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Categories: बीच बहस

ख़ास रिपोर्ट: उपेक्षा, बदला, बदहाली, हालाकानी और मौत का नया पता है श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन

सुपौल बिहार के गरीब राय 21 मई को दिल्ली से बिहार जाने वाली श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन में बैठे तो तीन दिन बैठे ही रह गए। 21 मई को दिल्ली से छूटी तो 24-25 की दरमियानी रात में पहुंची। इस दौरान तीन जगह चेक अप हुआ।

गरीब राय बताते हैं कि वो दिल के मरीज हैं। 2 महीने पहले ही हार्ट अटैक आया था। ज़रूरी दवाइयां अपने साथ ले गए थे लेकिन बहुत चाहकर भी वो तीन दिन दवाइयाँ नहीं खा सके क्योंकि डॉक्टर ने खाली पेट दवाइयां खाने से मना किया था। गरीब राय बताते हैं कि तीन दिन बिना खाना पानी के सफ़र करना पड़ा।

62 घंटे के सफर में नहीं मिला खाना और पानी, भूख से मजदूर की ट्रेन में मौत

20 मई की शाम 7 बजे लोकमान्य तिलक टर्मिनल से चली श्रमिक स्पेशल ट्रेन 23 मई शनिवार की सुबह वाराणसी पहुंची। ट्रेन में सवार जौनपुर के मछली शहर निवासी 46 वर्षीय जोखन यादव की मौत हो गई। शनिवार की सुबह ट्रेन के कैंट स्टेशन पर पहुंचने पर जीआरपी ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया।

जोखन यादव के साथ सफर कर रहे भतीजे रवीश का कहना है कि “मध्य प्रदेश के कटनी स्टेशन पहुंचने के बाद ट्रेन लगातार लेट होती गई और यात्री भूख प्यास से बेहाल रहे। इस बीच चाचा की तबियत खराब होती गई, पानी और भोजन के लिए बीच के कई स्टेशनों पर गुहार लगाई गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।”

परिजनों का आरोप है कि ट्रेन में भोजन-पानी का इंतजाम ठीक नहीं था। पहले से ही तबियत खराब थी और ट्रेन के लगातार लेट होने के चलते घबराहट बढ़ती गई। करीब 62 घंटे के सफर के दौरान ट्रेन के व्यास नगर स्टेशन और अवधूत भगवान राम हाल्ट के बीच पहुंचने पर जोखन यादव की मौत हो गयी।

श्रमिक एक्सप्रेस में मजदूरों की मौत का सिलसिला

16 मई को श्रमिक एक्सप्रेस में सवार होकर परिवार के साथ घर जा रहे एक मजदूर की झांसी आने से पहले हालत बिगड़ गई। उपचार के लिए मजदूर को स्टेशन पर उतारा, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। बता दें कि जिला सिद्धार्थनगर के मराठिया मोहल्ला निवासी रोहित शर्मा (42 वर्ष) अपने परिवार के साथ अहमदाबाद में मजदूरी करते थे। लॉकडाउन के बाद से ही वह अपने परिवार समेत फंस गए थे। इसी बीच श्रमिक एक्सप्रेस का संचालन होने के बाद घर पहुंचने की आस लगी। दो दिन पहले अहमदाबाद स्टेशन से पूरे परिवार के साथ श्रमिक एक्सप्रेस में सवार होकर सिद्धार्थनगर के लिए रवाना हुए। झांसी स्टेशन आने से पहले उनकी हालत बिगड़ गई। ट्रेन के झांसी पहुंचते ही परिजनों ने अधिकारियों को बताया। मौके पर मौजूद चिकित्सकों ने जांच के दौरान मृत घोषित कर दिया।

16 मई को मुंबई के बांद्रा से बनारस की ओर जा रही श्रमिक एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे 55 वर्षीय जावेद अहमद सिद्दीकी की अचानक तबियत बिगड़ने से मौत हो गई। शव को जबलपुर रेलवे स्टेशन पर उतार दिया गया और सीधे कोरोना टेस्ट के लिए मेडिकल रवाना कर दिया गया। मृतक की पत्नी इशरत जहां और बेटी नूरी भी बुखार से तप रहीं थीं, जिन्हें विक्टोरिया के कोविड सेंटर में भर्ती कराया गया है। बताया गया कि इटारसी स्टेशन के पास जब बांद्रा श्रमिक एक्सप्रेस पहुँची, उसी समय यात्री जावेद अहमद की मौत हो गई थी। जब ट्रेन मुख्य रेलवे स्टेशन पहुँची तो मृतक की पत्नी ने बताया कि उनके पति को काफी समय से हार्ट से संबंधित बीमारी थी। इटारसी के पास उनके सीने में जोर का दर्द हुआ था और अटैक आने के कारण उनकी मौत हो गई।

गुजरात के वडोदरा से चलकर आई श्रमिक ट्रेन में 13 मई को बुधवार सुबह बांदा रेलवे स्टेशन पर बुजुर्ग महिला का शव पाया गया। स्वास्थ्य विभाग व पुलिस ने एहतियात बरतते हुए कोरोना जांच के लिए सैंपल लिया है। साथ ही शव को पोस्टमार्टम हाउस में रखवाया गया है। मृतका गोरखपुर की रहने वाली थी। उसकी पहचान गोरखपुर के चिलुआताल थाना क्षेत्र के कलुकटुवा गांव निवासी दुविया देवी के रुप में हुई।

पुणे से प्रयागराज जा रही श्रमिक एक्सप्रेस में 12 मई को गोंडा के निवासी प्रवासी मजदूर राजेश कुमार की मौत हो गई। राजेश कुमार पुणे में काम करता था। ट्रेन को चित्रकूट की सीमा पर मझगवां स्टेशन पर रोककर शव उतारा गया। साथ यात्रा कर रहे मजदूरों का कहना है कि रास्ते में अचानक उसकी हालत बिगड़ी और बाद में उसकी मौत हो गई।

9 मई को गुजरात के भावनगर से बस्ती जा रही श्रमिक स्पेशल ट्रेन में रविवार 10 मई को सीतापुर निवासी प्रवासी मजदूर कन्हैया लाल (29 वर्ष) की रविवार अचानक श्रमिक स्पेशल ट्रेन से सफर के दौरान मौत हो गयी। बस्ती जा रही ट्रेन को लखनऊ चार बाग रेलवे स्टेशन पर रोक कर युवक के शव को ट्रेन से उतारा गया। जीआरपी से मिली जानकारी के मुताबिक युवक के पास से उसका मेडिकल सर्टिफिकेट मिला है जिसमें उसकी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव है हालांकि युवक की जेब में बुखार की कुछ दवाइयां, मोबाइल, टिकट, आधार व निर्वाचन कार्ड मिला है।

11 मई को मुंबई से यूपी के लिए चली ट्रेन में बैठे विनोद कुमार उपाध्याय की मौत हो गई। विनोद दिल के मरीज थे और इस खबर से बुरी तरह टूट चुके थे। सफर शुरू होने के कुछ ही समय बाद उन्हें बेचैनी होने लगी और रात 9 बजे वह सोने चले गए। पत्नी जयंती ने बताया, “अगले दिन सुबह साढ़े आठ बजे मैंने उन्हें जगाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं उठे। मैंने दूसरे यात्रियों से मदद मांगी जिन्होंने विनोद को उठाने की कोशिश की लेकिन उनके शरीर में कोई हरकत नहीं हुई।”

जयंती का कहना है कि-“न ही वहां कोई टीटीई या आरपीएफ जवान था और न ही ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी कि मैं मदद मांग सकती। जयंती ने एक दूसरे यात्री से विनोद के फोन से उनके बड़े भाई वीरेंद्र को कॉल करने को कहा जो लखनऊ में होमगार्ड हैं। वीरेंद्र ने आरपीएफ को सूचित किया और फिर जीआरपी प्राइवेट ऐंबुलेंस से चार बाग रेलवे स्टेशन पहुंची।”

प्रशासन की लापरवाही देखिए कि मौत के बाद विनोद कुमार के शव को परिजनों के हवाले कर दिया गया। मृतक का दाह संस्कार करने के बाद पता चला कि वो कोविड-19 पोजिटिव था।

जुड़वा बच्चे जन्म के बाद मौत

वाराणसी के राजापुर पोस्ट निवासी भैयालाल अपनी पत्नी गायत्री देवी के साथ गुजरात में रहते थे, लॉकडाउन में वह परिवार समेत वहीं फंसे रह गए। सरकार ने श्रमिक ट्रेन चलाई तो भैयालाल पत्नी के साथ 22 मई शुक्रवार को वाराणसी वापस आ रहे थे। एस-9 कोच में उनकी सीट रिजर्व थी। गायत्री देवी गर्भवती थी। सिराथू से पहले उसको प्रसव पीड़ा हुई तो कोच में सवार अन्य महिलाओं ने उसकी डिलेवरी करीब 12 बजे कराई। गायत्री ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया।

जानकारी गार्ड व टीटी को हुई तो ट्रेन को सिराथू रेलवे स्टेशन पर रोका गया। सिराथू रेलवे स्टेशन के अधीक्षक अनिल पटेल ने एंबुलेंस बुलाई। स्टेशन से जुड़वा बच्चों व मां को सीएचसी सिराथू अस्पताल भेजा गया। वहां स्टाफ नर्स थीं। आरोप है कि वह एंबुलेंस तक पहुंचीं, लेकिन उन्होंने बच्चों को हाथ लगाना भी मुनासिब नहीं समझा और कहतीं रहीं कि इनको जिला अस्पताल ले जाएं। वहां मौजूद लोगों का कहना है कि बच्चों को ऑक्सीजन की जरूरत थी, लेकिन स्टाफ नर्स ने जिस तरीके से व्यवहार किया, उससे एंबुलेंस कर्मी भी नाराज थे। इसके बाद जिला अस्पताल ले जाते समय बच्चों की मौत हो गई।

श्रमिक एक्सप्रेस में 21 दिन में 24 बच्चों का जन्म

2 महीने से लॉकडाउन में फँसे लोग इस तरह आजिज आ चुके हैं कि जो जैसा है उसी हालत में अपने मूल निवास की ओर भाग रहा है। श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन चलने के बाद बहुत से प्रवासी मजदूर अपने घरों की ओर रवाना हुए। इनमें कई गर्भवती स्त्रियां भी थीं। लेकिन रेलवे मंत्रालय और विभाग द्वारा इस दौरान सफर करने वाली गर्भवती महिलाओं का तनिक भी ख्याल रखकर ट्रेन में कोई विशेष सेवा या व्यवस्था का इंतजाम नहीं किया गया।

श्रमिक एक्सप्रेस में अब तक 21 दिनों के भीतर 24 महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया है। 22 मई को गायत्री देवी ने ट्रेन में जुड़वा बच्चे को जन्म दिया था। कांति बंजारी ने एक बच्चे को ट्रेन में जन्म दिया। 19 मई मंगलवार को अहमदाबाद से बांदा के लिए रवाना हुई श्रमिक एक्सप्रेस में मधु कुमारी नाम की एक महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया था।

मधु से पहले एक दूसरी महिला ने जोधपुर से बस्ती के बीच चलने वाली एक ट्रेन में जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। इनमें से एक बच्चे की मौत हो गई, जबकि दूसरे बच्चे और मां को बस्ती के अस्पताल में भर्ती कराया गया।

40 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें रास्ता भटकी

21 मई को महाराष्ट्र के वसई से गोरखपुर उत्तर प्रदेश के लिए चली ट्रेन ओडिशा के राउरकेला पहुँच गई। जबकि बंगलुरू से 1450 मजदूरों को लेकर बस्ती के लिए चली श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन गाजियाबाद पहुँच गई। इसी तरह दरभंगा के लिए चली एक ट्रेन भी राउरकेला पहुँच गई। 21 मई को मुंबई के कुर्ला से पटना के लिए चली ट्रेन पश्चिम बंगाल के पुरुलिया पहुँच गई। ऐसी कोई चार नहीं बल्कि कुल 40 ट्रेनें रास्ता भटककर कहीं की कहीं पहुँच गईं।    

मुंबई से चलकर वाया इटारसी-जबलपुर-सतना- प्रयागराज होकर गोरखपुर जाने वाली ट्रेन इटारसी के बाद रास्ता भटक गई और रेलवे की गफलतबाजी के चलते यह ट्रेन यूपी की बजाय सीधे बिलासपुर होकर ओडिशा के राउरकेला पहुंच गई। यात्रियों ने जब ट्रेन को दूसरे रूट पर देखा तो उन्होंने विरोध किया, जिसके बाद हड़कम्प मच गया। अब रेलवे के अधिकारी अपनी गलती छुपाने के लिए कह रहे हैं कि इटारसी-जबलपुर रूट इस समय काफी व्यस्त है, इसलिए ट्रेन को डायवर्ट करके चलाया गया।

क्या मजदूरों को भारत दर्शन कराया जा रहा है?

रेलवे अपनी गलती छुपाने के लिए गलत बयानी कर रहा है रेलवे का कहना है कि इटारसी-जबलपुर-पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर रूट पर बड़ी संख्या में श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के चलने के कारण भारी ट्रैफिक है, इसलिए रेलवे बोर्ड ने पश्चिम रेलवे के वसई रोड, सूरत, वलसाड, अंकलेश्वर, कोंकण रेलवे और सेंट्रल रेलवे के कुछ स्टेशनों से चलने वाली ट्रेनों को फिलहाल बिलासपुर-झारसुगुडा-राउरकेला के रास्ते चलाने का फैसला किया है। इसी के चलते वसई रोड-गोरखपुर श्रमिक स्पेशल ट्रेन को अब बिलासपुर-झारसुगुडा-राउरकेला रूट पर डायवर्ट करने का फैसला किया है। इस तरह यह ट्रेन अब इटारसी से बिलासपुर, चाम्पा, झारसुगुडा, राउरकेकला, आद्रा, आसनसोल, जसीडीह, झाझा, क्यूल, बरौनी, सोनपुर, छपरा, सीवान होते हुए गोरखपुर पहुंचेगी। पहले इसे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से होते हुए उत्तर प्रदेश पहुंचना था। लेकिन अब यह महाराष्ट्र्र मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, फिर झारखंड और उसके बाद बिहार होते हुए उत्तर प्रदेश पहुंचेगी।

आखिर ये कैसी दलील है लॉकडाउन के चलते इस समय देश में रेल सेवा बंद पड़ी है सिर्फ़ श्रमिक स्पेशल ट्रेनें ही चल रही हैं ऐसे में भारी ट्रैफिक का हवाला देने की दलील पचती नहीं है। जबकि आम दिनों में रोज औसतन 11000 गाड़िय़ां चलती हैं जबकि अभी तो महज कुछ सौ ट्रेनें ही चल रही हैं। इसलिए किसी भी रूट पर भारी ट्रैफिक का सवाल ही पैदा नहीं होता।

भूख, लूट, कटाजुझ्झ और रेल सेवा

प्रवासी मजदूरों के पैदल पलायन के दबाव में सरकार द्वारा स्पेशल श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन चलाई गई। शुरु में प्रवासी मजदूरों से टिकट के पैसे वसूले गए। लेकिन भारी विरोध और मुख्य विपक्ष कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रवासी मजदूरों के ट्रेन टिकट का खर्च वहन करने की घोषणा के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई। सरकार को मजबूरन घोषित करना पड़ा कि श्रमिकों के टिकट का खर्च राज्य और केंद्र सरकार मिलकर वहन करेंगी। लेकिन इसके साथ ही ट्रेन में दूसरी सेवाओं में कटौती कर दी गई। एक दिन का सफर जान-बूझकर 4-5 दिन के सफर में तबदील कर दिया गया। खाना पानी नहीं दिया गया। कहीं दिया भी गया तो बेहद घटिया और सड़ा हुआ खाना। इसका नतीजा ये हुआ कि कई मजदूर भूख से मर गए। कई मजदूर जहां जो दिखा लूटना शुरु कर दिए।  

इस हद तक भूखा रखा जा रहा है श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन में कि मजदूर खाने की चीज देखते ही लूट मार  करने में लग जा रहे हैं। ये वीडियो मध्य प्रदेश के इटारसी स्टेशन का है। खाने के पैकेट का इंतज़ाम 1869 श्रमिक स्पेशल ट्रेन के यात्रियों के लिये था लेकिन ट्रेन रूकते ही भूखे मुसाफिरों ने खाने में लूटपाट शुरू कर दी

पानी किस तरह से दिया जा रहा है एक नजारा देखिए। ठीक है कोरोना संक्रमण है एहतियात दरूरी है लेकिन थोड़ी संवेदना, मानवीयता और शर्म भी ज़रूरी है।

आखिर पानी की लूट देखना किसी भी सरकार और व्यवस्था के लिए शर्मनाक होना चाहिए। सरकार पानी भी मुहैया नहीं करवा पा रही है। तभी तो यूपी के पंडित दीनदयाल रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रूकते ही मजदूरों ने प्यास बुझाने के लिए पानी की बोतल लूट ली।

यह कठिन समय ज़रूर है पर सरकार की शिथिलता ने इसे और भयंकर बना दिया!  पुरानी दिल्ली में वेंडर को मजदूरों ने लूट लिया।

उत्तर प्रदेश, झांसी में प्रवासी मजदूरों ने खाने की लूट मचाई।

वेंडिंग मशीन को भी नहीं बख्शा। जब किसी व्यक्ति को 3-4 दिन भूखे रहकर सफ़र करने के लिए बाध्य किया जाता है तो सिर्फ़ और सिर्फ खाना चाहिए होता है। खाने की चीज दिखी नहीं कि भूखा उस पर झपट पड़ता है।

बिहार के कटिहार स्टेशन पर बिस्किट के लिए मची लूट का वीडियो भी ख़ूब वायरल हुआ है। श्रमिक एक्सप्रेस से आये मजदूर बिस्किट लूटने में भूल गए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना। ये बेचारे करें भी तो क्या करें? वैसे सरकार चौकस व्यवस्था कर रही है।

समस्तीपुर स्टेशन पर खाने पीने की चीजों की लूट का वाकया दिखा। अवसरवादी मध्यवर्ग और सुविधाभोगी एलीट वर्ग ने प्रवासी मजदूरों द्वारा खाने-पीने की चीजों के लूटने की घटनाओं का अपराधीकरण और बर्बरीकरण करके प्रतिक्रियाएं दी गईं।

झांसी के बाद कानपुर रेलवे स्टेशन पर खाने के पैकेट के लिए प्रवासी मजदूरों ने लूट मचाई। आपस में जमकर मारपीट हुई। अहमदाबाद से सीतामढ़ी जा रही थी श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन।

भूख ने मजदूरों को इस कदर हिंसक बना दिया कि वो खाने के लिए ट्रेन के भीतर आपस में ही लड़ने लगे। मजदूर मुंबई के कल्याण से चलकर दानापुर जा रही ट्रेन जब सतना पहुंची तो भूखे मज़दूर आपस में भिड़ गये, डर ऐसा कि पुलिस बाहर से ही डंडा बजाती रही!

सड़ा खाना यात्रियों ने स्टेशन पर फेंक दिया। एक मजदूर ने कहा, “केरल से चलकर आ रहा हूं इस ट्रेन पर पूरा साउथ में अच्छा खाना दिया और फिर आसन सोल पहुंचने के बाद सड़ा हुआ खाना यात्रियों को दिया सभी यात्रियों ने गुस्से में सभी खाना स्टेशन पर ही फेंक दिया शिकायत करने पर पुलिस प्रशासन ने बोला है जो मिला है वही खाओ सभी यात्री भूखे हैं।”

श्रमिक एक्सप्रेस में मजदूरों से किराया न लेने की बात के बाद से श्रमिक एक्सप्रेस में  खाना पानी की सुविधा एकदम घटिया स्तर की है। खराब सड़ा हुआ खाना देने पर कल मजदूरों का गुस्सा कुछ इस कदर भड़का कि वो मॉब लिंचिंग को उतारू हो गए।

किसी ने सच ही कहा है-“ जो बोया है वही काटोगे।”

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on May 26, 2020 1:47 pm

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