महामारी में विज्ञान और धर्म

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कोरोना महामारी के दौर में तबलीगी जमात की नामसझ गतिविधियों ने अपना और देश-दुनिया का जो नुकसान किया है उससे यह बात उजागर हो रही है कि धर्म का कट्टर और संगठित रूप मानवता के लिए कितना घातक है। लेकिन इसे इस्लाम को मानने वाले सभी लोगों का व्यवहार मानना उतना ही गलत है जितना कि अपने से असहमत होने वाले हर व्यक्ति को देशद्रोही मानना। इसी एक घटना को आधार बनाकर न तो किसी एक धर्म को जाहिल कहा जाना चाहिए और न ही अन्य धर्म को सर्वाधिक विवेकवान और विज्ञान सम्मत।

क्योंकि सारे धर्म ईश्वर के बहाने सत्य तक पहुंचने का एक मार्ग ही हैं और हर धर्म एक दूसरे जैसा ही अपूर्ण है। निश्चित तौर पर आज अस्पताल और प्रयोगशालाएं किसी भी पूजा घर और साधना केंद्र से ज्यादा अहमियत रखते हैं लेकिन इसी आधार पर यह मान लेना ठीक नहीं है कि मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और दूसरे पूजा स्थलों के कपाट बंद होने से धर्म हार गया है और विज्ञान जीत गया है। 

आजकल कुछ हैसटैग उन लोगों में बहुत लोकप्रिय हैं जो धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास की जगह पर वैज्ञानिक दृष्टि का विकास चाहते हैं। वे हैसटैग हैं—साइंस आन ड्यूटी, रिलीजन आन हालीडे, गॉड इज नाट पावरफुल। यह दृष्टि उस सोच से निकली है जहां माना जाता है कि विज्ञान और धर्म के बीच में कोई युद्ध चल रहा है और सोवियत संघ के विघटन के बाद अगर धर्म हावी हो गया था तो महामारी के साथ फिर धर्म के मुकाबले विज्ञान की प्रासंगिकता स्थापित होने लगी है। दरअसल इस दौर में यह कहना ज्यादा सही होगा कि सत्य और अच्छाई का दावा करने वाला धर्म खामोशी से विज्ञान और राजनीति में समा गया है।

वह उन दोनों का सहोदर बनकर इंसान की सेवा में ज्यादा जोर से लग गया है। वह विज्ञान से सहयोग कर रहा है। लेकिन सहयोग की यह कड़ी वहां टूट जाती है जब हमारी धर्म की सोच से निकली राजनीति युद्ध की भाषा बोलती है। कहीं वह वायरस जैसी एक अदृश्य शक्ति से महायुद्ध का आह्वान करती है तो कहीं वह 18 दिन के महाभारत की याद दिलाती है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि वायरस का संक्रमण एक प्रकार का आक्रमण है। एक प्रकार की हिंसा है लेकिन उसका मुकाबला हिंसा की रणनीति और भाषा से हो नहीं सकता। वैज्ञानिकों की राय है कि वायरस मनुष्य के शरीर और उसकी कोशिकाओं पर उसी प्रकार आक्रमण करता है जैसे कोई दुश्मन पर हमला करता है और जिस पर हमला करता है उसकी स्वतंत्रता, स्वायत्तता पर कब्जा करके उसे गुलाम बना लेता है और उससे अपनी जरूरत का उत्पादन और व्यवहार करवाने लगता है। वायरस कोशिकाओं के डीएनए यानी संचालन केंद्र पर कब्जा कर लेता है और उससे उसी प्रकार का आदेश जारी करवाता है जैसी उसकी जरूरत होती है।

इस युद्ध के बावजूद यह कहना कतई विवेकसंगत नहीं होगा कि मनुष्य और उसका विज्ञान सभी प्रकार के वायरसों का नाश कर देगा और उन्हें भी समाप्त कर देगा जो उनके वाहक हैं। महामारी के इस समय में सीबीएसई और दूसरी परीक्षाएं भले स्थगित हो गई हों लेकिन मनुष्य के समस्त संचित ज्ञान की कठिन परीक्षा चल रही है। प्रकृति महामारी और वायरस के रूप में मानव जाति की इस बात की परीक्षा ले रही है कि वह उसके साथ कितना तालमेल बिठा सकता है और अपने भविष्य के लिए किस हद तक पुनर्विचार करते हुए नई पर्यावरण चेतना और जीवन दर्शन विकसित कर सकता है।

वायरस एक प्रकार से नए पृथ्वी घोषणा पत्र की मांग कर रहा है। इसीलिए दुनिया भर के जैव वैज्ञानिक इस बात की खुलकर चर्चा कर रहे हैं कि हमें क्या खाना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, किससे कितनी दूरी रखनी चाहिए और अपनी प्रतिरोधक क्षमताओं को किस हद तक विकसित करना चाहिए। जाहिर है कि इस दौर में जितनी आचार संहिताएं निकलेंगी वे आगे तक प्रयोग में आने वाली हैं। यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अतीत में अगर शाकाहार करने और वन व जीवों की रक्षा करने वाले बौद्ध और जैन धर्म का विकास हुआ तो उसके पीछे वनों और वन्य जीवों का अत्यधिक विनाश और युद्ध की घटनाएं रही हैं। इसलिए इस घटना के बाद अगर विश्व में नए किस्म का मानव धर्म चल निकला तो आश्चर्य नहीं होगा।

यह महज संयोग नहीं है कि 1918-1920 तक पूरी दुनिया में पांच से दस करोड़ लोगों की जान लेने वाले इनफ़्लुएंज़ा पर चर्चित पुस्तक- द ग्रेट इनफ़्लुएंज़ा- लिखने वाले अमेरिकी पत्रकार जान बैरी कहते हैं कि इस दौर में दो चीजों की निहायत जरूरत है। एक है सत्य और दूसरा है विश्वास। सत्य का आविष्कार हमें मनुष्य और प्रकृति के जटिल रिश्तों को समझने में मदद करता है और विश्वास हमें इसी सत्य के आधार पर राज्य और नागरिक के बीच कल्याणकारी संबंधों का निर्माण करने की प्रेरणा देता है।

अगर आज दुनिया भर के वैज्ञानिक राष्ट्रीय संकीर्णता को त्यागकर पूरी मानवता के लिए एक जुट होने की बात कर रहे हैं तो यह आह्वान उसी सत्य के लिए है जिसे भूलकर मनुष्य मुनाफा और प्रकृति का विनाश करने वाले तो फर्जी किस्म के वैश्वीकरण में उलझ गया है। यही वजह है कि जुआल नोवा हरारी जैसे इतिहासकार आज वैश्विक सहयोग और विश्वास की सबसे ज्यादा जरूरत बता रहे हैं। नाम चोमस्की जैसे विचारक महामारी को मानवता के लिए खतरा बताते हुए उन खतरों को भूलने के विरुद्ध चेतावनी दे रहे हैं जो लाभ केंद्रित वैश्वीकरण और उग्र राष्ट्रवाद जनित नाभिकीय हथियारों के साथ उपस्थित विश्वयुद्ध, असमानता और नफरत के रूप में समाप्त नहीं हुआ है।

कभी डायसन कार्टर ने अपनी चर्चित पुस्तक `पाप और विज्ञान’ में दावा किया था कि साम्यवादी व्यवस्था ने धार्मिक व्यवस्था को खत्म करके वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से वेश्यावृत्ति, देहव्यापार, तलाक, गुप्तरोग, गर्भपात और व्याभिचार जैसी समस्याओं से निजात पा लिया है जबकि धर्म को साथ लेकर चलने वाली पूंजीवादी व्यवस्था उसे नहीं रोक पाई है। संभव है आज उस विचार को कोई चीन में स्थापित करने की कोशिश करे और कहे कि किस तरह चीन ने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों और अनुशासित व्यवस्था से कोरोना की महामारी को नियंत्रित कर लिया है जबकि यूरोप और अमेरिका तबाह हो रहा है। लेकिन ध्यान देने की बात है कि यूरोप के जिन देशों में महामारी ने विकराल रूप धारण किया है वहां पर लोकतांत्रिक समाजवादी दलों की बहुतायत है।

इस बीच वायरल युद्ध की साजिश वाली थ्योरी भी खूब जोर पकड़े हुए है। ऐसे में एक हद तक यही कहा जा सकता है कि इस महामारी का कारण सत्य के अनुसंधान और पारस्परिक विश्वास को कायम करने के उपायों से मुंह मोड़ लेने में है। विज्ञान के उद्देश्यों को समझने की बजाय इंसान ने राष्ट्र केंद्रित बायोटेक्नॉलाजी और सूचना प्रौद्योगिकी के विकास में ज्यादा ऊर्जा व्यय की और धर्म ने मनुष्य के आंतरिक सत्य को समझने और जगत के सभी जीवों में पारस्परिक एकता को समझने की बजाय उसमें विभेद करने में अपना समय लगाया। सत्य की हत्या का यही प्रयास इंसानियत की हत्या का प्रयास भी है।

मशीन पर मनुष्य के नियंत्रण की बात करने वाले और 1918 की महामारी परिवार के सदस्यों को गंवाने वाले महात्मा गांधी इन्हीं अर्थों में कहते हैं कि ईश्वर सत्य नहीं है बल्कि सत्य ही ईश्वर है। यहां उनका यह कथन और भी प्रासंगिक है कि जिस प्रकार एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में सत्य का अनुसंधान करता है उसी प्रकार एक सत्याग्रही अपने मन- मस्तिष्क (हृदय) के भीतर सत्य का अनुसंधान करता है।

सत्य के अनुसंधान का अर्थ वायरस की तरह दूसरे पर आक्रमण करना और हिंसा करना नहीं है। जो वैसा करते हैं वे महामारी फैलाने वाले एक वायरस ही हैं। सत्य के अनुसंधान का मतलब है जगत और मानव मन के विविध सत्यों को स्वीकार करना और उनके साथ संतुलन बिठाने का आचरण करना। यहां पर आकर धर्म और विज्ञान के बीच टकराव समाप्त हो जाता है। क्योंकि वे मानवता के साथ पृथ्वी नामक ग्रह का कल्याण भी करते हैं। 

इस समय गांधी के एक और साथी विनोबा भावे का वह कथन अहम हो जाता है कि धर्म और राजनीति का संगठित रूप मानवता के लिए घातक है। प्रकृति के विकास का नियम है कि जो संरचना उसके लिए घातक होती है वह धीरे धीरे नष्ट हो जाती है। इसलिए वे कहते हैं कि धर्म के संगठित कट्टर ढांचे और राजनीति के कलही ढांचे को एक दिन नष्ट होना है। धर्म का अच्छा काम अध्यात्म ही है और इसी नाते विनोबा जय जगत की बात करते हैं। आखिर में विज्ञान और अध्यात्म दो जरूरी चीजें इंसान के लिए बचेंगी और उन्हीं से उसका और इस जगत का काम चलेगा।

महामारी के इस समय में दुनिया भर के नासमझ लोग अगर सांप्रदायिकता और राष्ट्रीयता पर आधारित साजिश के आख्यान चला रहे हैं तो समझदार लोग अपने अपने घरों में अपने-अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर आत्ममंथन कर रहे हैं और दुनिया भर के डॉक्टर और वैज्ञानिक मानवता का उपचार करने के साथ नए अनुसंधान कर रहे हैं। इसीलिए उन्हें इस युग का सच्चा सिपाही कहा जाना चाहिए और उनकी मृत्यु सच्ची शहादत है। यह धर्म और विज्ञान के समन्वय और दोनों के उदार होने का समय है। यह सत्य पर केंद्रित दोनों के श्रेष्ठ आदर्शों को मिलाने का दौर है और यहीं से हमें प्रकाश का नया मार्ग भी मिलेगा। 

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्धा तथा भोपाल स्थित पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में अध्यापन का काम कर चुके हैं।) 

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