Wednesday, October 20, 2021

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अन्नदाताओं के खिलाफ बिगड़ते बीजेपी नेताओं के बोल!

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एक तरफ जहां किसान आंदोलन को पूरे देश से समर्थन मिल रहा है। वहीं भाजपा नेताओं के अन्नदाताओं के खिलाफ बोल बिगड़ गए हैं। भाजपा के नेता और समर्थक पूरी ताकत ये नैरेटिव सेट करने में लगा रहे हैं कि आंदोलनकारी किसान नहीं हैं और ये आंदोलन किसी और की साजिश है। हाल ऐसा है कि मानों सब में होड़ लगी है अन्नदाता के लिए सबसे ज्यादा खराब बात कौन बोलेगा। अन्नदाता को लेकर सबसे ज्यादा झूठ कौन बोलेगा। इन नेताओं की बतोलेबाजी को देखते हुए इनके समर्थक भी सोशल मीडिया पर किसानों के लिए जहर उगल रहे हैं, लेकिन पूरा देश अपने अन्नदाताओं के साथ खड़ा है। भाजपा के मंत्रियों, पदाधिकारियों के एक के बाद एक लगातार ऐसे बयान सामने आ रहे हैं, जो किसानों को और इस आंदोलन को अपमानित कर रहे हैं।

बात शुरू करते हैं सीधे नरेंद्र मोदी से। देश भर में चल रहे किसान आंदोलन के बीच पिछले दिनों नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के धुले के किसान जितेंद्र भोइजी का मन की बात कार्यक्रम में जिक्र किया था और कहा था कि नए कृषि कानूनों की वजह से जितेंद्र भोइजी को महीनों का बकाया पैसा मिल सका। बीबीसी सीधे धुले में जितेंद्र भोइजी के पास पहुंचा तो पता चला कि मोदी जी के मन की बात तो झूठी निकली। उल्टे उन्होंने भोइजी के मन की बात ही नहीं सुनी। भोइजी को अपने मक्के का पैसा तो मिल गया, मगर एमएसपी से इतना कम मिला कि उनको लाखों का नुकसान हो गया। किसान आंदोलन के बीच अपने मन की बात के माध्यम से मोदी जी देश भर में झूठ फैला रहे हैं। और तो और, किसान आंदोलन की पवित्रता को विपक्ष की साजिश करार देने वाले उनके कई बयान आ चुके हैं।

इसके बाद मोदी जी के इस झूठ को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं स्मृति ईरानी। स्मृति ईरानी ने मोदी जी के मन की बात का यही झूठा वीडियो लेकर ट्वीट किया है और कहा है कि विपक्षी दल जिन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं, उन्हीं कानूनों के कारण विपक्ष शासित महाराष्ट्र के धुले जिले के किसान जितेंद्र भोइजी को महीनों का बकाया पैसा मिल सका। विपक्ष के विरोध में दरअसल किसानहित नहीं बल्कि उनकी अपनी स्वार्थ निहित राजनीति मात्र है। यह कहकर स्मृति ईरानी ने किसान आंदोलन के बीच एक बार फिर से झूठ बोला है, या यूं कहें कि अधूरा सच बोला है, जिसकी फैक्ट चेकिंग बीबीसी ऑलरेडी कर चुका है कि किसान को एमएसपी नहीं मिली, उसे लाखों रुपयों का नुकसान हुआ।

अब चलते हैं एक और केंद्रीय मंत्री की ओर। केंद्रीय मंत्री वीके सिंह को दिल्ली और आसपास प्रदर्शन कर रहे हजारों लोग किसान नहीं लग रहे हैं। दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे किसानों के प्रदर्शन को लेकर वीके सिंह ने कहा कि जिनको कोई मतलब नहीं है, वो भी दिख रहे हैं। जब मैं फोटो देखता हूं तो बहुत से लोग उनमें किसान दिखाई नहीं देते हैं। उसमें बहुत कम किसान दिखाई देते हैं। जो चीज किसानों के हित में है वह की गई है।

केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने कहा, “स्वामिनाथन कमेटी की रिपोर्ट में भी मांग थी। समय-समय पर मांग होती रही कि किसान को आजादी होनी चाहिए कि वह किसी का बंधुआ न रहे। यह काम सरकार ने कर दिया कि मंडी में बेचना चाहते हो तो बेचो और अगर बाहर बेचना चाहते हैं तो भी वे बेच सकते हैं। इसमें किसान को नहीं बाकी लोगों को तकलीफ हो रही है। इसमें विपक्ष के साथ-साथ उन लोगों का हाथ है जो कमीशन खाते हैं।” शायद वीके सिंह के हिसाब से किसान को एकदम फटेहाल दिखना चाहिए। मोदी 15 लाख का सूट पहनें तो वह गरीब का बेटा मान्य है, मगर किसान जींस पहन ले तो वीके सिंह को वह किसान नजर नहीं आते हैं। वीके सिंह ने यह भी कहा कि इस बिल से किसानों को नहीं, बल्कि बाकी लोगों को ज्यादा दिक्कत है। 

जहां एक तरफ हरियाणा की तमाम खाप पंचायत समेत कई संगठन किसान आंदोलन के साथ हैं, वहीं हरियाणा के कृषि मंत्री जेपी दलाल ने किसान आंदोलन पर बेतुका बयान दिया है। उन्होंने कहा कि किसानों के नाम पर चीन, पाकिस्तान और बाकी दुश्मन देश भारत को अस्थिर करना चाहते हैं। उन्होंने तो इसे पाकिस्तान की साजिश बता डाला और कंगना रानौत की तरह दिल्ली की तुलना लाहौर और कराची तक से कर डाली। दिल्ली के रास्ते, पानी बंद करने या घेर कर बैठने पर उन्होंने कहा कि यह लाहौर या कराची नहीं, देश की राजधानी है। इस तरह का विरोध अच्छी बात नहीं है। वह किसानों से कहेंगे कि सद्बुद्धि से काम लें और बातचीत करके मामले को सुलझाएं। साथ ही कृषि मंत्री जेपी दलाल ने कृषि कानून को सेकेंडरी बताते हुए कहा कि हरियाणा के किसानों के लिए पहला मुद्दा सिंचाई है और बाकी मुद्दे सेकेंडरी हैं, क्योंकि हरियाणा के किसान के लिए पानी नहीं होगा तो फसल कैसे होगी।

इस सिलसिले को जारी रखते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री रतनलाल कटारिया किसानों के आंदोलन पर कहने लगे कि इन लोगों को यहीं मरना था। दरअसल हरियाणा के अंबाला में रेलवे अंडरब्रिज का शिलान्यास करने पहुंचे कटारिया को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने न केवल कटारिया को काले झंडे दिखाए, बल्कि जमकर मोदी सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी की। किसानों ने प्रदर्शनकारी किसानों पर दर्ज किए गए मुकदमों पर भी विरोध जताया। इस बात से कटारिया इतने क्रोधित हो गए कि जो कुछ उनके मुंह में आया, वह बोलना शुरू कर दिया।

भाजपा के ही एक और नेता मनोज तिवारी जो कि भोजपुरी अभिनेता और गायक भी हैं, का कहना है कि आंदोलनकारी टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य लगते हैं। कृषि कानून पूरी तरह से किसानों के हक में है। उन्‍होंने कहा कि संसद द्वारा पारित कृषि कानूनों को पंजाब छोड़ कर सभी राज्‍यों ने स्‍वीकार कर लिया है। केंद्र सरकार आंदोलनरत किसानों की हर बात सुनने और विचार करने को तैयार है। मनोज तिवारी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल कृषि कानूनों को लेकर देश में भ्रम फैला रहे हैं। किसानों से झूठ बोलकर उन्‍हें भड़का रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्‍य की ओर बढ़ रहे हैं। नए कृषि कानूनों से किसान आर्थिक रूप से मजबूत होगा।

ऊलजुलूल बयानों की इस झड़ी में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा की ये लोग किसान नहीं लगते हैं। किसान तो खेत में अच्छे लगते हैं। हालांकि अपने इस बयान पर योगी आदित्यनाथ खुद ही ट्रोल हो गए। सोशल मीडिया पर उनके इस बयान के जवाब में लोगों ने लिखना शुरू किया कि योगी मठ में अच्छे लगते हैं राजनीति की कुर्सी पर नहीं। भाजपा नेताओं और समर्थकों के बयान कृषि कानून से नाराज किसानों के गुस्से की आग में पेट्रोल डालने का काम कर रहे हैं।

कर्नाटक के कोडागु जिले के पोनमपेट में किसानों को संबोधित करते हुए भाजपाई कृषि मंत्री बीसी पाटिल ने कहा कि जो किसान आत्महत्या करते हैं, वे कायर हैं। जो सिर्फ अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल नहीं कर सकता, वह आत्महत्या कर लेता है। बीजेपी के ये मंत्री महोदय पोन्नमपेट के बांस उत्पादकों को समझा रहे थे कि खेती का धंधा कितना लाभदायक है, लेकिन कुछ कायरों को इस बात का अहसास नहीं होता है और वे आत्महत्या कर लेते हैं। मंत्री जी के इस बयान पर जब लोग भड़क उठे तो उन्होंने पलटी मार दी। बोले मैंने किसानों को नहीं सब आत्महत्या करने वालों को कायर कहा था। किसान तो हमारे देश की रीढ़ हैं। मैं उनके लिए कैसे गलत बोल सकता हूं।

  • अनीता मिश्रा

(अनीता मिश्रा युवा पत्रकार हैं।)

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