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Categories: बीच बहस

गाली सहनी पड़ती है, जब संविधान के रक्षक रंग और दीन के आधार पर बंटवारा करने लगें

मेरठ के एडिशनल एएसपी अखिलेश नारायण सिंह का एक वीडियो देखा। इस वीडियो में वे दो तीन लोगों को पाकिस्तान भेजने की बात कर रहे हैं। एक बुजुर्ग चुपचाप सुन रहे हैं। कहीं पढ़ा कि एएसपी साहब ने कहा है कि लड़के पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे। ऐसा कोई वीडियो तो नहीं है और नहीं भी है तो शूट हो जाएगा। इसमें कौन सी बड़ी बात है, लेकिन जब लड़के कथित रूप से नारा लगा रहे थे तो गाली गली के बुजुर्ग क्यों सुन रहे थे? क्या यह कोई नया क़ानून है?

आप वीडियो में गाली सुनते बुजुर्गों की शालीनता देखिए। गाली सहनी पड़ती है। जब संविधान के रक्षक रंग और दीन के आधार पर बंटवारा करने लगें तो सहना पड़ता है। यह दृश्य किसी हथियारबंद एएसपी के ग़ुस्ताख़ ज़ुबान का नहीं है, बल्कि किसी समुदाय के संविधान की किताब से बेदख़ल हो जाने का है।

हमारे समाज की जो सच्चाई है वहीं पुलिस की भी है। यहां किसी समाज के खान-पान, पहनावा, मोहल्ला, जाति और मज़हब को लेकर कितनी दीवारें हैं। उन दीवारों की हर ईंट नफ़रत और नासमझी से जुड़ी है। हमारे बाप अपने बच्चों को यही सब तो देते हैं। इस सोच से कोई नहीं लड़ता। हर किसी के भीतर यह वायरस घूम रहा है। यह वायरस कभी डेंगू फैलाता है तो कभी मलेरिया।

मेरी राय में एएसपी अखिलेश नारायण सिंह भारतीय पुलिस का ईमानदार चेहरा हैं। वीडियो में उनके चेहरे पर ईमानदारी साफ़ दिखती है। जैसा सोचते होंगे वैसा बोलते नज़र आए। उनके साथ एक और अफ़सर जो उनसे लंबे क़द के दिख रहे हैं वो ऐसी बात नहीं करते हैं। इस दौरान जो यूपी पुलिस कर रही है वही तो एडिशनल एसपी साहब बोल रहे थे।

फिर भी कहूंगा कि एएसपी अखिलेश नारायण सिंह की इस बात को लेकर गिला शिकवा मत रखिए। उन्हें आपके प्यार की ज़रूरत है। उन्हें प्यार दीजिए। उनके बैच के लोगों को कितना गर्व हुआ होगा कि बैचमेट का वीडियो वायरल है। मैं यकीनन कह सकता हूं कि पूरे बैच में कोई भी ऐसा नहीं होगा जो कहने की हिम्मत जुटा पाएगा कि यार ग़लत बोला आपने। बल्कि बैच के व्हाट्सऐप ग्रुप में बधाई  मिल रही होगी, इसलिए आप भी बधाई दीजिए। उन्हें पत्र लिखिए कि मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की बात कह कर आपने सांप्रदायिकता का सर ऊंचा किया है।

वे PCS हैं। IPS भी हो जाएंगे। आगे बहुत से बड़े पदों पर जाएंगे। बहुत से लोगों का काम पड़ता रहेगा, इसलिए उनके आसपास का सामाजिक नेटवर्क बड़ा और भव्य बना ही रहेगा। उन्हें ऐसा करके कोई नुक़सान नहीं होगा। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा सुरक्षित रहेगी, इसलिए अपना बिगाड़ मत कीजिए। यही तो अफ़सर होने की प्रासंगिकता है।

भारत की पुलिस फ़र्ज़ी मुक़दमों में अंदर कर देने और ठोक देने के लिए जानी जाती है। कोई अफ़सर इसे बदलने नहीं आता बल्कि इसे जीने आता है। इसका सुख भोगने आता है। कोर्ट की जो हालत है आप ज़िंदगी भर केस लड़ते रह जाएंगे और एएसपी साहब डीजीपी बनकर राजभवन पहुंच जाएंगे।

एएसपी अखिलेश नारायण सिंह ने चक दे इंडिया देखी होगी। कालेज में होंगे जब यह फ़िल्म आई होगी। उन्हें यह फ़िल्म फिर से देखनी चाहिए। उन्हें पता चलेगा कि जब कबीर ख़ान अपनी मां के साथ मोहल्ला छोड़ कर जा रहा है तब वे बाहर खड़े नज़र आ रहे हैं। उन लोगों के साथ जिन्होंने कबीर ख़ान को ग़द्दार कहा था, लेकिन कबीर ख़ान उसी मोहल्ले में लौट कर आता है और अपनी हॉकी की स्टिक एक दूसरे अल्पसंख्यक समाज के बच्चे को दे देता है। मोहल्ले वाले तब भी खड़े थे। बस पहले गाली दे रहे थे और अब ताली बजा रहे थे।

हर दौर में कोई कबीर ख़ान होगा और हर दौर में कोई एएसपी अखिलेश नारायण सिंह, इसलिए इससे कोई आहत न हो। अंतरात्मा पर भरोसा करना चाहिए। मुझे अखिलेश सिंह की अंतरात्मा पर भरोसा है और इस गाने की ख़ूबसूरती पर भी, इसलिए चक दे इंडिया का अपना एक पसंदीदा गाना भेजना चाहता हूं।

आज जब बहुत से लोग एएसपी अखिलेश नारायण सिंह को कोस रहे हैं, मैं उन्हें यह गाना भेज रहा हूं। मैं उनकी जगह होता तो इस गाने को सुनने के बाद उसी गली में जाता और जिस बुजुर्ग को पाकिस्तान भेजने की गाली दी थी, उनसे माफ़ी मांग कर आता, ताकि मेरा नाम उन मोहल्ले वालों की क़तार से कट जाता जो एक मैच हारने पर एक खिलाड़ी की देशभक्ति और मज़हब पर शक करते हैं।

मुझे पता है यह सब मुमकिन नहीं है, लेकिन मैं इसी दौरान एएसपी अखिलेश नारायण सिंह के घर चाय पीने जाना चाहता हूं। इस वादे के साथ इस वीडियो पर बिल्कुल बात नहीं करूंगा। सिर्फ़ चाय पीऊंगा। कई बार चुप रहकर किसी से मिलना चाहिए। मुल्क का मुस्तकबिल महफ़ूज़ है या नहीं इसे अपनी आंखों से देख आना चाहिए।

गाना सुनिए।

This post was last modified on December 29, 2019 4:36 pm

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