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प्लेग और गांधी का सत्याग्रह

सन 1904 में दक्षिण अफ्रीका के शहर जोहानसबर्ग से सात मील पूरब कुली बस्ती यानी हिंदुस्तानियों की आबादी में प्लेग फैला था। जोहानसबर्ग की म्युनिस्पलिटी ने इस बस्ती को इसलिए उपेक्षित कर रखा था ताकि यह तबाह हो जाए और उसे गोरों की बस्ती से दूर यहां से कहीं और हटा दिया जाए। यह वैसे ही उपेक्षित थी जैसे यूरोप में यहूदी बस्तियों और अन्य देशों में अल्पसंख्यकों के इलाकों की उपेक्षा की जाती थी। गांधी जी ने पहले प्लेग जैसी महामारी के फैलने की आशंका से प्रशासन को आगाह किया। प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। जब महामारी फैल गई तब उन्होंने सेवा का काम किया और प्रशासन की ओर से जो भी मदद मिली उसका आभार जताया।

दक्षिण अफ्रीका में प्लेग से गांधी का सत्याग्रह एक ऐसी कथा है जो बताती है कि किस तरह महामारियों के दौर में सरकारें भेदभाव करती हैं। वैसे समय में समुदाय और उसके नेतृत्व का दायित्व बढ़ जाता है। जब समुदाय आगे आता है तो सरकारें भी चाहे शर्म के नाते या संक्रमण के डर के नाते, आगे आती हैं। तब समुदायों का यह फर्ज होता है कि वे प्रशासन के काम को सराहें। हालांकि गांधी ने जब वहां प्लेग के विरुद्ध सत्याग्रह किया था तो व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं थी लेकिन किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी समुदाय का वैसा ही आचरण उचित होता है।

गांधी मानते थे कि भारतीयों की यह बस्ती गंदी है और भीड़भाड़ के नाते प्लेग या किसी महामारी के लिए ज्यादा मुफीद है। लेकिन उनका यह भी कहना था कि जोहानसबर्ग से सटा यह इलाका तबसे ज्यादा बिगड़ गया जबसे उसे म्यूनिस्पलिटी ने अपने जिम्मे लिया है। जब जमीन पर भारतीयों का 99 साल का पट्टा था तो लोग थोड़ा बहुत साफ सफाई कर लिया करते थे लेकिन नगर परिषद तो कुछ भी करने को तैयार नहीं है। सड़कें कच्ची थीं और पास में ईंट के भट्ठे थे। लोग टीन के घरों में रहते थे और उनके घरों में चूहे घूमते रहते थे।

इस इलाके के बारे में गांधी ने 11 फरवरी 1904 को नगर परिषद के मेडिकल अफसर डाॉ. पोर्टर को लिखा, “ इलाके में मौतें बढ़ गई हैं। अगर मौजूदा स्थितियां कायम रहीं तो एक दिन महामारी जरूरी फैलेगी।’’ डॉ. पोर्टर ने 15 फरवरी को इलाके का दौरा किया और इसके लिए गांधी ने उन्हें धन्यवाद दिया। उन्होंने म्यूनिस्पलिटी को लिखा भी लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। गांधी ने फिर कड़ा पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि इस मामले में एक एक मिनट की देरी आपदा को आमंत्रण है। इसके लिए ब्रिटिश इंडियन का कोई दोष नहीं है। उन्होंने लिखा कि अगर आज कुछ पौंड खर्च कर दिए गए तो भविष्य में हजारों पौंड बचाए जा सकते हैं। गांधी के इस पत्र का डॉ. पोर्टर ने बुरा माना।

गांधी ने 20 फरवरी को जवाब में कहा, “ आपने पत्र के कुछ हिस्से पर आपत्ति की है। पर मैंने तो सफाई को ध्यान में रखते हुए पत्र लिखा। मुझे अपने देशवासियों का ख्याल है। मैं कोई बात वापस नहीं लूंगा क्योंकि जरूरी हुआ तो हमारी हर बात का समर्थन किया जाएगा।‘’ डॉ. पोर्टर ने परिषद को बताया कि यहां की आबादी को कहीं और हटा दिया जाना चाहिए या उन्हें टेंट में रख देना चाहिए जल्दी से जल्दी। लेकिन लापरवाही जारी रही।

इस कहानी का वर्णन महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा `सत्य के प्रयोग’ में किया है लेकिन पत्रों का जिक्र इमिली ब्लेक नाम की नर्स के पड़पोते टिम कैपन ने दस साल के शोध के बाद 2015 में किया। इमिली ब्लेक ब्रिटेन के संसदीय सचिव की बेटी थीं और वहां सेवा करते हुए 31 मार्च 1904 को 27 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई थी। कैपन ने यह शोध उस समय प्रकाशित किया जब वहां खड़े रीटफोंटीन प्लेग अस्पताल की जगह पर बड़ी कालोनी और बाजार वगैरह बनाने की तैयारी चल रही थी और वहां के इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया था।

गांधी ने एक मार्च को पोर्टर को बताया कि इलाके में प्लेग आ गया है। न्यूमोनिया से मरने वाले बढ़ रहे हैं। लेकिन पोर्टर उनकी बात मानने को तैयार नहीं थे। लगता है पोर्टर महोदय श्वेत समुदाय की उस रंगभेदी योजना के तहत काम कर रहे थे जिसके तहत कुलियों की बस्ती को वहां से हटाना था। जबकि गांधी अपने समाज के लिए डट कर खड़े हो गए थे। 18 मार्च को प्लेग तेजी से फैल गया। गांधी ने पोर्टर को पेंसिल से लिखकर एक नोट भेजा। उन्होंने कहा 15 लोग बीमार हैं, एक मर गया है। कोई लाश नहीं उठा रहा है। स्वयं सेवक काम कर रहे हैं। आप खाली जगह को अस्पताल की तरह इस्तेमाल करने देंगे तो बड़ी कृपा होगी।

देर होते देखकर गांधी और `इंडियन ओपिनियन’ के प्रकाशक मदनजीत व्यावहारिक उस इलाके में गए और एक खाली घर खोलकर 36 बीमार लोगों को वहां ले गए। फिर एक निजी चिकित्सक डॉ. गाडफ्रे आए और उन्होंने इलाज शुरू किया। लेकिन इतने लोग काफी नहीं थे। गांधी ने अपने आफिस के उन लोगों को काम पर लगाया जो अविवाहित थे। इस बीच 17 लोग मरे पाए गए। उनके नमूने लैब को भेजे गए और 19 मार्च को यह साबित हो गया कि यह बीमारी प्लेग ही है। महामारी घोषित होते ही प्रशासन सक्रिय हो गया। पुलिस कमिश्नर ने पूरा इलाका घेर लिया। आने जाने वालों को पास जारी होने लगे। 17 से 25 मार्च के बीच वहां प्लेग का विस्फोट हुआ। 65 संक्रमित लोगों में 55 लोग मर गए। 20 मार्च को 22 लोगों की मौत हो गई।

गांधी ने अपनी आत्मकथा में इस घटनाक्रम का वर्णन तीन अध्यायों में किया है। दो अध्याय प्लेग पर हैं और तीसरा अध्याय बस्ती को आग लगाकर जला देने पर है। गांधी ने नाम लिए बिना इमिली ब्लेक की सेवा का जिक्र किया है। वे लंदन से आई थीं और उन्होंने सेवा करने वालों को सलाह दी कि वे ब्रांडी लेकर काम करें तो संक्रमण नहीं होगा। गांधी और उनके साथियों ने उनकी यह बात नहीं सुनी। वे गीली मिट्टी का सिर और पेट पर लेप करने का इलाज करते रहे। उससे दो लोग बच गए। बाद में 31 मार्च को इमिली स्वयं संक्रमण से चल बसीं।

इस दौरान गांधी ने सच को सामने लाने के लिए प्रेस की शक्तियों का सहारा लिया। कई अखबारों में पत्र लिखे।`द स्टार’ को इंटरव्यू दिया। एक साल पहले स्थापित हुआ उनका अपना अखबार `इंडियन ओपिनियन’ तो था ही। सेवा के इसी काम के दौरान उन्हें कई ऐसे अंग्रेज मिले जिन्होंने मदद के लिए हाथ बढ़ाए। एक निरामिष भोजनालय में उनकी भेंट मिस्टर पोलक से हुई और वे बाद में जीवन पर्यंत उनके मित्र बने रहे। उनसे क्रिटिक अखबार के उपसंपादक मिस्टर वेस्ट भी मिले जो बाद में `इंडियन ओपीनियन’ से जुड़े।

बाद में जब बस्ती खाली कराकर उसे जलाया जाना था तो अजीब स्थिति उपस्थिति हुई। तमाम भारतीय अपना धन किसी बैंक में नहीं रखते थे। वे जमीन में खोदकर गाड़ देते थे। उन्होंने जमीन खोदी और कागज के नोट और बड़ी मात्रा में तांबा और चांदी निकाली। तब गांधी और उनके साथियों ने उनके लिए बैंक का काम किया। उन्होंने अपने साथियों पर भरोसा करते हुए उनका धन इकट्ठा किया और उसे रोगाणु से मुक्त करने के लिए रसायन का छिड़काव किया। उसके बाद उसे बैंक में जमा कराया। उन्होंने बेघर हुए भारतीयों के 60 हजार पौंड बैंक में जमा कराए।

बस्ती जलाने पर कम से कम दस हजार पौंड का नुकसान हुआ। चूंकि वहां कुछ मरे हुए चूहे मिले थे इसलिए बस्ती जलाना जरूरी था। गांधी के इस काम ने उन्हें लोगों का विश्वासी बना दिया और इसी दौरान उन्हें रस्किन की `अनटू दिस लास्ट’ मिल गई जिसका उन पर जादुई असर हुआ। बाद में इसी को सर्वोदय के दर्शन के रूप में गांधी ने प्रसिद्ध किया।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)       

This post was last modified on April 25, 2020 2:22 pm

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