Friday, January 21, 2022

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धर्म की अफीम चटाकर, ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति को आरएसएस ने कैसे रोका

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डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में दलित लोकतांत्रिक क्रांति के बाद यदि भारत में ब्राह्मणवाद की कब्र खोदने वाली कोई लोकतांत्रिक क्रांति हो सकती थी, तो वह थी- ओबीसी क्रांति (शूद्र क्रांति)। यदि दलित लोकतांत्रिक क्रांति के बाद ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति इस देश में संपन्न हो जाती तो ब्राह्मणवाद का करीब-करीब खात्मा हो जाता। ब्राह्मणवाद मतलब सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक  और आर्थिक जीवन में तथाकथित उच्च जातियों का नियंत्रण, प्रभुत्व और वर्चस्व। भारत में ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति ( शूद्र क्रांति) का एक रूप तमिलनाडु में दिखाई देता है, भले ही उसकी कई सारी सीमाएं हों। यदि तमिलनाडु जैसी पिछड़ा वर्ग की लोकतांत्रिक क्रांति  भी पूरे भारत में हो जाती, तो भारत सच्चे अर्थों में एक लोकतांत्रिक देश बन जाता और कम से कम सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में आज की तुलना में बहुत ज्यादा समता, स्वतंत्रता और बंधुता होती। यदि तमिलनाडु जैसी भी पिछड़ा वर्ग की क्रांति पूरे भारत, विशेषकर हिंदी पट्टी ( गाय पट्टी) में हो जाती, तो भारत की राजनीतिक सत्ता पर पूरी तरह कब्जा करने की आरएसएस की मंशा कभी पूरी नहीं होती। आरएसएस का अनुषांगिक संगठन ( भाजपा) कभी भी भारत की केंद्रीय सत्ता पर कब्जा नहीं कर पाता।

दलित लोकतांत्रिक क्रांति की तुलना में आरएसएस को ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति से ज्यादा डर लगता था, क्योंकि दलित इस देश में अल्पसंख्यक हैं, जबकि ओबीसी  बहुसंख्यक हिस्सा ( 50 प्रतिशत से अधिक) हैं, यदि दलितों की तरह ही भारत का यह बहुसंख्यक हिस्सा भी ब्राह्मणवाद से बगावत कर देता, तो इस देश से तथाकथित उच्च जातियों का वर्चस्व का खात्मा हो जाता और इसके साथ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का आरएसएस का ख्वाब भी धूल-धूसरित हो जाता। 

आरएसएस को ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति (शूद्र क्रांति) से कितना डर लगता है, इसका अंदाज मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने ( व्यवहारिक अर्थ में पूरे भारत के स्तर पर ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति की शुरुआत) की वीपी सिंह की घोषणा के बाद आरएसएस की उस प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है, जिसमें उसने मंडल कमीशन लागू करने की घोषणा को ‘शूद्र क्रांति’ की संज्ञा दी और उसे किसी भी कीमत पर रोकने की रणनीति बनाने का आह्वान किया था। ‘शूद्र क्रांति’ ( ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति) रोकने लिए आरएसएस ने अध्यात्मिक क्रांति ( धार्मिक क्रांति) शुरू करने की बात कही। मंडल कमीशन की 40 सिफारिशों में से एक सिफारिश ( सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण) को जब वीपी सिंह ने लागू करने की घोषणा की और दूसरी सिफारिश ( उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण) लागू करने की जब अर्जुन सिंह ने घोषणा की तो आरएसएस के मुख पत्र आर्गेनाइजर की प्रतिक्रिया थी कि “संभावित शूद्र क्रांति ( सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण) से होने वाले नुकसान का मुकाबला करने के लिए तुरंत नैतिक और आध्यात्मिक ताकतों को गठित करना जरूरी है।” और जब मंडल-II ( उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण) लागू हुआ, तो उसी अखबार ने तर्क दिया कि “केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार योग्यता के अंतिम गढ़ को भी ध्वस्त करने पर आमादा है …..।” ( स्रोत- क्रिस्टॉफ जैफ्रेलॉट, दी इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख)

मंडल कमीशन की एकमात्र सिफारिश को लागू करने के बाद ( आरएसएस के शब्दों में शूद्र क्रांति की शुरूआत) आरएसएस ने इस क्रांति को रोकने के लिए भारत में  धार्मिक क्रांति ( भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की परियोजना) की शुरुआत की। ओबीसी के बीच अपने हक के लिए उभर रही व्यापक चेतना और आकांक्षा ( जो तथाकथित उच्च जातियों के वर्चस्व को तोड़ देती) को धार्मिक दिशा देकर, मुस्लिम विरोध में बदल दिया गया और पिछड़ों के नेतृत्वकारी समूह के एक बड़े हिस्से को राम मंदिर अभियान में लगा दिया गया है। इसकी पहली खेप के रूप में कल्याण सिंह, उमा भारती और विनय कटियार जैसे लोग सामने आए। फिर तो ऐसे लोगों की बाढ़ ही आ गई, तो जो पद और नेतृत्व प्राप्त की आकांक्षा में आरएसएस का मोहरा बन गए। ऐसे मोहरों ने ओबीसी समुदाय के ध्यान को अपने वास्तविक हकों की तरफ से मोड़ दिया और उन्हें हिंदुत्व के रक्षक सेना में तब्दील कर दिया। 

2014 में आरएसएस के लिए सबसे बड़े मोहरे के रूप में नरेंद्र मोदी मिले, जिन्होंने अन्य पिछड़े वर्गों की चेतना एवं आकांक्षा का पूरी तरह हिंदुत्वीकरण कर दिया और उन्हें भाजपा के वोट बैंक में तब्दील कर दिया तथा संभावित ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति को हिंदुत्ववादी प्रतिक्रांति में तब्दील कर दिया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आरएसएस के किसी भी पिछड़े वर्ग के नेता ने कभी मंडल कमीशन की शेष 38 सिफारिशों को  लागू करने की बात भी कभी मुंह से नहीं निकाली, जो ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति को ठोस आधार मुहैया कराती है।

जिन ओबीसी नेताओं को ओबीसी क्रांति ( आरएसएस की भाषा में शूद्र क्रांति) संपन्न करनी थी, वो हिंदुत्व की प्रतिक्रांति ( उच्च जातियों-उच्च वर्गों के वर्चस्व को बनाए रखने वाली क्रांति) संपन्न करने लगे। इस प्रक्रिया में ओबीसी समुदाय के वोटरों का भी बड़े पैमाने पर हिंदुत्वीकरण किया गया और उनके मतों का हिंदुत्ववादी प्रतिक्रांति के लिए इस्तेमाल किया गया।

इसका परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है, एक ओर जहां एक-एक करके ओबीसी की जायज मांगों को खारिज किया जा रहा है, वहीं उन्हें उनके वाजिब हकों से भी वंचित किया जा रहा है। इसके साथ ही संविधान और लोकतंत्र भी खतरे में पड़ गया है। ओबीसी के साथ न्याय करने के लिए सबसे आधारभूत मांग जाति जनगणना को नरेंद्र मोदी ( तथाकथित पिछड़े) की सरकार ने खारिज कर दिया है। ओबीसी के पिछड़ेपन की वास्तविक आंकड़े न होने के नाम पर सुप्रीमकोर्ट ओबीसी को विभिन्न राज्यों द्वारा दिए जा रहे आरक्षण को खारिज कर रहा है। आज कोई भी पार्टी या नेता (जिसमें पिछड़े वर्ग के नेता और पार्टी भी शामिल हैं) मंडल कमीशन की शेष 38 सिफारिशों को लागू करने बात नहीं कर रहा है, चारों ओर इस मुद्दे पर चुप्पी है, सिर्फ ओबीसी समाज के कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी ही इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं।

अपने को पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधि कहने वाली हिंदी पट्टी की पार्टियां भी हिंदुत्ववादी प्रतिक्रांति के दबाव में ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति के प्रश्न पर चुप्पी साधे हुए हैं। ओबीसी क्रांति को अंजाम तक ले जाने के लिए जाति जनगणना पहला प्रवेश द्वार है। यही कारण कि भारत का शासक वर्ग ( उच्च जातीय-उच्च वर्गीय मर्द) और वर्तमान सत्ताधारी दल ( भाजपा) जाति जनगणना किसी भी सूरत में नहीं होने दे रहे हैं, क्योंकि जाति जनगणना ओबीसी क्रांति का रास्ता खोल देगी, जो हिंदुत्व की पूरी परियोजना को खतरे में डाल देगा। ओबीसी क्रांति के लिए दूसरी जरूरत है- मंडल कमीशन की शेष सिफारिशों को लागू करना। इसके लिए जरूरी है कि ओबीसी की वर्तमान सामाजिक-शैक्षिक और आर्थिक स्थिति के आंकड़े मौजूद हों। जाति जनगणना से यह तथ्यात्मक तौर पर पता चल जाएगा कि कैसे तथाकथित उच्च जातियों ने देश के अधिकांश संसाधनों और पदों पर कब्जा कर रखा है और वे मुख्यत: ओबीसी के हकों को ही छीने हुए हैं।

जिस ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति ( शूद्र क्रांति) को आरएसएस रोकना चाहता था, उसमें वह पूरी तरह सफल हुआ है और यह कार्य उसने ओबीसी के नेताओं के हाथों ही संपन्न कराया है, जिसके सबसे बड़े चैम्पियन नरेंद्र मोदी हैं। भारत के इतिहास में ओबीसी के हितों को ओबीसी का होने के नाम पर नरेंद्र मोदी से अधिक नुकसान पहुंचाने वाला कोई व्यक्ति नहीं पैदा हुआ है। नरेंद्र मोदी स्वयं ही राममंदिर आंदोलन की पैदाइश हैं।

ओबीसी क्रांति ( शूद्र क्रांति) सिर्फ ओबीसी के लिए ही न्याय नहीं दिलाती,बल्कि पूरे भारत के वंचित तबकों को न्याय का आधार मुहैया कराती है। ओबीसी क्रांति एक न्यायपूर्ण, समतामूलक, बंधुता आधारित लोकतांत्रिक भारत की अनिवार्य शर्त है, यह लोकतंत्र की रक्षा के लिए भी जरूरी है। जहां ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति को दार्शनिक-वैचारिक आधार जोतीराव फुले, शाहू जी महराज, ई. वी. रामसामी पेरियार, नारायण गुरु, चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’, पेरियार ललई सिंह यादव, जगदेव बाबू, कर्पूरी ठाकुर, रामस्वरूप वर्मा आदि ने मुहैया कराते हैं, वहीं उसे ठोस लोकतांत्रिक  क्रांति में बदलने का व्यवहारिक प्रस्ताव मंडल कमीशन की रिपोर्ट ने प्रस्तुत किया।

हिंदुत्ववादी प्रतिक्रियावादी विचारधारा, राजनीति और कार्यक्रम को पराजित करने के लिए इस देश में दलित लोकतांत्रिक क्रांति के साथ ही ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति की भी  जरूरत है, इस क्रांति के बिना न तो आरएसएस को पराजित किया जा सकता है और न ही भाजपा को निर्णायक तौर पर सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि धर्म की अफीम चाटकर नशे में हिंदुत्व का रथ हांक रहे ओबीसी समुदाय को अफीम के नशे से मुक्त किया जाए और ओबीसी के नाम पर हिंदुत्व की राजनीति करने वाले नरेंद्र मोदी और उन जैसे अन्य नेताओं की वास्तविक हकीकत से अन्य पिछड़े वर्ग को रूबरू कराया जाए।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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