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Thursday, September 23, 2021

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कांशीराम स्मरणः खवासपुर के फकीर का राजनीतिक सफर और आज की बहुजन राजनीति!

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हिंदी-भाषी क्षेत्र में बहुजन-राजनीति के नायक और बेमिसाल संगठक कांशीराम जी का आज परिनिर्वाण दिवस है। सन् 2006 में आज ही के दिन उन्होंने दिल्ली में अंतिम सांस ली। एक संगठक और राजनीतिज्ञ के रूप में कांशीराम जी को देखने का हमें मौका तो मिला पर बहुत नज़दीक से नहीं। उनसे हमारी ज्यादा मुलाकातें नहीं हो सकीं। हां, संसद भवन परिसर और जालंधर में उनसे हुई कुछ संक्षिप्त मुलाकातें ज़रूर अविस्मरणीय हैं। सन् 1995-97 के दौर में मैं ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार का पंजाब राज्य-संवाददाता था। उस दौर में एक बार उनके गांव खवासपुर (रोपड़ ) जाने का मौका मिला।

चंडीगढ़ स्थित हमारे दफ्तर से ज्यादा दूर नहीं था। जिस कार से हम गये, उसके चालक उस इलाके से बहुत अच्छी तरह परिचित थे। हमें वहां पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं हुई। उस यात्रा के नोट्स किसी डायरी में आज भी सुरक्षित हैं। कुछ महीने पहले, किताबों भरी अपनी एक आलमारी में उस डायरी को देखा था। आज खोजने लगा तो मिली नहीं। मिल जायेगी तो आगे के लेखन में कभी उसका उपयोग ज़रूर होगा। पर उस यात्रा की कुछ बातें आज भी याद हैं। 

रोपड़ के उस खवासपुर गांव पहुंच कर हमें अपनी कार पहले ही रोकनी पड़ी थी। रास्ता ही कुछ ऐसा था। फिर हम रेलवे लाइन के किनारे-किनारे आगे बढ़े और किसी युवक से कांशीराम जी के घर के बारे में पूछा तो उसने एक साधारण से मकान को दिखाते हुए कहाः ‘वो रहा उनका घर।’ ईंट का पक्का घर लेकिन मकान के कई तरफ प्लास्टर भी नहीं लगा था। सिर्फ ईंट की दीवालें थीं। जब हम घर के दरवाजे पर पहुंचे और आवाज दी तो एक महिला सामने आईं। हमने ‘सत् श्री अकाल’ कहा और उन्होंने भी। अपना परिचय दिया तो वह हमें अंदर ले गईं और एक चारपाई बिछाकर बैठने को कहा। किसी भी ठेठ पंजाबी की तरह परिवार-वालों ने हमारी आवभगत की। पता चला, वह कांशीराम जी के भाई की पत्नी हैं।

थोड़ी देर में किसी ने उस चारपाई पर एक चादर भी बिछा दी। हमसे ‘रोटी खाने’ के बारे में पूछा गया। हमने बताया, नाश्ता करके निकले हैं। भोजन दोपहर में करेंगे। फिर थोड़ी देर बाद कुछ मीठा-नमकीन आया। हमसे लस्सी या चाय के बारे में पूछा गया। हमने चाय की तलब बताई। थोड़ी ही देर में चाय आ गयी। चाय पीते हुए हमने बातचीत शुरू कर दी। इसी बीच, घर के पुरुष सदस्य भी आ गये। उनके साथ कुछ और भी लोग थे। परिजनों से कांशीराम जी के बारे में जमकर बातचीत हुई। बसपा संस्थापक के बारे में ऐसी अनौपचारिक और खुली बातचीत मेरी कांशीराम जी से कभी नहीं हुई। उनके भाई की पत्नी और अन्य परिजनों से मैं जो भी पूछता, उसका तसल्लीबख्श जवाब मिलता। उनके घर से निकले तो गांव के कुछ बुजुर्गों से भी मिले, जो युवा कांशीराम को अच्छी तरह जानते थे। बाद के दिनों के उनके ‘मिशन’ के बारे में भी उनकी अच्छी जानकारी और समझदारी थी।

घर-परिवार और गांव के अन्य लोगों से बातचीत के बाद कांशीराम जी के बारे में बहुत नयी-नयी बातें पता चलीं। इस यात्रा के बाद कांशीराम के प्रति मेरा आदर और बढ़ गया। मैं उन्हें और जानने-समझने की कोशिश करने लगा। उनसे मिलकर अनेक मुद्दों पर (टुकड़ों-टुकड़ों में ही सही) बातचीत करना चाहता था। इससे उन्हें और समझने में मदद मिलती। ऊपर से रूखा और बेतरतीब सा लगने वाला यह राजनीतिज्ञ एक पत्रकार के रूप में मुझे बड़ा अलग सा लगता था। वह डॉ. अम्बेडकर की तरह महान् विचारक भी नहीं थे और देश के अनेक नेताओं की तरह प्रभावशाली वक्ता भी नहीं थे। पर उनमें वो क्या चीज थी, जिसने उन्हें कांशीराम बनाया? इसी सवाल से मैं लंबे समय तक जूझता रहा। इन्हीं सवालों को केंद्र में रखकर उन दिनों कांशीराम पर एक किताब लिखने का विचार बन रहा था। मैं न तो कोई राजनीतिक व्यक्ति था और न ही कांशीराम जी या बसपा का कोई समर्थक था। सिर्फ़ सुनी-सुनाई या पहले से लिखी बातों के आधार पर किताब लिखना तब मुझे उचित नहीं लगा! मैं उनसे और उनके निकटस्थ लोगों से समय-समय पर मिलते रहना चाहता था।

उन दिनों चूंकि एक बड़े अखबार का प्रोफेशनल पत्रकार था और इस टाइम-खपाऊ नौकरी के चलते अलग से पढ़ने-लिखने और शोध कर किताब तैयार करना कुछ आसान काम नहीं था। हिंदी में फेलोशिप आदि भी बहुत कम लोगों को ही मिला करती हैं। उसके लिए भी कोई बड़ा जुगाड़ चाहिए होता है। फिर भी मुझे लगता था कि कांशीराम जी से समय-समय पर मिलकर इंटरव्यू करते रहें, उनके नजदीकी लोगों और खास विरोधियों से मिलें तो शायद किताब बन सकती है। मैंने कोशिश की पर उनके इर्द-गिर्द के लोगों ने उस दौर में मुझे कांशीराम जी से मिलने-जुलने का मनचाहा मौका नहीं दिया। संभवतः उनके सहकर्मियों ने मुझे खास गंभीरता से नहीं लिया होगा या मेरे बारे में किसी से कुछ पूछा होगा और बताने वाले ने कुछ ‘निगेटिव-सा’ बता दिया होगा! इस तरह किताब की योजना पूरी नहीं हो सकी। 

पर कांशीराम जी से यदा-कदा संसद भवन में मुलाकात हो जाया करती थी। जब वह राज्यसभा के मुख्य सभाकक्ष से बाहर निकलते तो कई बार मैं प्रेस गैलरी से तेजी से नीचे उतरता और दरवाजे के पास जाकर खड़ा हो जाता। वह जैसे ही दरवाजे से बाहर आते, मैं उनको नमस्कार करके हर बार अपना परिचय देता और खबर बनाने के लिए किसी सम-सामयिक मुद्दे पर बात करता या फिर उनसे तसल्ली के साथ बैठकर बातचीत करने की अपनी ख्वाहिश जाहिर करता। कभी वह सम-सामयिक मुद्दे पर बोलते और कभी नहीं बोलते। ज्यादा बातचीत किये बगैर दरवाजे से बाहर निकल जाते। एक बार उनसे मैंने ऐसे सवाल किये कि वह चलते हुए अचानक रुक गये और मेरे सवालों का जवाब देने लगे।

संसद में बसपा के सांसदों ने किसी ऐसे विधेयक या संकल्प पर सरकार का समर्थन कर दिया था, जो बुनियादी तौर पर गरीबों, किसानों और दलितों के हित के विरूद्ध था। इसी से जुड़ा एक मसला था-बसपा के राज्य सभा सदस्य जयंत मल्होत्रा का, जो देश के बड़े उद्योगपति थे और कांशीराम जी के दौर में ही उन्हें बसपा ने अपना राज्य सभा सांसद नामांकित किया था। कांशीराम जी ने मेरे सवाल का जो जवाब दिया, उससे मैं बहुत संतुष्ट तो नहीं हुआ पर कांशीराम जी जैसे नेता के जवाब पर कितना सवाल करता और जवाब के लिए संसद भवन के गलियारे में वह कब तक खड़े रहते!

कांशीराम जी के बारे में जितना जाना-समझा, उसके हिसाब से वह मुझे चमत्कारी संगठक लगते हैं। लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने कुछ गलतियां भी कीं पर लंबे समय तक उन्होंने एक फकीर जैसा जीवन जिया। घर-परिवार की मोह-माया में कभी नहीं फंसे। उनके बंधु-बांधवों से भरा खवासपुर का अति-साधारण परिवार इसका सबसे बड़ा सबूत है। कांशीराम से पहले भी हिंदी क्षेत्र में कई बहुजन विचारक हुए। लेकिन संगठन और जन-समर्थन की जो जमीन कांशीराम ने पैदा की, वह किसी से संभव नहीं हुई थी। यूपी-बिहार जैसे हिंदी-भाषी क्षेत्र में उनसे पहले के बहुजन नेताओं को इतनी बड़ी कामयाबी कभी नहीं मिली। इसीलिए अपनी कतिपय कमियों और गलतियों के बावजूद हिन्दी भाषी क्षेत्र में बहुजन-राजनीति का ठोस परिप्रेक्ष्य विकसित करने वाले नेताओं में कांशीराम सबसे उल्लेखनीय नाम हैं। मुझे लगता है-इसके पीछे दो ही कारण रहेः उनका फकीर जैसा जीवन और अद्भुत संगठन-क्षमता!

अपने इन्हीं दो गुणों के बल पर कांशीराम ने देश के सबसे बड़े राज्य में, जहां मनुवादी सोच और संरचना सर्वाधिक मजबूत थी (और आज तो और भी है), वह कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की रही होगी! 

पर बीते तीसेक सालों में  बहुजन समाज के नेताओं और संगठनों के राजनीतिक कामकाज की जैसी निराशाजनक तस्वीर आज सामने है, वैसी पहले कभी नहीं दिखी थी। इस तस्वीर का एक दिलचस्प और विस्मयकारी पहलू है। वह ये कि हिंदी-भाषी क्षेत्र के कई राज्यों में आज दलित-आदिवासी और पिछड़ों के बीच शिक्षा, जागरूकता और समझदारी पहले से बढ़ी हुई है, पर उनके बीच सक्रिय रहे दलों और उनके नेताओं का समर्थन तेज़ी से घट रहा है। ऐसे नेताओं पर उनके अपने समाजों से ही सवालों की इतनी बौछार हो रही है कि इसमें उनकी राजनीतिक और व्यक्तिगत छवि भी बुरी तरह धुंधली हुई है। कइयों का आभामंडल तो लगभग ध्वस्त हो चुका है। ऐसा क्यों हुआ, कहां-कैसे ग़लतियां हुईं? ऐसे सवालों पर बहुजन राजनीति के मंचों पर आज किसी तरह का मंथन भी नहीं दिखाई देता। यह सवाल सिर्फ बहुजन समाज पार्टी का ही नहीं है, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, अपना दल, रालोसपा और लोक जनशक्ति पार्टी जैसी तमाम पार्टियों को देखिये तो कहीं भी शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर अपनी स्वघोषित विचारधारा के प्रति तनिक भी लगाव या प्रतिबद्धता के दर्शन नहीं होंगे।

आज हालात ऐसे हैं कि बहुजन-परिप्रेक्ष्य में राजनीति करने वाला एक भी समझदार और अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार बड़ा नेता या दल पूरे हिंदी-भाषी क्षेत्र में नहीं दिखाई देता। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या आज अपने को बहुजन-राजनीति, समाजवादी या सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाला एक भी ऐसा दल बचा है, जिसके यहां सांगठनिकता और वैचारिकता का महत्व है? क्या इन सबके यहां संगठन और पार्टी का मतलब परिवार नहीं हो गया है? परिवार का मतलब आलीशान महलों-हवेलियों या फार्महाउसों के एयरकंडीशंड कक्षों में रहने वाला परिवार! सबकी ख्वाहिशें अपने-अपने दल का ‘राजा’ बने रहने की हैं। जनता की चिंता किसी को नहीं। सबको अपने-अपने महल, धन-दौलत और पार्टी पर कब्जा बचाने और बढ़ाने की चिंता है। ऐसे नेताओं के परिवारवाद और दौलतवाद ने बहुजनवाद को बेमतलब बना दिया है। ‘खवासपुर के उस फकीर की बहुजन-राज स्थापित करने की ख्वाहिशों’ से ऐसे अमीरजादों का भला क्या नाता? 

ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में बहुजनों के बड़े नायक कांशीराम जी का स्मरण स्वाभाविक है। आज उनका परिनिर्वाण दिवस है। बहुजन नेता और उस प्रतिबद्ध संगठक को हमारा सलाम और आदरांजलि!

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं। और आप राज्यसभा टीवी के संस्थापक एग्जीक्यूटिव एडिटर रह चुके हैं।)

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