Saturday, October 16, 2021

Add News

जनता की जेब पर डाके का खुला ऐलान है बैंकों और बीमा कंपनियों का निजीकरण

ज़रूर पढ़े

19 जुलाई 1969 को बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था और उसके ठीक पचास साल बाद आज 21 जुलाई 2020 को यह खबर आयी कि सरकार छः पब्लिक सेक्टर बैंकों को पुनः निजी क्षेत्रों में सौंपने जा रही है। सरकार और बैंकिंग सूत्रों ने बताया कि बड़े सुधार के तहत पीएसयू बैंकों की संख्या आधी से कम किए जाने की योजना है। अभी देश में जो सरकारी बैंक हैं उन्हें, पांच तक सीमित करने की योजना है।

कहा जा रहा है कि, बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी बेचने के लिए नए निजीकरण प्रस्ताव पर काम चल रहा है और कैबिनेट की मंजूरी के बाद यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। अखबारों की एक खबर के अनुसार,  कोविड – 19 से देश की अर्थव्यवस्था पर काफी दबाव है और सरकार के पास धनाभाव है। कई सरकारी समितियों और रिजर्व बैंक ने भी सिफारिश की थी कि 5 से ज्यादा सार्वजनिक बैंक नहीं होने चाहिए।

खबर है कि पहले चरण में बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और पंजाब एवं सिंध बैंक का निजीकरण किया जाएगा। सरकार ने पहले ही बता दिया है कि अब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय नहीं किया जाएगा, सिर्फ उनके निजीकरण का ही विकल्प है। पिछले साल ही 10 सरकारी बैंकों का विलय कर 4 बड़े बैंक बनाए गए हैं। अगले चरण में, जिन बैंकों का विलय नहीं हुआ है, उनके निजीकरण की योजना है। 

अब जरा पचास साल पीछे चलें। जब 1969 में इंदिरा गांधी ने 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था तो वह एक अभूतपूर्व घटना थी। वह सरकार के वैचारिक बदलाव का एक संकेत था और 1947 से चली आ रही मिश्रित अर्थव्यवस्था से थोड़ा अलग हट कर भी एक कदम था। कांग्रेस के अंदर इंदिरा गांधी के इस कदम का विरोध हुआ और कांग्रेस नयी तथा पुरानी कांग्रेस में बंट गयी, पर देश की प्रगतिशील पार्टियों और समाज ने इंदिरा गांधी के इस कदम का बेहद गर्मजोशी से स्वागत किया और हवा का रुख भांपते हुए इन्दिरा गांधी ने 1972 में निर्धारित आम चुनाव को एक साल पहले ही करा दिया। इसका परिणाम आशानुरूप ही हुआ और 1971 में तब तक का सबसे प्रबल जनादेश इंदिरा गांधी को मिला और स्पष्ट है कि यह जनादेश प्रगतिवादी नीतियों के पक्ष में था और तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी उनके साथ आ गयी थी और वह इंदिरा गांधी का वामपंथी झुकाव था। 

ऐसा नहीं था कि इंदिरा गांधी के इस कदम का विरोध नहीं हुआ। विरोध कांग्रेस में भी हुआ और कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गयी। एक का नाम संगठन कांग्रेस पड़ा जिसके अध्यक्ष थे निजलिंगप्पा और दूसरी कांग्रेस इन्दिरा कांग्रेस बनी जिसके अध्यक्ष थे बाबू जगजीवन राम। कम्युनिस्ट इंदिरा कांग्रेस के साथ थे। गैर कांग्रेसवाद के रणनीतिकार डॉ. राम मनोहर लोहिया दिवंगत हो गए थे। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी प्रतिभावान और युवा जुझारू नेताओं के बावजूद भी गैर कांग्रेसवाद के सिद्धान्तवाद से चिपकी रही।

जनसंघ, जो आज की शक्तिशाली भाजपा का पूर्ववर्ती संस्करण था, एक शहरी और मध्यवर्गीय खाते-पीते लोगों की पार्टी थी, जिसकी कोई स्पष्ट आर्थिक नीति नहीं थी। लेकिन उसका झुकाव पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर था। पुराने राजाओं और ज़मीदारों की भी एक पार्टी थी, सितारा चुनाव चिह्न वाली स्वतंत्र पार्टी, जिसकी आर्थिक नीति जनविरोधी और सामंती पूंजीवादी थी। इन तीनों दलों संगठन कांग्रेस, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी ने इंदिरा गांधी के दो बड़े प्रगतिशील कदमों, एक बैंकों का राष्ट्रीयकरण और दूसरा राजाओं के विशेषाधिकारों और प्रिवी पर्स के खात्मे का खुल कर विरोध किया। 

1971 के आम चुनाव में एक तरफ कांग्रेस और उसके साथ कम्युनिस्ट दल थे, तथा दूसरी तरफ, संगठन कांग्रेस, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी थी। इन तीनों दलों के साथ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी भी शामिल हो गयी और इसका नाम पड़ा महा गठबंधन, ग्रैंड एलायंस। 1971 के चुनाव में यह महा गठबंधन बुरी तरह हारा। संगठन कांग्रेस, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी की आर्थिक नीतियां तो पूंजीवादी रुझान की थी हीं, पर समाजवादी उनके साथ कैसे चले गए यह गुत्थी आज भी हैरान करती है। लेकिन इसका कारण सोशलिस्ट पार्टी का गैरकांग्रेसवाद की थियरी थी। यही बिंदु संसोपा को इन दक्षिणपंथी दलों की ओर ले गया। डॉ. लोहिया अगर तब तक जीवित और सक्रिय रहते तो वे क्या स्टैंड लेते इसका अनुमान मैं नहीं लगा पाऊंगा। यह पृष्ठभूमि है बैंकों के राष्ट्रीयकरण की। 

भारतीय बैंकिंग प्रणाली में वाणिज्यिक बैंकों की अपनी अलग पहचान है और वे बैंकिंग सेक्टर के मेरुदंड हैं। ये बैंक अपने पूर्ण अंश पत्रों के विक्रय, जनता से प्राप्त जमा सुरक्षित कोष, अन्य बैंकों तथा केन्द्रीय बैंक से ऋण लेकर प्राप्त करते हैं और सरकारी प्रतिभूतियों, विनिमय पत्रों, बांड्स, तैयार माल अथवा अन्य प्रकार की तरल या चल सम्पत्ति की जमानत पर ऋण प्रदान करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक का इन पर नियंत्रण रहता है। राष्ट्रीयकरण से पूर्व इनका उद्देश्य तथा बैंकिंग प्रणाली थोड़ी अलग थी। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साथ बैंकिंग सेक्टर में आमूल चूल परिवर्तन हुए हैं। यह परिवर्तन ही बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मूल उद्देश्य था। अत: भारतीय बैंकिंग सिस्टम में 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घटना एक युग प्रवर्तक घटना मानी जाती है। 

19 जुलाई 1969 को, देश के 50 करोड़ रुपये से अधिक जमा राशि वाले, चौदह अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साथ ही, एक नयी आर्थिक नीति, जो प्रगतिशील अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर थी, की शुरुआत हुई। इसी के साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली मात्र लेन-देन, जमा या ऋण के माध्यम से केवल लाभ अर्जित करने वाला ही उद्योग न रहकर भारतीय समाज के गरीब, दलित तबकों के सामाजिक एवं आर्थिक पुनरुत्थान और आर्थिक रूप में उन्हें ऊंचा उठाने का एक सशक्त माध्यम बन गया। बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद इंदिरा गांधी को यह भरोसा था कि, बैंकिंग उद्योग राष्ट्र के लोक कल्याणकारी राज्य और जन विकास की दिशा में तेजी से अग्रसर होगा। राष्ट्रीयकरण के बाद इंदिरा गांधी ने कहा था कि 

“बैंकिंग प्रणाली जैसी संस्था, जो हजारों -लाखों लोगों तक पहुंचती है और जिसे लाखों लोगों तक पहुंचाना चाहिए, के पीछे आवश्यक रूप से कोई बड़ा सामाजिक उद्देश्य होना चाहिए जिससे वह प्रेरित हो और इन क्षेत्रों को चाहिए कि वह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं तथा उद्देश्यों को पूरा करने में अपना योगदान दें।”

राष्ट्रीयकरण से पूर्व सभी वाणिज्यिक बैंकों की अपनी अलग और स्वतंत्र नीतियां होती थीं और उनका उद्देश्य अधिकाधिक लाभ के मार्गों को प्रशस्त करने तक ही सीमित था जो स्वाभाविक ही माना जाना चाहिए क्योंकि इन बैंकों के अधिकतर शेयर-धारक कुछ इने-गिने पूंजीपति व्यक्ति थे जो अपने हितों की रक्षा के साथ निजी हितों को ही बैंकिंग सेवाओं एवं सुविधाओं का लाभ पहुंचाते थे। समाज के गरीब, कमजोर वर्ग, दलित तथा सामान्य ग्रामीण तबकों के लोगों को बैंक होता क्या है, इसका भी पता नहीं था। अत: वे दिन-प्रतिदिन सेठ-साहूकारों एवं महाजनों के सूद के नीचे इतने दब गए कि उनका जीवन एक त्रासदी की तरह बन गया था। 

भारत मूल रूप से एक कृषि आधारित आर्थिकी का देश है। आज भी तीन चौथाई आबादी ग्रामीण क्षेत्र में है। सड़़कों, बिजली, सिंचाई की काफी कुछ सुविधाओं के बावजूद, गांव, कृषि और मानसून पर ही देश की अर्थव्यवस्था निर्भर रहती है। खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता के बावजूद, अगर एक दो साल भी मानसून गड़बड़ा गया तो उसका सीधा असर देश के बजट पर पड़ता है। बैंक राष्ट्रीयकरण के पूर्व किसानों की स्थिति अपेक्षाकृत खराब थी और एक कटु सत्य यह था कि किसान कर्ज में ही जन्म लेता था, कर्ज में ही पलता था, और अपने पीछे कर्ज छोड़कर ही मर जाता था।

1942 के भयंकर दुर्भिक्ष और किसान जीवन पर लिखा तत्कालीन विपुल साहित्य से इसका अंदाज़ा लग सकता है। फलत: मिश्रित और प्रगतिशील अर्थव्यवस्था, तथा जमींदारी उन्मूलन जैसे भूमि सुधार कार्यक्रमों के बावजूद, पूंजीपति अधिक धनवान होते गए तथा निर्धन और भी गरीब बनते गए। देश में सामाजिक असंतुलन का संकट पैदा हो गया और इसके साथ ही, आर्थिक विषमता बढ़ने लगी। इससे सामाजिक तथा आर्थिक विकास की गति अवरुद्ध हो गयी और एक नई प्रगतिशील आर्थिक नीति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी । तब बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसा कदम तत्कालीन सरकार ने उठाया।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मूल उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली को देश के आर्थिक विकास में सक्रिय योगदान कराना था। मूल उद्देश्यों को संक्षेप में यहां आप पढ़ सकते हैं, 

● राष्ट्रीयकरण के पहले बैंकिंग सेवाएं कुछ पूंजीपतियों एवं बड़े व्यापारी और राजघरानों तक ही सीमित थीं जिससे आर्थिक विषमता बढ़ने लगी थी और, इस विषमता को दूर करने हेतु बैंकिंग सेवाओं एवं सुविधाओं का लाभ समाज में सभी वर्गों विशेषत: ग्रामीण कस्बाई क्षेत्रों में बसे कमजोर वर्गों तक पहुंचाने का मूल उद्देश्य बैंकों के राष्ट्रीयकरण में निहित है।

● बैंक राष्ट्रीयकरण के पहले देश में आर्थिक संकट उत्पन्न होने के कारण आर्थिक विकास की गति अवरुद्ध हो गई थी। अत: देश के आर्थिक विकास में तेजी लाने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जाना बहुत ही आवश्यक हो गया था क्योंकि किसी भी देश की प्रगति एवं खुशहाली के लिए उसके आर्थिक विकास की ही महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

● बैंक राष्ट्रीयकरण का तीसरा उद्देश्य था, देश में बेरोजगारी की समस्या और बैंकों के राष्ट्रीयकरण के माध्यम से इस समस्या का समाधान खोजना। क्योंकि शिक्षित बेरोजगारों को आर्थिक सहायता के माध्यम से उनके अपने निजी उद्योग या स्वरोजगार के अनेक साधनों में वृद्धि करके बेरोजगारी पर काबू पाया जा सकता था। 

● जब तक देश में बेरोजगारी की समस्या का उचित हल नहीं होता तब तक उसके विकास कार्य में तेजी नहीं आ सकती। इस तथ्य को दृष्टिगत रखकर बेरोजगारी उन्मूलन की दिशा में ठोस कदम उठाया जाना जरूरी हो गया था ताकि बैंकिंग सेवाओं तथा सहायता का लाभ शिक्षित बेरोजगारों को मिले और वे अपनी उन्नति के नए मार्ग खोज सकें।

● बैंक राष्ट्रीयकरण का एक उद्देश्य यह भी था कि, देश के कमजोर वर्ग तथा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के लोग अर्थात छोटे तथा मंझोले किसान, भूमिहीन मजदूर, शिक्षित बेरोजगार, छोटे कारीगर आदि की आर्थिक उन्नति हो। धन की अनुपलब्धता के कारण, समाज में यह वर्ग अलग-थलग था। अतः इनमें आत्मविश्वास पैदा करके उन्हें उन्नति एवं खुशहाली के मार्ग पर लाना देश की सर्वांगीण प्रगति के लिए बहुत आवश्यक था। समाज के आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत कमज़ोर लोगों का विकास, बैंकिंग सुविधा के माध्यम से संभव था अतः राष्ट्रीयकरण पर विचार किया गया। 

● बैंकों के राष्ट्रीयकरण का एक और मूल उद्देश्य था ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति में सुधार तथा कृषि एवं लघु उद्योगों के क्षेत्रों का समुचित प्रगति किया जाना। भारतीय किसान, ज़मींदारी उन्मूलन जैसे प्रगतिशील भूमि सुधार कार्यक्रम के बावजूद, उपेक्षित था, और वह गरीबी के पंक से उबर नहीं पाया था। 

● यही हालत कुटीर उद्योग एवं लघु उद्योगों की थी। ब्रिटिश उद्योग नीति ने स्वदेशी कुटीर और ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। यह सब कुटीर और ग्राम उद्योग, अधिकतर कृषि पर ही निर्भर थे और कृषि और कृषि का क्षेत्र उपेक्षित तथा अविकसित होने के कारण इन उद्योगों की भी प्रगति नहीं हो पा रही थी। इस प्रकार, कृषि एवं लघु उद्योग जैसे उपेक्षित क्षेत्रों की ओर उचित ध्यान देकर उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जाना राष्ट्र की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक तथा अनिवार्य हो गया था।

● देश के बीमार उद्योगों को पुनरूज्जीवित करके नए लघु-स्तरीय उद्योगों के नव निर्माण को बढ़ावा देना भी बैंकों के राष्ट्रीयकरण का एक उद्देश्य था। बीमार उद्योगों के कारण बेरोजगारी की समस्या में वृद्धि होकर आर्थिक मंदी फैलने का यह भी एक कारण था अत: ऐसे उद्योगों को आर्थिक सहायता देकर पुनरूज्जीवित करना आवश्यक था। 

● इसके साथ ही लघु-स्तरीय उद्योगों की संख्या पर्याप्त नहीं थी जिससे कस्बाई क्षेत्रों की प्रगति में तेजी नहीं आ पा रही थी। अत: देश की प्रगति के लिए लघु-स्तरीय उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना भी अत्यंत जरूरी था, जो कि आर्थिक सहायता के बगैर बेहद मुश्किल था। अत: बैंकों द्वारा आर्थिक नियोजन के लिए उन पर सरकार का स्वामित्व होना ज़रूरी था। अतः इन सामाजिक तथा आर्थिक उद्देश्यों के कारण बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया जिससे कि कमजोर एवं उपेक्षित वर्गों की उन्नति के साथ समाज और प्रकारांतर से राष्ट्र की प्रगति हो।

भारतीय बैंकिंग प्रणाली में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना भारत के कृषकों एवं पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन में क्रांतिकारी घटना मानी जा सकती है। क्योंकि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना के पीछे मूल उद्देश्य यही था कि, छोटे तथा मझोले स्तर के किसानों, भूमिहीन मजदूरों आदि को आसानी से बैंकिंग सेवाओं एवं सुविधाओं का लाभ पहुंचाया जाए तथा उन्हें लंबे समय से चले आ रहे, साहूकारों की जंजीरों से मुक्ति दिलाकर उनके अपने गौरव को, पुनरूज्जीवित करने की सहायता प्रदान की जाए। 

इन बैंकों की स्थापना क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अध्यादेश 1975 के अंतर्गत किया गया है। साथ ही स्थानीय जरूरतों को दृष्टिगत रखते हुए, अनुसूचित बैंकों को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना करने के लिए कहा गया। जिसके कारण, सभी वाणिज्यिक बैंकों ने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की और राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों और ग्रामीण बैंकों का नेटवर्क गांव-गांव तक फैल गया। नरेंद्र मोदी सरकार ने बैंकों को और अधिक जनता तक पहुंचाने के लिये जनधन योजना चलाई जिसका लाभ आम जन तक पहुंचा। 

लेकिन निजीकरण की राह भी सरकार के अनुसार उतनी निरापद नहीं है।  निजीकरण की राह में सबसे बड़ी बाधा बैड लोन बन सकता है। कोरोना आपदा के कारण, चालू वित्तवर्ष में बैड लोन का दबाव दूना हो जाने का अनुमान है। अतः यह प्रक्रिया अगले वित्तवर्ष में की जाएगी। आरबीआई के अनुसार, सितंबर 2019 तक सरकारी बैंकों पर 9.35 लाख करोड़ का बैड लोन था, जो उनकी कुल संपत्ति का 9.1 फीसदी है। ऐसे में हो सकता है कि इस साल सरकार को ही इन बैंकों की वित्तीय हालत सुधारने के लिए 20 अरब डॉलर (करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये) बैंकिंग सेक्टर में डालना पड़े। 

निजीकरण सरकार की अघोषित आर्थिक नीति बन गयी है। एयरपोर्ट, रेलवे, एयर इंडिया, आयुध फैक्ट्रियां, यहां तक कि बड़े सरकारी अस्पताल तक निजी क्षेत्रों में सौंपने का इरादा नीति आयोग कर चुका है। पर सरकार इस पर धीरे-धीरे चलना चाहती है। केंद्र सरकार एक के बाद एक निजीकरण के फैसले ले भी रही है। सरकार ने अब एलआईसी को छोड़ सभी सरकारी इंश्योरेंस कंपनियों को बेचने की तैयारी कर चुकी है।

सरकार का इरादा तो एलआईसी को लेकर भी साफ नहीं था और उसके भी कुछ अंशों को बेचने की बात उठी थी लेकिन जब विरोध हुआ तो सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिये हैं लेकिन यह वक़्ती रणनीति है, न कि, सरकार का हृदय परिवर्तन। न्यूज़ 18 की एक खबर के अनुसार, एलआईसी और एक नॉन लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को छोड़कर बाकी सभी इंश्योरेंस कंपनियों में सरकार अपनी पूरी हिस्सेदारी किस्तों में बेच सकती है। इस पर पीएमओ, वित्त मंत्रालय और नीति आयोग के बीच सहमति बन चुकी है साथ ही कैबिनेट ड्रॉफ्ट नोट भी तैयार हो चुका है।

अगर आप को लगता है यह निजीकरण कोरोनोत्तर अर्थव्यवस्था का परिणाम है तो यह बात बिल्कुल सही नहीं है। 2014 में जब सरकार सत्तारूढ़ हुई तो उसकी आर्थिक नीतियां निजीकरण की थी और यह सब एजेंडा पहले से ही तय है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार गैर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की थी और वर्तमान सरकार ने उस नीति को बदला है। कांग्रेस के पूंजीवादी आर्थिक सोच के बावजूद, कांग्रेस की मूल आर्थिक सोच समाजवादी झुकाव की ओर रही है ।

यह झुकाव जब नेताजी सुभाष बाबू ने आज़ादी के पहले, अपने अध्यक्ष के रूप में योजना आयोग की रूप रेखा रखी थी तब से था। कांग्रेस ने स्वाधीनता मिलने पर, तभी भूमि सुधार और अन्य समाजवादी कार्यक्रमों को लागू करने का मन बना लिया था। मिश्रित अर्थव्यवस्था, पंचवर्षीय योजना ज़मींदारी उन्मूलन और बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना उसी वैचारिक पीठिका का परिणाम था। लेकिन 1991 में इस आर्थिकी जिसे कोटा परमिट राज भी कहा जाता है, के कुछ दुष्परिणाम भी सामने आए तो खुली अर्थव्यवस्था को अपनाया गया। लेकिन इसके बावजूद भी सरकारी क्षेत्र मज़बूत बना रहा। 

2014 में सरकार की नीति बदली और सत्ता का जो रुप सामने आया वह पूंजीवाद की स्वस्थ प्रतियोगिता कहा जाने वाला न रह कर, कुछ चहेते पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने तक धीरे धीरे सिमटता चला गया। यह गिरोहबंद पूंजीवाद यानी क्रोनी कैपिटलिज़्म का रुप है।  केवल राजनीतिक सत्ता का ही केंद्रीकरण 2014 ई के बाद नहीं हुआ बल्कि इसी अवधि में पूंजीपतियों का भी केंद्रीकरण होने लगा। जानबूझकर सरकारी क्षेत्रों की बड़ी-बड़ी नवरत्न कंपनियों को भी चहेते पूंजीपतियों के हित लाभ और स्वार्थ पूर्ति के लिये, कमज़ोर किया गया ताकि वे स्वस्थ प्रतियोगिता में न शामिल हो सकें और चहेते पूंजीपतियों को अधिक से अधिक विस्तार करने का खुला मैदान मिल सके।

आज बीएसएनएल और ओएनजीसी जैसी लाभ कमाने वाली कम्पनियां, निजी क्षेत्र की, जिओ और रिलायंस के आगे नुकसान उठा रही हैं। इस प्रकार जब सरकारी उपक्रम कमज़ोर और संसाधन विहीन होने लगे तो उनको बोझ समझ कर उन्हें बेचने की बात की जाने लगी। यह एक विस्तृत विषय है जिस पर अलग से लिखा जायेगा। फिलहाल तो पचास साल पहले उठाया गया एक प्रगतिशील कदम आज फिर पीछे लौटाया जा रहा है। यह एक प्रतिगामी कदम है और समाज तथा इतिहास की प्रगतिशील धारा के विपरीत है। 

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

जलवायु सम्मेलन से बड़ी उम्मीदें

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का 26 वां सम्मेलन (सीओपी 26) ब्रिटेन के ग्लास्गो नगर में 31 अक्टूबर से...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.