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सबरीमाला पर असहमत फैसला

उच्चतम न्यायालय की पांच जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं को तीन जजों ने बहुमत से सात जजों की संविधान पीठ को भेज दिया है। चीफ जस्टिस  रंजन गोगोई, जस्टिस खानविलकर और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने मामले को सात जजों की संविधान पीठ को भेज दिया, जबकि दो जजों, जस्टिस नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसके खिलाफ अपना निर्णय दिया है।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि धार्मिक प्रथाओं को सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और भाग-3 के अन्य प्रावधानों के खिलाफ नहीं होना चाहिए, जबकि जस्टिस नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि संविधान सर्वोपरि है और अनुच्छेद 25 में तत्ससंबंधी प्रावधान हैं जो एक ही धर्म के मानने वाले अलग-अलग समुदायों कि अलग-अलग धार्मिक आस्था और विश्वास का अनुपालन अक्षुण्ण रखते हैं।

चीफ जस्टिस गोगोई ने कहा कि याचिकाकर्ता इस बहस को पुनर्जीवित करना चाहता हैं कि धर्म का अभिन्न अंग क्या है? यह याचिका दायर करने वाले का मकसद धर्म और आस्था पर वाद-विवाद शुरू कराना है। पूजा स्थलों में महिलाओं का प्रवेश सिर्फ मंदिर तक सीमित नहीं है, मस्जिदों में भी महिलाओं का प्रवेश शामिल है। तीन जजों ने सबरीमाला मंदिर ही नहीं, मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश तथा दाऊदी बोहरा समाज में स्त्रियों के खतना सहित विभिन्न धार्मिक मुद्दे नए सिरे से विचार के लिए सात सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपा है।

सबरीमाला मंदिर में दस से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का प्रवेश वर्जित होने संबंधी व्यवस्था को असंवैधानिक और लैंगिक तौर पर पक्षपातपूर्ण करार देते हुए 28 सितंबर, 2018 को तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाया था। इस पीठ की एकमात्र महिला सदस्य जस्टिस इन्दु मल्होत्रा ने अल्पमत का फैसला सुनाया था। जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि धर्मनिरपेक्षता का माहौल कायम रखने के लिए कोर्ट को धार्मिक अर्थों से जुड़े मुद्दों को नहीं छेड़ना चाहिए।

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन और  जस्टिस न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ ने सबरीमाला मामले को सात जजों वाले संविधान पीठ में भेजने से असहमति जताते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए कि भारत का संविधान ‘पवित्र पुस्तक’ है। हाथ में इस पुस्तक को लेकर भारत के नागरिक एक राष्ट्र के रूप में एक साथ चलते हैं, ताकि वे भारत के महान चार्टर द्वारा निर्धारित महान लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मानव प्रयास के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ सकें। बड़ी पीठ को भेजे गए संदर्भ से अपनी असहमति व्यक्त करते हुए जस्टिस नरीमन ने जस्टिस चंद्रचूड़ की ओर से भी कहा कि इस न्यायालय के समक्ष लंबित अन्य मुद्दों पर विचार करते समय भावी संविधान पीठ या बड़ी पीठ क्या कर सकती है या नहीं कर सकती है। उन्होंने कहा कि सख्ती से बोल रहा हूं, कोर्ट के सामने बिल्कुल भी नहीं। जस्टिस नरीमन ने कहा कि इसी तरह जब अन्य मामलों की सुनवाई की जाएगी, तो उन मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ भारतीय युवा वकील एसोसिएशन और बनाम केरल एवं अन्य दिनांक 28 सितंबर 2018 हमारे फैसले को अच्छी तरह से संदर्भित कर सकती है। या तो इस तरह के फैसले को लागू कर सकती है, इस फैसले के महत्व को बता सकती है या इस फैसले के एक मुद्दे/मुद्दों को बड़ी पीठ को निर्णीत करने के लिए संदर्भित कर सकती है। यह सब भविष्य के संविधान पीठों या वृहत्तर पीठों के लिए करने के लिए है।

नतीजतन चीफ जस्टिस के फैसले में जिन मुद्दों को प्रमुखता में निर्धारित किया गया है यदि भविष्य में वे उत्पन्न होते है तो उन्हें उचित रूप से पीठ/पीठों द्वारा निपटा जा सकेगा जो मुसलमानों, पारसियों और दाउदी बोहराओं से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई करते हैं।

जस्टिस नरीमन ने कहा कि जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने जस्टिस चिन्नाप्पा रेड्डी के फैसले को आधार बनाया था जो जस्टिस चिन्नाप्पा रेड्डी का असहमति का फैसला था। अदालत ने उल्लेख किया कि एसपी मित्तल बनाम भारत संघ (1983) 1 एससीसी 51 में जस्टिस चिन्नप्पा रेड्डी का निर्णय एक असहमति का निर्णय था और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने चिन्नाप्पा के निर्णय को दृढ़तापूर्वक मानते हुए चिन्नाप्पा रेड्डी के इस फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि यह धार्मिक संप्रदाय के पहलू पर एक निर्णायक निर्णय है।

जस्टिस चिनप्पा रेड्डी के असहमतिपूर्ण निर्णय में निहित टिप्पणियों के आधार पर जस्टिस इंदु मल्होत्रा का निष्कर्ष इस पहलू पर एक संभावित दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता है। इस विवाद में और न पड़ते हुए हम केवल इसे दोहरा सकते हैं कि बहुमत के न्यायाधीशों ने सही ढंग से माना है कि जस्टिस चिन्नप्पा रेड्डी के विचार असंतुष्ट हैं, जैसा कि स्वयं जस्टिस चिनप्पा रेड्डी, जे ने माना था। जस्टिस नरीमन ने कहा कि इस मुद्दे के बारे में कि क्या सबरीमाला में धर्मस्थल से दस से 50 वर्ष की उम्र के बीच की महिलाओं को बाहर करने की प्रथा एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है, ऐसा कुछ भी नहीं दिखा जो यह प्रदर्शित कर रहा हो कि युवा महिलाओं का बाहर रखना एक आवश्यक धार्मिक परम्परा है। जस्टिस नरीमन ने कहा कि हमें किसी भी पाठ या अन्य अधिकारियों के माध्यम से कुछ भी नहीं दिखाया गया है, जैसा कि विद्वान चीफ जस्टिस द्वारा सही ढंग से इंगित किया गया था, जिसमें यह प्रदर्शित किया गया हो कि हिंदू मंदिरों में दस से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश न करने देना हिंदू धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा है। यह फिर से एक आधार है, जिसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि दोनों में कोई त्रुटि नहीं है, और क्योंकि मूल निर्णय देने से पहले जिन आधारों पर बहस की गई थी, उन्हीं आधारों पर पुनरीक्षण याचिका में एक बार फिर से दोहराया गया है। जस्टिस नरीमन ने कहा कि समीक्षा याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, और जस्टिस चंद्रचूड़ ने ‘संवैधानिक नैतिकता’ पर भरोसा करते हुए, निर्णय दिए थे, वे त्रुटिपूर्ण थे, क्योंकि संवैधानिक नैतिकता एक अस्पष्ट अवधारणा है, जिसे इस मामले में धार्मिक विश्वास एवं आस्था को कम करने के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता है।

संवैधानिक कानून और संवैधानिक व्याख्या कानून की व्याख्या से अलग है। संवैधानिक कानून अन्य बातों के अलावा, उस समय की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित हो रहा है। जैसा कि हमारे कुछ निर्णयों में समझाया गया है, ‘संवैधानिक नैतिकता’ संविधान द्वारा विकसित मूल्यों के अलावा और कुछ नहीं है, जो प्रस्तावना निहित हैं जिसे विभिन्न अन्य भागों, विशेष रूप से, भाग III और IV के साथ पढ़ा जाता है। जो पहले तर्क दिया गया था उस पर यह फिर से एक मात्र पुनर्विचार है, और किसी भी तरह से रिकॉर्ड को देखते हुए प्रत्यक्षत: त्रुटिपूर्ण नहीं कहा जा सकता है।

न्यायाधीशों ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि आस्था और विश्वास अदालतों द्वारा न्यायिक रूप से समीक्षा योग्य नहीं है। इसमें कहा गया है कि अनुच्छेद 25, एक ऐसा अनुच्छेद नहीं है, जो एक ही धर्म के लोगों के दूसरे वर्ग के विश्वास और पूजा के अधिकार पर रौंदने के लिए व्यक्तियों के एक विशेष वर्ग को पूर्ण स्वतंत्रता देता है। ऐसे तर्कों को पूरी तरह खारिज करने की आवश्यकता है। ये तर्क अनुच्छेद 25 का मखौल उड़ाते हैं। अनुच्छेद 25, जैसा कि बहुमत के निर्णयों द्वारा पुष्टि की गई है, एक ऐसा प्रावधान नहीं है जो व्यक्तियों के एक विशेष वर्ग को पूर्ण स्वतंत्रता देता है कि वे अपने ही धर्म से संबंधित व्यक्तियों के दूसरे वर्ग के विश्वास और पूजा के अधिकार को रौंद दें। अनुच्छेद 25 में निर्धारित किया गया है कि एक ही धार्मिक विश्वास के भीतर विभिन्न समूहों द्वारा धार्मिक अधिकारों के अलग-अलग मान्यता के बीच नाजुक संतुलन बना रहे।

जस्टिस नरीमन ने कहा कि फिसलन-ढलान का तर्क कि इस निर्णय का उपयोग धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित अन्य के धार्मिक अधिकारों को कमजोर करने के लिए किया जाएगा, निराधार है। इस मामले में बहुमत के निर्णयों का अनुपात केवल यह है कि दस से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को एक विशेष हिंदू मंदिर में उनकी पूजा के अधिकार का प्रयोग करने से रोकना भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार गलत है क्योंकि एक ही धार्मिक समूह के सभी व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यताओं को मानने के अपने मौलिक अधिकार का पालन करने के लिए; समान रूप से हकदार हैं, और (ii) यह अनुच्छेद 25 (2) (बी) के प्रावधानों की परिधि में आता है। बहुमत के निर्णयों में कहा गया है कि 1965 अधिनियम की धारा 3 अनुच्छेद 25 (2) (बी) के इस भाग के अनुसरण में एक कानून है, जो स्पष्ट रूप से ऐसे किसी भी रिवाज के विरुद्ध है, जो एक सार्वजनिक चरित्र की हिंदू धार्मिक संस्था में दस से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के पूजा करने के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है। अनुच्छेद 25 (1) में दो अन्य अपवाद भी शामिल हैं, अर्थात्, यह अधिकार सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है; और (बी) भाग III के अन्य प्रावधानों के अधीन भी है, जैसा कि बहुमत के निर्णयों में बताया गया है। इसलिए इस तर्क को भी अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।

एक बार जब पांच जजों की एक संविधान पीठ संविधान की व्याख्या करती है और कानून व्याख्या करती है, तो उक्त व्याख्या न केवल सभी अदालतों और न्यायाधिकरणों पर एक मिसाल के रूप में बाध्यकारी है, बल्कि सरकार, अर्थात् विधायिका और कार्यपालिका की समन्वय शाखाओं पर भी बाध्यकारी है। इसके बाद जो होता है वह यह है कि किसी मामले में संविधान पीठ जब फैसला सुना देता है तो उस फैसले का पालन करना सभी व्यक्तियों पर बाध्यकारी हो जाता है। इसके अलावा, संविधान के अनुच्छे 144 में कहा गया है कि भारत की नागरिकता पर अधिकार रखने वाले सभी व्यक्ति उच्चतम न्यायालय के आदेशों और फरमानों को लागू करने में सहायता के लिए बाध्य हैं। यह वह संवैधानिक योजना है जिसके द्वारा हम शासित हैं यानि कानून का शासन, जैसा कि भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित है।

उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय की आलोचना किया जा सकता है, लेकिन लोगों को गला घोंटने या प्रोत्साहित करने के लिए, उच्चतम न्यायालय के निर्देशों या आदेशों की अवहेलना करना हमारी संवैधानिक योजना में नहीं माना जा सकता है। भारत ने संविधान द्वारा निर्धारित कानून के शासन के प्रति वचनबद्ध होना चुना है। प्रत्येक व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए कि भारत का संविधान वह ‘पवित्र पुस्तक’ है, जिसे लेकर भारत के नागरिक एक राष्ट्र के रूप में एक साथ चलते हैं, ताकि वे भारत के महान चार्टर द्वारा निर्धारित महान लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मानव प्रयास के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ सकें। इसलिए संविधान का अनुपालन विकल्प का विषय नहीं है।

जस्टिस नरीमन ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फ़ैसले के बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों की निंदा करते हुए कहा है कि शीर्ष अदालत का आदेश सभी पर लागू होता है और इसका पालन करने को लेकर कोई विकल्प नहीं था। उन्होंने कहा कि सरकार को संवैधानिक मूल्यों के पालन के लिए क़दम उठाने चाहिए। जस्टिस नरीमन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को विफल करने के लिए सुनियोजित प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ ही कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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