Sunday, October 17, 2021

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ताली, थाली, घण्टी और शंखनाद का मनोविज्ञान

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बात सिर्फ़ अंधभक्तों की ही नहीं है। अंधभक्तों की आंखों पर तो पट्टियां बंधी ही हुई हैं लेकिन आज राष्ट्रपति, डॉक्टर्स, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर्स, मंत्री, संतरी, टीचर्स, और अन्य पढ़े-लिखे तबक़े सभी को आज थाली, ताली, घण्टी और शंख बजाते देखकर बहुत हैरानी हुई । इसके इलावा राजनेताओं के तमाशे और मदारीगिरी भी चर्चाओं में हैं । राजनेताओं द्वारा गो कोरोना गो जैसे मंत्र, धर्माचार्यों द्वारा आयोजित की जा रही गोमूत्र पार्टी और गोबर-स्नान जैसे तमाशे चल ही रहे हैं । ऐसा लगा जैसे कि घरों के बाहर, बालकनियों और सड़कों पर थाली, घण्टी, शंख और ताली बजाते हुए इन झुंडों ने अपनी बुद्धि को राजनेताओं के यहां गिरवी रख दिया हो ।

इस तमाशे में कहीं भी डॉक्टर्स या उन लोगों के प्रति जो कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे है, अनुग्रह का भाव कहीं भी दिखाई दिया हो ऐसा लगा नहीं। बल्कि इस भीड़ में एक सामूहिक अंधविश्वास और पाखण्ड का उन्माद और चालाक और शोषक राजनेताओं के प्रति समर्थन का भाव ही देखा गया। यह आयोजन सोशल डिस्टेंसिंग के लिए किया गया था जो ठीक ही था लेकिन अधिकांश जगहों पर ये भीड़ घण्टियाँ, थाली, शंख लेकर ऐसे निकल आई जैसे कि कोई प्राकृतिक आपदा न होकर कोई धार्मिक उत्सव या राजनैतिक रैली हो । राजनेताओं और इस भीड़ के इन करतबों का कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ क्या संबंध हो सकता है ये तो राजनेता, धर्मगुरु और थाली-घण्टी बजाने वाली भीड़ ही जाने लेकिन उनके दिमाग में कितना भूसा भरा है यह आज और भी स्पष्ट तौर पर दिखाई पड़ गया।

स्पष्टतः यह जनता नहीं, भीड़ है और भीड़ भेड़ों की होती है और राजनेता इस भीड़ का नेतृत्व करते हैं । इन्हीं राजनेताओं के एक इशारे पर यह भीड़ खाई-खड्ड में भी गिरने को आसानी से तैयार हो जाती है । इस भीड़ का चरित्र मूलतः हिंसक और विध्वंसकारी होता है क्योंकि हिंसा और विध्वंस की जिम्मेदारी व्यक्ति पर न होकर भीड़ पर होती है और भीड़ की न कोई निजता होती है और न व्यक्तित्व । भीड़ तो हिंसक और विध्वंसकारी लोगों का जोड़ होता है  और हिंसा और विनाश के बाद यह जोड़ विसर्जित हो जाता है । यही भीड़ का चरित्र है । राजनेताओं के आह्वान पर घण्टी, थाली और शंख लेकर सड़कों पर उतरी भीड़ यह भी नहीं जानती कि कोरोना जैसा विध्वंसक वायरस इसी भीड़ के माध्यम से संक्रमित होकर भयानक तबाही मचा सकता है ।

यही भीड़ इस भयानक वायरस का बल है । लेकिन इस भीड़ को न बेरोज़गारी से मतलब है, न महंगाई से, न शिक्षा से, न गिरते रुपये से, न पेट्रोल के बढ़ते दामों से, न गिरती अर्थव्यवस्था से । यह भीड़ राममंदिर के फ़ैसले पर फिदा है, राष्ट्रवाद के उन्माद में डूबी है । इस भीड़ के सामूहिक अवचेतन में आस्था, धर्म और संस्कार के नाम पर सदियों से घण्टे-घड़ियाल, ताली, थाली, शंख, मंदिर-मस्जिद, जाति और वर्ण से संबंधित विचार सांप-बिच्छू की तरह छुपकर बैठे हैं । चालाक राजनेता ये हक़ीक़त अच्छी तरह से जानते हैं । इसीलिए मौक़ा मिलते ही ये राजनेता इस भीड़ की इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने से बाज़ नहीं आते और इन राजनेताओं की एक आवाज़ पर ये सांप-बिच्छू हिंसा का तांडव मचाने के लिए सड़कों पर मौजूद हो जाते हैं ।

इस भीड़ के पास आस्था और संस्कार के नाम पर मंदिर-मस्जिद, घण्टे-घड़ियाल और शंख इत्यादि ही रह गए प्रतीत होते हैं और कुछ नहीं । इस भीड़ के सामूहिक अचेतन में सदियों से घर कर गई और पुरखों से विरासत में मिलीं मात्र संस्कार, परम्पराएं और पूर्वाग्रह से ग्रस्त धर्म सम्बन्धी धारणाएं ही हैं । ये संस्कार, परम्पराएं और कुछ नहीं बल्कि मनुष्य की व्यक्तिगत और सामूहिक आदतें हैं । पूजापाठ या मंदिर, मस्जिद जाने का धर्म या धार्मिकता से दूर का भी कोई संबंध नहीं है । ये सिर्फ़ आदतें हैं लेकिन इन आदतों को ही संस्कार, परंपरा और आस्था और न जाने कैसे अच्छे-अच्छे नाम दिए गए हैं । लेकिन आदतें अच्छी हों या बुरी ये मूर्छित चित्त का ही हिस्सा होती हैं और मूर्छित चित्त में स्वविवेक का कोई स्थान नहीं होता ।

स्वविवेक न हो तो भीड़ आंखों पर पट्टी बांधकर दूसरों से प्रभावित होकर उनका अनुगमन करने को हर वक्त तैयार रहती है । जागरूक चित्त में स्वविवेक मौजूद होता है । इसीलिए जागरूक चित्त वाला व्यक्ति या समूह न तो किसी से प्रभावित होता है और न ही किसी का अनुसरण करने को तैयार हो सकता है । उसका अपना विवेक ही उसका मार्गदर्शन करता है इसीलिए उसका किसी भी राजनेता, राजनीतिक दल, सामाजिक या धार्मिक व्यक्ति या संस्था द्वारा इस्तेमाल किया जाना लगभग असंभव ही होता है । स्वविवेक से परिपूर्ण लोगों के इसी समूह को हम जनता कह सकते हैं । जनता में निजी जिम्मेदारियों और उत्तरदायित्व के भाव के साथ सामूहिकता का बोध भी मौजूद होता है । लेकिन स्वयं को धार्मिक प्रकट करने के लिए ये चालक राजनेता और जड़ बुद्धि लोगों के समूह अकसर आस्था की बड़ी दुहाई देते हैं । लेकिन आस्था तो चित्त की आत्यंतिक चेतन अवस्था में ही प्रकट हो सकती है । और आस्था तो समस्त जगत के प्रति अनुग्रह का भाव है ।

हिन्दू आस्था या मुस्लिम आस्था जैसी कोई चीज़ नहीं होती । आस्था अगर होती भी है तो वह अखंडित ही हो सकती है । ये सब खंडित आस्थाएं धर्म और आस्था के नाम पर राजनीतियों के ही छद्म रूप हैं । इसीलिए विवेकशील व्यक्ति या समूह घण्टे-घड़ियाल, ताली, थाली या शंख जैसे तमाशों में यक़ीन नहीं करता बल्कि वह तो तर्क, विज्ञान और अपने विवेक में यक़ीन करता है । चित्त की चैतन्य अवस्था में घण्टे-घड़ियाल, मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुसलमान ऐसे ही गायब हो जाते हैं जैसे प्रकाश के उपस्थित होने पर अंधकार गायब हो जाता है । जनता तो बोधपूर्ण लोगों के समूह को ही कहा जा सकता है और ऐसी जनता में हिंसा और उन्माद नहीं बल्कि विज्ञान, तर्क, विचार, और स्वविवेक का सतत प्रवाह मौजूद होता है । इसीलिए उसे ताली, थाली, घण्टी और शंख बजाने जैसी बेवकूफियां करने के लिए सड़कों पर नहीं लाया जा सकता ।

जनता और भीड़ में यही फ़र्क है । भारत में राजनेताओं को ऐसी भीड़ की दरकार होती है जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी हो और चित्त बोधशून्य हो ताकि वो उनके एक इशारे पर खाई-खड्ड में भी कूदने को तैयार हो जाये । दरअसल, भारत का व्यक्तिगत और सामूहिक चित्त कभी भी विज्ञान पर आधारित नहीं रहा है । अध्यात्म या धर्म के नाम पर भारतीय चित्त का मनोविज्ञान इन्हीं अंधविश्वसों पर ही आधारित रहा है और आज भी स्थिति जस की तस ही दिखाई देती है । इसमें अनपढ़, पढे-लिखे, अमीर-ग़रीब सभी समान रूप से शामिल हैं । इसी का मुज़ाहिरा उस दिन फिर देखने को मिला । इसी भीड़ का फ़ायदा उठाकर शोषकवर्ग हमेशा ही सत्ता पर क़ाबिज़ होता रहा है क्योंकि भारत में प्रचलित पूंजीवादी लोकतंत्र इसी उन्मादी भीड़ पर आधारित है । यह लोकतंत्र के नाम पर भीड़तंत्र ही हो सकता है ।

इसी जड़ बुद्धि और भावशून्य भीड़ का सहारा लेकर आज शासकवर्ग ने इस तथाकथित लोकतंत्र को भी बंदी बनाकर रखा हुआ है । इसके इलावा भारतीय शोषक शासकवर्ग द्वारा बड़े ही व्यवस्थित ढंग से भारत को एक धार्मिक या आध्यात्मिक समाज के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है । लेकिन हक़ीक़त बिल्कुल उल्टी है । भारतीय सामंती समाज व्यवस्था प्राचीन समय से ही शोषक व्यवस्था रही है । अगर वह व्यवस्था आध्यात्मिक या धार्मिक व्यवस्था होती तो वर्णव्यवस्था और जातिवाद जैसी शोषक संस्थाओं का अस्तित्व में आना असम्भव था । किसी भी धार्मिक समाज में निरंतर चन्द कामचोर शोषक लोगों के समूह द्वारा दलित-शोषित श्रमजीवी वर्ग के लोगों का पांच हज़ार वर्षों तक शोषण और दमन कैसे संभव हो सकता है ? फिर भी तथाकथित धर्म में इस भीड़ की इसी आस्था के मद्देनजर भारतीय शासकवर्ग बड़ी ही चालाकी से धर्म का इस्तेमाल करते हुए स्वयं के विश्वगुरु होने का दंभ भरता रहा है ।

इससे भारतीय जड़ बुद्धि जनमानस के अहंकार को बड़ा बल मिलता रहा है क्योंकि इससे व्यक्ति को निजी तौर पर भी विश्वगुरु होने का अहसास मिलता रहा है । लेकिन किसी का गुरु होने का भाव ही हिंसक चित्त का लक्षण है । आप किसी का गुरु क्यों होना चाहते हैं ? यही न कि आप दूसरों पर अपनी श्रेष्ठता क़ायम करके उस पर अपनी मालकियत क़ायम कर सकें । यह धर्म के नाम पर दूसरों को गुलाम बनाने का और स्वयं को मालिक बनाए रखने का बड़ा ही सुगम और धार्मिक दिखाई पड़ने वाला कृत्य है और धर्म के नाम पर मूढ़ भीड़ भी सहज ही गुलाम बनने को राज़ी हो जाती है । यह स्थिति शासकवर्ग और शोषकों के लिए बड़े काम की चीज़ है । इसी स्थिति के तहत आज भारत में मूढ़ से मूढ़ अदना से अदना व्यक्तिे को भी स्वयं को विश्वगुरु समझता हुआ देख जा सकता है । भारत में या अन्य देशों में जितने भी सद्गुरु हुए हैं उन्होंने कभी भी स्वयं को सद्गुरु घोषित नहीं किया, हां लोगों ने उन्हें सद्गुरु माना यह अलग बात है ।

धार्मिक होने का अर्थ ही व्यक्ति द्वारा यह घोषणा है कि मैं शिष्य हूँ और ‘शेष जगत’ मेरा गुरु है और इस ‘समग्र जगत’ के प्रति समर्पण और अनुग्रह के भाव को ही आस्था कहा जा सकता है । लेकिन भारत में प्रचलित आस्था का केंद्र व्यक्ति का अपने धर्म, अपनी धारणाएं, पूर्वाग्रह और सड़ी गली पुरातन मान्यताओं और परम्पराओं में विश्वास ही होता है और ‘शेष जगत’ के प्रति उनका आचरण घृणा और तिरस्कार से भरा होता है । आआस्था की यही परिभाषा आज प्रचलन में है । इसी कारण आज भारत में शायद ही कोई शिष्य देखने को मिले । यहां तो हर डाल पर स्वयं को गुरु समझने वाले उल्लुओं का बसेरा है । हक़ीक़त तो यह है कि शोषण और दमन पर आधारित समाज में विज्ञान का कोई स्थान नहीं हो सकता और जिस समाज में विज्ञान का स्थान न हो उसमें तो पाखंड, अंधविश्वास, जादू-टोना, भूत-प्रेत, हवन-यज्ञ, तंत्रमंत्र, झाडफ़ूंक, ओझाओं इत्यादि का ही बोलबाला हो सकता है ।

विज्ञान का स्थान उसी समाज में हो सकता है जो समाज जगत को सत्य माने । लेकिन धर्म और आस्था के नाम पर धर्म के ठेकेदारों और तथाकथित धर्माचार्यों द्वारा भारत में भौतिक जगत को माया या झूठ और किसी अदृश्य आत्मा और परमात्मा को सत्य माना जाता रहा है । अपने निजी अनुभव के बग़ैर भारतीय जनमानस के निजी और सामूहिक चेतन और अचेतन में ये विचार रच बस गए हैं । ये परजीवी विचार हैं । लेकिन इन्हीं परजीवी विचारों से मुक्त हो जाने की अवस्था को ही वास्तविक अर्थों में धार्मिकता कहा जा सकता है । ऐसी स्थिति में शासक वर्ग द्वारा शोषणकारी व्यवस्था को आसानी से नियंत्रित और संचालित किया जा सकता है और श्रमजीवी जनता को आसानी से दिग्भ्रमित करते हुए शासक वर्ग द्वारा उनका राजनीतिक और सामाजिक रूप से बखूबी इस्तेमाल किया जाता रहा है । यह प्रक्रिया आज भी जारी है ।

ये सब ताली, थाली, घण्टी, शंख, गौमूत्र पार्टियां, गोबर-स्नान जैसे अवैज्ञानिक कर्मकांड, पाखंड, और अंधविश्वास से भरे कृत्य जिनका शासकवर्ग के आह्वान पर आज खुले आम प्रचार और प्रदर्शन हो रहा है । ये सब पाखंड उसी प्राचीन सामंती परंपराओं के मरणशील अवशेष हैं जो भारत के सामूहिक अवचेतन में आज भी जिंदा हैं । इन्हीं अवशेषों का सहारा लेकर प्राचीन भारत के शोषकों के वंशज आज सत्ता पर काबिज हो गए हैं । ताली, थाली, घण्टी, शंख, गौमूत्र, गोबर-स्नान ये सब आज उसी अवचेतन मन से निकल कर आज ऐसे ही प्रकट हो गए जैसे कि एक सपेरे ने बिन बजाई हो और सैकड़ों सांप फन उठाए प्रकट हो गए हों । शायद इसीलिए पाश्चात्य विद्वानों ने भारत को सांप-सपेरों, नटों, बाजीगरों और मदारियों का देश कहा ।

भारतीय शासक वर्ग भीड़ के चेतन और अचेतन में मौजूद इन्हीं अंधविश्वासों के सहारे सत्ता तक पहुंचता रहा है और इस काम के लिए उन्हें ज़्यादा कुछ करना नहीं पड़ता सिर्फ़ अन्धविश्वास और पाखंड की बीन बजानी पड़ती है और सांपों के झुंड बिलों से निकलकर बीन के आगे नाचने लग जाते हैं । ऐसी स्थिति में इस पूंजीवादी व्यवस्था में शासक वर्ग के लोग कैसे एक साल के अंदर अपनी पूंजी या अपने मुनाफों को सोलह हज़ार गुना तक बढ़ा सकते है यह सबने देखा । भारतीय जनमानस के इस धर्मभीरु मनोविज्ञान को भांपकर कैसे कुछ सड़क छाप आबा-बाबा योग को धंधे और सत्ता से जोड़कर कुछ ही वर्षों में रंक से राजा हो जाते हैं यह भी सबने देखा । भारतीय जनमानस की ऐसी दयनीय अवस्था में शासकवर्ग द्वारा कोरोना जैसी भयंकर महामारी का फ़ायदा उठाते हुए कैसे राजनैतिक जनसमर्थन हासिल किया जा सकता है यह भी आज सबने देख लिया । अब और न जाने क्या-क्या देखना बाक़ी रह गया है । इस विकट स्थिति में फ़िलहाल यही कहा जा सकता है – 

क्या होगा हश्र उस कश्ती का दोस्तो,

अंधा है जिसका माझी और सोये हैं लोग ।

(अशोक कुमार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल ग़ाज़ियाबाद में रहते हैं।)

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