Wednesday, October 27, 2021

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फॉदर स्टेन स्वामी: संत जिसकी सलाखों के पीछे हत्या कर दी गयी

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अपनी गिरफ्तारी के दो दिन पहले रिकार्ड करवाए गए एक वीडियो संदेश में फॉदर स्टेन स्वामी ने कहा था, “मैं मूकदर्शक नहीं रहूंगा और भारत के सत्ताधारियों से असहमति व्यक्त करने और उन पर प्रश्न उठाने की जो भी कीमत मुझे अदा करनी पड़ेगी उसे अदा करने के लिए मैं तत्पर हूं।” यह दुःखद है कि उन्हें अपनी जान देकर यह कीमत अदा करनी पड़ी। हम किसी भुलावे में न रहें। फॉदर स्टेन स्वामी ने गरीब और वंचित आदिवासियों के हक में खड़ा होकर जो ‘राष्ट्रद्रोह’ किया था उसकी कीमत ही उन्हें अपनी जान से चुकानी पड़ी।

फॉदर स्टेन स्वामी का जन्म 26 अप्रैल, 1937 को तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली जिले में पुलमबाड़ी के नजदीक विरागलूर नामक गांव में हुआ था। उनके पिता किसान और मां गृहणी थीं। उनका मूल नाम स्टेनीलॉस लोरडोस्वामी था। उन्होंने सेंट जोजफ्स हायर सेकेन्डरी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और 30 मई, 1957 को 20 वर्ष की आयु में सोसायटी ऑफ जीसस (जेसुआईट) की सदस्यता ले ली। चौदह अप्रैल 1970 को उन्हें पादरी घोषित कर दिया गया। उन्होंने फिलीपीन्स के मनीला विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की। वे आगे की पढ़ाई के लिए ब्रसेल्स गए और वहां उनकी मुलाकात ब्राजील के आर्चबिशप हेल्डर कमारा से हुई। जल्द ही दोनों अच्छे दोस्त बन गए। आर्चबिशप कमारा ब्राजील के गरीब लोगों के लिए काम करते थे और इस बात के पक्षधर थे कि चर्च को समाज द्वारा तिरस्कृत तबकों का साथ देना चाहिए। ब्राजील में आर्चबिशप कमारा के कार्य से फॉदर स्टेन बहुत प्रभावित हुए। आर्चबिशप कमारा ने एक बार कहा था, “जब मैं गरीबों को भोजन देता हूं तो वे मुझे संत कहते हैं। जब मैं यह पूछता हूं कि गरीब, गरीब क्यों है तो वे मुझे कम्युनिस्ट बताते हैं।” शायद यही बात हम फॉदर स्टेन स्वामी के बारे में भी कह सकते हैं।

सन् 1975 से 1986 तक वे जेसुएट्स द्वारा संचालित बंगलुरू के इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट के निदेशक रहे। इसके बाद उन्होंने अविभाजित बिहार के आदिवासियों के लिए काम करना शुरू कर दिया। उनका अधिकांश जीवन झारखंड के आदिवासियों के बीच बीता और अंततः उनके अधिकारों के लिए लड़ते हुए ही उन्होंने अपनी जान गंवाई।

आदिवासियों के बीच काम करते हुए उन्हें यह अहसास हुआ कि आदिवासियों के दमन और शोषण में पूरी व्यवस्था का हाथ है। उन्होंने जमीनों और जंगलों पर आदिवासियों के अधिकार के लिए संघर्ष किया और साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए भी कि उन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य मिले। फॉदर स्टेन स्वामी ने सन् 2006 में रांची के बाहरी इलाके नमकुन में बगइचा शोध व प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की। वे वहीं रहते थे और वहीं से अपना काम करते थे। छोटा नागपुर किरायेदारी अधिनियम, 1908 झारखंड के 16 जिलों में आदिवासियों की भूमि गैर-आदिवासियों को बेचने पर प्रतिबंध लगाता है। संथाल परगना किरायेदारी अधिनियम, 1876, संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासियों की भूमि की गैर-आदिवासियों को बिक्री को सीमित करता है। कुछ साल पहले झारखंड सरकार ने इन दोनों अधिनियमों को संशोधित कर आदिवासियों के अधिकारों को कम करने की कवायद शुरू की। फॉदर स्टेन स्वामी ने इन कानूनों के पक्ष में एक लंबी लड़ाई लड़ी। उन्होंने प्रस्तावित संशोधनों के विरोध में लोगों और संस्थाओं को संगठित किया।

अंततः झारखंड सरकार को इन अधिनियमों को संशोधित करने का इरादा त्यागना पड़ा। सन् 2017-18 में झारखंड सरकार ने औद्योगिक इकाईयों को आवंटित करने हेतु लैंड बैंक बनाने के लिए 21 लाख एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया। गांवों की साझा भूमि को बिना ग्रामसभा या आदिवासी सलाहकार समिति की सहमति के अधिग्रहित कर लिया गया। फॉदर स्टेन स्वामी ने इस निर्णय का जबरदस्त विरोध किया और जमीनी स्तर पर और सोशल मीडिया के जरिए आदिवासी और मूलनिवासी विरोधी नीतियों के विरूद्ध आवाज उठाई। फॉदर स्टेन स्वामी पंचायत राज (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) के समर्थन और भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची को झारखंड पर लागू न करने के विरोध में भी आवाज उठाते रहे। पेसा लागू न करने की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए चलाए गए पत्थलगड़ी आंदोलन का भी उन्होंने समर्थन किया।

फॉदर स्टेन स्वामी उच्चतम न्यायालय के सन् 2000 में घोषित उस निर्णय का पालन न होने के विरूद्ध भी आंदोलन कर रहे थे जिसमें कहा गया था कि भूमि का मालिक जमीन के ठीक नीचे की सतह में पाए जाने वाले खनिजों का मालिक होगा। इस कारण और भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के विरूद्ध उनके आंदोलन ने फॉदर स्टेन स्वामी और उद्योगपतियों को आमने-सामने ला दिया। उन्होंने कहा था कि “सरकारें नागरिकों के प्रति उनके कर्तव्य से कहीं अधिक महत्व कारपोरेट घरानों की आवश्यकताओं को देती हैं।” उन्होंने यह भी कहा था कि “हर खदान हरे-भरे जंगलों, उर्वर भूमि और पानी के स्रोतों को नष्ट करती है और लोगों को उनके गांवों से विस्थापित करती है”।

फॉदर स्टेन से सरकार की नाराजगी का एक और कारण भी था। और वह था झारखंड की जेलों में आदिवासी विचाराधीन कैदियों को न्याय दिलवाने का उनका अभियान। वे झारखंड में जांच एजेन्सियों द्वारा हजारों आदिवासी नौजवानों को नक्सल बताकर उनकी अंधाधुंध गिरफ्तारियों के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उन्होंने झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर यह मांग की थी कि सभी विचाराधीन बंदियों को निजी मुचलके पर रिहा किया जाए और उनके खिलाफ मुकदमों में जल्द से जल्द निर्णय हों। बागीचा द्वारा प्रकाशित एक रपट में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। इस रपट का शीर्षक था, “प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकार से वंचित आदिवासियों को मिल रही है जेल – झारखंड में विचाराधीन बंदियों का अध्ययन”। रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़ी संख्या में आदिवासियों, दलितों और अन्य पिछड़ा वर्गों (जिन्हें मूलनिवासी कहा जाता है) को झूठे मामलों में फंसा दिया गया है।

यह विशेषकर तब होता है जब वे अपने उन संवैधानिक और मानवाधिकारों पर दावा करते हैं जिनका उल्लंघन अक्सर ‘उच्च’ जातियों/वर्गों द्वारा किया जाता है और राज्य द्वारा भी, जो इन वर्गों का संरक्षक और पोषक है। इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जिन 102 उत्तरदाताओं पर माओवादी या माओवादियों का सहायक होने का आरोप लगाया गया था उनमें से 97 प्रतिशत का कहना है कि पुलिस के आरोप गलत हैं और उनकी गिरफ्तारी भ्रामक सूचनाओं के आधार पर की गई है। इस अध्ययन का एक अन्य निष्कर्ष यह है कि आदिवासियों, दलितों और ओबीसी पर झारखंड के विभिन्न भागों में कड़े प्रावधानों वाले आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013, गैर-कानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम व भारतीय दंड संहिता की राष्ट्रद्रोही गतिविधियों संबंधी धाराओं के अंतर्गत मामलों में से अधिकांश पिछले एक दशक में दर्ज किए गए हैं। यह राज्य द्वारा आपराधिक न्याय प्रणाली का घोर दुरुपयोग है। राज्य गरीबों और पददलितों की कीमत पर धनिकों और शक्ति संपन्न वर्गों का साथ देता है और अब तो यह और भी खुलेआम किया जा रहा है। राज्य सबसे गरीब लोगों की जमीनें और देश के संसाधनों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देसी कारपोरेट घरानों को सौंप रहा है।

झारखंड सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर पत्थलगड़ी आंदोलन के बारे में लिखने के आरोप में फॉदर स्टेन स्वामी पर देशद्रोह और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए के तहत मामला दर्ज किया गया। ये आरोप बेबुनियाद थे। एक माह बाद झारखंड और महाराष्ट्र पुलिस की एक संयुक्त टीम ने नमकुन, रांची स्थित उनके घर पर छापा डाला और उनका लैपटाप, मोबाइल फोन और सीडी जब्त कर ली। इस छापे का उद्देश्य फॉदर स्टेन स्वामी को भीमा-कोरेगांव मामले से जोड़ना था। फॉदर स्टेन स्वामी अपने साथियों के साथ अपनी संस्था बगइचा के कार्यालय के परिसर में रहते थे। यह संस्था आदिवासियों से जुड़े मसलों पर काम करती है। लगभग चार घंटे तक चले इस छापे और पूछताछ से बगइचा में रहने वालों को बहुत धक्का लगा। उन्हें यह समझ में ही नहीं आया कि महाराष्ट्र पुलिस ने उनके कार्यालय और घरों की तलाशी क्यों ली। पुलिस के पास कोई सर्च वारंट नहीं था। छापा मारने वाले पुलिस दल ने सिर्फ एक नोटिस दिखाया जिसमें फॉदर स्टेन स्वामी से पुलिस के साथ सहयोग करने को कहा गया था।

इसके बाद एक वक्तव्य जारी कर फॉदर स्टेन ने कहा कि वे संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए बनाए गए कानूनों और सरकारी नीतियों से अपनी असहमति व्यक्त करते आए हैं। “मेरी मान्यता है कि यही कारण है कि राज्य चाहता है कि मैं उसके रास्ते से हट जाऊं और इसका सबसे अच्छा तरीका यह है कि मुझे गंभीर प्रकरणों में फंसा दिया जाए ताकि गरीब और निर्दोष आदिवासियों को न्याय दिलवाने की प्रक्रिया बाधित की जा सके”।

फॉदर स्टेन पर यूएपीए के अंतर्गत प्रकरण दर्ज किया गया। यह कानून मानवाधिकारों को सीमित करता है। ह्यूमन राइट्स पल्स नामक एक अंतर्राष्ट्रीय मंच, जो मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर जनजागृति उत्पन्न करने के काम में संलग्न है, के अनुसार इस कानून में 2019 में किए गए संशोधन भारतीय संविधान के प्रावधानों और अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का उल्लंघन करते हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल और प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल जैसे कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने भी इस अधिनियम की आलोचना की है। इस अधिनियम के कई प्रावधान अत्यंत विवादास्पद हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत किसी व्यक्ति को 180 दिन (छःह महीने) तक बिना आरोपपत्र प्रस्तुत किए जेल में रखा जा सकता है। अन्य अपराधों के मामले में यह अवधि 90 दिन है। यह अधिनियम जमानत हासिल करने के आरोपी के अधिकार को सीमित करता है और अदालत को इस बात के लिए मजबूर करता है कि वह पुलिस द्वारा प्रस्तुत सुबूतों और दस्तावेजों के आधार पर आरोपी को प्रथम दृष्ट्या दोष सिद्ध माने। यह प्रावधान न्याय शास्त्र के इस मूलभूत सिद्धांत के ठीक उलट है कि प्रत्येक व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक कि वह दोषी सिद्ध न हो जाए।

फॉदर स्टेन स्वामी को भीमा-कोरेगांव प्रकरण से जुड़ी एल्गार परिषद के मामले में गिरफ्तार किया गया था। यह अत्यंत हास्यास्पद था क्योंकि फॉदर स्टेन ने न तो एल्गार परिषद की बैठकों में भाग लिया था और ना ही कोई ऑनलाइन भाषण दिए थे। इस कार्यवाही का एकमात्र आधार रिपब्लिक टीवी द्वारा लगाए गए अप्रमाणित आरोप थे। बाद में उनके कम्प्यूटर पर उन्हें दोषी सिद्ध करने वाले दस्तावेज ढूंढ लिए गए। जाहिर है कि वह कम्प्यूटर एनआईए के कब्जे में था और उसके साथ छेड़छाड़ करना बहुत आसान था।

पददलितों के अधिकारों के इस सौम्य रक्षक, दयालुता, प्रेम, शांति, अपनी चीजों को दूसरों के साथ बांटने और श्रेष्ठ से श्रेष्ठ आचरण करने के ईसाई मूल्यों के इस प्रचारक को तालोजा जेल में बंद कर दिया गया। खुदा के इस बंदे को परेशान करने के लिए टुच्चे बहाने ढूंढे गए। फॉदर स्टेन कैंसर के मरीज थे और जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तब वे पार्किन्सन्स के मरीज बन चुके थे। जेल में उनके स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आई। अदालत में अपने बयान में उन्होंने कहा “जब मैं तालोजा आया था तब मेरे शरीर की सभी प्रणालियां काम कर रहीं थीं परंतु इन आठ महीनों में मेरे शरीर में गिरावट आई है। आठ महीने पहले मैं खुद खाना खा सकता था, कुछ लिख सकता था, थोड़ा-बहुत चल सकता था और खुद नहा सकता था। एक-एक करके ये क्षमताएं गायब होती जा रही हैं। तालोजा जेल में मेरी यह हालत हो गई है कि मैं न तो चल सकता हूं और न लिख सकता हूं। मुझे खाना भी किसी और को खिलाना पड़ता है।”

फॉदर स्टेन ने 6 नवंबर, 2020 को अदालत में दर्खास्त दी कि उन्हें एक स्ट्रा और सिपर उपलब्ध करवाया जाए। उन्हें ये दोनों चीजें 4 दिसंबर को मिल सकीं! चौरासी साल के इस पादरी जो कई जानलेवा बीमारियों से ग्रस्त था, की जमानत की अर्जी सुनने के लिए अदालतों के पास वक्त नहीं था। इसके मुकाबले अर्णब गोस्वामी की जमानत की अर्जी कितनी जल्दी सुनी गई यह हम सबको ज्ञात है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि एनआईए, जो अदालतों में उनकी जमानत याचिका का लगातार विरोध करती रही, ने एक दिन के लिए भी पूछताछ के लिए उनकी रिमांड नहीं मांगी।

तालोजा जेल में उनकी हालत नाजुक हो जाने के बाद उन्हें एक निजी होली फैमिली अस्पताल में दाखिल करने की इजाजत दी गई। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वे कोविड-19 से ग्रस्त हो चुके थे। चार जुलाई को इस पुण्यात्मा को दिल का दौरा पड़ा और 5 जुलाई को दोपहर 1.24 बजे वे हम सबको छोड़कर चले गए।

इस संत, जिसने जेल से लिखा था कि “पिंजरे के पंछी भी गा सकते हैं” की मौत के लिए हम सब जिम्मेदार हैं – केन्द्र और राज्य की सरकारें, क्षुद्र और नीच प्रकृति का जेल प्रशासन, अदालतें, कार्यपालिका और हम आम लोग जो हमारी अंतरात्मा, हमारे संविधान और हमारे अधिकारों की रक्षा करने वालों के उत्पीड़न को चुपचाप देखते रहते हैं।

फॉदर स्टेन अब नहीं हैं परंतु उनके जैसे कई लोग उनकी तरह दुःख भोग रहे हैं। इनमें भीमा-कोरेगांव मामले के आरोपी शामिल हैं। आइए हम संकल्प लें कि हम फॉदर स्टेन स्वामी के काम को आगे बढ़ाएंगे और तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक कि भयावह यूएपीए के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए निर्दोषों की रिहाई नहीं हो जाती, बल्कि यह कानून ही रद्दी की टोकरी में फेंक नहीं दिया जाता। शायद तभी हमें अपने आचरण के लिए माफी मिल पाएगी मार्टिन लूथर किंग जूनियर के शब्दों में “एक समय आता है जब चुप्पी ही विश्वासघात होती है”।

(सुबोध बेद्रे के इस अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद अमरीश हरदेनिया ने किया है।)

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