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Categories: बीच बहस

सरकार और संघ के लिए गहरी मायूसी, सीएए-एनआरसी पर सत्ताधारी खेमे की ‘हिन्दू-मुस्लिम’ कराने की योजना पंचर

सत्ताधारी दल, आईटी सेल और अन्य अफवाहबाज संगठनों की एक बड़ी मुहिम 19 दिसंबर को पंचर हो गई। पिछले कई दिनों से वे CAA-NRC विरोध को सिर्फ मुस्लिम-समुदाय के विरोध के रूप में प्रचारित कर रहे थे! पर 19 दिसंबर के राष्ट्रव्यापी-विरोध प्रदर्शनों और सर्वजन-गोलबंदी ने साबित कर दिया कि सरकार के इस राष्ट्र-विरोधी कदम का पूरे देश में व्यापक विरोध हो रहा है!

दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु, कोच्चि, गुवहाटी, कोलकाता, अहमदाबाद, हैदराबाद, पटना, इलाहाबाद और चेन्नई सहित देश के हर प्रमुख राज्य के हर प्रमुख शहर, यहां तक कि छोटे-मझोले कस्बों में भी गुरुवार को जिस तरह नागरिकता संशोधन कानून-एनआरसी की खतरनाक जोड़ी के खिलाफ लोगों ने मिल जुलकर प्रदर्शन किया, वह बेमिसाल है।

ऐसा हाल के वर्षों में शायद कभी नहीं देखा गया। इन प्रदर्शनों में हिन्दू समुदाय की हर जात-बिरादरी के लोगों की बेहिसाब हिस्सेदारी आज सचमुच सत्ताधारी दल के लिए चिंता का सबब बन गई। इसका ठोस संकेत कुछ ‘कड़ियल’ केंद्रीय मंत्रियों की विनम्रता भरी टिप्पणियों से मिला। पत्रकारों के सवालों के जवाब मे उनका रवैया आज बहुत रक्षात्मक था।

इस घटनाक्रम से एक बात तो साफ हो गई कि देश के आम लोगों को भी समझ में आ गया है कि CAA-NRC हर समुदाय के खिलाफ है और यह भाजपा सरकार का एक ऐसा एजेंडा है, जिसके जरिए वह अपनी तमाम शासकीय-विफलताओं से लोगों का ध्यान हटाने का रास्ता खोज रही है! असम में एनआरसी पर सरकारी खजाने का 1600 करोड़ रुपये खर्च करने, असम की संपूर्ण आबादी को बेहिसाब कष्ट देने और दर्जनों लोगों की जिंदगी लेने के बावजूद इस सरकारी-अभियान से कुछ भी नहीं निकला।

कुल 3.3 करोड़ की असमिया आबादी में 19 लाख लोग अपनी नागरिकता की पुष्टि के लिए मांगे आधिकारिक सबूत नहीं पेश कर सके। सत्ताधारी दल अंदाजा लगा रहा था कि इसमें ज्यादा से ज्यादा मुसलमान निकलेंगे, जिसका वह बीते दो-तीन दशक से लगातार प्रचार करता रहा है और जिसके बूते वह राज्य की सत्ता में आया। पर भाजपा को वहां मायूसी हाथ लगी। 19 लाख लोगों में सर्वाधिक हिन्दू या गैर-मुस्लिम निकल गए। इस तरह सारे 19 लाख लोगों को डिटेंशन सेंटर में भला वह कैसे डालता?

ऐसा लगता है कि शेष भारत के लोगों ने असम में भाजपा के झूठ-फरेब और एनआरसी की विफलता की कहानी से काफी कुछ समझा। लोगों तक इस तरह की जरूरी सूचना पहुंचाने में इस बार सिविल सोसायटी, न्यूज वेबसाइटों और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स की अहम भूमिका रही। बंदिशों के बावजूद सड़कों पर समाजः नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ गुरुवार के देश व्यापी प्रतिरोध प्रदर्शन किसी बड़ी पार्टी की पहल पर नहीं हुए। इसके पीछे आम लोग रहे। सिविल सोसायटी, जनसंगठन, ट्रेड यूनियन, छात्रसंघ और आम युवक-युवतियां रहे!

हाल के दिनों में जामिया-एएमयू और अन्य संस्थानों में जिस तरह पुलिस और प्रशासन ने जुल्म ढाए, उसे हर संजीदा भारतवासी ने खारिज किया। भाजपा-संघ परिवारी संगठनों के अलावा किसी ने भी दमन-उत्पीड़न के उन जघन्य तौर-तरीकों को पसंद नहीं किया। मजबूरी हो या हालात का दबाव, ‘गोदी मीडिया’ कहे जाने वाले न्यूज चैनलों को भी ऐसे घटनाक्रमों को किसी न किसी रूप में थोड़ा-बहुत दिखाना पड़ा।

छात्र-युवाओं ने भी अपने-अपने स्तर पर वीडियो बनाकर दमन-उत्पीड़न की उन भयावह तस्वीरों को जनता के सामने पेश किया। इन सबने महंगाई, बेरोजगारी और अन्य समस्याओं से जूझते समाज के मानस को थोड़ा-बहुत जरूर प्रभावित किया। मोदी-शाह की ‘चाणक्यबाजी’ यहां बेअसर दिखी!

गुरुवार की जन-गोलबंदी चमत्कृत करने वाली थी। तमाम तरह की गैरकानूनी बंदिशों, अवैध गिरफ्तारियों और हिरासतों के बावजूद देश में हर समुदाय-हर बिरादरी के लाखों लोग सड़कों पर उतर पड़े! राष्ट्रीय राजधानी के अनेक क्षेत्रों में इंटरनेट, मोबाइल सेवा और मेट्रो सेवाएं बंद रखी गईं! पर कड़ाके की ठंड में दिल्ली के हर इलाके से लोगों का लाल किले, मंडी हाउस या जंतर मंतर की तरफ कूच करना जारी रहा।

हरियाणा और यूपी जैसे पड़ोसी राज्यों से दिल्ली को जोड़ने वाले कई राजमार्गों पर घंटों का जाम रहा। कई क्षेत्रों में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं ठप्प करने का औचित्य मुझे समझ में नहीं आया! यह समझना भी मुश्किल है कि सरकार ने 19 दिसंबर के पूर्व घोषित प्रदर्शनों पर पाबंदी क्यों लगाई? लोकतांत्रिक ढंग से विरोध प्रदर्शन पर पाबंदी लगाने का क्या औचित्य था?

लोगों के सवालः मोदी सरकार पूरे देश का हाल कश्मीर जैसा कर रही! अगस्त महीने में हमारी ‘अति-राष्ट्रवादी’ सरकार ने दावा किया था कि संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करके उसने कश्मीर समस्या का समाधान कर दिया, लेकिन विडंबना देखिए, महज साढ़े तीन महीने बाद आज शेष भारत के लोगों के बीच से हर शहर-हर कस्बे से आवाज आ रही है-मोदी सरकार ने पूरे देश का हाल कश्मीर जैसा कर दिया है! जिस तरह दिल्ली सहित देश के कई राज्यों-कई शहरों में इंटरनेट-मोबाइल और मेट्रो सेवाएं रोकी गईं, उससे लोगों को पूरे देश पर कश्मीर की छाया मंडराती नजर आई। कश्मीर में लगभग 140 दिनों से इंटरनेट लगभग गायब है।

अपने देश में आज भी लोग दमन-उत्पीड़न के लिए इमरजेंसी के दिनों को याद करते हैं। पर मुझे तो मौजूदा माहौल ‘इमरजेंसी’ का भी ‘बाप’ नजर आ रहा है! पर यह बात सही है कि ‘इमरजेंसी’ के खिलाफ आठवें दशक में जितना जन-प्रतिरोध था, आज की ‘इमरजेंसी’ का उससे कहीं ज्यादा विरोध है। देश में शायद ही कोई प्रदेश हो जहां नागरिकता कानून-एनआरसी का विरोध नहीं हो रहा है!

लखनऊ का सच सामने आना चाहिए। देश के कुछ हिस्सों, ख़ासकर लखनऊ से आगजनी, तोड़फोड़ और टकराव की खबरें आईं। इस तरह की घटना की पारदर्शी और विश्वसनीय जांच होनी चाहिए ताकि जिम्मेदार तत्वों के खिलाफ कार्रवाई हो सके! अजीब संयोग है, CAB-NRC विरोधी प्रदर्शनों के दौरान आज उन्हीं राज्यों में आगजनी और तोड़फोड़ की ज्यादा घटनाएं हुईं, जहां CAB-NRC को लाने वाली पार्टी का शासन है!

न्यूज चैनलों के सीधे प्रसारण के जरिए यूपी में जिस तरह की तोड़-फोड़ और आगजनी के दृश्य हमने देखे, उसकी जितनी निंदा की जाए, वह कम होगी! हम समझते हैं, इस बात की पड़ताल होनी चाहिए कि इस तरह की कार्रवाई किन लोगों ने की? इस बात की शिनाख्त होनी चाहिए कि वे किस पृष्ठभूमि या सोच के लोग थे और वहां कैसे आए? लखनऊ के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत में कहा कि तोड़-फोड़ और आगजनी के चलते ही वास्तविक प्रदर्शनकारियों को उस इलाके से हटना पड़ा। फिर वे मायूस होकर अपने-अपने घरों को लौट गए। फिर यह हिंसा कैसे और किन लोगों द्वारा की गई?

उक्त असामाजिक तत्वों को यूपी की अति-सक्षम और प्रशिक्षित पुलिस समय रहते रोकने में क्यों और कैसे नाकाम रही? वे शरारती तत्व जो भी हों, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए! ऐसे में एक पारदर्शी और विश्वसनीय जांच जरूरी है!

देश के अनेक राज्यों में धारा 144 क्यों? सरकार का कोई जिम्मेदार नेता या प्रवक्ता क्या बता सकता है कि दिल्ली और कर्नाटक सहित देश भर से गणमान्य बौद्धिकों, राजनीतिक व्यक्तियों और हजारों छात्र-युवाओं को क्यों हिरासत में लिया गया? दिल्ली में प्रशांत भूषण, संदीप दीक्षित, सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, वृंदा करात, सुचेता डे, डी राजा, योगेंद्र यादव, उमर खालिद, हर्ष मंदर और नदीम खां समेत अनेक लोगों को हिरासत में लिया गया। बंगलुरु में इतिहासकार रामचंद्र गुहा को पुलिस ने यूं हिरासत में लिया, मानो वह कोई खतरनाक अपराधी हों।

देश के अन्य राज्यों से भी प्रदर्शनकारियों के हिरासत में लेने की खबरें आ रही हैं। यूपी में तो अनेक प्रतिष्ठित लोगों को नजरबंद तक किया गया! बिल्कुल ‘कश्मीर-स्टाइल’! इनमें यूपी पुलिस के पूर्व आईजी और मानवाधिकार कार्यकर्ता एसआर दारापुरी भी शामिल रहे।

कोई बताएगा, ऐसा क्यों किया गया? अगर शासन का जवाब है कि ये लोग सड़क पर क्यों आए या क्यों जाना चाहते थे, सड़कों पर धारा-144 लागू थी! इस जवाब के बाद मेरा अगला सवाल होगा: सड़कों पर धारा-144 क्यों लगाई गई? आखिर विरोध-प्रदर्शन पर पाबंदी क्यों? रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खां और रोशन सिंह जैसे स्वाधीनता सेनानियों के शहादत-दिवस पर स्वतंत्र भारत की सरकार का यह निरंकुशता-प्रदर्शन क्यों?

क्या मौजूदा सरकार और सत्ताधारी दल को ‘सांझी शहादत, सांझी विरासत और सांझी नागरिकता’ में यकीन नहीं? लोगों को विरोध-प्रदर्शन के अधिकार से वंचित करने के लिए ही एक समय इमरजेंसी लगाई गई थी! यकीनन यह इमरजेंसी है बल्कि उससे भी ज्यादा कुछ है, क्योंकि इसके तहत संविधान के सिर्फ एक प्रावधान का दुरुपयोग ही नहीं किया जा रहा, समूचे संविधान को उल्टा लटकाया जा रहा है! यही कारण है कि लोग आज इसे संविधान और देश बचाने की लड़ाई मान रहे हैं।…और यह सच है।

(उर्मिलेश राज्य सभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक रहे हैं। और मौजूदा समय में पत्रकारिता और बौद्धिक जगत के सबसे प्रतिष्ठित चेहरों में से एक हैं।)

This post was last modified on December 20, 2019 1:16 pm

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