत नज़र आता है। चाहे चंडीगढ़ में कोरोना वायरस से हुए माँ की मृत्यु के बाद शव को ले जाने में संतान की आनाकानी या असमंजस हो, या युवा प्रवासी मज़दूर का मुंबई से पैदल चल कर अपने घर आगरा में पहुँचने पर माँ द्वारा घर में घुसने की मनाही हो, या इंदौर में सड़क पर पड़े रूपये का ख़ौफ़ हो, या मेघालय और चेन्नई में कोरोना के संक्रमण के शिकार डॉक्टर की मौत के बाद शव को दफनाने का लोगों द्वारा प्रतिरोध हो। 

आख़िर एक माँ अपने ख़ुद के संतान के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करेगी? मृत्यु जैसे दुखद क्षण में परिवार और समाज इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है? क्या यह सिर्फ महामारी के सम्भावित संक्रमण का ही भय है, कि लोगों को अपनों से सामाजिक और भावनात्मक रूप से दूर कर रहा है। वैश्विक महामारी का यह दौर एक समुदाय, राज्य में ही नहीं, निजी रिश्तों में भी भय का माहौल खड़ा किया है। वैश्विक महामारी ने लोगों के सामने स्वास्थ्य और अपने वजूद को ही बचाने की चुनौती पेश नहीं की है बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी बचाने की कठिन चुनौती दे दी है।

महामारी और भयनुमा माहौल

महामारियों से भय की बात कोई नयी नहीं है, इतिहास में ऐसे बहुतेरे उदाहरण मिलते हैं। हालाँकि इस भय के कारण एक दूसरे को तिरस्कृत और प्रताड़ित करने की संस्कृति वृहत स्तर पर पहली बार देखने को मिल रही है। कुछ दिन पहले ही समाचार पत्रों में देखने को मिला कि कोरोना जैसी महामारी से लड़ने में सबसे अहम रोल निभा रहे डॉक्टर और स्वास्थ्य विभाग के लोगों को भी तिरस्कार का सामना करना पड़ा है। बहुत सारे चिकित्सक और स्वास्थ्य कर्मियों को मकान मालिकों ने घर से निकलने का अल्टीमेटम दे दिया है। वहीं कुछ जगहों पर उन्हें सामूहिक रूप से प्रताड़ित और तिरस्कृत करने की भी खबरें आई हैं। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जहाँ महज़ कोरोना के सम्भावित संक्रमण का भय लोगों को एक दूसरे को तिरस्कृत करने को प्रेरित कर रहा है। महामारी से कहीं भारी त्रासदी दरकते सामाजिक ताने-बाने के रूप में हमें देखने को मिल रही है। 

इस महामारी में एक शब्द काफ़ी प्रचलित हुआ है, सोशल डिस्टेंसिंग – सामाजिक दूरी। असल मायने में यह शब्द ‘शारीरिक दूरी’ होनी चाहिए। लेकिन सामाजिक दूरी जैसे शब्द का प्रचार लोग समाज में खाई पैदा करने के लिए कर रहे हैं। इस भय का असर समाज के हर व्यक्ति में है लेकिन सबके लिए बराबर नहीं है। समाज के संभ्रांत, उच्च कुलीन और मध्यवर्गीय समाज में इस भय का असर सबसे ज़्यादा देखने को मिल रहा है। यही वर्ग सबसे ज़्यादा भयभीत है और अन्य लोगों को शक की निगाह से देख रहा है। इस वर्ग के डर का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जितने भी जगहों पर स्वास्थ्य कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार, सामूहिक उत्पीड़न और तिरस्कार की घटनाएँ हुई हैं अधिकांशतः ‘रेजिडेंशियल सोसाइटी’ में रहनें वालों द्वारा की गयी हैं।

क्या यह वर्ग इतना डर गया है, कि चिकित्सकों से भी दुर्व्यवहार करने से बाज़ नहीं आ रहा है? डॉक्टर के बाद इस महामारी से लड़ने की सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी जिस पर है, वे हैं सफ़ाई कर्मी। इस लॉकडाउन में देश का मध्यवर्गीय और अन्य संभ्रांत लोग जब अपने घरों में आराम फ़रमा रहे हैं, वहीं ये सफ़ाई कर्मी अपने जान जोखिम में डाल देश को सैनिटाइज कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में उन्हें इसी समाज के लोगों के द्वारा, प्रताड़ना और तिरस्कार झेलना पड़ रहा है, कहीं-कहीं तो उन्हें मारा-पीटा भी गया है। इस डर के माहौल में जिस तरीक़े से डॉक्टरों और सफ़ाई कर्मियों को समाज का एक तबक़ा प्रताड़ित और तिरस्कृत कर रहा है, इसमें ‘जाति और वर्ग’ के भेद को पानी की तरह साफ़-साफ़ देखा जा सकता है।

यह भयभीत तबका सफ़ाई कर्मियों और उनके परिवारों को सामाजिक कलंक के तौर पर देख रहा है। यह सामाजिक कलंक एक प्रकार के सामाजिक बहिष्करण, शारीरिक प्रताड़ना और मानसिक पीड़ा की वजह बनती जा रही है। आख़िर वे कौन लोग हैं जिनके लिए इन्हें प्रताड़ित और तिरस्कृत करना इतना आसान है? प्रताड़ित और तिरस्कृत करने वाला समाज किस आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से आता है? इन प्रश्नों का उत्तर कहीं न कहीं जाति और वर्ग के भेद के रूप में देखने को मिल सकता है।

राज्य का तंत्र और भय की राजनीति

राज्य और सरकारों के रवैये में भी भय साफ़ दिख रहा है। भय की इस अभिव्यक्ति को सामाजिक मनोविज्ञान से इतर राजनीतिक रूप में भी देखने की ज़रूरत है। राजनीतिक चिंतक थॉमस हॉब्स ने हमें आगाह किया है कि भय एक राजनीतिक विचार है जिसे आधुनिक राज कौशल के केंद्र में देखना और समझना होगा। भय की व्यापकता और गहराई का आभास सरकार और संस्थान के व्यवहार से और बेहतर तरीक़े से स्पष्ट हो जाता है। भय से जुड़ी हुई ज़मीनी सच्चाई, दृश्य, विस्तृत विवरण, लोगों से प्राप्त प्रमाण, डर के बहुस्तरीय और बहुआयामी आयाम को दर्शाता है। इस डर को प्रवासियों का घर की ओर पुनर्वापसी या फिर उनके वापसी के साधन (परिवहन) के उदाहरण से समझा जा सकता है।

अपेक्षाकृत विकसित राज्य प्रवासियों का ठिकाना बने हुए थे, वे राज्य आज  एक सामाजिक अशांति के भय, अराजकता और हिंसा के डर में महज़ इसलिए है कि कहीं ये प्रवासी इस शहर में लम्बे समय तक रहे तो संक्रमण का ख़तरा शायद बढ़ जाएगा। प्रवासियों से राज्यों में उत्पन्न भय महज़ मेहमान राज्यों में ही नहीं है बल्कि उनके सम्भावित वापसी से उनके ख़ुद के राज्य, जो कि अपेक्षाकृत ग़रीब और अविकसित हैं, भी डरे हुए हैं। वायरस के बढ़ते सम्भावित ख़तरे का भय राज्यों में इस क़दर व्याप्त है कि वे कुछ समय के लिए अपने ही लोगों को अस्वीकार कर दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों ने प्रवासियों के राज्य में वापसी पर प्रतिबंध लगा दिया है।

इस महामारी से प्रभावित प्रवासियों की त्रासदी भरी ज़िंदगी के बीच में बिहार के मुख्य मंत्री की यह प्रतिक्रिया कि “अगर अन्य राज्यों में रह रहे बिहार के प्रवासियों को बस से उनके घर वापस भेजा जाता है तो कहीं न कहीं यह लॉकडाउन के उद्देश्यों का उल्लंघन होगा” दुख़द है। यह प्रतिक्रिया वैसे राज्यों के भय को दर्शाता है जिनकी अर्थव्यवस्था काफ़ी हद तक प्रवासियों के भेजे धन पर निर्भर करता है। अचानक ही एक काम करता हुआ शारीरिक रूप से सक्षम प्रवासी डर के संदेह में ‘बीमार और अवांछित’ बना दिया गया।

भय से टूटता-बिखरता सामाजिक तानाबाना 

भय का माहौल और भयभीत समाज बस शहरों तक ही सीमित नहीं है, गाँव में भी इसका व्यापक असर देखा जा सकता है। जिस तरह प्रवासी मज़दूरों को शहरों से बेघर और बेगाना कर दिया गया, उसकी परछाई उनका पीछा करते करते गाँव तक आयी है। तमाम झंझावतों को सहते हुए, प्रवासी मज़दूर किसी तरह अपने गाँव पहुँचे हैं लेकिन वहाँ भी उन्हें कमोबेश वैसा ही सामाजिक तिरस्कार और बेगानापन झेलना पड़ रहा है। देश भर में तमाम ऐसी घटनाएँ देखने को मिली हैं जिनमें प्रवासी मज़दूरों को अपने ही गाँव में घुसने नहीं दिया गया। गाँव वाले सम्भावित संक्रमण के डर से उनको स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

यह सोचने वाली बात है कि वही प्रवासी मज़दूर जब पहले शहर से अपने घर आता था तो उसकी आव-भगत करने वाले वही पड़ोसी और गाँव वाले होते थे लेकिन इस महामारी के संक्रमण के डर से न तो उनका परिवार ही उतनी गर्मजोशी दिखा रहा है और न ही उनके पड़ोसी और गाँव वाले। यह कहीं न कहीं प्रवासी मज़दूरों को मानसिक रूप से भी परेशान कर रहा है और इसका मानसिक आघात लम्बे समय तक उनके जीवन पर पड़ने वाला है। एक बात तो साफ़ है कि इस महामारी का भय आम जनमानस के जीवन में आर्थिक, और राजनीतिक प्रभाव ही नहीं छोड़ेगा बल्कि आने वाले समय में समाज पर गहरा असर छोड़ेगा। 

पारस्परिक सहयोग ही लोगों की चिंताओं को कम कर सकता है, एक समाज के रूप में एकजुट हो, लोगों का आत्म विश्वास जगा कर ही इस महामारी के भय को कम किया जा सकता है और इससे निपटा भी जा सकता है। कहीं ऐसा न हो कि इस महामारी में हम अपने समाज की मूलभूत प्रकृति को ही खो दें और यह किसी भी आर्थिक और राजनीतिक नुक़सान से कहीं ज़्यादा बड़ा नुकसान होगा।

भय की यह परिस्थिति संवेदना, सहानुभूति और सामाजिक सरोकार जैसे बुनियादी मूल्यों के ह्रास को दिखा रहा है। डर के इस माहौल से बढ़ती बेरुख़ी और अलगाव का व्यापक और गहरा असर समाज और व्यक्ति विशेष पर होगा। भय की मानसिकता लम्बे समय तक जीवन शैली और सामाजिक-मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर छोड़ सकती है। ऐसी परिस्थिति में समाज का एक तबका नैतिक निगरानी का संरक्षक बन जाता है, जिससे भय का ही प्रचार-प्रसार होता है। राज्यों को भय के इस व्याकरण को खारिज करना चाहिए क्योंकि भय ने किसी भी सभ्यता को प्रगतिशील या लोकोन्मुख सलाह कभी नहीं दी है। 

(लेखक मनीष झा, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में प्रोफ़ेसर हैं। जबकि अजीत कुमार पंकज इंफाल स्थित इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत हैं।)

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