संकट के स्वेच्छाचारी समाधान का बजट

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निर्मला सीतारमण का यह पहला बजट बजट नहीं, भारत के सरकारी बैंकों और एनबीएफसी के लिये बेलआउट पैकेज है। बैंकों के पांच लाख करोड़ के एनपीए को बट्टे खाते में डालने के बाद सरकार कह रही है कि बैंकों के एनपीए में एक लाख करोड़ के क़रीब की कमी आई है। अर्थात् बैंकें पहले ही चार लाख करोड़ रुपये गंवा कर बैठी हुई हैं। इसके बावजूद इस बजट में सरकार को बैंकों को एकमुश्त सत्तर हज़ार करोड़ रुपया देना पड़ा है । बैंकों को दिये गये इस रुपये से एनबीएफसी को भी बेल आउट किया जायेगा ।

यह मामला बैंकों मात्र का नहीं है। नोटबंदी के बारे में हम हमेशा यह कहते रहे हैं कि यह भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर लगा एक ऐसा धक्का साबित होगा जिसके प्रभाव से उसे निकालना सबसे टेढ़ी खीर होगी। आर्थिक मंदी का सीधा संबंध जनता के मानस से होता है। अनिश्चय और संकट का डर यदि उसमें बैठ जाए तो आदमी के पैर बाजार में उतरने के पहले दस बार ठिठकने लगते हैं और अर्थ-व्यवस्था मंदी के भंवर में धंसती चली जाती है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री केन्स ने अमेरिका की 1930 की महामंदी के विश्लेषण के आधार पर यह कहा था कि किसी भी वजह से यदि क्रेता बाजार से विमुख हो जाए तो फिर उसे वापस बाजार में लौटाना सबसे मुश्किल काम हो जाता है ।

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भारत में मोदी जी ने नोटबंदी के ठीक बाद जीएसटी के दोहरे धक्के से देश के हर आदमी को सकते में ला दिया था । नोटबंदी के उन दिनों में बैंकों ने आम लोगों के अर्जित धन के साथ जिस प्रकार का मनमाना व्यवहार किया, उसे कोई भी अपनी स्मृतियों से पूरी तरह पोंछ नहीं सकता है । वह डर हर आदमी के अवचेतन में आज भी बैठा हुआ है और उसके आर्थिक व्यवहार को निर्देशित कर रहा है । ऊपर से मोदी जी ने नोटबंदी के ज़रिये जनता के कम से कम तीन लाख करोड़ रुपये पर डाका डाल कर बैंकों की झोली भरने की जो योजना बनाई थी, वह ऐसी औंधे मुंह गिरी कि बैंकों को लाभ के बजाय उन पर हज़ारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त ख़र्च और लाद दिया । डिजिटलाइजेशन के अविवेकशील ताबड़तोड़ अभियान ने बैंकों के साथ ग्राहकों के संबंध में परिवर्तन की प्रक्रिया को भी उतना सरल नहीं रहने दिया है ।

बैंक कर्मचारियों का जीवन ऊपर से दूभर होता चला जा रहा है । सर्वोपरि, बैंकों का रुपया मार कर विदेश भाग जाने वालों का ऐसा ताँता लगा कि बैंक अपना सामान्य कारोबार संभाले या अपराधियों की तलाश में लगे पुलिस विभाग का काम करे, तय करना मुश्किल होता चला गया । और सरकार ! वह तो दिन रात सिर्फ चुनाव मोड में, अर्थात् कोरे प्रचार में लगी रही ।

इसके लिये तमाम आर्थिक आंकड़ों तक में धांधली करने से बाज़ नहीं आई। बेरोज़गारी सुरसा की तरह बढ़ कर पैंतालीस साल में सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई और सरकार उसे दर्शाने वाले आंकड़ों को छिपाने में ज़्यादा लगी रही, उसके निदान की दिशा में काम करने की उसके पास कोई योजना ही नहीं थी। इसीलिये, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अभी का समय वास्तव में भारतीय अर्थ-व्यवस्था का 2008 का मेल्टडाउन का क्षण है।

अमेरिकी सरकार के पास तब कोई चारा नहीं बचा था कि लेहमैन ब्रदर्स और अन्य बैंकों के त्राता के रूप में सामने आये । वही स्थिति आज भारत की है कि सरकारी बैंकों के अलावा आईएल एंड एफएस सहित तमाम एनबीएफसी को उनके संकट से निकालना ज़रूरी हो गया था। अन्यथा, बैंकिंग के ताने बाने के बिखरने का मतलब होता पूरी अर्थ-व्यवस्था के ताने-बाने और जन-जीवन का ही बिखर जाना। मज़े की बात यह है कि भारत सरकार अर्थ-व्यवस्था के इतने बड़े संकट को देश के सामने रखने के बजाय आज भी उस पर पर्दादारी के लिये सबसे ज़्यादा तत्पर नजर आ रही है ।

इसी उद्देश्य से उसने फ़ाइव ट्रिलियन डालर की इकोनॉमी का नारा उछाला है। और इसी के बहाने वह चारों ओर से क़र्ज़ जुटाने के काम में लग गई है। विदेश से क़र्ज़ के सारे दरवाज़े खोल दिये जा रहे हैं। कुल मिला कर यह बजट इस तथ्य की साफ़ स्वीकारोक्ति है कि सरकार अपने सामने संसाधनों की भारी कमी को साफ़ देख रही है। इसीलिये तत्काल सरकारी सम्पत्तियों को बेचना और विदेशों से हर रूप में उधार अथवा निवेश के रूप में ज़्यादा से ज़्यादा धन जुटाना ही आगे उसका सर्वप्रमुख काम होगा।

बाकी जहां तक जनता को राहतों का सवाल है, इस सरकार का पिछला रेकार्ड यही बताता है कि सरकार संसाधनों में कमी के कारण निर्धारित राशि को ख़र्च करने में भी विफल रहती है । इस बजट में किसानों को सीधे किसी प्रकार की राहत नहीं दी गई है । वैसे बजट में जिस प्रकार से तथ्यों को छिपाने की सायास कोशिशें की गई हैं, उनसे यह भी लगता है कि वर्तमान सरकार को बजट की तरह के वित्तीय व्यायाम की उपयोगिता पर ही कोई विश्वास नहीं रह गया है ।

उसके लिये संसदीय जनतंत्र की सारी स्थापित परिपाटियां महज सरकारी प्रचार के अवसरों के अलावा कुछ नहीं बची हैं । सरकार को चलना है एक कार्यालय से, प्रधानमंत्री कार्यालय से । बाक़ी सब मंत्रियों को वहां से निकले आदेशों पर सिर्फ मोहर लगाने का काम करना है । सरकार का संचालन अब लगभग पूरी तरह से एक बंद कमरे की चीज हो कर रह गया है । उसे पारदर्शिता प्रदान करने वाले सांस्थानिक औपचारिक उपक्रम प्रचार की तेज़ आंधी से आंखों में धूल झोंकने की एक कोशिश के अलावा कुछ नहीं बचे हैं। यही वजह है कि मोदी बजट पेश करने के संसदीय कर्मकांड से भी मुक्ति पा लेना चाहते हैं ।

भगवान की भक्ति के लिये योग मार्ग के अलावा दूसरा अधिकतर लोगों का मार्ग कर्मकांडों का मार्ग माना जाता है जिनके निर्वाह से भी स्वत: भक्ति और आस्था पैदा हो जाया करती है। मोदी जनतंत्र में भक्ति और आस्था पैदा करने के इन कर्मकांडी रूपों की संभावनाओं का भी अंत कर देना चाहते हैं। इसे कहते हैं लोगों में तानाशाही शासन में जीने की आदत पैदा करना। यह बजट वही है। अर्थ-व्यवस्था के लाभों के निजीकरण और नुक़सानों के सार्वजनीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करने वाला, आर्थिक तानाशाही की ज़मीन तैयार करने वाला बजट।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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