माहेश्वरी का मत: ‘हमारी सीमा आकाश तक है’

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सुप्रीम कोर्ट।

महाराष्ट्र में अजित पवार की जालसाजी, राष्ट्रपति शासन, रातों-रात फडनवीस को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री की शपथ दिलाये जाने के बारे में सुप्रीम कोर्ट में जब बहस चल रही थी, तब भारत सरकार के वकील तुषार मेहता अपनी हमेशा की टेक के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को उसकी हैसियत और सीमा की याद दिलाते हुए कुछ इस प्रकार की दलील दे रहे थे मानो यह सब राजनीति के क्षेत्र का मामला है, सुप्रीम कोर्ट को इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए; सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ दूसरे कानूनी विषयों पर ध्यान देना चाहिए।

इस पर सुनवाई कर रही बेंच के एक सदस्य ने नाराजगी के स्वर में कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कोई सीमा नहीं है, ‘वह आकाश तक जाती है ।’ न्यायाधीश महोदय का यह कथन न्याय विवेक के उस बहुत ही बुनियादी सिद्धांत की पुनरुक्ति थी जो किसी लिखित-अलिखित शब्द या परिपाटी का मोहताज नहीं होता । वह मूलतः संविधान के निदेशक सिद्धांतों से निदेशित होता है। लेकिन कहने की बात और वास्तविकता में सिर्फ इसीलिये बहुत फर्क हुआ करता है क्योंकि निदेशक सिद्धांतों से चालित होने के नाम पर किसी प्रकार के न्यायिक स्वेच्छाचार को बल न मिले, इसीलिये न्याय खुद अपनी परिपाटियां तैयार करता हुआ उनकी चौखट के बंधन को अपना कर चला करता है, वही उसके लिये सुविधाजनक हुआ करता है । और, इस प्रकार असीम आकाश में नहीं, न्याय कुछ सुनिश्चित दायरों में ही काम करने का अभ्यस्त हो जाता है ।

यह उसके घर की अपनी चौखट की तरह है जिसमें वह अपने को निश्चिंत और सुरक्षित पाता है । न्याय प्रणाली की खुद की सुविधा के लिये तैयार कर ली गई इन चौखटों के चलते ही इस क्षेत्र में उसी प्रकार की एक पूरी विचारधारा की नींव पड़ जाती है जैसे पितृसत्ता की विचारधारा खास सामाजिक मर्यादाओं को नारियों के लिये अलग से न सिर्फ सुविधाजनक बल्कि अनिवार्य भी बता कर नारियों की ‘पवित्रता’ को मान कर चलने पर बल दिया करती है । सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के प्रतिनिधि वकील आजकल कमोवेश वैसे ही सुप्रीम कोर्ट के लिये हमेशा एक प्रकार के शुचितावाद का झंडा उठाये रहते हैं, जबकि वे खुद एक ऐसी सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिसने लगता है, शासन की शुचिता और नैतिकता को पूरी तरह से अमान्य करके चलने की शपथ ले रखी है।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश महोदय ने आकाश तक फैली अपनी सीमा की घोषणा करके अदालत के कमरे में तो अपने नैतिक तेज का परिचय दिया, लेकिन व्यवहार में, अर्थात् इस मामले विशेष में न्याय देने के मामले में भी क्या वे अपनी इस स्वतंत्र उड़ान की क्षमता का परिचय दे पाएं, यह विचार का एक महत्वपूर्ण पहलू है जिस पर जरूर गौर किया जाना चाहिए । इस बात की जांच की जानी चाहिए कि जब सारी दुनिया जानती है कि इस मामले में महाराष्ट्र के एनसीपी के नेता अजित पवार ने एक प्रकार की जालसाजी करके एनसीपी के विधायकों के हस्ताक्षरों के साथ फडनवीस को समर्थन की चिट्ठी राज्यपाल को सौंपी थी, तब क्या आकाश तक अपनी पहुंच रखने का दावा करने वाला सुप्रीम कोर्ट इस मामूली अपराधपूर्ण साजिश के तथ्यों को ही देख पाने की अपनी क्षमता का परिचय दे पा रहा है ?

 उसके विपरीत, जब अदालत में राष्ट्रपति शासन को हटाए जाने के औचित्य के विषय को उठाया गया तो सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल यह कह कर कि वह अभी राज्यपाल की कार्रवाई पर विचार नहीं कर रहा है, खुद ही अपनी सीमा बांध ली । आकाश तक पहुंच की बात एक क्षण में जैसे कोरी लफ्फाजी में बदल गई । यह सच है कि इस खास मामले में समय का एक पहलू भी न्याय से ही जुड़ा हुआ पहलू है । अपराधी तो खुद समय ही चाहते हैं ताकि वे अरबों रुपये खर्च करके आराम से विधायकों की खरीद कर सकें ।

इस प्रकार की घोड़ों की खरीद-बिक्री को रोकना भी न्याय का एक जरूरी अंग है। इसीलिये सुप्रीम कोर्ट किसी दूसरी बात में उलझना नहीं चाहता है। उन दूसरी बातों पर विचार के लिये उसे कुछ अतिरिक्त समय की जरूरत पड़ सकती है । फिर भी इस मामले में, अब सुप्रीम कोर्ट के सामने एनसीपी के नये नेता के चयन और उद्धव ठाकरे को उसके 54 विधायकों के समर्थन के शपथ पत्र के अलावा रात के बारह बजे से लेकर सुबह छः बजे के अंदर आनन-फानन में राजभवन से लेकर दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन और गृह मंत्रालय के कार्यालय की नग्न साजिशाना गतिविधियों के तथ्य इतने साफ हैं कि न्यूनतम जनतांत्रिक और संवैधानिक निष्ठा के आधार पर ही उन पर तत्काल एक निश्चित राय सुनाई जा सकती है ।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट सहित भारत की सभी संवैधानिक संस्थाओं के अभी के हालात को देखते हुए शायद ही कोई भी सुप्रीम कोर्ट से इस प्रकार की प्रखरता और तत्परता की उम्मीद करता है । सुप्रीम कोर्ट तत्काल विधानसभा में शक्ति परीक्षण का आदेश दे दे, उसे इस अनैतिक साजिश में भागीदार राज्यपाल की मर्जी पर न छोड़े, इसे ही सब अपना अहोभाग्य मानेंगे । अन्यथा, आज के निराशापूर्ण माहौल में लोग इस आशंका से भी इंकार नहीं करते हैं कि ‘आकाश तक अपनी सीमा’ का दावा करने वाला सुप्रीम कोर्ट सोलिसिटर जनरल का उपदेश मान कर इस विषय में अपनी असमर्थता की बात करता हुआ कन्नी काटने लगे ! सभी प्रकार के लकीर के फकीर, यथास्थितिवादियों का यह जाना हुआ रूप होता है कि वे रोग के कारणों को शरीर की सीमा की हद तक तो देखने के लिये तैयार रहते हैं लेकिन शरीर के बाहर के पर्यावरण की तरह के विषयों पर जाने से कतराते हैं ।

आदमी के शरीर के तमाम रोगों का कोई संबंध उसके परिवेश, बाहर के दबावों से पैदा होने वाले तनावों से भी होता है, जो शरीर के अंगों को प्रभावित किया करता है, उस ओर रुख करना उनके पेशे की नैतिकता के बाहर का विषय होता है । कानून अपने दायरे के बजाय जब तक विचारधारा के व्यापक दायरे में — मानव कल्याण, स्वतंत्रता और समानता के दायरों में — विचरण करने की जहमत नहीं उठायेगा, आकाश तक अपनी सीमा का उसका दावा हमेशा खोखला बना रहेगा। तब बार-बार तात्कालिक शासन के दबाववश बाबरी मस्जिद के बारे में आए हुए फैसलों की तरह के उद्भट फैसले भी आते रहेंगे ! बहरहाल, कल सुबह साढ़े दस बजे तक की प्रतीक्षा की जानी चाहिए । कल के फैसले से पता चलेगा कि इस मामले की बेंच के विचार की सीमा कितनी दूर तक है !

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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