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Categories: बीच बहस

सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर बार-बार उठते सवाल

क्या न्याय इतना व्यक्तिनिष्ठ और इतना असहाय हो सकता है कि उसकी समीक्षा और आलोचना करना अनिवार्य बन जाए?  कोई एक न्यायाधीश यदि कमजोर मनुष्य सिद्ध हो जाए तो क्या करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले उसके फैसलों को केवल इस कारण शिरोधार्य करना होगा कि वे एक ऐसे पदाधिकारी द्वारा दिए गए हैं, जिसे अकूत शक्तियां प्राप्त हैं और जिसे दैवीय होने की सीमा तक परिपूर्ण मान लिया गया है। क्या न्यायपालिका वस्तुनिष्ठ नियमों और सिद्धांतों से संचालित नहीं हो सकती?

क्या न्यायाधीश विशेष की पसंद-नापसंद और उसके वैचारिक पूर्वाग्रहों से अलग हटकर किन्हीं व्यक्ति निरपेक्ष मापदंडों का निर्माण संभव नहीं है, जिसके आधार पर न्यायपालिका कार्य कर सके? क्या एक अच्छी न्यायपालिका वही होती है जो सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सरकार को मजबूती प्रदान करे भले ही यह नीतियां कितनी ही अलोकप्रिय और अतार्किक हों? क्या न्यायपालिका प्रशासन का ही एक हिस्सा है, जिसकी सोच और कार्यप्रणाली में जनता को अनुशासित, नियंत्रित और दंडित करने का भाव छुपा है?

क्या सत्ताधीशों और उच्चाधिकारियों में सामान्य रूप से देखी जाने वाली- स्वयं को विलक्षण, अलौकिक और सत्ता एवं प्रशासन का पर्याय मानने की- प्रवृत्ति का संक्रमण न्यायपालिका में भी फैल गया है? क्या न्यायाधीश ही न्याय हैं और उसका कथन ही विधि है? क्या हमारी न्याय प्रक्रिया में बहुत कुछ इतना अस्पष्ट और अपरिभाषित है कि इसकी व्याख्या के लिए न्यायाधीश के विवेक पर आश्रित होना ही पड़ेगा? इस प्रकार हम यह स्वीकार लेते हैं कि न्यायाधीश अविवेकी नहीं हो सकता और आजकल अकसर गलत सिद्ध होते हैं।

अब तक न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार या न्यायपालिका की लेट लतीफी या न्यायपालिका में लंबित प्रकरणों की विशाल संख्या अकसर चर्चा का विषय बनती थीं और इस पर न्यायविद्, पूर्व न्यायाधीश तथा न्यायपालिका से जुड़े अन्य लोग बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखते थे, किंतु न्यायालयों और विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय के हाल के फैसलों के बाद जो मुद्दे आम जनता के जेहन में उठ रहे हैं वे न्यायपालिका की इन परंपरागत समस्याओं से एकदम अलग हैं।

अब आम जनता का एक बड़ा भाग कतिपय न्यायाधीशों की सवर्ण मानसिकता, न्यायपालिका में दलितों और अल्पसंख्यकों के गिरते प्रतिनिधित्व तथा इनके साथ भेदभाव, पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त न्यायाधीशों की टिप्पणियों, कॉरपोरेट घरानों द्वारा न्यायाधीशों को मैनेज करने की कोशिशों तथा आर्थिक-सामाजिक मुद्दों के स्थान पर धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों को अधिक आवश्यक मानकर उन पर बहुसंख्यक समुदाय की मान्यताओं तथा विश्वासों के अनुरूप फैसले देने की प्रवृत्ति को लेकर आशंकित और चिंतित हैं।

सुप्रीम कोर्ट और उसके मुख्य न्यायाधीश बार बार नकारात्मक सुर्खियां बटोर रहे हैं। नवीनतम उदाहरण कृषि कानूनों से संबंधित मामले का है। किसान आंदोलन से जुड़े लोगों के अतिरिक्त आम जनता के एक बड़े वर्ग का यह मानना है कि अगर सरकार की मंशा आंदोलन को समाप्त करने अथवा मामले को लंबा खींचकर किसान नेताओं के धैर्य की परीक्षा लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट का उपयोग करने की थी तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की यह मंशा पूरी की है और स्वयं को उपयोग होने दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार की किसी भी रोक के पीछे यह तर्क देता कि प्रथम दृष्टया ये कृषि कानून संवैधानिक और कानूनी कसौटियों पर खरे नहीं उतरते और जनता के लिए अलाभकारी प्रतीत होते हैं, इसलिए इन पर रोक लगाई जाती है तो शायद यह अधिक उचित प्रतीत होता।

किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने जो तर्क दिया वह पूर्ववर्ती दृष्टांतों से एकदम अलग था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने का निर्णय संभवतः किसानों की आहत भावनाओं पर मरहम लगाने का कार्य करेगा और उन्हें वार्ता में आत्मविश्वास एवं भरोसे के साथ सम्मिलित होने के लिए प्रेरित करेगा। अनेक विधिवेत्ताओं की राय में यह निर्णय न्यायिक तदर्थवाद की अनुचित प्रवृत्ति का उदाहरण है।

कमेटी बनाने का एक कारण माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय ने यह बताया कि वे कृषि और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ नहीं हैं। यह बिलकुल स्वाभाविक है कि एक विधिवेत्ता इन बातों का विशेषज्ञ नहीं होता, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में वह इन कृषि कानूनों की संवैधानिकता के विषय में तो निर्णय ले सकता था। जो समिति न्यायालय ने बनाई उसके सारे सदस्य इन कृषि कानूनों के घोषित समर्थक हैं। एक सदस्य तो समिति से इस्तीफा भी दे चुके हैं। इस समिति को कोई विशिष्ट शक्तियां भी प्राप्त नहीं हैं। ऐसा भी नहीं है कि किसानों और सरकार के बीच वार्तालाप नहीं चल रही है। नियमित अंतराल पर सरकार और किसानों के बीच बैठकें हो रही हैं।

सरकार का प्रतिनिधित्व कृषि मंत्री समेत अनेक मंत्री और निर्णय लेने में सक्षम अधिकारी कर रहे हैं। किसान न्यायालय के पास नहीं गए हैं न ही उन्होंने इस प्रकार की किसी समिति की मांग ही की है। वे शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन के जरिए सरकार से अपनी मांगें मनवाने की कोशिश कर रहे हैं। फिर इस समिति का उद्देश्य आंदोलन को लंबा खींचकर कमजोर करने की सरकारी इच्छा की पूर्ति के अतिरिक्त यदि कुछ अन्य है तो उसका ज्ञान सर्वोच्च न्यायालय को ही होगा।

अभी कुछ दिन पहले 5 जनवरी 2021 को सर्वोच्च न्यायालय की एक बेंच ने सेंट्रल विस्टा मामले पर अपना निर्णय दिया। फैसले के पोस्टल्यूड में (पैरा 420-422) इस बेंच ने बड़े विस्तार से इस बात की चर्चा की है कि न्यायालय सरकार के पॉलिसी मैटर्स में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। पैरा 420 के  प्रारंभ में बेंच यह कहती है, “इस प्रकरण में हम यह कहने को विवश हैं कि याचिकाकर्ताओं ने अपने उत्साह में हमें ऐसे क्षेत्रों पर विचार करने का आग्रह किया जो किसी संवैधानिक न्यायालय को प्राप्त शक्तियों से एकदम बाहर के हैं।”

यह पैरा पॉलिसी के निर्माण और उसके क्रियान्वयन के लिए सरकार को प्राप्त अधिकारों के विषय में है, जिसमें बेंच के मतानुसार न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है। पैरा के अंत में बेंच कहती है, “किंतु यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि न्यायालय संविधान द्वारा तय की गई सीमाओं के भीतर कार्य करते हैं। हमें शासन करने के लिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि हमारे पास इसके लिए साधन या कौशल और विशेषज्ञता का अभाव होता है।” यही कारण है कि किसान इन जन विरोधी कृषि कानूनों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं गए, क्योंकि इनमें बदलाव सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है।

यह आश्चर्यचकित करने वाली बात है कि सेंट्रल विस्टा पर फैसला देने वाली त्रिसदस्यीय बेंच और कृषि कानूनों पर निर्णय सुनाने वाली चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच का दृष्टिकोण सरकारी नीतियों के निर्माण और उनके क्रियान्वयन के संबंध में न्यायपालिका की भूमिका और उसके हस्तक्षेप के बारे में एकदम अलग है, और इस मत भिन्नता के बावजूद इन फैसलों से लाभान्वित होने वाली सरकार ही है।

सर्वोच्च न्यायालय की प्राथमिकताओं के क्रम पर भी सवाल उठने लगे हैं। लोगों के मन में यह धारणा भी बन रही है कि जिन प्रकरणों में सरकार को तत्काल राहत की आवश्यकता होती है उन प्रकरणों पर सुप्रीम कोर्ट त्वरित सुनवाई करता है, जबकि नोटबंदी, सीएए और अनुच्छेद 370 के कतिपय प्रावधानों को अप्रभावी बनाने संबंधी संविधान संशोधन को लेकर दायर याचिकाओं तथा अनेक बुद्धिजीवियों, पत्रकारों एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस और प्रशासन के दमनात्मक व्यवहार को लेकर चल रहे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट वह तेजी और तत्परता नहीं दिखाता, क्योंकि इन मामलों में उसकी सक्रियता सरकार को असुविधा में डाल सकती है।

अनेक विधि विशेषज्ञ यह भी याद दिलाते हैं कि वर्तमान चीफ जस्टिस उन बेंचों की अगुवाई भी कर रहे थे, जो ईडब्लूएस कोटा लॉ और सिटीजनशिप (अमेंडमेंट) एक्ट जैसे विवादित कानूनों से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही थीं और इन दोनों अवसरों पर उन्होंने इन कानूनों की संवैधानिकता के प्रश्न को ही प्रधानता दी थी और इन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

लगभग एक वर्ष पूर्व 9 जनवरी 2020 को चीफ जस्टिस बोबडे ने सीएए पर एक याचिका की सुनवाई के दौरान प्रीजमशन ऑफ कॉन्स्टिट्यूशनलिटी का हवाला देते हुए कहा, “हमारा कार्य कानूनों की वैधता का परीक्षण करना है।” उत्कर्ष आनंद जैसे विधिवेत्ता इस बात को लेकर विस्मित हैं कि केवल एक वर्ष बाद ही चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच शक्तियों के पृथक्करण जैसे स्थापित सिद्धांतों और पुराने न्यायिक दृष्टांतों से भटकती प्रतीत होती है। यह बात  ध्यान अवश्य खींचती है कि सीएए के विषय में सर्वोच्च न्यायालय का रुख सरकार के लिए राहत लेकर आया था।

कानून के अनेक जानकार तो इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश गण कृषि और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ नहीं हैं उसी प्रकार वे पुरातत्व, इतिहास और धर्म दर्शन के भी विशेषज्ञ नहीं थे, फिर भी उन्होंने कुछ समय पूर्व राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में प्रतिदिन सुनवाई कर निर्णय सुनाया था। आम जनता के मन में यह प्रश्न उठा रहा है कि क्या प्रत्येक न्यायाधीश अपनी सुविधानुसार यह तय कर सकता है कि वह किस विषय का विशेषज्ञ है और किसका नहीं। बहरहाल राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर दिया गया निर्णय भी सरकार के मनोनुकूल था और सत्ताधारी दल की विचारधारा को पुष्ट करता था।

सर्वोच्च न्यायालय के हाल के इन फैसलों में एकरूपता, निरंतरता और वस्तुनिष्ठता का अभाव दिखता है। समान प्रश्नों पर सर्वोच्च न्यायालय का स्टैंड अलग-अलग रहा है। सर्वोच्च न्यायालय का स्टैंड बदलता रहा है, किंतु शायद संयोगवश ही हर फैसले का लाभ सरकार को ही मिलता रहा है। जब संयोग लगातार बनने लगते हैं तो फिर संदेह उत्पन्न होता है और यह प्रश्न भी उठता है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में तटस्थता और वस्तुनिष्ठता की कमी है?

प्रिंसिपल ऑफ डिफरेंस को लेकर बहुत चर्चा होती रही है। विधायिका और कार्यपालिका का सम्मान करते हुए न्यायपालिका अनेक मुद्दों पर स्वतंत्र निर्णय देने से बचती रही है। किंतु जब विधायिका एवं कार्यपालिका के फैसलों को संरक्षण देने की यह प्रवृत्ति अतार्किक रूप धारण करने लगती है तब कमिटेड ज्यूडिशियरी की चर्चा जोर पकड़ने लगती है।

हमारे देश में कमिटेड ज्यूडिशियरी की चर्चा इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में उठी थी और अब मोदी के कार्यकाल में जोर पकड़ रही है, जिस आत्ममुग्धता का शिकार होकर इंदिरा गांधी निरंकुश हो गईं थीं और आपातकाल लगाने जैसा निर्णय ले बैठी थीं, क्या मोदी भी उसी ओर अग्रसर हो रहे हैं, इस प्रश्न पर चर्चा होनी चाहिए, किंतु सर्वाधिक विचारणीय प्रश्न यह है कि जब लोकतांत्रिक प्रणाली को संतुलन प्रदान करने के लिए न्यायपालिका के सर्वश्रेष्ठ की आवश्यकता होती है, तब न्यायपालिका अपेक्षित मजबूती क्यों नहीं दिखा पाती।

एक प्रश्न न्यायाधीशों की मानसिकता का भी है। जब चीफ जस्टिस बोबडे पूछते हैं कि  इस विरोध प्रदर्शन में महिलाओं और बुज़ुर्गों को क्यों शामिल किया गया है? तब वे उसी पितृसत्तात्मक सोच से प्रभावित लगते हैं, जिसके अनुसार महिलाओं को घर की चहारदीवारी तक सीमित रहना चाहिए और पुरुष को बाहर निकलकर अर्थोपार्जन करना चाहिए। उनके इस कथन से खेती की जमीनी सच्चाइयों के प्रति उनकी अनभिज्ञता का भी पता चलता है, क्योंकि भारतीय कृषि में महिलाओं की भूमिका पुरुषों से कहीं अधिक ही होती है।

आदिवासी और दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन रेखांकित करते हैं कि न्यायपालिका के हाल के वर्षों के अनेक फैसले यह संदेह उत्पन्न करते हैं कि या तो आदिवासियों और दलितों का पक्ष माननीय न्यायालय के सम्मुख रखने में सरकार की ओर से कोताही की जा रही है या फिर न्यायपालिका का एक हिस्सा सवर्ण मानसिकता से अभी भी संचालित हो रहा है। सन् 2018 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने एससी/एसटी प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट 1989 के प्रावधानों को कमजोर करने वाला एक फैसला दिया था।

फरवरी 2020 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की एक बेंच ने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण की मांग कोई बुनियादी अधिकार नहीं है। यदि सेवाओं में प्रतिनिधित्व अपर्याप्त भी है तब भी सरकार आरक्षण देने को बाध्य नहीं की जा सकती। 22 अप्रैल 2020 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आरक्षण की संकल्पना के बारे में विपरीत लगने वाली टिप्पणियां की थीं।

जमीनी स्तर पर आदिवासी अधिकारों के लिए कार्य करने वाले संगठनों का यह अनुभव रहा है कि कॉरपोरेट घराने अपने औद्योगिक साम्राज्य के विस्तार के लिए सुप्रीम कोर्ट का उपयोग करने की कोशिश करते रहे हैं और उन्हें राहत देने वाले निर्णय सुप्रीम कोर्ट से आए भी हैं। कॉरपोरेट पर्यावरणविदों और टाइगर लॉबी को आदिवासियों के विस्थापन की अपनी कोशिशों में एक बड़ी सफलता तब मिलने वाली थी, जब उच्चतम न्यायालय ने 13 फरवरी 2019 को एक आदेश पारित किया, जिसमें उसने देश के करीब 21 राज्यों के 11.8 लाख से अधिक आदिवासियों और वनों में रहने वाले अन्य लोगों को वन भूमि से बेदखल करने की बात की थी। दरअसल, ये लोग अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006 के अधीन वनवासी के रूप में अपने दावे को सिद्ध नहीं कर पाए थे।

बाद में जब अनेक संगठनों ने इस आदेश का विरोध किया और स्वयं केंद्र सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से यह बताया कि प्रभावित परिवारों की संख्या कहीं अधिक हो सकती है और करीब 20 लाख आदिवासियों और वन वासियों पर इस आदेश का असर पड़ सकता है तब जाकर केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप किया और सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश पर रोक लगाई। यह मामला एक वर्ष से चल रहा था और इस पूरी समयावधि में केंद्र सरकार की रहस्यमय चुप्पी भी सवालों के घेरे में रही।

वास्तव में कॉरपोरेट समर्थक पर्यावरणविद् और संरक्षणवादी वन अधिकार कानून 2006 को भारतीय वन अधिनियम, वाइल्ड लाइफ एक्ट तथा पर्यावरण संबंधी अन्य अनेक कानूनों का उल्लंघन करने वाला और असंवैधानिक बताकर खारिज कराना चाहते हैं।

सोशल मीडिया में एक नई प्रवृत्ति देखने में आई है, वह है न्यायाधीशों को नायक के रूप में महिमामंडित कर उनकी अतिरंजित प्रशंसा की। चाहे वे दीपक मिश्रा हों या फिर रंजन गोगोई हों। इन्हें राष्ट्र भक्त और रामभक्त बताते हुए यह रेखांकित किया जा रहा है कि अब न्यायपालिका के शोधन की प्रक्रिया प्रारंभ हो रही है एवं न्यायपालिका वामपंथ और कांग्रेसवाद की गिरफ्त से बाहर निकल रही है, जिसके कारण राष्ट्र को मजबूती देने वाले निर्णय लिए जा रहे हैं।

कुछ पोस्ट्स ऐसी भी हैं जिनमें न्यायपालिका में आए इस कथित परिवर्तन का श्रेय मोदी सरकार को दिया गया है। हो सकता है कि यह पोस्ट्स  सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ बीमार मानसिकता के लोगों के विकृत मस्तिष्क की उपज हों, किंतु यह तो सोचना ही होगा कि न्यायपालिका के हाल के क्रिया कलापों में ऐसा क्या है जिसकी बुनियाद पर यह जहरीला और खतरनाक नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।

भारतीय न्यायपालिका को बड़ी गहराई से जानने वाली पुरानी पीढ़ी के अनेक वयोवृद्ध प्रतिनिधि अपने समय के न्यायाधीशों की ईमानदारी और विद्वत्ता की चर्चा बड़े गौरव से करते हैं, किंतु साथ ही यह कहना भी नहीं भूलते कि नई पीढ़ी में वैसी नैतिक दृढ़ता नहीं है। क्या हमारी न्याय प्रक्रिया को इतना पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ नहीं बनाया जा सकता कि उसे किसी न्यायाधीश के दोष और पूर्वाग्रह प्रभावित न कर सकें। यही वह प्रश्न है जिसका समाधान तलाशना होगा।

(डॉ. राजू पाण्डेय लेखक और चिंतक हैं। आप आजकल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)

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This post was last modified on January 21, 2021 2:57 pm

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