Thursday, October 28, 2021

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संघ के रामराज्य का मतलब धर्म, सत्ता और संपत्ति पर ब्राह्मणों का कब्जा!

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दिल्ली चुनाव से ठीक पहले संसद के भीतर राम मंदिर के लिए न्यास और उसके सदस्यों की घोषणा कर पीएम मोदी ने आखिरी तौर पर राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश की। चुनाव को सांप्रदायिक रंग में रंग देने की यह उनकी आखिरी कोशिश थी। पूरे चुनाव के दौरान बीजेपी शाहीन बाग-शाहीन बाग करती रही। इससे इतर दूसरा शब्द उसके नेताओं की जुबान पर आया ही नहीं। राम मंदिर ट्रस्ट की घोषणा उसी कड़ी का एक और हिस्सा था। लेकिन हम यहां बात आज दिल्ली चुनाव और उसमें बीजेपी के सांप्रादियक खेल की नहीं करेंगे। 

हम बात बीजेपी-संघ के उन मंसूबों की करेंगे जिसको वे इन मुद्दों के जरिये हासिल करना चाहते हैं। घोषित राम मंदिर ट्रस्ट महज कुछ नामों का समूह नहीं बल्कि भविष्य में बनने वाले संघ के सपनों के समाज का प्रकृत रूप है जिसको पूरे समाज पर लागू किया जाना है। ट्रस्ट के 9 सदस्यों में अपवाद स्वरूप कामेश्वर चौपाल को छोड़कर बाकी सभी ब्राह्मण हैं। क्षत्रिय, वैश्य, पिछड़े तथा आदिवासी समुदाय तक के किसी एक प्रतिनिधि को इस लायक नहीं समझा गया कि वह राम मंदिर के निर्माण में हाथ बंटा सके। 

कामेश्वर चौपाल दलित हैं और बिहार के सुपौल से आते हैं। बताया जाता है कि 1989 में शिलान्यास के दौरान पहली ईंट वीएचपी के तत्कालीन मुखिया अशोक सिंहल ने उन्हीं के हाथ से रखवायी थी। इसके पीछे उनका सीता के मायके मिथिलांचल से जुड़ा होना प्रमुख कारण बताया गया था। हालांकि उनकी जाति को लेकर बिहार के सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम कुमार मणि ने संदेह जाहिर किया है और उनका किसी अति पिछड़ी जाति से जुड़ा होना बताया जा रहा है जिसे बाद में अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की तरफ इशारा किया गया है। बहरहाल जो भी हो यह दिखाता है कि चौपाल को शामिल किया जाना बीजेपी और संघ की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं बल्कि एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक दबाव का नतीजा है। और इस बात में कोई शक नहीं कि अंदरूनी तौर पर वे चौपाल को ट्रस्टियों के एक सेवक के तौर पर ही देख रहे होंगे, जिसकी फैसलों में भूमिका नगण्य होगी।

दरअसल इसके जरिये संघ बिल्कुल साफ-साफ बताना चाहता है कि धर्म के काम में ब्राह्मणों के अलावा किसी दूसरी जाति या फिर समुदाय की कोई भूमिका नहीं है। साथ ही उसमें अयोध्या के राजा के वंशज को रखकर इस बात को साफ करने की कोशिश की गयी है कि संघ की राजे-रजवाड़ों में आस्था अभी भी बरकरार है। और इससे भी आगे बढ़कर जिस तरह से कानून और चिकित्सा समेत तमाम दूसरे क्षेत्रों से भी किसी दूसरे समुदाय के किसी शख्स को रखने की जगह ब्राह्मण को ही प्राथमिकता दी गयी है। वह बताती है कि संघ के आदर्श राज्य में शिक्षा को सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मणों तक ही सीमित रखा जाएगा। ट्रस्ट में किसी क्षत्रिय को न रखकर यह संदेश देने की कोशिश की गयी है कि सनातन व्यवस्था में लोगों की रक्षा का काम उनका सुरक्षित है लिहाजा उन्हें धर्म के काम से खुद को अलग ही रखना चाहिए। साथ ही रजवाड़े से भी ब्राह्मण वंशीय को रखकर यह संकेत दिया गया है कि राजा बनने और सिंहासन हासिल करने का मोह उन्हें छोड़ देना चाहिए। क्योंकि उनका मुख्य काम सैनिक बनकर लोगों की रक्षा करना है।

जिस राम मंदिर के लिए पिछड़ों ने सबसे ज्यादा कुर्बानी दी उसका इस पूरी कवायद में कोई नामोनिशान तक नहीं है। कल्याण सिंह से लेकर विनय कटियार और उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान मंदिर आंदोलन के कद्दावर नेता रहे। दिलचस्प बात यह है कि ये सभी जिंदा हैं और सक्रिय हैं। बावजूद इसके उन्हें ट्रस्ट का एक सदस्य बनने लायक भी नहीं समझा गया। दरअसल संघ मनुस्मृति को उसकी पूरी शुद्धता और पवित्रता के साथ लागू करना चाहता है। और वह इसकी इजाजत नहीं देती कि किसी धर्म के काम में पिछड़े को शामिल किया जाए। क्योंकि शास्त्रों और वर्ण व्यवस्था में उसकी भूमिका सेवक की है।

इस तरह से मंदिर आंदोलन में लाठियां भाजने और मार खाने वाले पिछड़े समुदाय को ठेंगा दिखा कर न केवल सत्ता बल्कि संपत्ति पर भी ब्राह्मणों के वर्चस्व को सुनिश्चित कर दिया गया है। इस कड़ी में अब तक राम मंदिर के नाम पर आए अरबों रुपये और मंदिर निर्माण के दौरान मिलने वाली शेष भारी रकम समेत निर्माण के बाद की व्यवस्था में हर तरीके से ब्राह्मणों के लाभ को सुरक्षित कर दिया गया है। हालांकि उमा भारती ने इस पर एतराज जताया है। उन्होंने कहा है कि ट्रस्ट में पिछड़े समुदाय से भी लोगों को होना चाहिए था। उसी के साथ उन्होंने पीएम मोदी की जमकर तारीफ भी कर डाली है।

इसके साथ ही ट्रस्ट में एक भी महिला को न रखकर इस देश की आधी आबादी को भी रामराज्य में उसकी जगह बता दी गयी है। अनायास नहीं संघ प्रमुख मोहन भागवत घूम-घूम कर कहते रहते हैं कि महिलाओं की भूमिका घर की चारदीवारी के भीतर है। और उन्हें खुद को पतियों और परिवार की सेवा तक ही सीमित रखना चाहिए। उसी में उनकी मुक्ति है।

और आखिर में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का खुला उल्लंघन करते हुए (क्योंकि कोर्ट ने अयोध्या के शहरी क्षेत्र में जमीन देने का निर्देश दिया था ) अयोध्या से 30 किमी दूर एक गुमनाम स्थान पर बाबरी मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन मुकर्रर कर मुसलमानों की इस देश, समाज और व्यवस्था में हैसियत बता दी गयी है। लखनऊ-गोरखपुर हाईवे पर स्थित रौहानी के पास धन्नीपुर में जहां यह जमीन दी जा रही है उसके बारे में बताया जा रहा है कि कई मस्जिदें पहले से मौजूद हैं। लिहाजा वहां किसी नयी मस्जिद की जरूरत ही नहीं है। और इस तरह से बाबरी मस्जिद के न केवल वजूद को खारिज कर दिया गया बल्कि अब उसकी यादों को भी लोगों के जेहन से मिटाने का रास्ता साफ कर दिया गया।

इस तरह से राम मंदिर के जरिये हासिल होने वाला यही असली रामराज्य है। जिसमें सनातन धर्म की तूती बोलगी। और वर्णाश्रम व्यवस्था के मुताबिक हर जाति का अपना अधिकार और कार्य क्षेत्र सुरक्षित रहेगा। उससे किसी भी तरह की छेड़छाड़ या फिर उसके नियमों का उल्लंघन अपराध की श्रेणी में आएगा। यह तो अभी ट्रेलर है। जब सत्ता पूरी तरह से संघ के कब्जे में आ जाएगी और देश हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया जाएगा तब नागपुर से पूरी पिक्चर रिलीज होगी। क्योंकि हिंदू तालिबान देश का नया आदर्श है। और उस सपने को संघ किसी भी कीमत पर पूरा करेगा।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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