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Categories: बीच बहस

हर लिहाज से गलत है सार्वजनिक संपत्तियों को बेचने का सरकार का फैसला

सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कई परिसंपत्तियों का निजीकरण करने का, सिवा व्यय के लिए स्रोत जुटाने के, और कोई कारण नहीं बताया है। हमें ऐसी वित्तीय रणनीति को समझना होगा।

कोई भी अपनी खपत में कमी करके सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियां नही खरीदता। अपने निवेश में कंजूसी करके भी कोई ऐसी परिसंपत्तियां नहीं खरीदता। आज कल निवेश के लिए खर्चा अतीत में लिए गए लगभग पूर्व निर्धारित फैसलों पर आधारित होता है। भविष्य में लाभ देने वाली किसी संपत्ति में निवेश करने पर वर्तमान में लिए जा रहे निर्णयों में ही कमी बेशी की जा सकती है। और वर्तमान में निवेश पर लिए गए निर्णयों में कमी करना इस बात का प्रमाण है कि लघु उपक्रमों को बंद किया जा रहा है। ऐसी स्थितियों से हर हाल में बचना चाहिए।

दरअसल ,सरकारी खर्चे के लिए सार्वजनिक परिसंपत्तियां बेचने की प्रक्रिया में निजी संसाधनों से कुछ नहीं मिलता। सार्वजनिक परिसंपत्तियों की बिक्री से सरकार को जो स्रोत प्राप्त होते हैं, दरअसल वे अर्थव्यवस्था ही में मौजूद स्रोत होते हैं जो निष्क्रिय अवस्था में होते हैं। ऐसी सुस्त क्षमता और अप्रयुक्त श्रम शक्ति के जरिए वह उत्पाद प्राप्त हो सकता था जो मांग के अभाव में संभव नहीं हुआ। पर अब सार्वजनिक परिसंपत्तियों के बल पर सरकारी व्यय शक्ति के सृजन से संभव हो गया है। इस सारी प्रक्रिया को इस तरह समझा जा सकता है। मान लीजिए सरकार बैंकों से 100 रुपए उधार लेती है और फिर इतना धन अर्जित करने के लिए 100 रुपए की कीमत की सार्वजनिक परिसंपत्तियां बेच देती है ताकि इसकी सकल कर्जदारी में कोई बढ़ोतरी न हो।

सरकार की क्रय शक्ति के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियां बेच देना बुनियादी तौर पर वित्तीय घाटे से किसी भी तरह अलग स्थिति नहीं है। दूसरे प्रकार के मामले में सरकार सीधे या परोक्ष रूप में बैंकों के जरिए  अपने बॉन्ड निजी क्षेत्र को सौंप देती है। दूसरी प्रकार के मामलों में सरकार अपने शेयर (जो कि सार्वजनिक क्षेत्रों की परिसंपत्तियों में होते हैं) निजी क्षेत्र के हवाले कर देती है। वित्तीय घाटे और सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों को बेचने में एकमात्र अंतर सरकारी कागजों पर की गई कार्यवाही का होता है। लेकिन मोटे तौर पर  आर्थिक नजरिए से देखने पर अर्थव्यवस्था पर वित्तीय घाटे के कारण हुए दुष्प्रभाव, सार्वजनिक परिसंपत्तियों के बेचने से हुए दुष्प्रभावों से अलग नहीं हैं। वित्तीय पूंजी और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएं इस तथ्य को नकारती हैं। और केवल वैचारिक, आर्थिक नहीं, कारणों से सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों की बिक्री को वित्तीय घाटे से अलग मानती हैं क्योंकि वैचारिक स्तर पर तो वे सार्वजनिक क्षेत्र को खत्म करने के पक्ष में हैं।

पूछा जा सकता है कि वित्तीय घाटे में बुरा क्या है। यह आम धारणा जैसा मामला तो नहीं ही है। मांगों में कमी के कारण उपजी स्थिति में, जब क्षमता काफी हद तक अप्रयुक्त रही हो और कामगार बेरोजगार हों, तो कोई भी सही आर्थिक नीति अपनाने का दुष्प्रभाव नहीं होगा। सिवा एक दुष्परिणाम के कि इस से समाज में अनुचित ढंग से आर्थिक विषमता बढ़ जाएगी। विदेशी क्रिया कलापों के नजरिए से कहें तो, एक वित्तीय घाटा किसी भी निजी निवेश को बिल्कुल उसी के समकक्ष अतिरिक्त निजी बचत का लाभ देता है। वित्तीय घाटे से चलाए सरकारी खर्चे से सकल मांगों में वृद्धि होती है जिसके कारण उत्पादन और आय में इजाफा होता रहता है  जब तक इस अतिरिक्त आय से हुई अतिरिक्त बचत ( निजी निवेश के होते हुए) वित्तीय घाटे के समकक्ष न पहुंच जाए। बचतकर्ता को अपनी खपत में कोई कमी किए बिना शुरुआती अवस्था (यानी सरकारी व्यय के बढ़ जाने) की तुलना में अधिक लाभ मिलता है क्योंकि यह बचत संपत्ति में वृद्धि करती है। तो स्पष्ट है कि धनवान (जो कि मूलतया बचतकर्ता ही है) की संपत्ति में गलत ढंग से और संपत्ति जुड़ जाती है। अगर सरकार यही व्यय करों द्वारा प्राप्त धन से करती तो निजी संपत्ति में कोई वृद्धि नहीं होती और आर्थिक असमानता भी नही बढ़ती।

इसीलिए वित्तीय घाटे से बचना जरूरी है। और इसी लिए वित्तीय घाटे पर आधारित सरकारी व्यय की बजाय कर पर आधारित सरकारी व्यय को तरजीह देनी चाहिए, तब भी जब शुरुआती स्थिति के मुकाबले इस तरह कर लगाने से न तो निजी खपत या निजी निवेश में कमी होती हो।

सार्वजनिक परिसंपत्तियों की बिक्री (जो वित्तीय घाटे जैसी ही होती है) भी बहुत अनुचित ढंग से आर्थिक असमानता बढ़ाती है। और इसके लिए सरकार निजी क्षेत्रों को अपने ऊपर दावेदारी की शक्ल में न केवल धन ही देती है, (जैसा कि वित्तीय घाटे के कारण होता है) बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों को निजी क्षेत्र को बेच देती है, आय के पूंजीगत मूल्य से भी कम दर पर क्योंकि अन्यथा निजी क्षेत्र के ग्राहक वह खरीदेंगे ही नहीं। वित्तीय घाटे के मामले में, निजी क्षेत्र की अतिरिक्त संपत्ति पर कर लगाने के बजाय, इसी तरह, वास्तव में सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों को निजी क्षेत्र को स्थानांतरित कर दिया जाता है। इस तरह आर्थिक असमानता दो कारणों से बढ़ जाती है। पहले, यह उसी तरह होता है जैसे वित्तीय घाटे की दशा में होता है। और दूसरे, इस प्रकार सार्वजनिक परिसंपत्तियां कम कीमत पर निजी हाथों को सौंप दी जाती हैं।

चलो, हम निजीकरण को रोकने के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों की नीतिगत भूमिका से जुड़े सवालों को छोड़ देते हैं : बहुराष्ट्रीय निगमों के तीसरी दुनिया के किसी देश पर दबाव डालने की सहज वृत्ति के मार्ग में एक अवरोधक बनना; (सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा) जनता के बहुस्तरीय अंश को कर्ज उपलब्ध करवाना जो अन्यथा हालत में संभव न होता (जिस कारण हरित क्रांति संभव हुई) इत्यादि। पर फिर भी सरकारी खर्च के हेतु धन जुटाने के लिए सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निजीकरण को एक खालिस नीति के रूप में अपनाया जाना ठीक नहीं लगता। या तो यह गलत आर्थिक नीतियों या आर्थिक असमानता बढ़ाने के लिए गलत नीतियों का निर्माण ही प्रदर्शित करता है।

लेकिन सरकार के पास और चारा क्या है। पहला तो स्पष्ट है ही, संपत्ति कर। बिना टैक्स के निजी संपत्ति में वृद्धि और वित्तीय घाटे की दशा में गलत तरीके से अर्जित की गई संपत्ति, प्रारंभिक दशा से ही निजी संपत्ति के कारण उपजी असमानता को बरकरार रखती है। कर लगाने से  यह असमानता और गहरी नहीं होगी। इसलिए इस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए, और इस से जुड़ी और बातों पर भी नहीं अर्थात लाभांशों पर और कर लगाने पर। यह दिलचस्प बात है कि जब अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की दौड़ में शामिल  एलिजाबेथ वारेन ने संपत्ति कर लगाने का सुझाव दिया तब 18 बड़े अरबपतियों ने इसका समर्थन किया था और अपने ऊपर और कर लगाए जाने की पेशकश की थी।

यदि सरकार संपत्ति या लाभ पर और अधिक कर लगाने की इच्छुक न हो तो वह राज्य सरकारों से सलाह करके ऐश्वर्य वाली वस्तुओं पर जीएसटी बढ़ा कर लगा सकती है। चलो मान लेते हैं कि कामकाजी जनता जो कमाती है वह खपा भी लेती है, और, जैसा विदेशों में होता है, अप्रत्यक्ष करों में की गई वृद्धि और सरकार द्वारा मैचिंग खर्च के बावजूद भी रोजगारों और उत्पादन की वृद्धि में कराधान से प्राप्त लाभों की दशा में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। इसलिए सरकारी खर्च चलाने के लिए  सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों को बेचना, अवांछनीय और गैर जरूरी, दोनों है।

( जेएनयू के प्रोफेसर प्रभात पटनायक द्वारा लिखा गया यह लेख इंडियन एक्सप्रेस से साभार लिया गया है। इसका हिंदी अनुवाद महावीर सरवर ने किया है।)

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This post was last modified on March 30, 2021 11:23 am

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