Wednesday, October 27, 2021

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आरएसएस के सांप्रदायिक कीचड़ में राजा महेंद्र प्रताप को उतारना किसी गुनाह से कम नहीं

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मुझे 1945 में अग्रणी में, छपा हिंदू महासभा और आरएसएस का वह कार्टून नही भूलता, जिसमें सावरकर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, तीर लेकर, दशानन रावण के रूप में चित्रित गांधी के ऊपर सरसंधान कर रहे हैं। गांधी के दस सिर के रूप में नेहरू, पटेल, आज़ाद और अन्य स्वाधीनता संग्राम के महत्वपूर्ण नेता हैं। यह अकेला कार्टून यह स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि, आरएसएस और हिन्दू महासभा यानी वीडी सावरकर और डॉ. एसपी मुखर्जी, दोनों ही स्वाधीनता संग्राम के विरुद्ध थे और वे अंग्रेजों और धार्मिक आधार पर, मुसलमानों के लिये एक नए मुल्क के रूप में, पाकिस्तान बनाने के लिये, बंटवारे की मुहिम चला रहे, एमए जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग के साथ थे। गांधी, सुभाष, भगत सिंह आदि की विचारधारा का विरोध किया जा सकता है, पर जब पूरा देश, आज़ादी के लिये सड़कों पर था, तब बार-बार राष्ट्र निर्माण, देश भक्त आदि खूबसूरत शब्द का उच्चारण करने वाला संगठन, उस महासमर से अलग क्यों था ? यह सवाल अक्सर मेरे मन में उठता है। पर आरएसएस और हिन्दू महासभा उस महासमर से दूर और अलग थे, यह ऐतिहासिक तथ्य है।

गांधी, पटेल, नेहरू, सुभाष, मौलाना आज़ाद, भगत सिंह सबके बारे में इन संगठनों ने, कभी न कभी ऐसा बयान ज़रूर दिया है, जिससे इनकी खीज और चिढ़ सामने आ ही जाती है। स्वाधीनता संग्राम में आरएसएस की कोई भी भूमिका आज तक सामने नहीं आयी। इस हीन भावना से ग्रस्त होकर, यह लोग अक्सर स्वाधीनता संग्राम के महान नेताओं के कभी चरित्र की, तो कभी उनके फैसले की, तो कभी उनकी निजी बातों की आलोचना करते रहते हैं। आज कल इनकी कृपा स्वाधीनता संग्राम सेनानी, राजा महेंद्र प्रताप पर पड़ रही है। साल, 2017 में अचानक भाजपा को याद आता है कि राजा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अपनी ज़मीन दी थी, तो उनकी जयंती एएमयू में मनाई जाए और एक अभियान इसके लिये चलाया गया। इस प्रकार एक महान व्यक्तित्व को याद करने के बजाय भाजपा की ज़िद और सक्रियता, बस यही थी कि, एएमयू में ही यह आयोजन हो। पर उन्हें यह याद नहीं होगा कि 1977 में जब एएमयू की स्थापना की शताब्दी मनाई जा रही थी, तो उसके मुख्य अतिथि राजा महेंद्र प्रताप ही बनाये गए थे।

राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर यूनिवर्सिटी की घोषणा के बाद लोगों का ध्यान इन महान स्वाधीनता संग्राम सेनानी पर भी गया। लोग इनके बारे में पढ़ने लगे। पर ऐसा नहीं है कि, अलीगढ़ में राजा पर पहली बार चर्चा हो रही है। 2017 में भी राजा महेंद्र प्रताप की एएमयू में जयंती मनाने को लेकर अलीगढ़ के स्थानीय भाजपा नेताओं और एएमयू के प्रशासन के बीच विवाद हो चुका है। लेकिन एएमयू ने इस सम्बंध में स्थानीय भाजपा नेताओं की नहीं सुनी और जयंती जैसी किसी परम्परा की शुरुआत नहीं की। भाजपा नेताओं का उद्देश्य भी राजा महेंद्र प्रताप की जयंती मनाना कम, अपितु इस पर बखेड़ा खड़ा करना अधिक था। राजा महेंद्र प्रताप की राजनीतिक विचारधारा, भाजपा और आरएसएस की विचारधारा के सर्वथा विपरीत थी और जब राजा ने 1957 में, मथुरा लोकसभा से चुनाव लड़ा तो वे किसी दल के प्रत्याशी नहीं बल्कि उन्होंने निर्दल चुनाव लड़ा और जीता था। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी चौधरी दिगम्बर सिंह जो कांग्रेस के प्रत्याशी थे को हराया और उसी चुनाव में भारतीय जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी भी प्रत्याशी थे, उनको तीसरा स्थान मिला था। यह चुनाव राजा की लोकप्रियता का प्रमाण है। मथुरा हो या आगरा या अलीगढ़ यहां के किसी भी भाजपा के नेता ने न तो राजा महेंद्र प्रताप का कभी नाम लिया और न ही, उनकी स्मृति के लिये कभी कुछ किया। पर वे अलीगढ़ के एएमयू में केवल इसलिए राजा की जयंती मनाना चाहते थे जिससे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो और विवाद हो। स्वाधीनता संग्राम के प्रतीकों और योद्धाओं को जानबूझकर विवादित करना, और उनके माध्यम से अपनी राजनीतिक हैसियत बनाना इनका प्रिय एजेंडा है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में राजा महेंद्र प्रताप की जयंती मनाने को लेकर, 2017 में लेकर जब विवाद बढ़ने लगा तो इस विवाद में यूनिवर्सिटी के अध्यापक भी सामने आ गए थे। तब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन ने संघ और बीजेपी के नेताओं की आलोचना करने के साथ ही कुलपति की भी आलोचना की थी। एएमयू टीचर्स एसोसिएशन ने आरएसएस के नेताओं और कुलपति के बीच हुई कथित गुप्त मीटिंग पर भी नाराजगी जताई थी और इस पर कहा था कि, यूनिवर्सिटी को इस तरह की राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए। 

एएमयू टीचर्स एसोसिएशन ने तब कहा था, “शिक्षा के इस महान केंद्र को किसी का प्यादा नहीं बनने दिया जाएगा। टीचर्स एसोसिएशन ने किसी भी राजनीतिक दल के दबाव में जयंती मनाने का विरोध किया फिर चाहे वह केंद्र सरकार ही क्यों न हो।”

एसोसिएशन ने अपने बयान में कहा था,  ‘बीजेपी राजा महेंद्र प्रताप की विरासत पर कब्जा करना चाहती है। राजा धर्म निरपेक्ष थे, जो बीजेपी की नीतियों से मेल नहीं खाता। कुछ लोग इस मुद्दे को लेकर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं ताकि राजनीतिक लाभ लिया जा सके। राजा महेंद्र प्रताप सामाजिक परिवर्तन के क्रांतिकारी पुरोधा थे। 1957 में जनसंघ ने उनके खिलाफ प्रत्याशी उतारा था। जनसंघ के नए अवतार में बीजेपी गलत तरीके से उनकी विरासत पर दावा कर रही है।”

इस पर, एएमयू के तत्कालीन वाइस चांसलर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह ने यूनिवर्सिटी के अंदर बीजेपी के प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर कड़ी आपत्ति जताई थी और उन्होंने तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को लिखे अपने पत्र में इस कार्यक्रम की वजह से सांप्रदायिक तनाव फैलने की आशंका भी व्यक्त की थी। उन्होंने स्मृति ईरानी को लिखा था,  ‘यूनिवर्सिटी किसी भी तरह की राजनीति या किसी राजनीतिक आयोजन का हिस्सा नहीं बनना चाहती बल्कि आपकी मदद चाहती है, ताकि किसी भी तरह से कानून व्यवस्था न बिगड़े।”

इस मामले पर राजनीति भी तेज हो गई थी। बीजेपी ने एएमयू के इस फैसले का विरोध किया था तो, वहीं समाजवादी पार्टी समेत कई दूसरे संगठन कार्यक्रम के विरोध में उतर आए थे।

राजा महेंद्र प्रताप की जयंती मनाने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे थे, वे यह थे कि, उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अपनी ज़मीन दान में दी थी। यह बात बिल्कुल सही है कि राजा ने एएमयू को अपनी कुछ ज़मीन दान में दी थी। लेकिन यह बात सही नहीं है कि, पूरा एएमयू ही राजा महेंद्र प्रताप की दी हुयी ज़मीन पर बना है। अलीगढ़ के इतिहास पर काम करने वाले, डॉ राहत अबरार ने, राजा महेंद्र प्रताप से संबंधित भूमि विवाद की पड़ताल करके एक तथ्यात्मक स्थिति प्रस्तुत की है। डॉ अबरार, उर्दू अकादमी, एएमयू के निदेशक हैं, जिन्होंने इस विषय पर आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उनके अनुसार, ” राजा महेंद्र प्रताप प्रसिद्ध स्वाधीनता संग्राम सेनानी, मानवतावादी और 1915 में काबुल में स्थापित निर्वासन में भारत की पहली अनंतिम सरकार के राष्ट्रपति थे। वे 20 वीं सदी के भारत में धर्मनिरपेक्षता के चैंपियन लोगों में से एक थे।”

भूमि विवाद का जिक्र करते हुए डॉ अबरार कहते हैं,

” महेंद्र प्रताप के पिता मुरसान के राजा घनश्याम सिंह और उनके पिता राजा टीकम सिंह सर सैयद अहमद खान के बहुत करीबी दोस्त थे। इसके बाद जब राजा घनश्याम सिंह की मृत्यु हुई तो, राज परिवार ने सर सैयद अहमद द्वारा, युवा राजकुमार (राजा महेंद्र प्रताप) को अपने संरक्षण में लेने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और उन्हें एमएओ कॉलेज स्कूल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा शुरू की।”

डॉ अबरार आगे लिखते हैं, 

” राजा टीकम सिंह ने सर सैयद की साइंटिफिक सोसायटी के लिए 800/- रुपये और राजा घनश्याम सिंह ने एमएओ कॉलेज के पहले छात्रावास के निर्माण के लिए 1500/- रुपये का दान दिया था। राजा महेंद्र प्रताप ने भी 1929 में एमएओ कॉलेज स्कूल के लिए 1.2  हेक्टेयर जमीन, दो रुपये प्रति वर्ष की सांकेतिक राशि पर लीज में दी थी, जहां वह एक छात्र के रूप में पढ़ चुके थे।”

हालाँकि, डॉ अबरार ने यह भी स्पष्ट किया है कि, ” भूमि का यह भूखंड मुख्य विश्वविद्यालय परिसर के बाहर है। यूनिवर्सिटी के लिए सर सैयद अहमद खान ने सेना की छावनी से भूमि का अधिग्रहण, सरकार से करा कर लिया था। राजा महेंद्र प्रताप की भू संपत्ति से यूनिवर्सिटी की मुख्य भूमि, किसी भी तरह से जुड़ी नहीं थी।”

राजा महेन्द्र प्रताप ने एएमयू, अलीगढ़ को ही ज़मीन नही दी थी बल्कि उन्होंने अलीगढ़ और मथुरा जिलों में विभिन्न शैक्षिक और सामाजिक संगठनों को भी  व्यापक दान दिया है।

वर्ष 1895 में जब वे एमएओ में पढ़ रहे थे तो उन्हें सर सैय्यद अहमद खान ने एक अलग बंगले में रहने की अनुमति दी थी। डॉ अबरार, राजा साहब को दी गयी, इस विशेष सुविधा के पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि, “यह विशेषाधिकार उन्हें इसलिए दिया गया था क्योंकि सर सैयद इस तथ्य से अवगत थे कि यह उनके दिवंगत मित्र के पुत्र थे, जिन्हें उनके संरक्षण में ही पढ़ने के लिये, राज परिवार ने दिया था। इसलिए यह महत्वपूर्ण था कि उन्हें सुविधापूर्ण ढंग से अच्छी शिक्षा मिले।”

अब जिस ज़मीन पर एएमयू बना है, उसके बारे में निम्नलिखित तथ्य है,

● मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल (एमएओ) कॉलेज, अलीगढ़ की स्थापना 8 जनवरी, 1877 को हुई थी। अधिकांश जमीन ब्रिटिश सरकार से खरीदी गई थी, जो अलीगढ़ छावनी (छावनी) को बंद करने की प्रक्रिया में थी, जिससे सर सैयद को 74 एकड़ जमीन मिली थी।

● राजा महेंद्र प्रताप (1886-1979) एमएओ कॉलेज के प्रतिष्ठित पूर्व छात्र थे।  एएमयू एक महान स्वतंत्रता सेनानी और परोपकारी राजा महेंद्र प्रताप का बहुत सम्मान करता है।

● राजा महेंद्र प्रताप के परदादा, राजा टीकम सिंह और मुरसान के पिता राजा घनश्याम सिंह भी सर सैयद अहमद खान के करीबी थे। उनके परदादा ने रु.  800/- अलीगढ़ में साइंटिफिक सोसायटी भवन के निर्माण हेतु। उनके पिता ने रुपये की राशि दान की। 1500/- बोर्डिंग हाउस के निर्माण के लिए दिया था।

● कुछ व्यक्तियों और संगठनों द्वारा फैलाई गई खबर कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय केवल राजा महेंद्र प्रताप द्वारा दी गई भूमि पर खड़ा है, तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि राजा महेंद्र प्रताप का जन्म एमएओ कॉलेज की स्थापना के नौ साल बाद 1886 में हुआ था।

● राजा महेंद्र प्रताप को 1895 में एमएओ कॉलेज में भर्ती कराया गया था। उन्हें एक बंगले जो जहूर वार्ड के सामने है, में वह रहते थे।

● 1929 में, राजा महेंद्र प्रताप ने 1.221 हेक्टेयर (3.04 एकड़) भूमि को ₹ 2 प्रतिवर्ष की सांकेतिक दर से पट्टे पर दिया था। अब, यह भूमि का उपयोग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय द्वारा संचालित सिटी हाई स्कूल के खेल के मैदान के रूप में हो रहा है। इस भूमि के अलावा, सिटी हाई स्कूल का क्षेत्रफल 1.96 हेक्टेयर है जो विश्वविद्यालय के पक्ष में भी पट्टे पर दिया गया है।

● एमएओ कॉलेज, अलीगढ़ के सबसे पुराने जीवित प्रतिष्ठित पूर्व छात्र के रूप में, राजा महेंद्र प्रताप को 1977 में एएमयू के शताब्दी समारोह में मुख्य अतिथि बनाया गया था।

● राजा महेंद्र प्रताप एक महान स्वाधीनता संग्राम सेनानी थे और उन्होंने 1 दिसंबर, 1915 को काबुल (अफगानिस्तान) में भारत की पहली अंतरिम सरकार की स्थापना की और इसके निर्वासन के राष्ट्रपति बने। उनका चित्र विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय, मौलाना आजाद पुस्तकालय के मुख्य हॉल में लगाया गया है।

जिस समय एएमयू, बीएचयू जैसी यूनिवर्सिटी बन रही थी, उस समय उसके महान संस्थापकों, सर सैयद अहमद खान और पंडित मदन मोहन मालवीय जैसी महान शख्सियतों को उनके मिशन में धन का योगदान देने के लिये देश भर के राजा, महाराजा, नबाब और अन्य धनिक वर्ग खुल कर सामने आया था। एएमयू और बीएचयू दोनों को ही इन रियासतों और कुलीन वर्गों का आर्थिक सहयोग मिला था। पर आज तक इन दानदाताओं की कोई भी जयंती, न तो एएमयू में मनाई गई और न ही बीएचयू में। ऐसी कोई परंपरा ही नहीं है। हां एएमयू के संस्थापक, सर सैयद और बीएचयू के संस्थापक, मदन मोहन मालवीय की जयंती ज़रूर, एएमयू में, सर सैयद डे और बीएचयू में मालवीय जयंती के नाम से मनाई जाती है। बीएचयू की पूरी ज़मीन काशी नरेश द्वारा दान में दी गयी है, और शुरुआती आर्थिक सहायता महाराजा दरभंगा ने प्रदान की थी। इनके अतिरिक्त, तमाम राजाओं और यहां तक कि निज़ाम हैदराबाद और प्रमुख व्यावसायिक घराना, बिड़ला परिवार ने भी बीएचयू को, धन दिया था, पर वहां पर कभी भी भाजपा के दिमाग मे नहीं आया कि वह काशी नरेश या अन्य किसी दानदाता की जयंती मना ले, पर केवल अपने साम्प्रदायिक एजेंडा बरकरार रखने के लिये 2017 में यह बखेड़ा, अलीगढ़ में किया गया था।

राजा से भाजपा की कभी निकटता नही रही है और न ही राजा की विचारधारा आरएसएस की वैचारिकी से मेल खाती रही है, बल्कि राजा जिस सोच औऱ वैचारिकी के थे, उससे तो संघ दूर ही भागता रहा है। आज राजा की विचारधारा पर, उनके योगदान पर, बात कम हो रही है, बात हो रही है तो केवल राजा की जाति, जाट पर और राजा के भूमिदान पर। जब देश भर के राजा महाराजा, अपने मंहगे और सजे सजाए पोशाक में ब्रिटेन के सम्राट के सामंत की तरह, उनके दरबार मे हाज़िरी लगाने को उत्सुक थे, तब 1915 में, राजा महेंद्र प्रताप, अपने साथी बरकतुल्लाह खान के साथ काबुल में आज़ाद भारत की सरकार गठित कर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन चुके थे। इस घटना को राजा के जज़्बे से देखिए, जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज नहीं डूबता था तब उसकी आंख में आंख डाल कर देखने का साहस, देश की एक मामूली सी रियासत, मुरसान का राजा कर रहा था। स्वाधीनता संग्राम के नायकों को उनकी जाति के कठघरे में सीमित कर के उनका आकलन करना और निहित चुनावी लाभ और स्वार्थ के लिये उन्हें विवादित करना, उन महानुभावों को अपमानित करना ही है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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