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अयोध्या फैसलाः अब सद्भाव की स्थापना की जरूरत

बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने देश के सम्मुख एक अवसर उपस्थित किया है, जब वह कटुता और वैमनस्य के लंबे और अंतहीन दौर से बाहर निकल कर सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता के पुराने और जांचे-परखे रास्ते पर वापस कदम बढ़ सके। यह विवाद एक जीर्ण रोग का रूप ले चुका था और जैसा हर जीर्ण रोग के साथ होता है, इसकी पैठ हमारे राष्ट्र रूपी शरीर के हर अंग तक हो गई थी। हमारा राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक जीवन इसकी चपेट में आ गया था।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने इस विवाद के निपटारे के लिए बारंबार मध्यस्थता पर बल दिया था, मध्यस्थता के प्रयास भी हुए किंतु संदेह, अविश्वास और भय के वातावरण में इन प्रयासों को विफल तो होना ही था। यदि मध्यस्थता के जरिए कोई समाधान निकलता तो शायद वह आज के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले जैसा ही होता। एक ऐसा समाधान जिसके न्याय सम्मत होने के विषय में वाद-विवाद किया जा सकता है, किंतु जिसके पीछे की सद इच्छा पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई फैसला न्याय सम्मत भी हो, लोकहितकारी भी हो और लोकप्रिय भी हो। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस असंभव को संभव करने की कोशिश की है।

फैसले की सैद्धांतिक स्थापनाएं बड़ी महत्वपूर्ण हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि इस तरह की संपत्ति विवादों का निपटारा इतिहास, भावना और आस्था के आधार पर नहीं किया जा सकता। इस पर निर्णय देने के लिए तथ्य और प्रमाण आवश्यक हैं। माननीय न्यायालय ने यह भी कहा है कि न केवल 1949 में रामलला एवं अन्य देवताओं के विग्रहों की जबरन स्थापना गलत थी, बल्कि 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस का कृत्य भी विधि सम्मत नहीं था। संभवतः न्यायालय ने इस तरह यह संदेश देने की चेष्टा की है कि बात-बात पर कानून को हाथ में लेने की प्रवृत्ति एकदम गलत है और हमें न्यायालयीन प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखना चाहिए तथा यह भी कि देश बहुसंख्यक वर्ग की धार्मिक आस्था द्वारा नहीं अपितु कानून और संविधान द्वारा संचालित होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मीर बाकी ने कराया था और इसका निर्माण इस्लामिक धार्मिक सिद्धांतों से विपरीत जाकर नहीं हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकारा कि मस्जिद के नीचे कोई ढांचा था और यह ढांचा इस्लामिक नहीं था; हिंदू पक्ष यह सिद्ध करने में सफल रहा है कि विवादित ढांचे के बाहरी बरामदे पर उनका कब्जा था; यह साफ है कि मुस्लिमों द्वारा अंदर वाले कोर्ट यार्ड में नमाज अदा की जाती थी और हिंदुओं द्वारा बाहरी कोर्ट यार्ड में पूजा की जाती थी। एएसआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि विवादित स्थान पर एक मंदिर का अस्तित्व था। यद्यपि एएसआई ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि मस्जिद के निर्माण के लिए मंदिर को गिराया गया था। इतिहास यह इंगित करता है कि हिंदू यह विश्वास करते रहे हैं कि अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि है। रामजन्म भूमि लीगल पर्सनालिटी नहीं है किंतु रामलला लीगल पर्सन हैं।

न केवल मुस्लिम पक्ष को अपितु अनेक बुद्धिजीवियों को ऐसा लगता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय की सैद्धांतिक निष्पत्तियां तो उचित हैं, किंतु इन सिद्धांतों का पालन शायद पूरी तरह नहीं हो पाया है और फैसले में तथ्यों एवं सबूतों से अधिक इतिहास और आस्था को महत्व दिया गया है। मुस्लिम पक्ष को अयोध्या के ही किसी मुख्य स्थान में पांच एकड़ जमीन दिए जाने के फैसले को भी अनेक तरह से परिभाषित किया जा रहा है। कुछ लोग इसे मुस्लिम पक्ष की नैतिक विजय के रूप में देख रहे हैं और इसे अपराधबोध से मुक्ति पाने की सर्वोच्च न्यायालय की एक कोशिश मान रहे हैं। जबकि अन्य लोग इसे सर्वोच्च न्यायालय की उदार और समावेशी दृष्टि का प्रतीक बता रहे हैं जिसके द्वारा प्रतिकूल फैसले से उत्पन्न मुस्लिम पक्ष की निराशा को दूर करने का प्रयास किया गया है।

कुछ मुस्लिम नेता सुप्रीम कोर्ट के मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन दिए जाने के फैसले को अपने स्वाभिमान पर आघात की तरह ले रहे हैं। फैसले को लेकर मुस्लिम पक्ष की संभावित प्रतिक्रिया के विषय में भी दो मत हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि मुस्लिम पक्ष को पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए, जबकि बहुत से लोग इस मत के भी हैं कि अब मुस्लिम पक्ष को इस फैसले को उदारतापूर्वक स्वीकार कर हिन्दू समुदाय की खुशी में शामिल हो जाना चाहिए। पहले मत के लोग यह मानते हैं कि कानून ही वह जरिया है जिसके द्वारा अन्य धार्मिक स्थलों तक इस सिलसिले के फैलने को रोका जा सकता है, जबकि दूसरे मत के लोग यह मानते हैं कि मुस्लिम समुदाय की विनम्रता बहुसंख्यक समुदाय के दिल से नफरत को मिटा सकती है।

यह देखना आश्चर्यजनक है कि वे कट्टरपंथी शक्तियां जो इस मसले पर अपने जहरीले बयानों से हमारे अमनपसंद मुल्क की फिज़ा में जहर घोलने और न्यायालय पर दबाव बनाने का काम करती थीं, आज बिल्कुल शांत हैं। इनके बयान संतुलित और मर्यादित हैं और इनमें एक स्वर में देश के कानून और संविधान की सर्वोच्चता स्वीकारने की बात कही गई है।

इस परिवर्तन की अनेक व्याख्याएं की जा सकती हैं। यह कहा जा सकता है कि बहुसंख्यक वर्ग की कट्टरपंथी ताकतों के लिए न्यायालय का फैसला मनोनुकूल आने पर स्वयं को सहिष्णु और उदार रूप में प्रस्तुत करना सरल भी है और रणनीतिक तौर पर सही भी है। इसी प्रकार अल्पसंख्यक वर्ग की कट्टर ताकतें बहुसंख्यक वर्ग की हिंसा के भय के कारण अपने तेवर नरम किए हुए हैं। यह भी माना जा सकता है कि यह जान लेने के बाद कि यह मुद्दा जनता में अपनी अहमियत खो चुका है, कट्टरपंथी ताकतों के लिए इसका कोई विशेष महत्व नहीं रह गया था और यह मुद्दा उनके गले की फांस बन गया था, जिससे सम्मानजनक छुटकारा पाने का अवसर इस फैसले ने प्रदान कर दिया है। इस बात की अब केवल कल्पना ही की जा सकती है कि यदि फैसला अल्पसंख्यक समुदाय के पक्ष में होता तब भी क्या उग्र बहुसंख्यकवाद की हिमायत करने वाली शक्तियां इसका इसी प्रकार स्वागत करतीं।

कारण जो भी हो अब तक तो सर्व संबंधित पक्ष संयम का परिचय दे रहे हैं और यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। हालांकि इसकी उम्मीद कम ही है, क्योंकि टीवी चैनलों की सस्ती बहसों में राष्ट्रभक्त एंकरों के भड़काऊ सवालों के बाद आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल निकलेगा और माहौल बिगड़ते देर नहीं लगेगी।

इस फैसले ने सांप्रदायिक सौहार्द के निर्माण की अनंत संभावनाएं उत्पन्न की हैं। सरकार को तीन माह के भीतर योजना बनाकर मंदिर निर्माण के ट्रस्ट का गठन करना है। सरकार चाहे तो सभी धर्मों के प्रतिनिधियों को इस ट्रस्ट में शामिल कर सर्वधर्म संभाव की मिसाल कायम कर सकती है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार अयोध्या के किसी मुख्य स्थान पर पांच एकड़ की जमीन उदारतापूर्वक तत्काल दी जानी चाहिए और हिन्दू समुदाय को चाहिए कि वह अपने खर्च पर यहां मस्जिद का निर्माण करे। इसी प्रकार मुस्लिम समुदाय को भी चाहिए कि वह भी मंदिर निर्माण के कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करे। यदि ऐसा होता है तो एक ऐसे वातावरण का निर्माण होगा जिसमें सोमनाथ और मथुरा जैसे विवाद स्वतः ही महत्वहीन हो जाएंगे।

यह कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले में इस बात का उल्लेख करना था कि यह विवाद अपनी तरह का अंतिम मामला था और भविष्य में अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर इस प्रकार के विवाद किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होंगे, लेकिन हमें यह भी स्मरण रखना होगा कि अविश्वास और कटुता के मौजूदा माहौल में सुप्रीम कोर्ट के इस तरह के किसी निर्देश या ऑब्जरवेशन का शायद बहुत अधिक महत्व नहीं होता। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने राम जन्म भूमि विवाद को संपत्ति विवाद की भांति माना है किंतु हम सब जानते हैं कि यह बहुसंख्यक वर्ग की पहचान का प्रश्न बना दिया गया था और सत्ताधारी दल ने दो लोकसभा सांसदों से लोक सभा चुनावों में दो लगातार विजय की यात्रा इस और इस जैसे मुद्दों के रथ पर सवार होकर तय की है। स्थिति यह हो गई थी कि अनेक जनहित के मुद्दों पर वरीयता देते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय को लगातार 40 दिन तक इसकी सुनवाई करनी पड़ी।

हो सकता है कि मुख्य न्यायाधीश देश की तासीर पर नकारात्मक असर डालने वाले इस विवाद के निपटारे के लिए कृत संकल्पित रहे हों किंतु उग्र बहुसंख्यकवाद की हिमायत करने वाली शक्तियों ने जल्दी और अनुकूल फैसला सुनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय पर दबाव डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखी थी। सत्ताधारी दल के लिए राम मंदिर विवाद सत्ता प्राप्त करने का सुपरहिट फार्मूला सिद्ध हुआ है। सत्ताधारी दल जिन पैतृक संगठनों से वैचारिक पोषण प्राप्त करता है उनकी रणनीति में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के कथित रूप से खोए हुए गौरव की पुनर्स्थापना के लिए जन भावनाओं को भड़काने के प्रयासों का एक  अहम स्थान है। ऐसी स्थिति में बहुसंख्यक अस्मिता के किसी नए प्रतीक को लेकर बांटने वाली राजनीति कभी भी प्रारंभ हो सकती है और देश में नफ़रत फैलाने का जरिया बन सकती है।

रामजन्म भूमि पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है इस विवाद के बुरे अनुभव से सबक सीखना। यह तभी संभव होगा जब हम इस फैसले का उपयोग सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना किए जााने की रणनीति पर अमल करें, और जन दबाव बना कर इस बात की तसल्ली करें कि ऐसा कोई नया नासूर न पनपने पाए।

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This post was last modified on November 11, 2019 6:15 pm

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