Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

आर्थिक आत्मनिर्भरता : भाषण नहीं लोकोन्मुखी बदलाव से आएगी

घर-वापसी के लिए निकले मजदूरों के प्रति सामान्य राय है कि वे रोज कमाने-खाने वाले लोग हैं। यह कोई नहीं पूछ रहा कि हमारे अर्थतंत्र में आखिर कौन-सी कमी है जो अपने मेहनतकश वर्ग को आपद्काल में दो-चार महीने के गुजारे लायक संपन्नता भी नहीं दे पाता? कारण कई हो सकते हैं। अलग-अलग हो सकते हैं। बड़ा कारण श्रम-मूल्यांकन की वर्तमान पद्धति है। पूंजीपति अपने उत्पाद का मूल्यांकन करते समय पूरी तरह स्वतंत्र होता है। लागत की गणना करते समय वह जमीन, इमारत, मशीनरी, कच्चा माल, परिवहन, मजदूरी, बिजली-पानी, मूल्यहृास, निवेश पर ब्याज, परामर्श शुल्क जैसे हर छोटे-बड़े खर्च का हिसाब रखता है।

फिर अपना लाभ उसमें जोड़ता है। मजदूर को बस उतना दिया जाता है, जितने से वह जीवित रह सके। न्यूनतम मजदूरी की गणना में आटा, दाल, चावल जैसी मूल-भूत जरूरतों पर ध्यान रखा जाता है। वह भी इतनी कि एक दिन की मजदूरी में वह अपने और अपने छोटे-से परिवार का एक दिन गुजार सके। बाकी कल्याण योजनाएं नाम की होती हैं। इसलिए होती हैं, ताकि जनता का शासन-प्रशासन पर भरोसा बना रहे; पूंजीवादी संस्थानों को सस्ते मानव श्रम की आपूर्ति बाधित न हो। बाकी मूलभूत आवश्यकताओं, जैसे आवास, स्वास्थ्य सेवा और बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा के बारे में तो वह सोच ही नहीं पाता।

कमोबेश यही हालत किसान की है। मजदूर की तरह किसान को भी अपने उत्पाद के मूल्य तय करने का अधिकार नहीं मिल पाता। उस समय सरकार का ध्यान किसान की मेहनत, लागत और जरूरत के बजाय, अपनी खाद्य सुरक्षा, मनरेगा तथा न्यूनतम मजदूरी जैसी योजनाओं के संचालन पर होता है। सरकार जानती है कि यदि अनाज का खरीद मूल्य अधिक रखा गया तो उसका असर उसकी दूसरी योजनाओं पर भी पड़ेगा। इसलिए वह उतना ही मूल्य तय करती है जिससे भविष्य में उसके खजाने पर कम से कम असर पड़े।

दूसरे शब्दों में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की कामयाबी के लिए किसानों तथा पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफे के लिए मजदूरों के हितों से समझौता किया जाता है। श्रमिकों में से दो-तिहाई हिस्सा बहुजन समाज से आता है। यह वर्ग शताब्दियों से सामाजिक एवं आर्थिक शोषण का शिकार होता आया है। अन्य संसाधनों के अभाव में वह अपने श्रम-कौशल पर निर्भर रहता है। सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों का सर्वाधिक नुकसान भी इसी वर्ग को होता है।

विकास की गारंटी नहीं है विदेशी निवेश

कुछ दशकों से विकास और विदेशी पूंजी को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया गया है। मान लिया गया है कि जब विदेशी निवेशक आएंगे, तभी देश का विकास होगा। जबकि विदेशी निवेश समुद्री लहरों जितना चंचल होता है। एक लहर आकर आपको नीचे से ऊपर तक समृद्धि से सराबोर कर सकती है। कुछ अंतराल के बाद पूंजी वापसी की लहर, आपसे आपकी सारी खुशियां छीन पुनः कंगाली की ओर ले जा सकती है।

स्मरणीय है विदेशी निवेशक आपके लिए नहीं आते। यहां तक कि वे अपने देश के लिए भी नहीं आते। वे केवल अपने स्वार्थ के लिए आते हैं। लगाए गए धन पर पैनी नजर रखते हैं। विपरीत हवा की संभावना भी दिखे तो फौरन भाग छूटते हैं। इसलिए पूंजीवाद ने आज तक किसी देश का भला नहीं किया। उन देशों का भी जिन्हें उसकी प्रयोगशाला माना जाता है। इसलिए विदेशी पूंजी से निवेश की मात्रा तो बढ़ाई जा सकती है, वास्तविक समृद्धि उससे असंभव है।

वास्तविक समृद्धि क्या है

वास्तविक समृद्धि का सीधा-सा अभिप्राय है कि अर्थव्यवस्था के स्तर में जो सुधार नजर आ रहा है, वह आम आदमी के जीवन में भी नजर आए। उदाहरण के लिए यदि देश की सकल उत्पादकता में दस प्रतिशत की वृद्धि हुई है, तो मुद्रा-स्फीति के समायोजन के पश्चात, आनुपातिक रूप से उतनी ही वृद्धि नागरिक जीवन में भी नजर आनी चाहिए। प्रायः ऐसा हो नहीं पाता। लाभ की मात्रा, आमतौर पर सकल उत्पादकता में हिस्सेदारी के अनुसार तय होती है।

परिणामस्वरूप बड़े औद्योगिक घराने, देश की सकल आय का बड़ा हिस्सा हड़प ले जाते हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए दस बड़े पूंजीपति घरानों का देश की सकल उत्पादकता में 65 प्रतिशत का योगदान हो तो वे आमतौर पर इतने ही लाभांश के अधिकारी माने जाएंगे। ऊपर से नीचे तक जैसे-जैसे उत्पादकता में हिस्सेदारी घटेगी, लाभानुपात भी उतना ही कम होता जाएगा।

सकल उत्पादकता में मजदूरों और किसानों का भी योगदान होता है। बल्कि उससे कहीं ज्यादा होता है, जितना बताया जाता है। मगर कृषि क्षेत्र की उत्पादकता को देखते हुए उसपर आश्रित लोगों की संख्या, आनुपातिक रूप से कहीं ज्यादा है। 2019 में भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र, उत्पादन क्षेत्र और सेवा क्षेत्र का कुल सकल संवर्धित मूल्य(ग्रोस वेल्यू एडिड) क्रमशः 15.87, 29.73 तथा 54.40% था। सकल संवर्धित मूल्य की गणना, सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) तथा उसके लिए दी गई छूटों के योग में से करों की कुल मात्रा घटाकर की जाती है(सकल संवर्धित मूल्य = सकल घरेलू उत्पाद + कुल छूट—उत्पादों पर लगने वाला कर)।

विश्व बैंक की 1 मार्च 2020 की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में मात्र 15.87% की हिस्सेदारी वाला कृषि क्षेत्र, 42% रोजगार उपलब्ध कराता है, जो बाकी सेक्टरों द्वारा दिए जाने वाले रोजगार से कहीं अधिक है। चीन में कुल रोजगारों का एक-चौथाई रोजगार कृषि क्षेत्र से आते हैं, जबकि वहां का कुल कृषि क्षेत्र(52.77 लाख वर्ग किलोमीटर), भारत के कुल कृषि क्षेत्र(15.97 लाख वर्ग किलोमीटर) के तीन गुने से भी ज्यादा है। रोजगार का कोई और विकल्प न होने के कारण, गांव लौटे अधिसंख्य मजदूर कृषि क्षेत्र के ही आसरे होंगे, जो पहले से ही दबाव में है।

वास्तविक समृद्धि आए कैसे?

इसे समझने के लिए विकास की पहेली को समझना आवश्यक है। प्रत्येक सरकार विकास के नाम पर वोट मांगती है। किंतु उसका न्यायोचित लाभ उसी अनुपात में नागरिकों तक भी पहुंचे, इसे लेकर वह कभी गंभीर नहीं होती। स्वार्थपरक राजनीति के चलते चुनाव वास्तविक मुद्दों के बजाय, नकली मुद्दों पर लड़े जाते हैं। अतः मतदाताओं के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण हेतु भारी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में पूंजीपति वर्ग उनका खेवनहार बनकर सामने आता है।

वह राजनीतिक पार्टियों को धन तथा दूसरे संसाधन देकर उपकृत करता है। कुछ करों तथा सुविधाओं के बदले वह राज्य के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा करने लगता है। वह सरकारों को अपने स्वार्थ के अनुरूप योजनाएं बनाने के लिए बाध्य कर देता है। मजबूर सरकारें नागरिकों को विकास की पहेली में उलझाए रखती है। यह विकास की पहेली क्या है? जनसाधारण को उसमें उलझाकर रखने से सरकार का कौन-सा हित सधता है? विकास के नागरिक स्तर पर मापदंड के लिए उसको प्रगति के संदर्भ में देखना क्यों आवश्यक है?

विकास एवं प्रगति

विकास जीवन-स्तर में सुधार की, अपेक्षित दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्नत अवस्था तक पहुंचने की प्रक्रिया है। वह बहुआयामी होता है। किसी बांध परियोजना में यदि कुछ गांव डूब क्षेत्र में आकर, पारिस्थितिकीय संकट शिकार होते हैं, तो उसे विकास की स्वाभाविक परिणति के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। प्रगति अपेक्षित दिशा में सकारात्मक उपलब्धि है। वह दर्शाती है कि विकास के उद्देश्य से बनाई गई योजना, लक्ष्य की दिशा में कितनी फलदायक सिद्ध हुई है। इसे एक उदाहरण की मदद से समझ सकते हैं। मान लीजिए, सरकार किसी इलाके में उर्वरक का कारखाना लगाने की अनुमति देती है।

सब कुछ समयानुसार और योजनाबद्ध तरीके से होता है। उम्मीद के अनुसार इलाके के किसानों को भरपूर उर्वरक मिलने लगता है। जितना सोचा था, उतने रोजगार मिल जाते हैं। मालिक उम्मीद के अनुसार मुनाफा कमाने लगता है। माना जाएगा कि कारखाने से उम्मीद के अनुरूप विकास हुआ है। क्या प्रगति भी ठीक उतनी ही होगी, जितना विकास हुआ था? प्रथम दृष्टया तो इसका उत्तर ‘हां’ होना चाहिए। परंतु ऐसा होता नहीं है।

अब हम उन स्थितियों पर विचार करेंगे, जिन्हें सरकार अप्रिय मानकर, जान-बूझकर नजरंदाज करती जाती हैं; या फिर दिखावे की संस्थाओं के ऊपर छोड़ देती है। जैसे कि उर्वरक के कारखाने से इलाके में वायू प्रदूषण बढ़ेगा। उससे निकले अपशिष्ट पदार्थ भूजल को प्रदूषित करेंगे। बीमारियां बढ़ेंगीं। यह असंभव नहीं कि एक अर्से के बाद प्रदूषण से जन्मी बीमारियों के उपचार पर उतनी ही धनराशि खर्च होने लगे, जितनी कारखाना लगने से सरकार और स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि हुई है। उस अवस्था में विकास तो शत-प्रतिशत होगा, परंतु प्रगति की रफ्तार शून्य कही जाएगी। कारखाना उर्वरक के बजाय शराब बनाने का हो तो प्रगति नकारात्मक भी हो सकती है।

ऐसा नहीं हैं कि सरकार द्वारा चलाई जाने वाली विकास योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता, उनके माध्यम से हुई प्रगति को मापने के लिए कोई संसाधन न हों। आमतौर पर हर सरकार का अपना सांख्यिकीय विभाग होता है, जिसका काम जमीनी स्तर से आंकड़े जुटाकर सरकार के सामने प्रस्तुत करना है। परंतु इन संस्थाओं द्वारा जुटाए गए ज्यादातर आंकड़े फर्जी और गैर-जिम्मेदराना होते हैं। अधिकांश पूंजीवादी योजनाएं पूंजीगत लाभ को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं। उस कसौटी पर खरा उतरने के साथ ही उन्हें सफल मान लिया जाता है। सरकार भी उसी को अपनी कामयाबी मानकर अपनी सफलता का ढिंढोरा पीटती जाती है।

विकास और प्रगति के अंतर को कैसे पाटा जाए

5 अक्टूबर, 1843 को चार्ल्स डिकेंस ने मानचेस्टर की मजदूर बस्तियों का निरीक्षण किया था। वे अपनी नई कृति के लिए जमीनी अनुभव बटोरना चाहते थे। मजदूर बस्तियों की दुर्दशा देख उनका दिल कराह उठा। उसी शाम मजदूरों को संबोधित भाषण में डिकेंस ने कहा था कि उन्हें उनकी दुर्दशा से उबारने के लिए कोई आगे नहीं आने वाला। जो भी करना है, स्वयं करना होगा। डिकेंस के आह्वान पर इंग्लेंड के रोशडेल नामक कस्बे के 28 बुनकर आगे आए। ‘रोशडेल पायनियर्स’ नाम से उन्होंने उपभोक्ता सहकारिता की शुरुआत की।

आज हम सबसे बड़ी उपभोक्ता चेन के रूप में ‘अमेजन को जानते हैं, ‘अलीबाबा’ और फ्लिपकार्ट का नाम भी हमने सुना है। लेकिन अपने समय में ‘रोशडेल पायनियर्स’ दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता संस्थान था। अंतर बस इतना है कि उसका मुनाफा किसी जेफ बेजोस, जेक मा या बंसल बंधुओं की इजारेदारी न होकर, सदस्य बुनकरों में बंट जाता था। वह श्रमिकों द्वारा अपनी जरूरत के हिसाब से बनाई गई योजना थी। इसलिए उसके किसी नकारात्मक प्रभाव, जिसका विकास योजनाओं में प्रायः अंदेशा होता है—की कोई संभावना नहीं थी।

शहरों से लुट-लुटाकर गांव पहुंचे मजदूर क्या अपने स्तर पर इस तरह की योजनाएं बना सकते हैं? बिलकुल बना सकते हैं। गांव पहुंचे श्रमिकों में से कोई इलेक्ट्रीशियन के काम में दक्ष होगा तो किसी को सिलाई, कढ़ाई या राजमिस्त्री का काम आता होगा। वे सामान्य हितों को केंद्र में रखकर छोटे-छोटे संगठन बना सकते हैं। फिर उन संगठनों के बीच तालमेल रखने के लिए बड़ा संघ। यह आसान नहीं है। दरअसल, सहकार को समझना जितना सरल है, स्वभाव को सहकारी भाव के अनुरूप ढालना उतना ही मुश्किल है। श्रमिकों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या कोई और विकल्प है?

कम से कम निकट भविष्य में तो नहीं। न सरकारें नए विकल्प के लिए काम कर रही हैं। पूंजीवाद की एक के बाद एक, निरंतर असफलताओं के बावजूद, सरकारें आज भी उसे निर्विकल्प मानती हैं। ऊपर से, इस उम्मीद में कि चीन से उकताई कंपनियां उनके यहां चली आएंगी, अनेक राज्य सरकारों ने श्रमिक कानूनों को बट्टे खाते में डाल दिया है। अब कारखाना मालिक मजदूरों से दिन में 12 घंटे काम ले सकते हैं। 12 घंटे काम और चार घंटे आना-जाना, प्रतिदिन 16 घंटे काम के लिए घर से बाहर रहना, ऊपर से कोई कानूनी संरक्षण न होना….इस अवस्था  में कोई भी मजदूर यह भूल सकता है कि वह इंसान है और किसी सभ्य देश में रहता है।

सरकार क्या कर सकती है

लोकतंत्र में राज्य अपने दायित्व से बच नहीं सकता। समाजार्थिक न्याय हेतु आवश्यक है कि सरकार ऐसी योजनाओं पर काम करे, जिनसे विकास और प्रगति के अंतर को न्यूनतम रखा सके। इसके लिए विकेंद्रीकृत उद्योगतंत्र चाहिए। ऐसा उद्योगतंत्र जिसमें स्थानीय संसाधनों के साथ, वहां की मेधा की भी अधिकतम भागीदारी हो। विडंबना यह है कि विगत तीन दशकों से हमने पूंजीवाद को अपरिहार्य मान लिया है। बीते वर्षों में पूंजी का निचले स्तर से ऊपर की ओर प्रवाह और भी तेज हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम तेजी से बेचे जा रहे हैं। पिछले छह वर्षों में रिकार्ड 23 सार्वजनिक संस्थानों का विनिवेशीकरण हो चुका है।

प्राप्त धनराशि से सरकार ने लोकहित की किसी नई योजना की शुरुआत की हो, इसका भी कोई प्रमाण नहीं है। ऐसे में उचित होगा कि सरकार अव्यावहारिक लगने वाली योजनाओं की समीक्षा करे। स्मार्ट सिटी के स्थान पर 30,000-50,000 की आबादी को ध्यान में रखकर छोटे शहर बसाए जाएं, जिनमें उत्पादन, विपणन के अलावा शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। उनमें सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को उनकी स्थानीय आबादी के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था हो। एक स्मार्ट सिटी की लागत में कम से कम 50-100 छोटे शहर बसाए जा सकते हैं।

पहले से ही मौजूद कस्बों और शहरों को स्थानीय व्यापार केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए सकेगा। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। न केवल शहरों की ओर पलायन रुकेगा, अपितु भारतीय गांव जो अभी तक सामंतवाद के गढ़ रहे हैं, अर्थव्यवस्था के स्वरूप में बदलाव के साथ, उनके चरित्र में भी बदलाव आएगा। चूंकि पलायन का शिकार प्राय: पिछड़ी और दलित जातियों को होना पड़ता है, इसलिए गांवों के चरित्र में बदलाव से सामाजिक न्याय के रास्ते भी प्रशस्त होंगे।

(ओमप्रकाश कश्यप द्वारा लिखित ‘समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि’, ‘समाजवादी चिंतन के विविध आयाम’ सहित 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आप उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान एवं हिंदी अकादमी द्वारा सम्मानित लेखक हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on June 21, 2020 3:47 pm

Share