रेप पीड़िता से शादी का प्रस्ताव मामलाः चार हज़ार महिला अधिकार एक्टिविस्ट ने सीजेआई से पद छोड़ने को कहा

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आये दिन मीडिया में सुर्खियाँ रहती हैं कि एकतरफा प्रेम में ग्रस्त युवक ने कथित प्रेमिका पर तेजाब फेंका, लड़की द्वारा ठुकराए जाने पर आत्महत्या किया, लेकिन उसे यह नहीं मालूम की न्यायालय में रेप को शादी के जरिए सेटल करने का ट्रेंड चल रहा है। यानी प्रेमिका को पाने के लिए एक अदद रेप की जरूरत है जो कि पूरी तरह कानून के शासन के विरुद्ध है। इसका अर्थ यह भी है कि जो प्रत्यक्ष नहीं हो सकता उसे न्यायिक सेटलमेंट के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से किया जा सकता है।

गौरतलब है कि मुंबई हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने रेप के आरोपी जिस शख्स की अग्रिम जमानत को ठुकरा दिया था, उससे उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने जो सवाल किया, उसकी हर तरफ आलोचना हो रही है। रेपिस्ट ने औरंगाबाद पीठ के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी तो मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने उससे पूछा कि क्या वह रेप विक्टिम से शादी करने को तैयार है? अगर वह ऐसा करता है तो उसे जमानत मिल जाएगी और उसकी सरकारी नौकरी भी बची रहेगी। रेप के वक्त विक्टिम नाबालिग थी। आज की तारीख में आरोपी विवाहित है।

इस सवाल पर कई सवाल उठे। तीखी टिप्पणियां की गईं। यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय के अवकाशप्राप्त जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि दुर्भाग्य से जिस तरह से चीजों को देखा गया, उस हिसाब से यह एक बहुत पितृसत्तात्मक तरीके की की गई टिप्पणी है। इतना ही नहीं, यह लैंगिक असंवेदनशीलता भी है।

जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि मैं सिर्फ कल्पना कर रहा हूं। संभवतः यह तर्क दिया गया था कि वे प्रेम में थे और इसलिए उनके बीच यौन संबंध सहमित से बने थे। भले ही हम मान लें कि यदि आप किसी से पूछना चाहते हैं, तो आप महिला से पूछें कि क्या वह उससे शादी करने के लिए तैयार है? आप बलात्कारी से यह न पूछें कि क्या वह पीड़िता से शादी करने के लिए तैयार है? उसे तो बुलाया ही नहीं गया है और यह बहुत ही असंवेदनशील है। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि लेकिन यह नहीं कहा जाना चाहिए था। यह टिप्पणी जिस तरीके से की गई है… अदालतों को जेंडर पूर्वाग्रह और पितृसत्ता के उदाहरण स्थापित नहीं करने चाहिए।

आरोपी रेप विक्टिम से शादी कर ले, इस आधार पर रेप के मामलों में जमानत देना या एफआईआर को रद्द करना, स्वयं उच्चतम न्यायालय के आदेश के खिलाफ है, क्योंकि रेप जैसा अपराध सिर्फ किसी महिला के खिलाफ ही नहीं, पूरे समाज के खिलाफ है, इसीलिए इसे दो पक्षों के बीच सेटल नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, सर्वाइवर की रजामंदी थी या नहीं, इस सच्चाई का पता लगाना बहुत मुश्किल होता है।

इस तरह की प्रवृत्ति की आलोचना दिल्ली हाई कोर्ट और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट भी कर चुके हैं। इनका मत था कि अगर इसकी मंजूरी दी जाएगी तो आगे भी आरोपी रेप विक्टिम पर सेटेलमेंट करने के लिए दबाव डाल सकते हैं या उनके साथ जबरदस्ती कर सकते हैं,

लेकिन न्यायपालिका में आमतौर पर इसका ट्रेंड चल रहा है। उच्चतम न्यायालय की एक पीठ सेटलमेंट के आधार पर एक आरोपी की सजा कम कर चुकी है। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ जमानत दे चुकी है, ताकि आरोपी बीच-बचाव कर सके, चूंकि उसने इस बात का वादा किया था कि जब लड़की 18 साल की हो जाएगी तो वह उससे शादी कर लेगा।

उच्चतम न्यायालय पहले के कई फैसलों में कह चुका है कि रेप जैसे जघन्य अपराधों में, जिन्हें राज्य के खिलाफ अपराध माना जाता है, दो पक्षों के बीच सुलह होने के बावजूद क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन पर कोई असर नहीं होता। इसके बाद भी गुजरात हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़कियों के रेप और फिर उनसे शादी करने के दो मामलों में एफआईआर को रद्द कर दिया।

अधिकांश मामलों में न्यायधीशों ने बलात्कारियों से यही पूछा है कि क्या वे उस औरत से शादी करना चाहेंगे, जिसका रेप हुआ है, जैसा कि चीफ जस्टिस ने भी पूछा, लेकिन अभी तक यह नहीं देखने सुनने को मिला कि रेप विक्टिम से अदालत ने पूछा हो कि उसकी आत्मा को लहूलुहान करने वाले रेपिस्ट से वह शादी करना चाहती है या नहीं?

ज्यादातर मामलों में देखने को मिलता है कि सेटलमेंट करते समय रेप विक्टिम की राय नहीं पूछी जाती। चाहे जातिगत पंचायतें हों या अदालतें, वे आरोपी से पूछती हैं कि क्या वह रेप विक्टिम से शादी को तैयार है। अगर रेप विक्टिम से भी पूछा जाएगा तो सिक्के का दूसरा पहलू भी दिखाई देगा।

क्रिमिनल कानून संशोधन 2018 में रेप विक्टिम की मौजूदगी जरूरी है, लेकिन इसे अमल में नहीं लाया जाता। दिल्ली हाई कोर्ट ने यह गौर किया था कि इस संशोधन से संबंधित दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा। तब उसने यह दिशा निर्देश दिए थे कि रेप विक्टिम या उसका प्रतिनिधि जमानत की सुनवाई के दौरान जरूर मौजूद होना चाहिए। हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में बेंच को ज्यादा संवेदनशील होना चाहिए और रेप विक्टिम  को अग्रिम जमानत के समय भी मौजूद होना चाहिए।

बलात्कार के अपराध पर शादी का उच्चतम न्यायालय का सुझाव इसलिए भी गलत है कि जब न्यायपालिका बलात्कार के इंसाफ़ के लिए शादी का रास्ता सुझाती है, तो एक बार फिर बलात्कार को हिंसा की नहीं, बल्कि समाज में इज़्ज़त लुटने की नज़र से देखा जाता है और बलात्कार जैसे हिंसक अपराध से औरत को हुई शारीरिक और मानसिक पीड़ा को दरकिनार कर दिया जाता है। यही नहीं बलात्कार को आम मान लिया जाता है, मानो उसके लिए सज़ा अनिवार्य ही न हो। जब ये सुझाव सबसे ऊँची अदालत के सबसे ऊँचे न्यायाधीश से आता है, तो इसका असर और व्यापक हो जाता है। दरअसल ऐसा सुझाव देना ही पीड़िता की तौहीन है, उसके साथ हुई हिंसा को अनदेखा करना है, अमानवीय बर्ताव है।

चार हज़ार से अधिक महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, प्रगतिशील समूहों और नागरिकों ने सीजेआई एसए बोबडे से पद छोड़ने की मांग करते हुए कहा कि उनके शब्द अदालत की गरिमा पर दाग़ लगा रहे हैं और उस चुप्पी को बढ़ावा दे रहे हैं जिसे तोड़ने के लिए महिलाओं ने कई दशकों तक संघर्ष किया है।

इस पत्र पर कई जानी-मानी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें एनी राजा, मरियम धवले, कविता कृष्णन, कमला भसीन, मीरा संघमित्रा, अरुंधति धुरु आदि शामिल हैं। इसके साथ ही महिला संगठन- ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमेन एसोसिएशन, ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वूमेन एसोसिएशन, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमन, वूमेन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन, फोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ वूमेन, बेबाक कलेक्टिव, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन, दलित वूमेंस फाइट, बासो, थिट्स, विमेन एंड ट्रांसजेंडर आर्गेनाईजेशन जॉइंट एक्शन कमेटी आदि और विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले सचेत नागरिक जैसे एडमिरल रामदास, अरुणा रॉय, निखिल डे, आनंद सहाय, देवकी जैन, जॉन दयाल, लक्ष्मी मूर्ति, अपूर्वानंद, फराह नकवी, आयशा किदवई आदि शामिल हैं।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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