Tuesday, March 5, 2024

बिहार में प्रशांत किशोरः चुनाव की ठेकेदारी से सीधे मैदाान में?

देश की सबसे पुरानी पार्टी को सुधारने का फार्मूला बेचने में विफल हुए प्रशांत किशोर अब बिहार आ गए हैं और जमीन की राजनीति का अपना नया फार्मूला घोषित करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने संकेत दिए हैं कि गरीबी और पलायन से ग्रस्त बिहार में:‘जनसुराज’ का नारा लेकर वह लोगों के सामने जाएंगे और अपने राजनीतिक कैरियर की नई शुरूआत करेंगे। मीडिया यह कयास लगा रहा है कि वह अपनी पार्टी बनाने जा रहे हैं। जाहिर है कि अब तक दूसरों को पार्टी चलाने और चुनाव जीतने की सलाह देने वाले किशोर को अपनी पार्टी बनाते देख भारत का तमाशापसंद मीडिया खुश है क्योंकि उसे जिंदा रहने के लिए ऐसे मजों की जरूरत है। लेकिन राजनीति के किसी साधारण छात्र के लिए यह एक गंभीर सवाल है कि बिहार मे एकाएक प्रशांत किशोर को क्या दिख गया है कि वह विपक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट करने का प्रोजेक्ट बीच में छोड़ कर यहां की जमीनी लड़ाई लड़ने का निश्चय करने लगे हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाना भी थोड़ा अचरज पैदा करता है कि राज्य में विधान सभा चुनाव हो चुके हैं और प्रदेश के स्तर पर किसी राजनीतिक बदलाव के लिए अगले विधान सभा चुनावों का इंतजार करना पड़ेगा।

लेकिन बिहार की राजनीति में कूदने की उनकी बेचैनी का सबब समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। जाहिर है कि अच्छी-खासी संख्या में सांसद चुनने वाला यह प्रदेश  2024 के लोकसभा चुनावों के लिए महत्वपूर्ण है। सवाल उठता है कि क्या किशोर सिर्फ अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए 2024 के लिए सक्रिय हो रहे हैं या  या किसी और के लिए?   अगर देखा जाए तो बिहार एक दिलचस्प राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है और वहां के राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। भाजपा विधान सभा चुनावों के पहले से ही राज्य की कमान अपने हाथों में लेने की कोशिश में लगी है। लेकिन यह उसके हाथों में आने के बदले लगातार फिसल रही है। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की नजदीकियों की लगातार आ रही खबरों से भाजपा असहज है और उसे यह अंदाजा हो गया है कि बिहार की राजनीति पर कब्जा जमाना फिलहाल उसके वश का नहीं है। साथ ही, उसे यह भी समझ आ रहा है कि प्रदेश के बदलते राजनीतिक समीकरण 2024 के चुनाव को कठिन बना देंगे।   

भाजपा और आरएसएस की परेशानी का एक कारण यह भी है कि उत्तर भारत में बिहार ही एक ऐसा राज्य है जहां वामपंथी पार्टियां अपना असर रखती हैं। वहां राजनीति का वैसा खालीपन नहीं है कि संघ या आम आदमी पार्टी जैसे संगठन आसानी से घुस जाएं। इस प्रदेश में सांप्रदायिकता का वैसा खेल खेलना भी संभव नहीं है जैसा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान या दिल्ली में खेला जा सकता है। आरएसएस ने जैसी सफलता दूसरे राज्यों में पाई है, वैसी सफलता उसे बिहार में अब तक नहीं मिली है। इस हिसाब से देखें तो हिंदू राष्ट्र के रास्ते में यह प्रदेश अभी भी बड़े बाधक के रूप में खड़ा है। ऐसे में यहां की राजनीति को बदलना भाजपा की सबसे बड़ी जरूरत है। 

क्या इन राजनीतिक परिस्थितियों में प्रशांत किशोर के प्रवेश को एक सामान्य घटना मान लिया जाए? इसी से जुड़ा सवाल है कि पीके का असली इरादा क्या है- भाजपा के विरोध में तैयार हो रहे समीकरण को मजबूत करने का या उसे कमजोर? क्या वह आरजेडी तथा जेडीयू के साथ आने की स्थिति में उसी तरह उनकी मदद करेंगे जैसी मदद उन्होंने 2015 में की थी और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प का रास्ता आसान करेंगे?

लेकिन चुनावी रणनीतिकार के रूप में उनके पिछले कामकाज पर नजर डालने से कुछ और ही समझ में आता है। साल 2014 में नरेंद्र मोदी को सत्ता में पहुंचाने के बाद पीके की यात्रा में एक बात साफ तौर पर उभरती है कि उन्होंने प्रदेशों से कांग्रेस को बहिष्कृत करने में अहम भूमिका निभाई है। क्षेत्रीय दलों को मजबूत करने की उनकी रणनीति का सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ है जो भाजपा के खिलाफ बनने वाले राष्ट्रीय विकल्प की धुरी बनने में सक्षम है। कई स्थानों से पार्टी गायब ही हो गई। अगर डीएमके को छोड़ दें तो पीके से मदद पाने वाले सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस को बहिष्कृत करने में अपनी ताकत लगाते रहे हैं।

पीके की चुनावी सफलता की सूची में अव्वल स्थान रखने वाले पश्चिम बंगाल पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि वहां के विधान सभा चुनावों को दो ध्रुवीय बनाने का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस और वाम मोर्चा को हुआ। दोनों का सफाया हो गया और बंगाल की राजनीति को तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ने आपस में बांट लिया है जो दोनों के लिए फायदेमंद है। वहां के नतीजे आने के बाद ममता बनर्जी ने पहला काम यही किया कि वह राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को अलग-थलग करने में जुट गईं।

दूसरी ओर, ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के बहाने प्रशांत किशोर ने गोवा में कांग्रेस की वापसी नहीं होने दी और भाजपा दोबारा सत्ता में  आ गई। वहां तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के कारण कांग्रेस हार गई। किशोर आप के चुनावी सलाहकार की भूमिका निभा चुके हैं। उत्तर पूर्व में तृणमूल कांग्रेस के विस्तार के बहाने उन्होंने कांग्रेस को सीन से गायब करने की कोशिश की। मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा समेत 17 विधायकों के दलबदल में उनकी भूमिका होने का इशारा खुद संगमा ने किया था। 

पश्चिम बंगाल के चुनावों के बाद किशोर ने कांग्रेस को बाहर रख कर विपक्षी एकता की नैरेटिव बनाने की भरपूर कोशिश की। इसके लिए ममता और के चंद्रशेखर राव ने भी अपनी पूरी ताकत लगाई। एनसीपी नेता शरद पवार ने उनकी इस कोशिश को नाकाम कर दिया है। पीके की कंपनी आधिकारिक तौर पर अब केसीआर से जुड़ चुकी है और आने वाले विधान सभा चुनावों में उसके लिए काम करेगी। 

यह पता नहीं कि कांग्रेस के लिए गड्ढा खोदने वाले पीके को 2017 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों के लिए रणनीतिकार बनाने में किस कांग्रेसी नेता की भूमिका थी। यह जानकारी भी उपलब्ध नहीं है कि उन्हें इस बार भी किस नेता ने सोनिया गांधी के दरबार में पहुंचाया। सत्ता के गलियारों में घूमने वाले पीके के लिए ऐसे शुभचिंतकों की कमी नहीं है। अपनी बीमार कार्यशेली और अस्पष्ट नीतियों के कारण लगातार डूब रही कांग्रेस का किशोर की ओर आकर्षित होना भी स्वाभाविक है। पार्टी के निकम्मे नेता राजनीति को आउटसोर्स करना चाहें तो इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। मैदान में संघर्ष करने के लिए विचारों और कर्म से जिस तरह का जुड़ाव चाहिए वह कांग्रेस में फिलहाल नजर नहीं आता है।

पीके ने कांग्रेस से अपनी बातचीत का जमकर फायदा उठाया है। वह दूसरे ऐसे व्यक्ति हैं जो मोदी सरकार को गद्दी से उतारने के लिए घूमते नजर आते हैं, फिर भी गोदी मीडिया के चहेते हैं। गेादी मीडिया ऐसी मुहब्बत सिर्फ औवैसी से करता है। कांग्रेस के साथ अपनी बातचीत टूटने के बाद उन्होंने बहुत ही नफीस तरीके से कांग्रेस के खिलाफ यह नैरेटिव बनाई है कि अब इस सबसे पुरानी पार्टी का भला आसान नहीं है क्योंकि वह पीके जैसे चाणक्य का सहारा लेने से चूक गई है। वह इस नैरेटिव के हीरो बन गए हैं। इस नैरेटिव के मुताबिक कांग्रेस को संकट से उबारने के पुनीत कार्य का मौका उन्हें इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि पार्टी में  अपने को उबारने की इच्छाशक्ति का अभाव है।

सच्चाई यह है कि कांग्रेस में उपाध्यक्ष या महासचिव का पद लेकर वह सलाहकार से नेता बन जाना चाहते थे और इसे सोनिया गांधी ने अस्वीकार कर दिया। यह किसी और की नहीं खुद प्रशांत किशोर की बात से साफ होता है कि जिस शक्तिसंपन्न समूह का सदस्य उन्हें बनाया जा रहा था उसकी कोई संवैधानिक हैसियत नहीं होती।

इसे किस तरह लिया जाए कि कांग्रेस को अपनी शर्तों को स्वीकार कराने में असफल रहे प्रशांत किशोर ने सीधे बिहार का रुख किया? उनसे यह सवाल तो पूछा ही जाएगा भाजपा से दूर जाते बिहार में बदलाव की ऐसी कौन सी आपात जरूरत उन्हें महसूस हुई कि वह अपने राष्ट्रीय प्रोजेक्ट को छोड़ कर यहां आ गए? क्या वह बिहार को योगी का उत्तर प्रदेश या केजरीवाल की दिल्ली बनाना चाहते हैं? 

लेकिन लोकतंत्र के लिए सबसे चिंता की बात यह है कि पार्टी चलाने और चुनाव लड़ने का काम ठेके पर दिया जाने लगा है। कंपनी चलाने का तजुर्बा रखने वाले आगे आएंगे और प्रचार और पैसे से चुनाव का प्रबंधन करने में माहिर लोग राजनीति चलाएंगे। ऐसे में यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आपके सामने खड़े व्यक्ति को किसने सामने लाया है। पीके के पीछे कौन सी कंपनी या संगठन है, इसे बिहारवासी शायद ही जान पाएंगे। यह जरूर है कि मोदी के ब्रांड मैनेजर होने का उनका अतीत उनके राजनीतिक रूझानों का कुछ अंदाजा जरूर देता है।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजक दिल्ली में रहते हैं।) 

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