भारत के जनसंख्या विस्फोट में राजनीतिक अवसर

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जनसंख्या वृद्धि के मामले में भारत के चीन से आगे निकलने के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिणाम चाहे जो भी हों मगर धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को इस संकट में भी एक वोट कमाऊ अवसर मिल गया है। वैसे भी प्रधानमंत्री मोदी पहले ही जनसंख्या विस्फोट को भावी पीढ़ी के लिये संकट बता चुके हैं और भाजपा शासित असम और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में इस दिशा में चहलकदमी हो चुकी है।

उत्तर प्रदेश के विधि आयोग ने बाकायदा जनसंख्या नियंत्रण के बिल का ड्राफ्ट जनता की राय के लिये पहले ही सार्वजानिक कर दिया था। यही नहीं भाजपा के सांसद जनसंख्या नियंत्रण के लिए संसद में विधेयक पेश भी कर चुके हैं। अगर जनसंख्या वृद्धि में केवल एक ही सम्प्रदाय का हाथ होता तो ऐसा कानून 2014 के बाद कब के बन चुका होता।

संयुक्त राष्ट्र विश्व जनसंख्या डैशबोर्ड 2023 के अनुसार भारत की जनसंख्या 142.86 करोड़ हो गयी है, जो कि चीन की अनुमानित जनसंख्या 142.57 करोड़ से कुछ अधिक है। यद्यपि दशकीय जनगणना अभी शुरू नहीं हुयी है। भारत में जनसंख्या का यह विस्फोट तब है जबकि देश में प्रति महिला प्रजनन दर कम हो रही है।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या ऐजेंसी के अनुसार भारत की जनसंख्या 2040 तक 163 करोड़ और 2026 तक 166 करोड़ तक पहुंच सकती है। हालांकि उसके बाद ठहराव के साथ गिरावट के संकेत भी दिये गये हैं। क्योंकि भारत में प्रति महिला प्रजनन दर घटती जा रही है।

जनसंख्या वृद्धि को लेकर विद्वानों में दो मत हैं। विख्यात अर्थशास्त्री माल्थस जैसे विद्वान जनसंख्या विस्फोट को अकाल का कारण बताते हैं और पर्यावरणविद तो जनसंख्या के बोझ को घातक मानते ही हैं।

जनसंख्या विस्फोट का असर पर्यावरण, दैवी आपदाओं, नागरिक सुविधाओं पर भारी दबाव, गरीबी और बेरोजगारी के रूप में नजर आ भी रहा है। लेकिन अमेरिकी अर्थशास्त्री जूलियन सिमौन, स्वीडिश सांख्यकीविद हंस रोसलिंग और डेनिश अर्थशास्त्री ईस्थर बोजेरप जैसे वि़द्वान किसी भी देश की प्रगति के लिये अधिक जनसंख्या को अनुकूल मानते हैं।

इस धारणा को लेकर उनके तर्क हैं कि एक बड़ी आबादी किसी देश को वैश्विक मंच पर अधिक राजनीतिक प्रभाव और सौदेबाजी की शक्ति दे सकती है और बड़ी आबादी वाला देश एक आर्थिक महाशक्ति बन सकता है, क्योंकि उसके पास वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और बिक्री के लिए एक बड़ा बाजार होता है। इससे आर्थिक विकास होगा तो रोजगार के अवसर बढेंगे।

विद्वानों के मतों को परे रख कर देखा जाय तो अब तक की सभी सरकारें जनसंख्या वृद्धि को लेकर चिन्तित रही हैं और इस दिशा में परिवार नियोजन से लेकर परिवार कल्याण, परिवार विकास अभियान और प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान आदि कार्यक्रम भी देश में चलते रहे हैं। लेकिन जनसंख्या वृद्धि के साथ राजनीतिक कारणों से जो धार्मिक कोण जोड़ा जा रहा है वह जनसंख्या विस्फोट से ज्यादा खतरनाक है।

ऊपरी तौर पर भले ही सबका साथ, सबका विश्वास का नारा दिया जाता हो मगर जमीनी तौर पर लव जेहाद और जनसंख्या जेहाद का प्रचार किया जाता रहा है। जबकि जनसंख्या वृद्धि में किसी मजहब की नहीं बल्कि अज्ञानता और पिछड़ेपन की भूमिका ज्यादा है। ऐसे लोग किसी भी धर्म में हो सकते हैं जो कि पुत्र की आस में पुत्रियों के जन्म के सिलसिले को चलने देते हैं।

संभवतः यही एक कारण है जो केन्द्र सरकार को जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने से ठिठका रही है। वरना जो केन्द्र सरकार तीन तलाक विरोधी कानून लाने के साथ ही नागरिकता संशोधन जैसे कानून बना सकती है वह अब तक जनसंख्या नियंत्रण वाला कानून भी बना चुकी होती। वैसे भी भाजपा शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता बनाने की प्रक्रिया चल रही है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जनसंख्या नियंत्रण नीति 2021 ला चुकी है, जिस पर विवाद होने के कारण वह नीति फिलहाल ठण्डे बस्ते में है। इसी तरह उत्तर प्रदेश का विधि आयोग जनता की राय जानने के लिये प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण कानून का मजमून सार्वजनिक कर चुका है। जिसमें सरकारी नौकरियों समेत विभिन्न सरकारी सुविधाओं से दो से अधिक बच्चे वालों को वंचित करने का प्रस्ताव है।

असम में जनसंख्या एवं महिला सशक्तीकरण नीति जनवरी 2021 में लागू हो चुकी है। अधिक बच्चे वाले अन्य धर्मो के लोगों के प्रभावित होने के डर से अन्य भाजपा शासित राज्य जनसंख्या नियंत्रण के लिये कठोर नियम बनाने से ठिठक रहे हैं।

जनसंख्या नियंत्रण के लिये केन्द्रीय कानून की मांग भी भाजपा के अंदर से ही उठती रही है। इस दिशा में भाजपा के थिंक टैंक राकेश सिन्हा जुलाई 2019 में राज्य सभा में जनसंख्या विनियमन विधेयक निजी तौर पर पेश कर चुके हैं। सिन्हा द्वारा पेश किये गये 2019 के बिल में दो-बच्चे की नीति का पालन नहीं करने वाले दम्पत्तियों पर पाबंदिया लगाने की बात की गई थी। जैसे कि चुनाव लड़ने से रोकना और सरकारी नौकरियों के लिए अपात्रता।

सिन्हा के इस बिल का महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, विपक्षी दलों और समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा भारी विरोध हुआ। इसके खिलाफ तर्क दिया गया कि यह नैसर्गिक अधिकार का उल्लंघन करता है और महिलाओं तथा हाशिए पर बैठे समुदायों के खिलाफ भेदभाव का कारण बन सकता है। विरोध के कारण यह बिल आगे नहीं बढ़ा और कालातीत हो गया।

राकेश सिन्हा के बाद भाजपा के ही दो सांसद रवि किशन और निशिकांत दुबे ने 9 दिसम्बर 2022 को जनसंख्या नियंत्रण सम्बंधी प्राइवेट मेंबर बिल लोकसभा में पेश किया था। हालांकि बिल पास नहीं हुआ। इनके अलावा शिव सेना के अनिल देसााई ने भी 7 फरबरी 2020 को राज्यसभा में ऐसा ही एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था।

भाजपा के सांसदों और मुख्यमंत्रियों के इन प्रयासों से साफ जाहिर है कि भले ही पार्टी का यह खुला ऐजेंडा न हो मगर छिपा हुआ ऐजेंडा जरूर है। हिन्दुओं के भी अधिक बच्चे होने के कारण इस ऐजेण्डे के तहत भले ही कानून न बन पा रहा हो मगर चुनावी माहौल तो बनता ही है। जैसे कि कुछ भाजपाई राज्यों में समान नागरिक संहिता के नाम पर हो रहा है।

हालांकि सरकार ने संसद में स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल जनसंख्या नियंत्रण के लिये कोई कानून लाने का प्रस्ताव नहीं है। फिर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने 15 अगस्त 2019 को लालकिले की प्राचीर से दिये गये भाषण में जनसंख्या वृद्धि पर चिन्ता प्रकट कर कठोर उपायों की आवश्यकता रेखांकित कर ही चुके है।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा था कि- ‘‘हमारा देश उस दौर में पहुंचा है जिसमें बहुत-सी बातों से अब हमें अपने आपको छुपाए रखने की जरूरत नहीं है। वैसा ही एक विषय है जिसको मैं आज लाल किले से स्पष्ट करना चाहता हूं, और वह विषय है, हमारे यहां हो रहा बेतहाशा जनसंख्या विस्फोट। यह जनसंख्या विस्फोट हमारे लिए, हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए अनेक नए संकट पैदा करता है’’।

वैसे देखा जाय तो जनसंख्या का जितना बड़ा हव्वा खड़ा किया जा रहा है स्थिति उतनी डरावनी नहीं है। वैसे भी विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र की संस्था आगे चल कर भारत की जनसंख्या में गिरावट का संकेत तो दे ही रहे है। भारत में प्रति महिला प्रजनन दर भी घट रही है। भारत में प्रजनन दर एक समान नहीं है।

यद्यपि सम्पूर्ण भारत की प्रति महिला प्रजनन दर 2.2 है जो कि जनसंख्या नियंत्रण के लिये अपेक्षित 2.1 से थोड़ा अधिक है। देश के कुछ हिस्से या प्रदेश ऐसे भी हैं जहां प्रजनन दर 2 से कम है। दक्षिणी राज्यों जैसे केरल, और महाराष्ट्र में प्रति महिला प्रजनन दर 1.6 है और बंगाल, पंजाब तथा जम्मू और कश्मीर में यह दर 1.7 के करीब है।

इन राज्यों में अगर जनसंख्या और भी घट गयी तो चीन जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। चीन की वर्तमान प्रजनन दर 1.63 प्रति महिला है और यह अब बूढ़ों का देश कहलाने लगा है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिन्दी भाषी राज्यों में यह दर 3.0 तथा 3.2 तक है, जो कि अपेक्षा से काफी अधिक है।

जनसंख्या वृद्धि को किसी धर्म विशेष से जोड़ना भी दुराग्रहपूर्ण होगा। अब तक के कुछ कदमों से ऐसा संदेश गया भी है। सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर, केरल और पश्चिम बंगाल, जहां मुस्लिम आबादी काफी है वहां प्रजनन दर हिन्दी भाषी प्रदेशों की तुलना में कहीं कम है।

(जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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