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Categories: बीच बहस

सुशांत राजपूत मामलाः एकल पीठ ने पलट दिया तीन जजों की बेंच का फैसला

उच्चतम न्यायालय कई बार कह चुका है कि जो काम प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता उसे अप्रत्यक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता। सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या प्रकरण में उच्चतम न्यायालय की एकल पीठ द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सीबीआई जांच के आदेश में जो बातें कही गई हैं, उनमें से कुछ विरोधाभाषी हैं और एकल पीठ ने चीफ जस्टिस बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के फैसले को पलट भी दिया है।

पिछली 30 जुलाई को उच्चतम न्यायालय  ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को बॉम्बे पुलिस से सीबीआई को सौंपने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने कहा था कि मुंबई पुलिस पहले से ही इस मामले की जांच कर रही है और उसे अपना काम करने दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को बॉम्बे हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करने का सुझाव दिया, ताकि अगर मामले में दिखाने के लिए कुछ ठोस हो तो उचित राहत मिल सके।

यह निर्णय चीफ जस्टिस की अगुआई वाली तीन जजों की पीठ ने दिया था। क्या एकल पीठ उसी मामले में तीन जजों की पीठ के निर्णय की खुली अवहेलना करते हुए अनुच्छेद 142 का प्रयोग करके सीबीआई जांच का आदेश पारित कर सकती है?

गौरतलब है कि अनुच्छेद 142 के तहत उच्चतम न्यायालय को असीमित शक्तियां प्राप्त हैं, जिनका प्रयोग करते हुए उच्चतम न्यायालय कोई भी आदेश जारी कर सकता है, जो कि उस परिस्थिति विशेष में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो। परन्तु अनुच्छेद 142 का प्रयोग कुछ ख़ास परिस्थितियों में नहीं किया जा सकता है

उच्चतम न्यायालय की ही व्यवस्था है कि अनुच्छेद 142 का प्रयोग मौलिक अधिकारों को दरकिनार करते हुए नहीं किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त शक्तियों को हालांकि किसी कानूनी प्रोविशन द्वारा कंट्रोल या बांधा नहीं जा सकता है, परंतु इन शक्तियों का प्रयोग तब नहीं किया जा सकता है, जब इनका प्रयोग करने पर उस मुद्दे के लिए ख़ास तौर पर बने क़ानून की अवहेलना हो। अनुच्छेद 142 का प्रयोग किसी ऐसे कार्य को अप्रत्यक्ष रूप से करने में नहीं किया जा सकता, जिसको प्रत्यक्ष रूप से न किया जा सकता हो।

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में बिहार पुलिस की एफआईआर को सही माना और इस केस की सीबीआई जांच की मंजूरी दे दी है। उच्चतम न्यायालय  ने संविधान के आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला सुनाया है। जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि बेशक ये केस मुंबई पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन इस मामले में सभी लोग सच जानना चाहते हैं, इसलिए कोर्ट ने विशेष शक्ति का प्रयोग करते हुए केस को सीबीआई के हाथों में सौंपने का फैसला किया है।

यह न्यायिक इतिहास पहला मामला है जब किसी सिंगल जज की पीठ ने संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग किया हो।

आर्टिकल 142 संविधान द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दिया गया विशेष अधिकार है। एकलपीठ ने इस संबंध में महाराष्ट्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी की आपत्ति को खारिज कर दिया, सिंघवी ने कहा था कि सिंगल जज वाली पीठ आर्टिकल 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकती है। ऐसा करने के लिए बेंच में कम से कम दो जजों का होना जरूरी है।

जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जांच में जनता का विश्वास सुनिश्चित करने और मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 142 द्वारा प्रदत्त विशेष शक्तियों को लागू करना उचित समझती है। जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने कहा कि मुंबई पुलिस को इस मामले में जांच करने का अधिकार था, लेकिन, किसी भी तरह की असमंजस की स्थिति से बचने के लिए सीबीआई को केस सौंपा गया है।

अब क़ानूनी हलकों में सवाल उठ रहा है कि जब एकल पीठ एक तरफ कह रही है कि बिहार में एएफआईआर करना सही है और सीबीआई जांच की सिफारिश करना सही है तो सीआरपीसी के जीरो एफ़आईआर और सम्बंधित राज्य के सम्बंधित थाने में भेजने सम्बंधी प्रावधान का क्या हुआ? क्या उसे अनुच्छेद 142 से निष्प्रभावी किया जा सकता है?

उच्चतम न्यायालय की ही व्यवस्था है कि अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग तब नहीं किया जा सकता है, जब इनका प्रयोग करने पर उस मुद्दे के लिए ख़ास तौर पर बने क़ानून की अवहेलना हो। क्या एकल पीठ के आदेश से सीआरपीसी के प्रावधानों की अवहेलना नहीं हो रही है? 

उच्चतम न्यायालय की ही व्यवस्था है कि अनुच्छेद 142 का प्रयोग किसी ऐसे कार्य को अप्रत्यक्ष रूप से करने में नहीं किया जा सकता, जिसको प्रत्यक्ष रूप से न किया जा सकता हो। क्या एकल पीठ ने अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन नहीं किया है? क्या एकल पीठ तीन जजों के निर्णय को पलट सकती है?

इसके अलावा यह निर्णय रिया चक्रवर्ती की ट्रांसफर याचिका पर आया है, जिसमें बिहार में दर्ज एफआईआर को मुंबई ट्रान्सफर करने का अनुतोष मांगा गया था। क्या ट्रांसफर याचिका में भी अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है? यह भी यक्ष प्रश्न है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on August 20, 2020 11:48 am

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