बीच बहस

बेशर्मी के पाताल में गोता लगा रही है मौजूदा मोदी सरकार

विचित्र दौर से गुज़र रहा है देश। और देश की राजनीति भी। हर तरफ़ चौंकाने वाले दृश्य बिल्कुल स्पष्ट हैं। जिसके इतिहास की गवाह आज की हर तबके की जनता है और होगी। जिसमें एक तरफ सेंट्रल विस्टा का बनना-रहते जाना और दूसरी तरफ़ भयंकर महामारी द्वारा हर वर्ग-उम्र की जनता का मरते जाना और लगातार मरते जाने की ख़बरों ने रातों की नींद हराम होना। कई कई रात करवट बदलते हमारे आप की ही तरह लाखों, करोड़ों ने भी बिताई होगी। जिस तरह गंगा लाशों से पट गईं। जिस तरह श्‍मशान घाट चिताओं की लपट से धुंधुंआती रही। दिन-रात।

जिस तरह हर दिन हजारों कब्रों में दफ्न हुए जनाजे का यह विश्वास ज़्यादा सर चढ़ने लगा- कल हमारी बारी,परसों इसकी उसकी बारी! यह भी लगने लगा कि संभवतः यह भी हो सकता है – भारत एक बहुसंख्या वाले देश से अल्प-जनसंख्या वाला देश न हो जाए। इतना सब कुछ दो से आज ढाई महीने-अप्रैल से जून चलता रहा और जनता के जान बचाने की तैयारी, उपाय करने के बदले, सरकार इस ओर से विमुख रही। बल्कि मतलब साधती रही और मजबूर ग़रीब जनता को पैसे बांट कर प्रचारक की भीड़ जुटाती रही। यानी जनता मरे या जीए,’सरकार साहब’ को अपनी वोट की राजनीति में लगे रहना है।

रसूख दारों को भी तिल-तिल मरते‌ देखा-पढ़ा-सुना सबने

‘बांटो और राज करो’ का नंगा नाच हम सबने-सभी वर्ग और सभी उम्र की जनता ने कोरोना काल में साफ देखा। जिस जनता को बरगला कर वोट लिया, उसी जनता के मरते जाने पर कान पर जूं तक नहीं रेंगी। कमाल का देश और कमाल की सरकार! और तो और रसूख दारों को भी तिल-तिल मरते‌ देखा-पढ़ा-सुना सबने। विदेशों में भी जनता और उनकी सरकारों की आंखें नम हुईं। उन विदेशी सरकारों ने हमें सहायता पहुंचाई- यूएसए, आस्ट्रेलिया, चीन, जर्मनी, सऊदी अरब, फ्रांस, पाकिस्तान, सिंगापुर,यूनाईटेड किंगडम ने मनुष्यता का पैगाम इस तरह से भेजा। लेकिन हमारी सरकार ने खुद को ईश्वर समझ लिया और अपनी वोट की राजनीति के साथ सेंट्रल विस्टा में मजदूरों की जान को जोखिम में डालकर अपने स्वार्थ में लगे रहे। और अभी लगे हैं। जनता की ही तरफ़ से सवाल है कि क्या यह कृत्य न्याय संगत या तर्क संगत है? मरता क्या न करता की तरह। मच्छरों, चूहों की मौत जनता मरती रही और अब भी मर रही है। वोट देने वाली जनता के जान की कीमत ही नहीं।

पहली कोराना लहर में पैदल मीलों चलकर घर लौटे मजदूर

इस बीच विपक्ष ने कम-से-कम मानवता को आधार बना कर हर संभव तरीके से जनता की मददगार बनी रही। और इस ओर भी ध्यान गया कि विपक्ष ने पहली लहर में भी अपनी हर संभव मदद की कोशिश की। जिसमें यूपी सरकार ने अड़ंगा डाल कर मरती -भागती जनता को मरने दिया। पैदल चल चल कर,और बसों को यह कह कर रोक दिया कि दूसरे प्रदेशों की बसें यूपी में नहीं जा सकतीं। यह तो जनता की प्रतिनिधि सरकार नहीं बल्कि जनता के ईश्वर ही बन बैठे। मानो ऐसा कुछ कह रही थी कि दूसरे प्रदेशों में खाने- कमाने गए हो तो अब उसकी सजा भी खुद भुगतो। इन सबके बीच जो सबसे दुखद बात पढ़ने -सुनने- जानने को मिली वह दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सेंट्रल विस्टा को बनने देने की मंजूरी रही। इस ख़बर को पढ़ कर दिमाग सुन्न पड़ गया और हम पीछे की राजनीति यानी इतिहास के पन्नों पर नजरें दौड़ाने लगे। रातों की नींद हराम कर इतिहास के पन्ने आंखों के सामने ‌नाचने लगे। और वही सब कुछ अब दोहराया जा रहा था।

क्‍यों याद आने लगा 1857 का विद्रोह

2020-2021 का लोकतंत्र मानो 1857 का युद्ध हो। मानो हम गुलाम हों। मानो अंग्रेजी राज है जो जनता को आपस में भिड़ा कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। ऐसे में कंपनी सरकार का विरोध भला ‘कानून’ कैसे कर सकता है। यह समय कंपनी राज का है मानो अब क्या होगा। होगा क्या? उस जनता का जिसने अपनी मूर्खता का परिणाम खुद ही देख लिया। जिसमें उनके अपने, करीबी, मित्र, बच्चे मरते रहे और इस सरकार ने कुछ नहीं किया। याद करें तो 2019 चुनाव के नतीजे भी चौंकाने वाले थे। सरकार और कानून का खेल जनता हर हाल, हर मुद्दों में समझ और देख चुकी है। यह भी देख चुकी है कि विपक्ष प्रोपोगंडा नहीं करता बल्कि वक्त पर जनता के काम आता है। जनता को और चाहिए ही क्या!

यह अलग बात है कि यही बीजेपी की सरकार आज विपक्ष में बैठी सरकार को लूट खसोट वाली सरकार बता कर, सात साल पहले गद्दी पर काबिज हुई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जनता कोई भ्रष्ट और बेईमान सरकार नहीं चाहती। बदले में मिला क्या? बस जनता का खून चूस कर उसे उसके हाल पर छोड़ देने वाली हुकूमत। जनता की लगातार होती मौत पर मौन और अपने स्वार्थ में लिप्त रहने वाली सरकार की कारस्तानियां अब किसी से छुपी नहीं हैं! इतना ही नहीं ऊपर से जनता को ही उसकी औकात बताने पर तुल गयी है।

कांग्रेस में पुराने कद्दावर ‌नेताओं की कोई पूछ नहीं

अब जनता यदि मूर्ख नहीं है तो उसे बताना होगा कि बेगैरत है कौन आखिर? ‘माफी सहित’ यह भी कि जनता को काना राजा चाहिए। इतना चतुर नहीं कि मतलब निकल जाने के बाद जनता को पहचाने ही नहीं! कुल मिलाकर कर दूर तक सोचने पर यह भी लगता है कि यह सरकार देश की दुश्मन है और इसकी डोर किसी और के हाथ बंधी है! उससे भी बड़ी उलझन विपक्ष में बैठी कांग्रेस से है जो अपने अहम में डूबी है और चुप है। राहुल, प्रियंका अपने अपने स्तर पर जनता का कुछ सहयोग कर देते हैं या करवा‌ देते हैं। इसके साथ ही सोनिया गांधी को लगता है कि बस हो गई विपक्ष की खाना पूर्ति। इसी कांग्रेस में पुराने कद्दावर ‌नेताओं की कोई पूछ ही नहीं है।

यह कैसा विपक्ष है? ऐसे में राजनीति में अपना जीवन खपा देने वाले ‌नेता जब खुद को उपेक्षित‌ महसूस करेंगे तब या तो राजनीति छोड़ देंगे या फिर चुपचाप अपनी खोल में सिमट जाएंगे। जैसा कि हुआ। और होता दिख रहा है। परले दर्जे के स्वार्थी तो हमेशा दल बदल में ही विश्वास रखते हैं, उनका तो काम ही है इधर से उधर या उधर से इधर जाना। खैर यदि कांग्रेस आलाकमान को देश की सचमुच चिंता है तो उन्हें चाहिए की अपनी पार्टी के सभी नेताओं को बुला कर मीटिंग करें। और मौजूदा स्थितियों पर विचार कर सामूहिक पहल करें। 

 जनता को अब और मूर्ख नहीं बनाया जा सकता

कहते हैं कि परिवार हो या देश समय रहते कमान संभालने वाला नहीं सुधरा तो सब कुछ गर्त में चला जाता है। दो अक्षर पढ़ चुकी जनता के लिए राजनीति का इतिहास साक्षी है लेकिन इस समय तो जनता ही साक्षी है कि सरकार और विपक्ष किस-किस तरह से जनता को बरगलाने में लगे हैं। देश की शान को बट्टा लगा कर सरकार बार बार खुद की पीठ ठोक लेती है और बिकी हुई मीडिया उसे ख़बर बना कर जनता के बीच परोस देती है! जैसा कि अभी कल ही पढ़ा कि सरकार के पास इस समय विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा भंडार है। शर्म के बदले वाहवाही की हद है। महामारी के नाम पर और मनुष्यता के नाम पर आया चंदा इकट्ठा कर हमारी सरकार उस पर भी वाह-वाही लूटने से बाज़ नहीं आ रही है। अब ऐसी बेशर्म सरकार के बारे में क्या ही कहा जाए। लाशों की ढेर याद कर करके कितनी रातों की नींद हराम कर सकती है जनता और कितनी कितनी-सरकार की बेशर्मी झेल सकती है यह जनता!

(आभा बोधिसत्व कवयित्री हैं। और आजकल मुंबई में रहती हैं।)

This post was last modified on June 17, 2021 11:33 am

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