Tuesday, January 18, 2022

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त्रासदियों के लिए याद किया जाएगा बीत रहा साल

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बीता साल इतनी निराशा से भरा था कि किसी ने शायद ही उम्मीद की होगी कि वह जाते-जाते लोकतंत्र को जगा कर जाएगा। भारत की हालत यह है कि सरकार की सारी संस्थाएं सत्ताधारी पार्टी की शाखा में तब्दील हो चुकी हैं और अदालत तथा मीडिया ने हाथ खड़े कर लिए हैं। विपक्षी पार्टियों का हाल भी यह है कि वे चुनाव को छोड़ कर बाकी समय खुले मैदान में आने से परहेज करती हैं। ऐसे समय में किसानों ने मोर्चा संभाला है और सरकार के सारे पाखंड खंड-खंड कर दिए हैं। उन्होंने मूर्छित लोकतंत्र को पानी के छींटे मार कर जगा दिया है। लोकतंत्र को नया जीवन देने का एक कार्यक्रम लोगों को सौंप दिया है। देखना यह है कि देश की जनता इस क्रांतिकारी तोहफे को खुले मन से स्वीकार करती है या नहीं।

यह संयोग नहीं है कि जब किसान दिल्ली की सीमा पर आ डटे थे तो नीति आयोग के प्रमुख अमिताभ कांत ने फरमाया कि हमारे यहां लोकतंत्र कुछ ज्यादा ही है और इस कारण कठोर आर्थिक सुधार नहीं हो सकते। उनकी बातों से दो बातें साफ होती हैं। एक तो यह कि आर्थिक सुधार और लोकतंत्र में से किसी एक को चुनना पड़ेगा। जाहिर है कि मोदी सरकार आर्थिक सुधार चाहती है और इसके लिए उसके सामने लोकतांत्रिक अधिकारों को कम करने के अलावा कोई उपाय नहीं है। अमिताभ कांत जैसा अधिकारी सरकार की इच्छा के बगैर ऐसी बातें नहीं कह सकता, वह भी उस समय जब कारपोरेट की मर्जी के अनुसार फसल उगाने तथा बेचने के लिए मजबूर करने वाले आर्थिक सुधार लाने वाले कानून को रद्द करने की मांग को लेकर हजारों किसान दिल्ली के दरवाजे पर आ पहुंचे है।

अमिताभ कांत, सीईओ, नीति आयोग।

अमिताभ कांत का बयान मोदी सरकार की ओर से एक चेतावनी है और इसके असली मायने आने वाले साल में खुलेंगे। वैसे, मोदी लगातार यह दिखाते रहे हैं कि लोकतंत्र उनके लिए ज्यादा अर्थ नहीं रखता है। सता में आने के बाद से ही लोकतंत्र के खिलाफ वह एक तेज अभियान चलाते रहे हैं। बीते साल उन्होंने देशी-विदेशी कारपोरेट के हाथ देश की संपत्ति और संसाधन सौंपने का अभियान तेज कर दिया और कोरोना के बाद भी जिस तरह किसान सड़कों पर आ गए, वह उनके और अधिक कठोर बनने तथा जनता के विदे्रोही बनने के संकेत देता है। आने वाले साल में यह संघर्ष तेज होगा।

कोरोना महामारी के निकल जाने के बाद सरकारी कंपनियों को बेचने तथा बाकी लोक विरोधी कदमों के खिलाफ लोगों को सड़क पर उतरने से रोकना सरकार के आसान नहीं होगा। साल 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा-संघ का लोकतंत्र विरोधी अभियान पूरी ताकत से चलता रहा तो ऐसा नहीं है कि जनता खामोश रही। वह भी इसका प्रतिरोध करती रही। बीता साल कोरोना की महामारी के साथ-साथ जनता के प्रतिरोध के लिए भी याद रहेगा। एक ओर मोदी अर्थतंत्र के कारपोरेटीकरण तथा शासन के भगवाकरण में लगे रहे तो दूसरी ओर जनता उनके हर कदम के खिलाफ लड़ती रही।    

मोदी सरकार पहले भी अपने इरादे जताती रही है, लेकिन कोरोना-काल में वह उन्हें लागू करने में जुट गई। उसने संसद के शीतकालीन सत्र को विप़क्ष से राय लिए बिना स्थगित कर दिया। दिल्ली आए किसानों के साथ किए गए सलूक को भी आगे के संकेत के रूप में ही लेना चाहिए। उन पर पानी की बौछारें की गईं, आंसू-गैस के गोले दागे गए और उन्हें अपनी मर्जी की जगह पर जमा नहीं होने दिया गया। ये कदम खुलेआम दबंगई की श्रेणी में आते हैं।  

कोरोना-काल में सरकार ने न केवल संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर बनाने का काम चालू रखा, बल्कि कोरोना की आड़ में इस दिशा में कुछ नए प्रयोग भी किए। महामारी रोकने के सारे फैसले उसने खुद लिए। किसी भी फैसले में राज्यों की सरकार को शामिल नहीं किया गया। लॉकडाउन से लेकर वैक्सीन के प्रस्तावित वितरण को लेकर सारे फैसले मोदी सरकार ने एकतरफा ढंग से लिए हैं। उसने ऐसा करने के साथ-साथ राज्य सरकार को जरूरी मदद देने में कोताही भी की। राज्यों को अपने बूते ही महामारी की रोकथाम के सारे इंतजाम करने पड़े। इसके बावजूद केंद्र ने यह फैसला भी कर दिया कि उससे पूछे बिना लॉकडाउन नहीं किया जाए। भजपा ने कोरोना की महामारी का उपयोग संविधान के संघीय ढांचे को बिगाड़ने के लिए ही किया।  

इसके कई उदाहरण हैं जो बताते हैं कि मोदी ने आपदा को अवसर में बदलने के नारे को बेहिचक लागू किया। कोरोना काल उपयोग उन्होंने खुद को नायक दिखाने के लिए किया। दीप जलाने के कार्यक्रम और ‘मन की बात’ के एकतरफा संवाद के जरिए उन्होंने न केवल अंधविश्वास को पुख्ता करने तथा उन्हें वैज्ञानिक साबित करने की कोशिश की बल्कि खुद को कोरेाना के खिलाफ युद्ध का नायक भी बताया। लोकतंत्र के लिए इससे बुरा क्या हो सकता है कि कोरोना-काल में देश का मुखिया एक संवेदनशील राजनेता के बदले एक चालाक अभिनेता की तरह व्यवहार करे जो हर मौके को अभिनय का कौशल दिखाने का मौका समझता है।  

महामारी के दौरान हर जगह अंधविश्वास बनाम वैज्ञानिकता का संघर्ष हुआ, लेकिन हमारे यहां हिंदुत्ववादियों ने चालाकी से अंधविश्वास का पक्ष लिया। एक ओर रामजन्मभूमि पूजन से लेकर दीपोत्सव वाले हिंदुत्व के सारे कार्यक्रम चलते रहे और प्रधानमंत्री मोदी तथा योगी आदित्यनाथ ने इनमें शामिल होकर राज्य को धर्म से अलग रखने के संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ किया और दूसरी ओर वे लोगों को मास्क पहनने तथा दो गज की दूरी रखने के लिए भी कहते रहे। बाबा रामदेव को उन जड़ी-बूटियों के बेचने की छूट भी दी गई जिसके कोरोना पर असर के कोई सबूत नहीं हैं। आयुर्वेद में वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा देने के बदले हिंदुत्व इसका इस्तेमाल लोगों को अंधविश्वासी बनाने के लिए करता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी कोरोना से लड़ने के लिए डाक्टर, एंबुलेंस, मुफ्त जांच और सस्ती दवाइयों पर चर्चा करने के बदले योग और ध्यान लगाने पर जोर दिया। साल 2020 ने दिखाया कि हिंदुत्व की राजनीति कितनी कठोर है और आम लोगों की जान से ज्यादा अपनी राजनीति प्यारी है।

क्या यह दिलचस्प नहीं है कि कोरोना महामारी के सबसे बुरे दौर में भाजपा ने मध्य प्रदेश की सरकार गिराई? यहां तक कि फिर से कुर्सी पर बैठे शिवराज सिंह चैहान कोरोना से पीड़ित हो गए। इस काल में भाजपा की राजनीति बिना रूकावट के चलती रही। येागी ने अयोध्या के पंचलखा दीपोत्सव में राम से ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी के नाम लिए। कोरोना काल में ही बिहार के चुनाव हुए और प्रधानमंत्री मोदी, जेपी नड्डा तथा मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों, राजनाथ सिंह तथा रविशंकर प्रसाद आदि ने जमकर रैलियां की। चुनाव स्थगित करने की विप़़क्ष की की मांग चुनाव आयोग ने नहीं मानी। इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पीछे नहीं रहे। कोरोना को भगाने के लिए उन्होने पूजन के जरिए तरंगें पैदा करने की हास्यास्पद कोशिश की।  

बीते साल सरकार ने कई फैसले लिए हैं जो घोटाले जैसे दिखाई देते हैं। सबसे बड़ा घोटाला तो कोरोना से निपटने के लिए घोषित 20 लाख करोड़ का पैकेज है। इसकी जांच होनी चाहिए कि वास्तव में सरकार ने कितना पैसा खर्च किया? इन पैसों में से कितना गरीबों पर खर्च हुआ और कितना कारपोरेट को दे दिया गया?
आर्थिक सुधारों के नाम पर भी जमकर घोटाला हुआ। किसान तो तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर सड़क पर आ भी गए, लेकिन सरकारी कंपनियों को बेचने, रेलवे के निजीकरण जैसे जनता की संपत्ति लुटाने के फैसलों के खिलाफ अब तक कोई बड़ी लड़ाई खड़ी नहीं हो पाई है। संभव है कि किसानों से प्रेरणा लेकर देश के बाकी तबके भी सरकार के खिलाफ खड़े हो जाएं।
इसी साल एक और घोटाले की नींव रखी जा चुकी है। यह है कोरोना की वैक्सीन लगाने की योजना। वैक्सीन बनाने वाली मल्टीनेशनल कंपनियां भारत को विशाल बाजार के रूप में देख रही हैं। सरकार ने इसकी घोषणा भी कर दी है कि वह सभी लोगों को वैक्सीन नहीं लगाएगी। इसका मतलब लोगों को अपने पैसे से वैक्सीन लगानी पड़ सकती है। कोरोना की जांच में भी ऐसा ही हुआ है। जांच और दवा के लिए अनाप-शनाप ढंग से पैसे वसूले गए। सरकार वैक्सीन कंपनियों को बाजार से कमाने का पूरा मौका देने के प्रयास में है।    

कथित लव जिहाद रोकने के लिए कानून बनाने के उत्तर प्रदेश सरकार का कदम भी कोरोना-काल का इस्तेमाल का ही एक नमूना है। भाजपा ने राजनीति को मुस्लिम विरेाधी बनाने के लिए कश्मीर में स्थानीय निकाय के चुनाव कराए हैं और गुपकार गठबंधन (कश्मीर की राजनीतिक पाटियों का गठबंधन) के विरोध का अभियान चला रखा है। वह मीडिया के सहारे चुनावों में गठबंधन की जीत को पराजय साबित करने में लगी है।

आने वाले साल में ‘‘लव-जिहाद’’ और ‘‘गुपकार गैंग’’ के मुद्दे रामजन्मभूमि, धारा 370 तथा तीन तलाक  की जगह ले सकते हैं। दोनों ही मुद्दे हिटलर के नाजीवादी तकनीक पर आधारित हैं । जिन तकनीकों के जरिए जर्मनी में यहूदियों को निशाना बनाया गया, उन्हें भारतीय मुसलमानों पर दोहराया जा रहा है। कश्मीर में धारा 370 को बहाल करने की मांग लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन उसे राष्ट्र-विरोधी बता कर संघ-परिवार इसका इस्तेमाल मुसलमानों को निशाना  बनाने के लिए कर रहा है।

यह मालूम नहीं कि बीते साल की कुछ घटनाओं को भारतीय राजनीति के इतिहासकार किस तरह याद रखते हैं, लेकिन उन्हें यह तो बताना ही पड़ेगा कि देश के लोकतंत्र को तानाशाही में बदलने में सारी संस्थाएं सरकार के साथ खड़ी रहीं।
पहली घटना देश के बड़े शहरों से प्रवासी मजदूरों के पलायन की थी। उन्होंने भूखे-प्यासे सैंकड़ों मील की दूरी तय की। वे जहां रहते थे, वहां की सरकारों ने उनकी देखभाल के वादे पूरे नहीं किए और वे जहां के थे, वहां की सरकारें उन्हें बुलाने में आनाकानी कर रही थीं। केंद्र सरकार खामोश हो गई और बीमारी तथा मौत से जूझते भारत के ये मेहनतकश यात्रा करते रहे। मीडिया ने भी इसे एक मनोरंजक दृश्य मान कर ही दिखाया, इस बारे में सरकार से कोई सवाल नहीं किया। अदालतें, पुलिस किसी ने उनके हक में कुछ नहीं किया। विपक्ष भी सड़क पर नहीं उतरा।

दूसरी घटना अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की है। बिहार के एक भाजपा विधायक के इस चचेरे भाई की जाति को ध्यान में रख कर मीडिया ने ऐसी पटकथा रची जो चुनाव में जातीय ध्रुवीकरण में मदद कर सके। इस कहानी में बारी-बारी से केंद्र और बिहार की सरकारें, सीबीआई, ईडी नारकोटिक्स विभाग, अदालतें शामिल हो गईं। शिकार के लिए मृत अभिनेता की प्रेमिका रिया चक्रवर्ती को चुना गया और उसके चरित्र, सामाजिक जीवन और कैरियर की हत्या कर दी गई। इसमें किसी भी कानून का पालन नहीं किया गया और न किसी मर्यादा का। सारा तंत्र इसमें शामिल हो गया और उसने अपराध की जांच के महाराष्ट्र सरकार के अधिकार को भंग करते हुए सीबीआई को मैदान में उतारा।

वैधानिक संस्थाओं के पतन का ऐसा ही उदाहरण पत्रकार अर्णब गोस्वामी के मामले में दिखाई पड़ा । कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के मामलों पर खामोशी रखने वाले सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तुरंत जमानत दे दी क्योंकि केंद्र सरकार उसके पीछे खड़ी थी।  लेकिन ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र को ढहाने के प्रोजेक्ट को देश में कोई चुनौती नहीं मिल रही है। प्रवासी मजदूरों की महायात्रा, नागरिकता कानून में संशोधन के खिलाफ शाहीन बाग का आंदोलन या दिल्ली की सीमा पर किसानों के जमघट ने यही दिखाया है कि लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए देश के सामान्य लोग हर तरह की कुर्बानी को तैयार हैं। बिहार में धन तथा तंत्र की ताकत लगाने तथा मोदी के चेहरे पर वोट मांगने के बाद भी भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी ही बन पाई और बेराजगारी सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। यह प्रवासी मजदूरों की उपेक्षा का नतीजा नहीं तो और क्या था? आने वाला साल आम जनता तथा मोदी-तंत्र के बीच का संघर्ष का साल होगा।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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