Sat. Apr 4th, 2020

न्यू इंडिया में मंदी: स्किल इंडिया का पोस्टमॉर्टम

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वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में बनी पहली मोदी सरकार ने धूमधाम से अनेक योजनाएं शुरू कीं, जिनमें से अधिकतर के पाश्चात्य धुन जैसे नाम में उपसर्ग के रूप में इंडिया शब्द शामिल है। इनमें ‘स्किल इंडिया ‘भी है, जिसे ‘वर्ल्‍ड यूथ स्किल डे’ के अवसर पर 15 जुलाई 2015 को लागू किया गया।

इसे लागू करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के नए बने कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय को सौंपी गई। स्किल इंडिया मिशन का घोषित उद्देश्य भारत में रोजगार के लिए कामगार और युवाओं को हुनरमंद बनाना है। इसके तहत हर राज्‍य में स्किल यूनिर्वसिटी भी खोलने की घोषणा की गई। लेकिन ये घोषणाएं समुचित रूप से जमीन पर नहीं उतारी जा सकी। 

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सरकारी तौर पर देश में 2022 तक 10.4 करोड़ नए कामगार युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देने की जरूरत बताई गई है। उनके अलावा 29.8 करोड़ मौजूदा कामगार को भी अतिरिक्त स्किल ट्रेनिंग देने की आवश्यकता व्यक्त की गई है। इस मिशन को लांच करने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत में मौजूदा सदी की सबसे बड़ी जरूरत आईआईटी नहीं, बल्कि आईटीआई है।

स्किल विकास के मामले में भारत अन्य देशों से बहुत पीछे है। चीन में 45 फीसदी, अमेरिका में 56 फीसदी, जर्मनी में 74 फीसदी, जापान में 80 फीसदी और दक्षिण कोरिया में 96 फीसदी लोग स्किल ट्रेंड हैं। नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएसओ) के मुताबिक देश भर में सिर्फ 3.5 फीसदी युवा हुनरमंद हैं। देश को 2019 तक 12 करोड़ कुशल नए कामगार की जरूरत बताई गई थी, लेकिन सरकारी आंकड़ों के ही अनुसार इसके तहत अभी तक बमुश्किल 50 लाख युवाओं को ही रोजगार उपलब्ध किया जा सका है।

दैनिक अखबार बिजनेस लाइन की एक रिपोर्ट में राज्यसभा में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के हवाले से कहा गया है कि इस योजना के तहत जुलाई 2019 तक प्रशिक्षित करीब 72 लाख लोगों में से 21 प्रतिशत को ही रोजगार उपलब्ध हो सका। सर्वाधिक 29 प्रतिशत सफलता तेलंगाना में मिली। हरियाणा, पंजाब और आंध्र प्रदेश में एकसमान 28 प्रतिशत, तमिलनाडु में 26 प्रतिशत तथा केरल और महाराष्ट्र में 10-10 प्रतिशत की सफलता दर्ज हुई। चौंकाने वाली बात यह है कि सर्वाधिक करीब 10 लाख युवाओं को प्रशिक्षण उत्तर प्रदेश में दिया गया, लेकिन इनमें से महज 20 प्रतिशत को ही रोजगार मिल सका।

स्किल इंडिया मिशन के तहत 20 से अधिक केंद्रीय मंत्रालय और विभाग अल्प अथवा दीर्घ अवधि के प्रशिक्षण संचालित कर रहे हैं। इनमें शामिल नेशनल स्कि‍ल डेवलपमेंट मिशन, नेशनल पॉलिसी फॉर स्किल डेवलपमेंट एंड आंत्रप्रेन्योरशिप, स्किल लोन स्कीम और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत 2022 तक कुल 40 करोड़ लोगों को कुशल बनाने का लक्ष्य निर्धारित है। स्किल इंडिया मिशन के तहत ही वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाय) भी शुरू की गई। पीएमकेवीवाय के तहत कंस्ट्रक्शन, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं हार्डवेयर, फूड प्रोसेसिंग, फर्नीचर और फिटिंग, हैंडी क्रॉफ्ट, जेम्स एवं ज्वेलरी,लेदर टेक्नोलॉजी जैसे 40 तकनीकी पाठ्यक्रम का संचालन किया जाता है।

इसका उद्देश्य युवाओं में कौशल विकास कर उनके लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना है ताकि वे पूरी तरह से नौकरी, रोजगार के लिए तैयार हो सके और कंपनियों को उनके प्रशिक्षण पर धन खर्च नहीं करना पड़े। इसके लिए 12,000 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया। लेकिन पीएमकेवीवाय के तहत वर्ष 2020 तक जितने युवाओं को कुशल बनाने का लक्ष्य है, वह पूरा होना मुश्किल लगता है।

गौरतलब है कि इस योजना के तहत देश भर में 2500 से ज्यादा सेंटर खोले गए। कई लोगों ने अपनी नौकरी छोड़कर ऐसे फ्रैंचाइजी सेंटर खोलने में निवेश किया, लेकिन ज्यादातर सेंटर बंद हो गए हैं। स्किल इंडिया की नीति में बार-बार बदलाव की वजह से कई फ्रैंचाइजी सेंटर बंद हो गए हैं। इन सेंटर से कौशल हासिल करने वाले युवाओं के करीब आधे का ही प्लेसमेंट हो पाया है। आरोप है प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत चलने वाले सेंटरों को सरकार ही काम नहीं दे रही है। निजी क्षेत्र की शिकायत है कि डिग्री धारी युवाओं का बड़ा हिस्सा वास्तव में नौकरी के लायक ही नहीं होता।

एसोसिएशन ऑफ़ चेंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (एसोचैम) के एक अध्ययन में दावा किया गया है कि 94 फीसदी एमबीए ग्रेजुएट नौकरी के लायक नहीं है। टेक इंडस्ट्री को लगता है कि 94 फीसदी आईटी ग्रेजुएट बड़ी कंपनियों में काम करने के लायक ही नहीं हैं।

इस मिशन में केंद्र सरकार के रेल मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय, स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, इस्‍पात मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय, नवीन एवं नवीकरण ऊर्जा मंत्रालय और सामाजिक न्‍याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भी शामिल हैं। इस योजना में निजी क्षेत्रों की भी भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।

सरकार द्वारा घोषणा की गई कि वह स्किल लोन स्‍कीम के तहत पांच वर्ष में 34 लाख स्किल्‍ड बेरोजगार युवाओं को ऋण देगी। स्किल डेवलपमेंट के लिए पीपीपी प्रोजेक्‍ट भी शुरू करने की घोषणा की गई। इस मिशन से 160 ट्रेनिंग पार्टनर्स और 1722 ट्रेनर्स जोड़े गए। करीब 35 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी गई। 20 सरकारी संस्थाएं स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम को चला रही हैं।

रेलवे ने इस मिशन के लिए अलग से 450 संस्थाओं और ट्रेनिंग सेंटर को चुना है। सरकार ने जो आंकड़े दिए हैं उसके अनुसार फार्मा सेक्‍टर में 35 लाख और माइनिंग सेक्‍टर में 45 लाख ट्रेंड लोगों की जरूरत है। सीआईआई-एआईसीटीई की 2019 की इंडिया स्किल रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2014 में 33.95 फीसदी भारतीय युवा रोजगार लायक थे और यह आंकड़ा 2019 में 47.3 करोड़ है।

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना को मिनिस्ट्री ऑफ़ स्किल डेवलपमेंट एंड एंट्रेप्रेनरशिप (एमएसएडीई) द्वारा नियंत्रित और नियमित किया जाता है। सरकार ने इस योजना के लिए 12000 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया। इस योजना के तहत देश में 2500 से भी ज्यादा सेंटर खोले गए। कई लोगों ने नौकरी छोड़कर सेंटर खोलने में पैसा लगाया, लेकिन स्किल इंडिया सेंटर की हालत बहुत खराब हो चुकी है। 

हाल में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा भारत में बेरोजगारी के आंकड़े जारी किए गए, जिनके मुताबिक़ वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी रही। ये आंकड़े जुलाई 2017 से जून 2018 की आवधि में श्रम बल सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर जारी किए गए हैं। 2016 में विमुद्रीकरण के बाद यह देश में बेरोजगारी पर किसी सरकारी एजेंसी की ओर से तैयार नवीनतम रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक़ शहरों में बेरोजगारी की दर गावों के मुक़ाबले 2.5 फीसदी ज़्यादा है। 7.8 फीसदी शहरी युवा बेरोजगार हैं। गांवों में ये आंकड़ा 5.3 फीसदी है। इसके अलावा अखिल भारतीय स्तर पर पुरुषों की बेरोज़गारी दर 6.2 फीसदी और महिलाओं की बेरोजगारी दर 5.7 फीसदी रही।

रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 15 से 29 वर्ष की आयु के युवकों में बेरोज़गारी की दर साल 2011-12 में पांच फीसदी थी जो 2017-18 में बढ़ कर 17.4 फीसदी तक पहुंच गई। इसी उम्र की महिलाओं में यह दर 4.8 से बढ़ कर 13.6 फीसदी तक पहुंच गई।

आज़ादी के बाद भारत ने नब्बे के दशक तक कृषि क्षेत्र पर ध्यान दिया, ताकि देश की विशाल आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा किया जा सके। 1991 में उदारीकरण के बाद देश में सेवा क्षेत्र ने गति पकड़ी। सेवा क्षेत्र की तेज गति के सामने कृषि और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र पिछड़ गए। बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए देश की अर्थव्यवस्था को श्रम प्रधान उद्योगों की ज़रूरत है, लेकिन सरकार की गलत नीतियों से बेरोजगारी की स्थिति बहुत गंभीर हो गई, जिसका असर मंदी के मौजूदा दौर में देखा जा सकता है।

देश में अधिक से अधिक रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने जो स्टैंडअप इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया की शुरुआत की उनमें भी कोई सफलता नहीं मिली। भारत में आज 65% कार्यशील युवा आबादी है। विशेषज्ञों के बीच इस बात पर सहमति है कि इस जनसांख्यिकी क्षमता का समुचित लाभ युवा आबादी को कुशल बनाकर ही उठाया जा सकता है। वे अपने कौशल के विकास की बदौलत भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं बशर्ते कि कौशल विकास की योजनाएं मिथ्या प्रचार के लिए नहीं जमीनी वास्तविकताओं के अनुरूप सही तरीके से लागू की जाए।

भारत के कुशल कामगारों की विश्व में मांग कम नहीं है। मध्य एशिया, पश्चिम एशिया से लेकर अफ्रीका तक में भारत के कुशल श्रमिकों की मांग है, लेकिन भारत के कामगारों को रोजगार उपलब्ध कराने के समुचित सांस्थानिक प्रयास नहीं किये जा सके हैं। चीन जैसे देशों के लोग अपनी सरकार की सहायता से विश्व भर में रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। चीन ने ऐसे 65 देशों की पहचान की है, जहां चीनी निवेश के आधार पर चीनी लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है। भारत को भी ऐसी दीर्घकालिक नीति अपनानी होगी।
(जारी है…)

चंद्र प्रकाश झा
(न्यू इंडिया में मंदी के लेखक।)

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