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Categories: बीच बहस

रोने, चीखने या मोमबत्तियां जलाने से नहीं रुकेंगे बलात्कार!

(‘कानूनी अधिकारों’ को जब जंग लग जाए, तो आंदोलन और संघर्ष की दरांती, गंडासा या खुकरी को ‘विचारों की शान’ पर तेज़ करना पड़ेगा। रोने, चीखने या मोमबत्तियां जलाने से कुछ नहीं होने वाला।)

हाथरस (उत्तर प्रदेश) में दलित लड़की के साथ गैंगरेप। लड़की की जीभ काट दी गई, मगर कहा जा रहा है कि कट गई होगी। गर्दन तोड़ दी गई। वो भी टूट गई होगी। पंद्रह दिन अस्पताल में जीवन और मौत से संघर्ष करते हुए लड़की की मृत्यु हो गई। लाश रातों-रात दफ़्न कर दी गई। घर वाले देखते रह गए। दलित, गरीब, वंचित, ग्रामीण घर वाले क्या करते? मीडिया चुप रहा। तमाम समाजसेवी संगठन और महिला नेताओं को लकवा मार गया। सत्ता, प्रशासन, कानून, पुलिस और न्याय व्यवस्था ऐसी स्थितियों से निपटना अच्छी तरह जानती-समझती है। फिर वही हुआ जो आज तक होता रहा है। कल फिर नई ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ देखेंगे। सिर्फ कानून बदलने से देश की महिलाओं के हालात न बदले हैं और न बदलेंगे। सुन रही हो न मनीषा!

‘यौन हिंसा और न्याय की भाषा’ से लेकर ‘बचपन से बलात्कार’ और समाज शास्त्र पर पिछले चार दशक से लिख रहा हूं। ‘औरत होने की सज़ा’ हर बार नये रूप में सामने आती रहती है। लगभग छह साल पहले लिखा था कि देश भर में (विशेषकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश दिल्ली और राजस्थान) दलित महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाना, दिन-दहाड़े असहाय चश्मदीदों के सामने मार दिया जाना, आंख निकालना, जिंदा जला देना, हाथ-पैर काट डालना, सामूहिक बलात्कार करना, गांव बर्बाद कर देना (बेलछी, सुन्दूर, गोहाना) और उनके परिवार को आतंकित करने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही है। यौन-हिंसा का आतंक इसलिए कि दलित सब चुपचाप सहते रहें तथा दुराग्रहपूर्ण घृणा का प्रतिरोध नहीं कर पाएं। सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता प्राप्त व्यक्ति भी, इस छुआछूत रूपी ‘कैंसर’ के शिकार हैं।

दलितों का दमन, उत्पीड़न, शोषण एवं अवमानना, हमारे देश के इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय है। उत्तर भारत में अनुसूचित जाति के लड़के/लड़कियां, अगर गैर-अनुसूचित जातियों के लड़के/लड़कियों से प्यार करते हैं या शादी करना चाहते हैं, तो ज्यादातर मामलों में दोनों को परिवार के सदस्यों के द्वारा मार दिया जाता है, जिसे वे गर्व से ‘ऑनर किलिंग’ कहते हैं। इन अमानवीय क्रूर हत्याओं में भला, क्या शान हो सकती है।

हरियाणा में भगाणा गांव के पांच (जाट जाति के) लड़कों ने, दलित स्कूली लड़कियों को अगवा कर बारी-बारी से उनका बलात्कार किया। पीड़ित परिवार का जंतर-मंतर पर धरना। बदायूं में दो दलित कन्याओं की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या। लाशें आम के पेड़ से लटकी मिलीं। सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज़। आजमगढ़, अमेठी, आगरा और अन्य शहरों में भी इसी तरह के बर्बर बलात्कार, तेजाब कांड सामने आए/ आ रहे हैं। राज्य की कानून व्वयस्था को लगता है कि लकवा ही मार गया है और बेबस परिवार न्याय की गुहार लगाते रहे।

अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग के चेयरमैन पीएल पुनिया ने हरियाणा को ‘बलात्कार प्रदेश’ के नाम से नवाज़ा किंतु सगोत्र और प्रेम विवाहों पर तालिबानी फरमान जारी करने वाली कुछ खाप पंचायतों ने बलात्कार रोकने के लिए सुझाव दिया कि अगर लड़कियों कि शादी की उम्र 18 साल से घटाकर 16 साल और लड़कों की उम्र 21 से घटाकर 18 कर दी जाए, तो बलात्कार के मामलों में कमी हो सकती है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ने भी खाप पंचायत के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा, “मुगलों के शासनकाल में भी हमलावरों से बेटियों को बचाने के लिए उनकी शादी छोटी उम्र में कर दी जाती थी। हमें भी इतिहास से सबक लेना चाहिए और खाप पंचायतों के इस अच्छे फैसले को मान लेना चाहिए।” ऐसे ही ‘शर्मनाक’ बयान, उत्तर प्रदेश के ‘नेताजी’ और मध्य प्रदेश के ‘गृह मंत्री’ के भी पढ़ने-सुनने को मिले हैं।

सचमुच समझ नहीं आ रहा कि राजनेताओं के सामजिक और राजनीतिक विवेक को आखिर हो क्या गया है? क्या आर्थिक समृधि की अफीम, राज्य की आत्मा तक को निगल गई है? नेता जी! इस देश में तीन महीने की बच्ची से लेकर 70 साल कि वृद्ध महिला तक से बलात्कार के मामले सामने आए हैं और आप हैं कि वोटों कि राजनीति के लिए ऐसे शर्मनाक बयान दिए जा रहे हैं। शुक्र है कि आप मुख्यमंत्री नहीं हैं (अब), वरना न जाने क्या करते-करवाते।

उल्लेखनीय है कि अब तक दलित महिलाओं के साथ, बलात्कार के सब से ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में और आदिवासी महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएं, मध्य प्रदेश में होती रही हैं। 2011 की रिपोर्ट के अनुसार नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार के अधिकतम मामले (26-27%) मध्य प्रदेश में ही हुए हैं। नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में, पिछले कई सालों से मध्य प्रदेश पहले नंबर पर रहा है।

नाबालिग लड़कियों के साथ हिंसा-यौन हिंसा, आये दिन की बात है और सामूहिक बलात्कार सुर्खियों में हैं। गांव ही नहीं, छोटे-बड़े शहरों की गलियों से लेकर खेतों तक में लड़कियां यौन-हिंसा की शिकार बनाई जा रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दलितों पर अत्याचार (हत्या, हिंसा, यौन-हिंसा) में उत्तर प्रदेश पूरे भारत में सबसे आगे है। हालांकि दिल्ली में भी यौन हिंसा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। सवाल है कि दलितों के साथ ही अत्याचार-अन्याय के मामलों पर पुलिस उन्हें ही क्यों डराती-धमकाती है या समझौता करने का दबाव क्यों डालती है? दलितों पर अत्याचार के आरोपियों को सजा आखिर कब और कैसे होगी?

आये दिन की ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ है कि दलित कन्या से बलात्कार की कोशिश, विरोध करने पर लड़की के हाथ, पांव और कान काट डाले। विधायक ने दलित नाबालिग लड़की को मामूली चोरी के इल्जाम में जेल ही भिजवा दिया। दलित लड़की की लाश मिली, बलात्कार के बाद, उसी के दुपट्टे से गला घोंटकर हत्या। सोलह वर्षीय नाबालिग दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार। आठ साल की दलित बालिका की बलात्कार के बाद हत्या। बीस वर्षीय दलित लड़की से खेत में तीन युवकों द्वारा बलात्कार।

नौंवी क्लास की नाबालिग लड़की से बलात्कार, छेड़छाड़ का मामला दर्ज। एक महिला को जिंदा जलाने की कोशिश। बलात्कार की शिकार लड़कियों ने खुद को आग लगा ली। बलात्कार की शिकार दो नाबालिग लड़कियां मौत की नींद सो गईं। चार वहशी दरिंदों ने दलित के घर में घुस कर, मंद-बुद्धि युवती की इज्जत लूटी। दो युवकों ने तमंचों के बल पर, दलित युवती से बलात्कार किया। दलित युवती के साथ तीन ने सामूहिक दुष्कर्म किया। कामांध युवक द्वारा दलित नाबालिग युवती से बलात्कार और अज्ञात युवकों ने तमंचे के बल पर महिला की अस्मत तार-तार की।

यह सिर्फ संक्षेप में कुछ ही दुर्घटनाएं हैं। विस्तृत आंकड़ों में जाने की जरूरत नहीं। सैकड़ों मामले तो ऐसे भी हैं, जिनमें सामूहिक बलात्कार की शिकार दलित या आदिवासी लड़कियों को डरा-धमका कर (या 1000-2000 रुपये देकर) हमेशा के लिए चुप करा दिया गया। मां-बाप को गांव से बाहर करने और जेल भिजवाने की धमकी देकर, पुलिस और गुंडों ने सारा मामला ही दफना दिया। अखबारों में छपी तमाम खबरें झूठी साबित हुईं। पत्रकारों पर मानहानि के मुकदमे दायर किए गए। गवाहों को खरीद लिया गया और न्याय-व्यवस्था की आंखों में धूल झोंक कर अपराधी साफ बच निकले।

‘माथुर’ से लेकर ‘भंवरी बाई’ केस के शर्मनाक फैसले अदालतों से समाज तक बिखरे पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायमूर्तियों तक ने अनुसूचित-जनजाति अधिनियम की व्याख्या करते हुए कहा है कि प्रामाणित करो कि बलात्कार का मूलाधार जाति है, वरना सज़ा नहीं दी जा सकती। अपमान सार्वजनिक स्थल पर होना चाहिए और शिकायतकर्ता की वहां उपस्थिति अनिवार्य है, वरना तो कोई अपराध ही नहीं बनता। अगर अदालत के फैसले और दृष्टिकौन भी जातीय पूर्वाग्रहों या दुराग्रहों से मुक्त न हो तो इंसाफ कैसे संभव हो सकता है!

सत्ता में लगातार बढ़ रहे ‘दलित वर्चस्व’ के कारण, आहत और अपमानित कुलीन वर्ग के हमले, दलित स्त्रियों के साथ हिंसा या यौन हिंसा के रूप में बढ़ रहे हैं। राजनीति में अपनी हार का बदला, दलितों पर अत्याचार के माध्यम से निकाला जा रहा है। समाज और नौकरशाही में अब भी कुलीन वर्ग का बोलबाला है। दोहरा अभिशाप झेलती दलित महिलाएं, इसलिए भी बेबस और लाचार हैं, क्योंकि उनके अपने नेता, सत्ता-लोलुप अंधेरे और भ्रष्टाचार के वट-वृक्षों के मायाजाल में उलझ गए हैं। ऐसे दहशतजदा माहौल में, आखिर दलित महिलाओं की शिकायत कौन सुनेगा और कैसे होगा इंसाफ?

देश की बहुमंजिला इमारतें दरअसल विकास की भ्रामक छवि हैं। सच यह है कि सीमेंट के जंगल में राजनेताओं की छत्र-छाया में पल रहे, दबंगों की तादाद भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है। उच्च जाति के लोग, दलित महिलाओं को बलात हवस का शिकार बना और मनोबल कुचल कर, गांव-गांव में उन्हें नीचा दिखने का प्रयास करते रहते हैं। राज्य कि सत्ता भी उच्च जाति के राजनेताओं के हाथ में होने के कारण, राज्य में ‘अछूत की शिकायत’ सुनने वाला कोई नहीं।

ज्यादातर दलित महिलाएं खेतों-खलिहानों में या उनके घरों में काम करती हैं, इसलिए उनके बेख़ौफ़, आवारा और बेरोजगार युवकों की आसानी से शिकार बन जाती हैं। दलितों के साथ अत्याचार, उत्पीड़न, दमन और शोषण का इतिहास बहुत पुराना है, परंतु अब दलित समाज चुपचाप सहने और खामोश रहने को तैयार नहीं है।

दलितों में लगातार बढ़ रही शिक्षा और जागरूकता के कारण, वो अपने कानूनी अधिकारों के प्रति पहले से अधिक सजग हुए हैं और समाज में बराबरी और सम्मानपूर्वक जीने की मांग करने लगे हैं। बेटियों से आये दिन बलात्कार, अब नाकाबिले बर्दाशत होता जा रहा है। स्पष्ट है कि अगर समय रहते राज्य सरकारें, विपक्ष और आम समाज ने मिल कर, दलित लड़कियों की सुरक्षा के समुचित समाधान नहीं ढूंढे तो महिलाएं अपनी आत्मरक्षा में खुद ही हथियार उठाने के लिए विवश होंगी और तब बलात्कारियों को सजा से कोई नहीं बचा पाएगा।

‘कानूनी अधिकारों’ को जब जंग लग जाए तो आंदोलन और संघर्ष की दरांती, गंडासा या खुकरी को ‘विचारों की शान’ पर तेज़ करना पड़ेगा। रोने, चीखने या मोमबत्तियां जलाने से कुछ नहीं होने वाला। इस दहशतज़दा माहौल में श्रमजीवी महिला शक्ति को स्वयं, सड़क से संसद तक निर्णायक संघर्ष का संकल्प और मशाल ले आगे बढ़ना होगा।

(अरविंद जैन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)        

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This post was last modified on October 4, 2020 12:42 pm

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