Thu. Oct 24th, 2019

परिवर्तनशील, प्रयोगधर्मी व निरंतरता के गांधी

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जब यह फ्रेम गांधी जी के लिए है ही नहीं तब क्यों उनकी प्रासंगिकता पर चिंतन किया जाए। ऐसा चिंतन फिजूल की क़वायद ही होगी।यह सही है, कोई भी नायक-महानायक अपने, चिंतन, विचारधारा और क्रिया में समय-समाज सापेक्ष होते हैं। इन्हें भौतिक विकास अवस्था के संदर्भों से काट कर नहीं देखा जा सकता। यदि ऐसा किया जाता है तो अवैज्ञानिक दृष्टि होगी। मनुष्य के भौतिक कृत्यों पर सापेक्षता का सिद्धांत लागू होता है। मैं यहां आध्यात्मिक कृत्यों की बात नहीं कर रहा हूं जिसके लिए मैं सक्षम नहीं हूं। यहां मैं इतना स्पष्ट कर देना चाहता हूं, सापेक्षता के सम्बन्ध में यांत्रिक दृष्टि भी नहीं अपनाई जानी चाहिए क्योंकि यह रूढ़िवादिता होगी। सापेक्षता की परिधि में ही परिवर्तन व निरंतरता की धाराएं बहती रहती हैं। इस प्रक्रिया में ठहराव भी आता है और अनुभवजन्य सत्य शामिल होता है तो ठहराव विखडिंत होकर आगे भी बढ़ता है। परिस्थितियों -घटनाओं के साथ मुठभेड़ों से जन्में सत्य निरंतरता व परिवर्तन को एक नयी गति प्रदान करते हैं। अनुभव व सत्यों का एक नया पुंज  का निर्माण होता है जिसके प्रकाश में अपने कर्मपथ पर पथिक आगे बढ़ता है। इस  कर्मपथ के परिप्रेक्ष्य में मैं गांधीजी के साथ मित्रता करना चाहता हूं।
यदि महात्मा में ठहराव रहा होता तब वे कभी के ही अप्रासंगिक हो गए होते! आज भी भारत में गांधी जी को लेकर सबसे अधिक साहित्य, नाटक, विश्लेषणात्मक पुस्तकें, फ़िल्में आदि का सृजन क्यों हो रहा है? क्यों ‘लगे रहो मुन्ना भाई, मुन्नाभाई एम.बी.बी.एएस, हे राम, महात्मा जैसी फ़िल्में बनाई जा रही हैं? इन फिल्मों ने युवा मानस को उतना ही आकृष्ट क्या था जितना मेरी उम्र के लोगों को। हमारे देश में ही नहीं, विश्व भर उनकी उपस्थिति को देखा जा सकता है। यह लेखक अनेक देशों की यात्रायें कर चुका है। गांधी जी की उपस्थिति सर्वत्र मिली। कुछ समय पहले न्यूयॉर्क में एक अश्वेत महिला के यहां रुकने का मौक़ा मिला था।  मैंने देखा उनके ड्राइंग रूम और बेड रूम में गांधी-उपदेश दीवारों से झूल रहे थे। बोस्टन के एक सितारा अस्पताल में श्वेत नर्स गांधीजी के सम्बन्ध में श्रद्धाभाव से काफी देर बातें करती रही। इसे सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। कुछ तो है जिससे गांधीजी की चरम भौतिक समृद्धि के महासागर में भी हस्ती मिटी नहीं है।
वास्तव में नायक -महानायक को किसी एक काल का बंदी नहीं बनाया जा सकता। यही चिंतन व विचारधारा के सम्बन्ध में सत्य है। यह सही है, नायक- महानायक स्वयं में परिपूर्ण नहीं होते हैं। उनमें कमियां रहती हैं तभी वे अपने समाज को संवेदनशीलता के साथ समझ सकते हैं। उसके सुख-दुःख को महसूस कर सकते हैं। यदि हमारे नायक -महानायक निरापद रहते तो वे ईश्वर बन जाते, देवता बन जाते। यह सही है,  हम उनमें ‘देवत्त्व’ का भाव देखना चाहते हैं। स्वयं से अलग व ऊपर देखना चाहते हैं। गांधी जी के प्रति भी हमारी यही दृष्टि रहती है। मूल प्रश्न यह है कि वे कितना समय सापेक्ष और वर्तमान में भविष्य का कितना व कैसे  प्रतिनिधत्व करते हैं?
मैं जितना समझ पाया हूं, गांधी के जीवन का सबसे सशक्त आयाम है उनका जीवन पर्यन्त ‘ प्रयोगधर्मी‘ बने रहना। यह तभी सम्भव है जब आप स्वयं का नित नया सृजन ‘ इंवेंट‘  करते रहें। स्वयं का आविष्कार और पुनराविष्कार की  प्रक्रिया काफी दुरूह व चुनौतीपूर्ण रहती है। इस प्रक्रिया से गुजरना तभी संभव है जब आप यथास्थितिवाद से मुक्त रहें, स्वयं में कल+आज+कल का संगम देखें। आत्मालोचना करें। शायद इसीलिए गांधी जी ने अपने किसी अनुभव व सत्य को अंतिम नहीं माना है क्योंकि प्रत्येक चुनौती ने एक नए सत्य का सृजन किया है।
उदाहरण के लिए एक- कट्टर वैष्णव परिवार में जन्म और मानस का निर्माण; लेकिन ‘ वैष्णव जन तो तेने कहिये जो पीर पराई जाणे रे‘ में नई परिभाषा खोजी और आत्मसात किया सभी धर्म–समुदायों को ; दो धर्म का अर्थ विस्तार व परिवर्तनकामी बनाना; तीन हिन्दू अस्मिता का सार्विक धर्मनिरपेक्षता में रूपांतरण-अल्लाह -ईश्वर तेरो  नाम। संक्षेप में, देश की दासता से मुक्ति के विराट स्वपन  के ध्येय की प्राप्ति के लिए धर्म एक साध्य रहा, न किधेय या मोक्ष का मार्ग। धर्म का एक नया रूप सामने आता है। गांधी जी में भारतीय ईथोस रचा- बसा था।
वे  जानते थे कि भारत की मुख्यधारा के वर्ग समुदाय (जिसकी संरचना मूलतःसवर्ण) मानी जाती है, कभी भी अखिल भारतीय स्तर पर विद्रोह या क्रांति नहीं करेगा। दूसरे शब्दों में फ्रांस और रूस की क्रांति भारत में नहीं हो सकती। यहां तक की अंग्रेजों के खिलाफ 1857 का स्वतंत्रता (या विद्रोह) तब हुआ जब सैनिकों के धार्मिक संस्कार जाग्रत हुए। चर्बी चढ़ी कारतूसों को वे अपने दांतों से काट कर खोल रहे हैं, इतना मालूम होते ही सिपाही भड़क उठे और कोलकता से लेकर  दिल्ली तक बगावत फ़ैल गयी। बीती सदियों में ज्यादतर हिंसात्मक विद्रोह जनजातियों और पिछड़े वर्ग के किसानों द्वारा किये जाते रहे हैं। यहां तक कि मध्यकाल का ‘विद्रोही भक्ति आंदोलन (रविदास, कबीर आदि) में व पिछड़ी जातियों के संत कवि शामिल थे, ऊंची जातियों के संत- कवि दरबार भक्ति या श्रृंगार भक्ति (बिहारी, केशव, घनानंद आदि) में लीन थे। दबी-कुचली जातियों में ही प्रतिरोध की चेतना थी। इस यथार्थ से महात्मा परिचित थे। धर्म और उसके  सांस्कृतिक संस्कारों के माध्यम से ही भारतीय जनता में आज़ादी और आत्मस्वाभिमान का अलख जगाया जा सकता है।
मेरे कई मित्र इससे असहमत हो सकते हैं। उन्हें होना भी चाहिए। लेकिन याद रखें, बोल्शेविक क्रांति के सूत्रधार लेनिन ने स्वयं भारतीय नेता एमएन रॉय को सलाह दी थी कि वे गांधी का सहयोग करें क्योंकि भारतीय जनता उनके साथ है। बेशक,उस समय तक राष्ट्रीय औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन के अग्रज नेता बन चुके थे महात्मा गांधी। कह सकते हैं,  टैक्टिकल दृष्टि से गांधी ने धर्म और प्रतीकों-रूपकों और साहित्य का इस्तेमाल किया। इसके अनुकूल परिणाम भी निकले; किसान, निम्न मध्य वर्ग,  मध्य वर्ग और अभिजात वर्ग सक्रिय हो उठे और उनके नेतृत्व में सड़कों पर उतरे व जेलें भरीं। इसकी ज्वलंत मिसाल है चम्पारण का सत्याग्रह। 
आलोचक, गांधीजी को अंग्रेज़ों का एजेंट भी कहते हैं। यहीं मैं कहना चाहता हूं जिस व्यक्ति ने दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों की सेना में भर्ती करवाई थी (बोर युद्ध) और रानी के साम्राज्य की रक्षा के लिए सक्रिय हुए थे, उसी मोहनदास  करमचंद गांधी नामक व्यक्ति ने 15 वर्ष बाद भारत से अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ने का आंदोलन भी चलाया, सत्याग्रह किया, जेल गए और अंततः कामयाब भी हुए। हालांकि, इसकी कीमत अंतहीन त्रासदी में आज तक चुकाई जा रही है। यह भी सही है कि व्यक्ति या इंसान के रूप में वे अंग्रेजो के खिलाफ नहीं थे,  उनके शासन और जुल्मों सितम के खिलाफ थे। क्या यह सही नहीं कि उन्होंने अंग्रेजी वस्त्रों का बहिष्कार किया। देश में होली जलाई गयी। अभिजात वर्ग के लोग भी  इसमें शामिल थे।
यदि वे कट्टर जातिवादी रहे होते तो अपने पुत्र का विवाह अंतर्जातीय-अंतर राज्यीय नहीं करते। यह सही है कि जातियों के श्रेणीतंत्र को वे नहीं तोड़ सके। बाबा साहब अम्बेडकर ने इसकी आलोचना भी की है। जाति प्रथा का विनाश जिस स्तर पर होना चाहिए था, आज तक नहीं हो सका है। बल्कि उसके नए नए संस्करण सामने आ रहे हैं। अपना वर्चस्व फिर से स्थापित करने के लिए ऊंची जातियां पुनः सक्रिय हो गयी हैं। लेकिन गांधी ने जाति व्यवस्था में परिवर्तन  का प्रयास नहीं किया था, यह कहना गलत होगा। क्या वे हरिजन बस्तियों में नहीं रहे?  क्या हरिजनों में चेतना जगाने और राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जोड़ने का प्रयास नहीं किया था?  क्या गांधी जी की सिफारिश पर ही अपने कट्टर विरोधी डॉ. आंबेडकर को संविधान की प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग समिति) का अध्यक्ष नहीं बनाया गया था जिसकी वजह से आज उन्हें भारतीय संविधान के पिता के रूप में जाना जाता है। आदिवासियों की भूमिका के प्रति भी गांधी जी उतने ही सचेत थे। आदिवासी नेता ठक्कर बापा उनके अनुयाई रहे। गांधी जी ने उनके माध्यम से आदिवासियों में आज़ादी का शंख बजाने की कोशिश भी की। 

(जारी…)

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